13 Aug स्वदेशी आंदोलन और आत्मनिर्भर भारत : ‘मेड इन इंडिया से मेड फॉर इंडिया’ तक
पाठ्यक्रम – सामान्य अध्ययन – प्रश्नपत्र – 1 के अंतर्गत – भारत का इतिहास, कला एवं संस्कृति, आधुनिक भारतीय इतिहास, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन से संबंधित प्रमुख घटना और महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में स्वदेशी आंदोलन का महत्त्व और प्रभाव
प्रारंभिक परीक्षा के लिए – स्वदेशी आंदोलन 1905, राष्ट्रीय हथकरघा दिवस, बंगाल विभाजन, आत्मनिर्भर भारत अभियान, मेक इन इंडिया, भारत की आर्थिक नीतियों में स्वदेशी आदर्शों की प्रासंगिकता
खबरों में क्यों?

- हाल ही में 7 अगस्त 2025 को ‘ राष्ट्रीय हथकरघा दिवस 2025 ’ मनाया गया।
- भारत हर वर्ष 7 अगस्त को ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ के रूप में मनाता है। यह दिवस 1905 के स्वदेशी आंदोलन की स्मृति में मनाया जाता है, जिसकी शुरुआत 7 अगस्त 1905 के दिन ही हुई थी।
- यह आंदोलन भारतीयों द्वारा ब्रिटिश शासन के आर्थिक व सांस्कृतिक वर्चस्व के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण प्रतिरोध था। इसमें हथकरघा उद्योग और स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया गया।
स्वदेशी आंदोलन की उत्पत्ति का मुख्य उद्देश्य :
- बंगाल विभाजन (1905) : ब्रिटिश सरकार ने बंगाल को धार्मिक आधार पर पूर्वी (मुस्लिम बहुल) और पश्चिमी (हिंदू बहुल) हिस्सों में बाँटने का निर्णय लिया। यह राष्ट्रवादी एकता को तोड़ने की साजिश मानी गई।
- लॉर्ड कर्जन की नीतियाँ : कर्जन द्वारा लागू दमनकारी नीतियाँ, जैसे कलकत्ता निगम सुधार और भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम (1904), जो भारत के मध्यम वर्ग के असंतोष और रोष का मुख्य कारण था।
- कलकत्ता टाउन हॉल बैठक (अगस्त 1905) : इसी बैठक में स्वदेशी आंदोलन का औपचारिक आरंभ हुआ। इसमें लोगों से ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी उत्पाद अपनाने का आह्वान किया गया था।

स्वदेशी आंदोलन : प्रमुख रणनीतियाँ और आधुनिक संदर्भ
स्वदेशी आंदोलन की प्रमुख कार्यप्रणालियाँ :
- ब्रिटिश वस्तुओं का बहिष्कार और स्वदेशी को प्रोत्साहन : ब्रिटिश उपनिवेशवाद की आर्थिक नींव को कमजोर करने के उद्देश्य से भारतीय जनता को विदेशी वस्त्रों व उत्पादों का बहिष्कार करने का आह्वान किया गया। इसके स्थान पर स्थानीय कारीगरों द्वारा निर्मित घरेलू उत्पादों को अपनाने और प्रोत्साहित करने पर बल दिया गया, जिससे आर्थिक आत्मनिर्भरता को बल मिला।
- राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली की स्थापना : विदेशी शिक्षा संस्थानों के बहिष्कार के परिणामस्वरूप भारतीय मूल्यों और सांस्कृतिक आत्मा पर आधारित वैकल्पिक शैक्षिक संस्थानों की नींव रखी गई।
- छात्रों में स्वदेशी शिक्षा की ओर झुकाव होना : सन 1905 के कार्लाइल सर्कुलर में आंदोलनरत छात्रों की छात्रवृत्तियाँ रद्द करने की धमकी दी गई, जिससे छात्रों में स्वदेशी शिक्षा की ओर झुकाव बढ़ा। 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना हुई, जिसने बंगाल नेशनल कॉलेज एवं बंगाल तकनीकी संस्थान की स्थापना में अहम भूमिका निभाई।
- स्वयंसेवी संगठनों व समितियों का गठन : स्वदेशी विचारधारा को जनसामान्य तक पहुँचाने हेतु अनेक समितियाँ एवं संगठन गठित किए गए। बारिसल की ‘स्वदेश बंधु समिति’ अश्विनी कुमार दत्ता के नेतृत्व में, एक प्रभावशाली जनआंदोलन का केंद्र बनी।
- लोक-उत्सवों का उपयोग जनजागरण के माध्यम के रूप में : गणपति उत्सव, शिवाजी जयंती जैसे सांस्कृतिक आयोजनों का प्रयोग राष्ट्रवाद और स्वदेशी चेतना को फैलाने हेतु किया गया। 1905 में रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षाबंधन को हिन्दू-मुस्लिम एकता और बंगाल विभाजन के विरोध के प्रतीक रूप में प्रयोग किया।
- आत्मबल और सामाजिक सुधार : स्वदेशी आंदोलन केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक पुनर्जागरण का भी माध्यम बना। आंदोलन ने ‘आत्म शक्ति’ (स्वबल) का संदेश दिया और जातिगत भेदभाव, बाल विवाह, दहेज, नशाखोरी जैसे सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध चेतना जागृत की।
स्वदेशी आंदोलन के विभिन्न चरण :

- उदारवादी चरण : प्रारंभिक दौर में आंदोलन शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीकों जैसे याचिकाएँ देना, शांतिपूर्ण सभाएँ करना और सार्वजनिक रूप से वक्तव्य देना जैसे तरीकों पर आधारित था। सुरेंद्रनाथ बनर्जी जैसे नेताओं ने आत्मनिर्भरता की भावना को बल देते हुए स्वदेशी को अपनाने का आग्रह किया।
- क्रांतिकारी या उग्रवादी चरण : भारत के स्वतंत्रता – संग्राम में जब शांतिपूर्ण उपायों से अपेक्षित परिणाम नहीं मिले, तो इसके नेतृत्वकर्ताओं द्वारा प्रतिरोधात्मक रुख अपनाया जाने लगा। लाल-बाल-पाल (बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय, बिपिन चंद्र पाल) ने सविनय अवज्ञा, बहिष्कार और स्वशासन की माँग को तीव्र किया। उन्होंने निष्क्रिय प्रतिरोध के साथ-साथ, सशस्त्र संघर्ष के विकल्प को भी समर्थन दिया।
समकालीन भारत में स्वदेशी आंदोलन की प्रासंगिकता :
- ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान : वर्तमान सरकार द्वारा शुरू किया गया यह मिशन स्वदेशी आंदोलन की भावना का आधुनिक पुनरुपयोग है। महामारी के दौरान शुरू की गई यह योजना लगभग 20 लाख करोड़ रुपए (GDP का ~10%) के प्रोत्साहन के साथ प्रारंभ हुई। ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘लोकल फॉर ग्लोबल’ जैसे नारों के माध्यम से भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का केंद्र बनाने की दिशा में प्रयास हो रहे हैं।
- ‘मेक इन इंडिया’ पहल : यह पहल घरेलू निर्माण को वैश्विक मंच पर प्रतिस्पर्धी बनाने हेतु आरंभ की गई थी। वर्ष 2015 में FDI जहाँ 45 अरब डॉलर था, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 81.04 अरब डॉलर हो गया। निर्यात भी 2024 में 437 अरब डॉलर तक पहुँच गया। भारत अब दुनिया का 60% टीका उत्पादन करता है। भारतीय रक्षा उत्पादों (जैसे ‘मेड इन बिहार’ जूते) का उपयोग रूसी सेना तक में किया जा रहा है।
- उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएँ (PLI) : PLI योजनाओं के तहत 14 प्रमुख क्षेत्रों को निर्यातोन्मुखी और तकनीकी रूप से सशक्त बनाया जा रहा है।
- खादी और ग्रामोद्योग का पुनरुत्थान : खादी, जो गांधीजी के स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक रही है, आज भी रोज़गार, स्वावलंबन और सांस्कृतिक चेतना का माध्यम है। वर्ष 2013 से 2025 तक KVIC के उत्पादन में 347%, बिक्री में 447% और रोजगार में 49% की वृद्धि दर्ज की गई।
- आर्थिक राष्ट्रवाद और संरक्षणवाद को प्राथमिकता देना : भारत अब आयात प्रतिस्थापन, शुल्क संरक्षण, और देशी कंपनियों के लिए नीतिगत समर्थन जैसे उपायों को अपनाकर घरेलू उद्योगों को प्राथमिकता दे रहा है।
परंपरा और नवाचार का संगम राष्ट्रीय हथकरघा दिवस :
- भारत में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस हर वर्ष 7 अगस्त को मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य देश के हथकरघा बुनकरों और उनके योगदान को सम्मान देना है। इस दिन को वर्ष 2015 में भारत सरकार ने औपचारिक मान्यता दी थी, ताकि हथकरघा उद्योग की सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक भूमिका को व्यापक रूप से रेखांकित किया जा सके।
- 2025 की थीम : “हथकरघा – महिला सशक्तिकरण, राष्ट्र सशक्तिकरण” है।
- वर्ष 2025 के राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की विषयवस्तु, “परंपरा में नवाचार को बुनना (Weaving Innovation into Tradition)” और “हथकरघा – महिला सशक्तिकरण, राष्ट्र सशक्तिकरण”, महिला बुनकरों की अहम भूमिका को उजागर करती है। ये महिलाएँ न केवल पारंपरिक कलाओं को जीवित रख रही हैं, बल्कि अपने परिवारों और समाज के आर्थिक उत्थान में भी सक्रिय योगदान दे रही हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में हथकरघा क्षेत्र का महत्त्व :
- रोज़गार और स्वावलंबन का साधन : हथकरघा उद्योग भारत का सबसे बड़ा पारंपरिक कुटीर उद्योग है, जिसमें 35 लाख से अधिक कारीगर संलग्न हैं। इन श्रमिकों में एक बड़ी संख्या – लगभग 72% महिलाएँ – हैं, जिन्हें इससे आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त होती है।
- पर्यावरणीय और सांस्कृतिक स्थिरता : यह क्षेत्र सतत विकास और पर्यावरण के प्रति उत्तरदायी उत्पादन का प्रतीक है। हथकरघा वस्त्र न केवल जैविक और टिकाऊ होते हैं, बल्कि वे भारतीय सांस्कृतिक विरासत की पहचान भी बने हुए हैं।
- वैश्विक स्तर पर पहचान : भारत आज दुनिया का सबसे बड़ा हथकरघा उत्पादक है, और वैश्विक उत्पादन का लगभग 95% हिस्सा भारत से आता है। भारत से निर्यात होने वाले प्रमुख हथकरघा उत्पादों में चटाइयाँ, कालीन, रग्स, बेडशीट्स, कुशन कवर और सिल्क स्कार्फ शामिल हैं।
- FY 2023 में भारत ने लगभग 10.94 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य के हथकरघा उत्पादों का निर्यात किया था। FY 2024 में यह निर्यात 20 से अधिक देशों को हुआ, जिसमें अमेरिका प्रमुख आयातक रहा, उसके बाद यूएई, स्पेन, ब्रिटेन, फ्रांस और इटली प्रमुख बाजार रहे।
हथकरघा क्षेत्र के लिए भारत सरकार की प्रमुख पहलें :
- राष्ट्रीय हथकरघा विकास कार्यक्रम (NHDP) : यह कार्यक्रम बुनकरों को डिज़ाइन सहायता, कच्चा माल, विपणन सहयोग, तकनीकी उन्नयन और बुनियादी संरचना प्रदान करता है, जिससे उनका समग्र विकास सुनिश्चित हो।
- कच्चा माल आपूर्ति योजना (RMSS) : इस योजना के अंतर्गत गुणवत्तापूर्ण धागे की उपलब्धता सुनिश्चित की जाती है, साथ ही माल भाड़ा अनुदान और 15% धागा सब्सिडी से बुनकरों को पावरलूम उद्योग के समकक्ष प्रतिस्पर्धा करने में मदद मिलती है।
- प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) : बुनकरों को छोटे और मध्यम ऋण उपलब्ध कराकर उन्हें स्वरोज़गार की ओर प्रोत्साहित किया जाता है।
- वर्कशेड योजना : बुनकरों के घरों के निकट परिवार-आधारित कार्यस्थल तैयार किए जाते हैं। योजना के तहत पात्र बुनकरों को 75% से लेकर 100% तक की वित्तीय सहायता दी जाती है।
- भौगोलिक संकेत (GI) संरक्षण : देशभर के 104 हथकरघा उत्पादों को GI टैग प्रदान कर उनकी पारंपरिकता और विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण दिया गया है।
- सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM) से जुड़ाव : लगभग 1.8 लाख बुनकर GeM पोर्टल से जुड़कर अपने उत्पादों को सरकारी खरीद के लिए उपलब्ध करा चुके हैं, जिससे उनके उत्पादों को व्यापक बाज़ार मिला है।
- सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ : बुनकर समुदाय के लिए PMJJY, PMSBY और महात्मा गांधी बुनकर बीमा योजना (MGBBY) के माध्यम से बीमा और अन्य सामाजिक सुरक्षा लाभ उपलब्ध कराए जाते हैं।
निष्कर्ष :

- स्वदेशी आंदोलन महज़ एक ऐतिहासिक घटनाक्रम नहीं था, बल्कि यह आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक न्याय का एक जीवंत प्रतीक था।
- आज जब भारत वैश्विक मंच पर एक सशक्त आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, तो पारंपरिक उद्योगों, विशेषकर हथकरघा जैसे क्षेत्रों का संरक्षण केवल सांस्कृतिक उत्तराधिकार की रक्षा नहीं करता, बल्कि यह आर्थिक समावेशन, महिला सशक्तिकरण और सतत विकास की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
- राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल बुनकरों के सम्मान का दिवस नहीं है, बल्कि यह हमारी उस साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक है जो स्थानीय कौशल, महिला नेतृत्व, पर्यावरणीय संतुलन और सांस्कृतिक संरक्षण को आगे बढ़ाती है।
- आज आवश्यकता है कि पारंपरिक हथकरघा उद्योग को आधुनिक डिज़ाइन, तकनीकी नवाचार और प्रभावी नीतियों के साथ जोड़ा जाए, जिससे यह एक समावेशी और सतत् आर्थिक मॉडल का आधार बन सके।
- हथकरघा केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा है—जो हमारे अतीत की गौरवशाली परंपरा और भविष्य की संभावनाओं को जोड़ता है।
- यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि आर्थिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक स्वाभिमान और पर्यावरणीय संतुलन जैसे आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने वे स्वदेशी आंदोलन के दौर में थे। हमें इस अमूल्य विरासत को संरक्षित ही नहीं, बल्कि सशक्त बनाकर आगे बढ़ाने की ज़रूरत है।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान में स्वदेशी आंदोलन की किन-किन मूल अवधारणाओं को समाहित किया गया है?
- विदेशी निवेश को पूर्णतः प्रतिबंधित करना
- ‘वोकल फॉर लोकल’ योजना का आह्वान करना
- घरेलू विनिर्माण और निर्माण क्षेत्र को प्रोत्साहन देना
- भारतीय उत्पादों का वैश्विक स्तर पर प्रचार करना
नीचे दिए गए कूट के माध्यम से सही उत्तर का चयन करें:
A. केवल 1, 2 और 3
B. केवल 2, 3 और 4
C. इनमे से कोई नहीं।
D. उपरोक्त सभी।
उत्तर – B
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. स्वदेशी आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उससे संबंधित प्रमुख रणनीतियों एवं समकालीन भारत में इसकी वर्तमान प्रासंगिकता की चर्चा करते हुए ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ के संदर्भ में भारत में हथकरघा उद्योग की सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

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