निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

पाठ्यक्रम : जीएस – 2 भारतीय राजनीति और शासन

निष्क्रिय इच्छामृत्यु और गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

समाचार में क्यों?

  • सर्वोच्च न्यायालय ने एक अस्पताल को निर्देश दिया है कि वह एक मेडिकल बोर्ड बनाए, जो 32 वर्षीय व्यक्ति के लिये निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के अनुरोध का मूल्यांकन करे। यह व्यक्ति पिछले 12 वर्षों से लगातार शारीरिक रूप से बेहोशी की स्थिति (Persistent Vegetative State- PVS) में है।
  • शारीरिक रूप से बेहोशी की स्थिति (PVS) एक चिकित्सीय स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी उच्च मस्तिष्क क्रियाएँ (जैसे चेतना, सोचने की क्षमता और उद्देश्यपूर्ण गतिविधियाँ) खो देता है, लेकिन मूलभूत शारीरिक क्रियाएँ जैसे साँस लेना, रक्त संचार, नींद-जागरण चक्र और रिफ्लेक्स बनी रहती हैं।

क्या आप जानते हैं?

यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) और असिस्टेड सुसाइड (सहायता प्राप्त आत्महत्या) अलग-अलग हैं:
यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) में आमतौर पर कोई व्यक्ति (अधिकतर डॉक्टर) प्रत्यक्ष रूप से रोगी के जीवन का अंत करता है, जबकि असिस्टेड सुसाइड में व्यक्ति को अपने जीवन का अंत करने के लिये साधन या मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जाता है।
सुसाइड टूरिज़्म या यूथेनेशिया टूरिज़्म तब होता है जब मरीज उन देशों की यात्रा करते हैं जहाँ ये प्रथाएँ कानूनी रूप से मान्य हैं। स्विट्ज़रलैंड इसका एक प्रमुख गंतव्य है, जहाँ मुख्यतः यूके, जर्मनी और फ्राँस के मरीज आते हैं।

इच्छामृत्यु क्या है?

परिचय : इच्छामृत्यु/यूथेनेशिया उस प्रक्रिया को कहते हैं जिसमें किसी व्यक्ति की असाध्य या अंतिम अवस्था वाली बीमारी के कारण होने वाले असहनीय दर्द को समाप्त करने के लिये उसके जीवन को जानबूझकर समाप्त किया जाता है। इसका उद्देश्य व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कष्ट से मुक्त करना होता है। यूथेनेशिया दो प्रकार का होता है:
सक्रिय इच्छामृत्यु : इसमें किसी रोगी के जीवन को जानबूझकर समाप्त किया जाता है। यह विभिन्न रूपों में हो सकता है:
स्वैच्छिक : जिसमें रोगी सचेत रूप से स्वयं मृत्यु का विकल्प चुनता है।
गैर-स्वैच्छिक : जिसमें विशेषज्ञ चिकित्सक या कोई अन्य व्यक्ति द्वारा रोगी की असमर्थता या अचेत स्थिति के कारण उसके स्थान पर निर्णय लिया जाता है।
अनैच्छिक : जिसमें बिना सहमति के किसी व्यक्ति की मृत्यु कराई जाती है यह लगभग सभी देशों में अवैध है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु : यह उस स्थिति को दर्शाता है जब रोगी असाध्य रूप से बीमार हो और ठीक होने की कोई वास्तविक संभावना न हो, तब जीवन-रक्षक उपकरण या चिकित्सा उपचार को रोकना या वापस लेना, जिससे मृत्यु स्वाभाविक रूप से होती है।
यह तरीका व्यक्ति के गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को बनाए रखने और अपरिवर्तनीय चिकित्सा स्थितियों में होने वाली लंबी, व्यर्थ पीड़ा को रोकने का उद्देश्य रखता है।

भारत में कानूनी स्थिति:

सक्रिय इच्छामृत्यु: भारतीय कानून सक्रिय इच्छामृत्यु को प्रतिबंधित करता है। भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS), 2023 के अनुसार, किसी भी व्यक्ति की मृत्यु जानबूझकर कराना दंडनीय अपराध है। इसे दोषपूर्ण हत्या (Section 100) या हत्या (Section 101) के तहत अपराध माना जाता है और इसके लिये अभियोजन चलाया जा सकता है।
निष्क्रिय इच्छामृत्यु: सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने कुछ कड़ी शर्तों और सीमाओं के तहत निष्क्रिय इच्छामृत्यु को मान्यता दी है, बशर्ते यह रोगी के सर्वोत्तम हित में हो और कानूनी प्रक्रिया का सही पालन किया गया हो।
अनुच्छेद 21 यह सुनिश्चित करता है कि किसी को भी जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से केवल कानून के अनुसार ही वंचित नहीं किया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय इसे स्वास्थ्य, आजीविका, गोपनीयता, आवास और गरिमा सहित समझती है। हालाँकि यह सामान्यतः मृत्यु का अधिकार शामिल नहीं करता, सिवाय कुछ विशेष परिस्थितियों के जहाँ गरिमापूर्ण मृत्यु की अनुमति दी जाती है।
कानून आयोग का रुख: लॉ कमीशन की 241वीं रिपोर्ट (2012) में स्पष्ट किया गया कि एक सक्षम रोगी जीवन-रक्षक उपचार अस्वीकार कर सकता है और इसका कोई कानूनी दंड नहीं होगा। इसके अलावा यदि डॉक्टर रोगी की सूचित इच्छाओं के अनुसार कार्रवाई करते हैं, तो उन्हें उकसावे या दोषपूर्ण हत्या का दोष नहीं माना जाएगा।

संबंधित न्यायिक निर्णय:

मारुति श्रीपति दुबल बनाम महाराष्ट्र राज्य (1987): बॉम्बे हाई कोर्ट ने यह निर्णय दिया कि मृत्यु का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने कहा कि असाध्य रूप से बीमार या गंभीर पीड़ा में रहने वाले व्यक्तियों को अपनी मृत्यु का विकल्प चुनने की अनुमति दी जानी चाहिये।
ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य (1996) : सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जीवन का अधिकार मृत्यु के अधिकार को शामिल नहीं करता। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि जीवन एक प्राकृतिक उपहार है, जिसे समाप्त करने के बजाय सुरक्षित और संरक्षित रखा जाना चाहिये।
अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ (2011) : सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि जीवन-रक्षक उपचार को रोकना या बंद करना संभव है, भले ही रोगी निर्णय लेने में असमर्थ हो, लेकिन यह केवल कड़ी कानूनी और चिकित्सीय सुरक्षा उपायों के तहत ही किया जा सकता है।
कॉमन कॉज़ बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2018) : सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सक्रिय इच्छामृत्यु (जानबूझकर मृत्यु का कारण बनना) और निष्क्रिय इच्छामृत्यु (जीवन-रक्षक उपचार को हटाना) अलग-अलग हैं, यह कहते हुए कि बहुत कम मामलों में पैसिव यूथेनेशिया की स्वीकृति दी जा सकती है।
न्यायालय ने यह स्थापित किया कि एक असाध्य रूप से बीमार व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का मौलिक अधिकार है, जिसमें अग्रिम चिकित्सा निर्देश या लिविंग विल के माध्यम से उपचार से इंकार करने का अधिकार भी शामिल है।

सर्वोच्च न्यायालय के इच्छामृत्यु संबंधी निर्देश:

वर्ष 2018 के निर्देश:  वर्ष 2018 के दिशानिर्देशों में दो चरणों में चिकित्सा समीक्षा की आवश्यकता थी:
प्राथमिक चिकित्सा बोर्ड: यह अस्पताल द्वारा गठित किया जाता है, जिसमें उपचार करने वाले विभाग के प्रमुख और कम से कम तीन विशेषज्ञ शामिल होते हैं। ये विशेषज्ञ सामान्य चिकित्सा, कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, नेफ्रोलॉजी, मनोरोग या ऑन्कोलॉजी में से हों और प्रत्येक के पास 20 वर्षों का अनुभव होना चाहिये।
द्वितीयक चिकित्सा बोर्ड : यह ज़िला कलेक्टर द्वारा नियुक्त किया जाता है। इसमें अध्यक्ष के रूप में मुख्य ज़िला चिकित्सा अधिकारी और समान क्षेत्रों के तीन विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल होते हैं।
वर्ष 2023 में किये गए संशोधन : सर्वोच्च न्यायालय ने दोनों चिकित्सा बोर्डों को बरकरार रखा, लेकिन विशेषज्ञों के अनुभव की आवश्यकता को 20 वर्ष से घटाकर 5 वर्ष कर दिया और राय देने के लिये 48 घंटे की सीमा निर्धारित की।
अब द्वितीयक बोर्ड में मुख्य ज़िला चिकित्सा अधिकारी (CDMO) शामिल नहीं होंगे और उनके स्थान पर ज़िला चिकित्सा अधिकारी (DMO) द्वारा नामित सदस्य हो सकता है। दोनों बोर्डों में अब तीन-तीन सदस्य होंगे।
इच्छामृत्यु पर वैश्विक स्थिति : नीदरलैंड, लक्ज़मबर्ग और बेल्ज़ियम में इच्छामृत्यु और चिकित्सकीय सहायता प्राप्त आत्महत्या दोनों की अनुमति है, बशर्ते व्यक्ति असहनीय पीड़ा झेल रहा हो तथा उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो।
स्विट्ज़रलैंड गैर-चिकित्सकों को भी असाध्य रोगियों को आत्महत्या में सहायता करने की अनुमति देता है, हालाँकि सक्रिय इच्छामृत्यु वहाँ अवैध है।
ऑस्ट्रेलिया भी दोनों प्रकार की इच्छामृत्यु को अनुमति देता है, लेकिन केवल उन वयस्कों के लिये, जिनमें निर्णय लेने की पूर्ण क्षमता हो और जो जानलेवा बीमारी से पीड़ित हों।
ये वैश्विक भिन्नताएँ दर्शाती हैं कि इच्छामृत्यु मूलतः एक नैतिक मुद्दा है, जिसे चिकित्सा क्षमता से अधिक समाज के नैतिक मूल्यों, सिद्धांतों और दार्शनिक परंपराएँ आकार देती हैं।

इच्छामृत्यु पर प्रमुख नैतिक दृष्टिकोण क्या हैं?

इच्छामृत्यु के पक्ष में तर्क

इच्छामृत्यु के विरोध में तर्क

स्वायत्तता की सर्वोच्चता (लिबर्टेरियनिज़्म): जॉन स्टुअर्ट मिल के लिबरलिज़्म के आधार पर समर्थक तर्क देते हैं कि व्यक्ति अपने शरीर और मन पर पूर्ण अधिकार रखता है। इसलिये सक्षम वयस्क को आत्म-निर्णय का अधिकार है, जिसमें असहनीय जीवन को समाप्त करने का विकल्प भी शामिल है—बिना राज्य के हस्तक्षेप के।

जीवन की पवित्रता (डीऑन्टोलॉजी): इमैनुएल कांट की कर्त्तव्यनिष्ठ नैतिकता बताती है कि मानव जीवन ‘अपने आप में एक लक्ष्य’ है, किसी साधन की तरह नहीं। इसलिये जानबूझकर जीवन समाप्त करना—भले ही दर्द से राहत के लिये हो—मानवता को एक साधन की तरह उपयोग करना है, जो प्राकृतिक कानून के उस कर्त्तव्य का उल्लंघन करता है जिसमें जीवन की रक्षा आवश्यक है, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी हो।

पीड़ा को कम करना (यूटिलिटेरियनिज़्म): जेरेमी बेंथम के एक्ट यूटिलिटेरियनिज़्म के अनुसार, किसी भी क्रिया का नैतिक मूल्य इस तर्क पर निर्भर करता है कि वह सुख को कितना बढ़ाती और दर्द को कितना कम करती है। चूँकि लंबे समय तक चलने वाली पीड़ा का कोई सकारात्मक उद्देश्य नहीं होता, इसलिये इच्छामृत्यु को एक दयालु और तार्किक विकल्प माना जाता है जो विश्व में कुल पीड़ा को कम करता है।

सहनशीलता का मूल्य (वर्च्यू एथिक्स): गुण-नैतिकतावादी तर्क देते हैं कि पीड़ा, यद्यपि कठिन है, मानव अस्तित्व का हिस्सा है और यह साहस तथा धैर्य जैसी गुणों की मांग करती है। गांधीवादी नैतिकता (अहिंसा) सक्रिय रूप से जीवन लेने को स्वीकार नहीं करती और यह सुझाव देती है कि आध्यात्मिक शक्ति जीवन के प्राकृतिक अंत का सामना करने में है, न कि उसे समय से पहले समाप्त करने में।

जीव विज्ञान पर परोपकार: चिकित्सा नैतिकता का (Beneficence) सिद्धांत (अर्थात् रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना) यह दर्शाता है कि डॉक्टर का कर्त्तव्य पीड़ा को कम करना है। जब इलाज असंभव हो जाता है और दर्द असहनीय होता है तो एक शांत मृत्यु में सहायता करना चिकित्सा पेशे के मानवीय दायित्व को पूरा करना माना जाता है।.

‘हानि न पहुँचाना’ (Non-Maleficence):

चिकित्सा नैतिकता का मूल सिद्धांत Primum non nocere—’पहले, हानि न पहुँचाओ’—हिप्पोक्रेटिक ओथ से उत्पन्न हुआ है।

विरोधियों का तर्क है कि डॉक्टर का कार्य उपचार करना है, न कि जीवन समाप्त करना।

यूथेनेशिया में शामिल होना चिकित्सा पेशे के उद्देश्य (telos) को भ्रष्ट करता है और डॉक्टर–रोगी के बीच भरोसे को नष्ट कर देता है।

रैशनल रिसोर्स मैनेजमेंट (प्रैग्मैटिज़्म): प्रैक्टिकल यूटिलिटेरियन दृष्टिकोण से देखा जाए तो PVS (परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट) मरीज़ों के लिये लाइफ़ सपोर्ट बनाए रखने में बहुत कम मेडिकल संसाधन लगते हैं। इन फंड्स को इलाज वाले मरीज़ों तक रीडायरेक्ट करना डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस के सिद्धांत को बनाए रखता है, जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को लाभ होता है।

‘स्लिपरी स्लोप’ (नियम-उपयोगितावाद):

नियम-उपयोगितावादी चेतावनी देते हैं कि भले ही किसी विशेष मामले में इच्छामृत्यु दयालु प्रतीत हो, लेकिन इसे वैध बनाने से एक खतरनाक नियम स्थापित हो जाता है। इससे ‘स्लिपरी स्लोप’ का जोखिम उत्पन्न होता है, जहाँ समाज अंततः लागत बचाने के नाम पर बुजुर्गों, दिव्यांगों या गरीबों की अनैच्छिक हत्या को भी उचित ठहराने लग सकता है, जिससे नैतिकता प्रभावित होती है।

 

स्वायत्तता की सर्वोच्चता (लिबर्टेरियनिज़्म) : जॉन स्टुअर्ट मिल के लिबरलिज़्म के आधार पर समर्थक तर्क देते हैं कि व्यक्ति अपने शरीर और मन पर पूर्ण अधिकार रखता है। इसलिये सक्षम वयस्क को आत्म-निर्णय का अधिकार है, जिसमें असहनीय जीवन को समाप्त करने का विकल्प भी शामिल है—बिना राज्य के हस्तक्षेप के।

जीवन की पवित्रता (डीऑन्टोलॉजी) : इमैनुएल कांट की कर्त्तव्यनिष्ठ नैतिकता बताती है कि मानव जीवन ‘अपने आप में एक लक्ष्य’ है, किसी साधन की तरह नहीं। इसलिये जानबूझकर जीवन समाप्त करना—भले ही दर्द से राहत के लिये हो—मानवता को एक साधन की तरह उपयोग करना है, जो प्राकृतिक कानून के उस कर्त्तव्य का उल्लंघन करता है जिसमें जीवन की रक्षा आवश्यक है, चाहे उसकी गुणवत्ता कैसी भी हो।

पीड़ा को कम करना (यूटिलिटेरियनिज़्म) : जेरेमी बेंथम के एक्ट यूटिलिटेरियनिज़्म के अनुसार, किसी भी क्रिया का नैतिक मूल्य इस तर्क पर निर्भर करता है कि वह सुख को कितना बढ़ाती और दर्द को कितना कम करती है। चूँकि लंबे समय तक चलने वाली पीड़ा का कोई सकारात्मक उद्देश्य नहीं होता, इसलिये इच्छामृत्यु को एक दयालु और तार्किक विकल्प माना जाता है जो विश्व में कुल पीड़ा को कम करता है।

सहनशीलता का मूल्य (वर्च्यू एथिक्स) :  गुण-नैतिकतावादी तर्क देते हैं कि पीड़ा, यद्यपि कठिन है, मानव अस्तित्व का हिस्सा है और यह साहस तथा धैर्य जैसी गुणों की मांग करती है। गांधीवादी नैतिकता (अहिंसा) सक्रिय रूप से जीवन लेने को स्वीकार नहीं करती और यह सुझाव देती है कि आध्यात्मिक शक्ति जीवन के प्राकृतिक अंत का सामना करने में है, न कि उसे समय से पहले समाप्त करने में।

जीव विज्ञान पर परोपकार : चिकित्सा नैतिकता का (Beneficence) सिद्धांत (अर्थात् रोगी के सर्वोत्तम हित में कार्य करना) यह दर्शाता है कि डॉक्टर का कर्त्तव्य पीड़ा को कम करना है। जब इलाज असंभव हो जाता है और दर्द असहनीय होता है तो एक शांत मृत्यु में सहायता करना चिकित्सा पेशे के मानवीय दायित्व को पूरा करना माना जाता है।.

‘हानि न पहुँचाना’ (Non-Maleficence):

  • चिकित्सा नैतिकता का मूल सिद्धांत ( Primum non nocere)’पहले, हानि न पहुँचाओ’—हिप्पोक्रेटिक ओथ से उत्पन्न हुआ है।
  • विरोधियों का तर्क है कि डॉक्टर का कार्य उपचार करना है, न कि जीवन समाप्त करना।
  • यूथेनेशिया में शामिल होना चिकित्सा पेशे के उद्देश्य (telos) को भ्रष्ट करता है और डॉक्टर–रोगी के बीच भरोसे को नष्ट कर देता है।
  • रैशनल रिसोर्स मैनेजमेंट (प्रैग्मैटिज़्म): प्रैक्टिकल यूटिलिटेरियन दृष्टिकोण से देखा जाए तो PVS (परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट) मरीज़ों के लिये लाइफ़ सपोर्ट बनाए रखने में बहुत कम मेडिकल संसाधन लगते हैं। इन फंड्स को इलाज वाले मरीज़ों तक रीडायरेक्ट करना डिस्ट्रिब्यूटिव जस्टिस के सिद्धांत को बनाए रखता है, जिससे ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को लाभ होता है।

‘स्लिपरी स्लोप’ (नियम-उपयोगितावाद):

नियम-उपयोगितावादी चेतावनी देते हैं कि भले ही किसी विशेष मामले में इच्छामृत्यु दयालु प्रतीत हो, लेकिन इसे वैध बनाने से एक खतरनाक नियम स्थापित हो जाता है। इससे ‘स्लिपरी स्लोप’ का जोखिम उत्पन्न होता है, जहाँ समाज अंततः लागत बचाने के नाम पर बुजुर्गों, दिव्यांगों या गरीबों की अनैच्छिक हत्या को भी उचित ठहराने लग सकता है, जिससे नैतिकता प्रभावित होती है।

निष्कर्ष:

सर्वोच्च न्यायालय का यह हस्तक्षेप ‘गरिमा के साथ मरने के अधिकार’ के प्रति भारत के विकसित होते दृष्टिकोण को मज़बूत करता है। यह कानूनी सुरक्षा उपायों को दयालु देखभाल के साथ जोड़ते हुए एक संरचित और चिकित्सकीय रूप से समीक्षा किये गए पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) प्रक्रिया को सुनिश्चित करता है।

 

 प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न: 

Q. निजता के अधिकार को जीवन एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत भाग के रूप में संरक्षित किया जाता है। भारत के संविधान में निम्नलिखित में से किससे उपर्युक्त कथन सही एवं समुचित ढंग से अर्थित होता है?
(a) अनुच्छेद 14 एवं संविधान के 42वें संशोधन के अधीन उपबंध
(b) अनुच्छेद 17 एवं भाग IV में दिये गए राज्य के नीति निदेशक तत्त्व
(c) अनुच्छेद 21 एवं भाग III में गारंटी की स्वतंत्रताएँ
(d) अनुच्छेद 24 एवं संविधान के 44वें संशोधन के अधीन उपबंध

उत्तर: C

 मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q. सक्रिय और निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Euthanasia) में अंतर बताइये। जीवन-रक्षक उपकरण हटाने के लिये सर्वोच्च न्यायालय ने कौन-से प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय निर्धारित किये हैं?            ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )

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