130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक 2025

130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक 2025

पाठ्यक्रम – मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र – 2 – भारतीय राजनीति एवं शासन व्यवस्था के अंतर्गत – संसद, संवैधानिक निकाय, 130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक, 2025,  संवैधानिक निर्णय और मामले 

प्रिलिम्स के लिए – संसद, मंत्रिपरिषद, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988, विधायी निगरानी में संसद और न्यायपालिका की भूमिका।

 

खबरों में क्यों ? 

 

 

  • हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा 130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक, 2025 लोकसभा में प्रस्तुत किया गया है, जिसने भारत में एक बार फिर से राजनीतिक और संवैधानिक चर्चाओं को नई दिशा दी है। यह विधेयक मंत्रियों की जवाबदेही, नैतिकता और सुशासन को केंद्र में रखते हुए एक ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया है। 
  • इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य गंभीर आपराधिक आरोपों में लिप्त और हिरासत में लिए गए मंत्रियों को पद से हटाने हेतु स्पष्ट और प्रभावी संवैधानिक व्यवस्था स्थापित करना है।
  • यह विधेयक ऐसे समय में आया है, जब राजनीति के अपराधीकरण और प्रशासनिक नैतिकता को लेकर जनचिंता चरम पर है। 
  • भारत के उच्चत्तम न्यायालय के अनेक निर्देशों, विधि आयोग की रिपोर्टों और सिविल सोसायटी के दबाव के बाद यह स्पष्ट हुआ है कि वर्तमान कानूनी ढाँचा मंत्रियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में अपर्याप्त है। ऐसे में यह संशोधन विधेयक एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सुधार की संभावना लेकर आया है।

 

130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक, 2025 विधेयक के मुख्य प्रावधान : 

 

130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक, 2025 भारत के संविधान में तीन प्रमुख अनुच्छेदों—75, 164 और 239AA—में संशोधन का प्रस्ताव करता है। इन अनुच्छेदों के अंतर्गत क्रमशः केंद्र सरकार, राज्य सरकार और केंद्रशासित प्रदेशों की मंत्रिपरिषदों का गठन और संचालन शामिल है।

 

  • मंत्रियों के लिए कठोर मापदंड : यदि कोई मंत्री (प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री सहित) पाँच वर्ष या उससे अधिक की सज़ा वाले अपराध में लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहता है, तो उसे पद से हटाया जाएगा। यह कार्रवाई प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। राज्य सरकार के सन्दर्भ में यह निर्णय मुख्यमंत्री की सलाह पर राज्यपाल द्वारा किया जाएगा। रिहाई के पश्चात् यदि संबंधित व्यक्ति दोषमुक्त होता है, तो उसका निष्कासन प्रतिवर्ती (reversible) हो सकता है, अर्थात वह पुनः पद ग्रहण कर सकता है।
  • नैतिकता को सुनिश्चित करना और सुशासन को सुदृढ़ करना : इस विधेयक का स्पष्ट उद्देश्य है—संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखना, सुशासन को सुदृढ़ करना और यह सुनिश्चित करना कि गंभीर आपराधिक आरोपों में लिप्त व्यक्ति मंत्री पद का दुरुपयोग न कर सकें

 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA) से संबंधित वर्तमान कानूनी ढाँचा और उसकी सीमाएँ : 

 

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA) : इस अधिनियम के धारा 8 के अंतर्गत केवल दोषसिद्धि (conviction) होने पर ही किसी विधायक या मंत्री को अयोग्य ठहराया जा सकता है। यानी मात्र गिरफ्तारी या आरोप के आधार पर उन्हें पद से नहीं हटाया जा सकता। उदाहरण के लिए – यदि किसी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अंतर्गत दोषी ठहराया जाता है और सिर्फ जुर्माना लगाया जाता है, तब भी वह 6 वर्षों तक अयोग्य हो जाता है। यदि सज़ा में कारावास है, तो अयोग्यता की अवधि सज़ा की अवधि + 6 वर्ष तक लागू रहती है।
  • निर्दोषता की धारणा का प्रभावित होना : भारतीय न्याय व्यवस्था में “जब तक दोष सिद्ध न हो, तब तक व्यक्ति निर्दोष माना जाता है” की धारणा प्रभावी है। इसलिए, केवल आरोप या गिरफ्तारी के आधार पर किसी मंत्री को पद से हटाना अब तक उचित नहीं माना गया है।

 

विधेयक से संबंधित प्रमुख न्यायिक दृष्टिकोण : 

 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर मंत्रियों की जवाबदेही के प्रश्न पर विचार किया है:

  • मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014) : इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को ऐसे व्यक्तियों को मंत्री नियुक्त करने से बचना चाहिए, जिन पर गंभीर अपराधों के आरोप हों, हालांकि, कानूनी रूप से रोक नहीं लगाई है , बल्कि इसमें केवल नैतिक सलाह दी गई है।
  • पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018) : इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि अयोग्यता से संबंधित कानून बनाने का अधिकार केवल संसद के पास है। न्यायालय ने सख्त कानून की सिफारिश की थी जिससे राजनीतिक दल गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपियों को टिकट न दें।
  • अरविंद केजरीवाल केस (2024) : दिल्ली के मुख्यमंत्री शराब नीति मामले में गिरफ्तारी और जमानत के बाद उन्हें मंत्री पद छोड़ने के लिए बाध्य नहीं किया गया, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया।
  • वी. सेंथिल बालाजी केस (2025) : तमिलनाडु के मंत्री सेंथिल बालाजी पर नकद के बदले नौकरी घोटाले का आरोप था। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद और स्वतंत्रता में से एक चुनने का निर्देश दिया। उन्होंने अंततः मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
  • इन सभी निर्णयों में यह स्पष्ट है कि कानून में स्पष्ट प्रावधानों की कमी के कारण न्यायालय केवल नैतिकता की बात कर सकता है, लेकिन किसी मंत्री को हटाने की विधायी शक्ति संसद के पास ही है।

 

वर्तमान विधेयक में नए प्रावधानों की आवश्यकता क्यों है ?

 

 

  • राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण को रोकना : एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 45% विधायक आपराधिक मामलों का सामना कर रहे हैं, जिनमें से 29% पर गंभीर आरोप हैं। मौजूदा कानून के तहत केवल दोषसिद्धि के बाद कार्रवाई होती है, जिससे आरोपी मंत्री वर्षों तक पद पर बने रहते हैं।
  • सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही को सुनिश्चित करना और नैतिकता का प्रश्न : मंत्री होने के नाते व्यक्ति के पास जांच को प्रभावित करने की क्षमता होती है। लंबे समय तक मुकदमा चलने के दौरान भी मंत्री पद पर बने रहने से निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं।
  • लोकतंत्र और शासन में आम जनता के विश्वास की पुनर्स्थापना करना : जब सरकार के मंत्री गंभीर आरोपों के बावजूद पद पर बने रहते हैं, तो इससे जनता का विश्वास कमजोर होता है। सरकार की नैतिकता और पारदर्शिता को बनाए रखने हेतु स्पष्ट नियम आवश्यक हैं।

 

समाधान की राह : 

 

  1. संवैधानिक एवं कानूनी रूप से सुधार करने को सुनिश्चित करने की आवश्यकता : संसद को स्पष्ट कानून बनाने की आवश्यकता है, जिससे गंभीर आरोपों में हिरासत में लिए गए मंत्री पद पर बने न रह सकें। विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999), 244वीं रिपोर्ट (2014), और चुनाव आयोग की सिफारिशें (2004) इस दिशा में पहले ही सुझाव दे चुकी हैं।
  2. पारदर्शी नियुक्ति प्रक्रिया को सुनिश्चित करना : राजनीतिक दलों को ऐसे व्यक्तियों को मंत्री पद पर नियुक्त करने से परहेज़ करना चाहिए, जिन पर जघन्य अपराधों के आरोप हों। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों के लिये दिशानिर्देश बनाए जाएँ कि वे निष्पक्ष छवि वाले व्यक्तियों को ही नियुक्त करें।
  3. संसदीय निगरानी तंत्र एवं लंबित मामलों का नियमित प्रकटीकरण अनिवार्य किया जाना : मंत्रियों के आचरण पर निगरानी रखने हेतु संसद में नैतिकता समितियाँ, आचरण समीक्षा प्रकोष्ठ, तथा स्वतंत्र लोकपाल जैसे तंत्रों को और मजबूत किया जाना चाहिए। उनकी संपत्ति, देनदारियाँ एवं लंबित मामलों का नियमित प्रकटीकरण अनिवार्य किया जाए।
  4. आचार संहिता एवं नैतिक शासन के तहत आंतरिक जवाबदेही तंत्र विकसित किए जाने की आवश्यकता : एक अनिवार्य मंत्रिस्तरीय आचार संहिता लागू की जानी चाहिए, जो पारदर्शिता, जवाबदेही, और जनता की सेवा को प्राथमिकता दे। राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक जवाबदेही तंत्र विकसित किए जाएं, जो नैतिक मानकों का पालन सुनिश्चित करें।

 

निष्कर्ष :

 

 

  1. 130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक, 2025 भारतीय लोकतंत्र के सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं दूरगामी कदम है। यह संशोधन केवल एक विधायी प्रयास नहीं है, बल्कि भारतीय शासन प्रणाली को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और नैतिक बनाने की दिशा में एक ठोस पहल है।
  2. वर्तमान समय में राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण, जनता के प्रति जवाबदेही की कमी, तथा न्यायिक प्रक्रिया की सुस्ती जैसे मुद्दों ने लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर करने का खतरा पैदा किया है। ऐसे में यह विधेयक इन चुनौतियों से निपटने हेतु एक सार्थक उपाय के रूप में सामने आता है।
  3. यह संशोधन मंत्रियों के लिए उच्च नैतिक मानदंड स्थापित करने का प्रयास करता है, जिससे सत्ता में बैठे लोग कानून से ऊपर न समझे जाएँ और उनके कार्यों की सख्त समीक्षा की जा सके। 
  4. अब तक यह देखा गया है कि कई बार राजनीतिक पदों का प्रयोग निजी स्वार्थों के लिए किया जाता रहा है, जिससे जनता का भरोसा तंत्र पर से उठता जा रहा है। यह विधेयक इस मानसिकता को तोड़ता है और एक ऐसा ढांचा प्रस्तुत करता है जिसमें पद का दुरुपयोग नहीं बल्कि जनसेवा सर्वोच्च प्राथमिकता हो।
  5. 130वाँ संशोधन यह स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी व्यवस्था है जो नैतिक मूल्यों, पारदर्शिता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व पर आधारित होती है। इस विधेयक के माध्यम से सरकार यह संदेश देती है कि सत्ता का उद्देश्य जनता की सेवा है, न कि व्यक्तिगत रूप से लाभ कमाना।
  6. हालाँकि, यह भी आवश्यक है कि इस कानून के क्रियान्वयन में निष्पक्षता, पारदर्शिता और न्याय का पूरी तरह पालन हो। यदि इसे राजनीतिक प्रतिशोध या विरोधियों को दबाने के उपकरण के रूप में प्रयोग किया गया, तो इसका मूल उद्देश्य ही विफल हो जाएगा। इसलिए, इसके संतुलित उपयोग की आवश्यकता होगी, जहाँ कानून सबके लिए समान रूप से लागू हो।
  7. इसके साथ ही राजनीतिक दलों पर भी यह नैतिक जिम्मेदारी आती है कि वे अपने उम्मीदवारों और मंत्रियों का चयन करते समय केवल योग्यता और नैतिकता को प्राथमिकता दें, न कि जाति, धर्म या बाहुबल जैसे कारकों को। यह परिवर्तन केवल कानून बनाकर संभव नहीं होगा, जब तक राजनीतिक संस्कृति में मूलभूत सुधार नहीं लाया जाता।
  8. अंततः, यह कहा जा सकता है कि 130वाँ संविधान संशोधन विधेयक 2025 भारत के लोकतंत्र को अधिक परिपक्व, जवाबदेह और नैतिक बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। 
  9. यदि इस विधेयक की भावना को ईमानदारी से लागू किया गया, तो यह भारत को एक ऐसे शासन मॉडल की ओर ले जा सकता है जहाँ सत्ता का मूलाधार केवल शक्ति नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व, ईमानदारी और जनसेवा होगी। यही लोकतंत्र की असली आत्मा है, और इसी दिशा में यह संशोधन एक मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है।

 

स्रोत – पी. आई. बी एवं इंडियन एक्सप्रेस।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. 130वाँ संविधान (संशोधन) विधेयक, 2025 के अनुसार किस स्थिति में किसी मंत्री को पद से हटाया जा सकता है?

  1. उस मंत्री पर अगर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हों।
  2. यदि वह मंत्री लगातार 30 दिन तक हिरासत में रहे और अपराध की सजा 5 वर्ष या उससे अधिक की हो।
  3. संबंधित मंत्री यदि संसद में बहुमत खो दे, लेकिन विधानसभा में उसका बहुमत हो।
  4. यदि उक्त मंत्री के संबंध में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति/राज्यपाल निर्णय लें।

नीचे दिए गए कूट के आधार पर सही विकल्प का चयन कीजिए : 

A. केवल 1 और 3 

B. केवल 2 और 4 

C. इनमें से कोई नहीं।

D. उपरोक्त सभी।

उत्तर – B

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. राजनीति में नैतिकता की भूमिका कितनी आवश्यक है? क्या आज की राजनीतिक व्यवस्था में नैतिक मूल्यों का स्थान शेष रह गया है? क्या आप सहमत हैं कि राजनीति और नैतिकता एक साथ नहीं चल सकते? अपने विचार उदाहरणों सहित प्रस्तुत कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 ) 

 

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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