शांति विधेयक (SHANTI BILL 2025) : भारत की परमाणु ऊर्जा क्रांति 

शांति विधेयक (SHANTI BILL 2025) : भारत की परमाणु ऊर्जा क्रांति 

SHANTI BILL 2025 (शांति विधेयक 2025) : भारत की परमाणु ऊर्जा क्रांति 

पाठ्यक्रम : जीएस 3-  विज्ञान और प्रौद्योगिकी 

परिचय : 

13 दिसंबर 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने “सस्टेनेबल हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI)” विधेयक को मंजूरी दी। यह विधेयक भारत की ऊर्जा नीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने का उद्देश्य रखता है। वर्तमान में भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता लगभग 7.48 गीगावाट है, जो कुल बिजली उत्पादन का मात्र 2-3% है। शांति विधेयक का लक्ष्य वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट की क्षमता हासिल करना है, जो भारत को स्वच्छ और सतत ऊर्जा स्रोतों की ओर ले जाएगा। यह विधेयक परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 और अन्य संबंधित कानूनों को एकीकृत कर एक व्यापक कानूनी ढांचा स्थापित करेगा।

पृष्ठभूमि : 

भारत में परमाणु ऊर्जा का विकास 1948 में परमाणु ऊर्जा आयोग (AEC) की स्थापना से शुरू हुआ। 1962 के परमाणु ऊर्जा अधिनियम ने इस क्षेत्र को सरकारी नियंत्रण में रखा, जहां परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) और न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (NPCIL) का एकाधिकार रहा। हालांकि, बढ़ती ऊर्जा मांग, जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता ने निजी क्षेत्र की भागीदारी को अनिवार्य बना दिया। 2010 के सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट (CLNDA) ने दुर्घटना दायित्व को परिभाषित किया, लेकिन निजी निवेशकों के लिए चुनौतियां बनी रहीं। शांति विधेयक इसी पृष्ठभूमि में आया है, जो नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्यों (2050 तक) और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा।

शांति विधेयक की प्रमुख विशेषताएं : 

शांति विधेयक परमाणु ऊर्जा क्षेत्र को अधिक समावेशी और नवोन्मेषी बनाने पर केंद्रित है। इसकी मुख्य विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

निजी क्षेत्र की भागीदारी: विधेयक परमाणु ऊर्जा की पूरी वैल्यू चेन—खनन, ईंधन उत्पादन, रिएक्टर निर्माण, संचालन और अपशिष्ट प्रबंधन—में निजी कंपनियों को प्रवेश की अनुमति देता है। इससे DAE का एकाधिकार समाप्त होगा, लेकिन विनियमन DAE और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (AERB) के अधीन रहेगा।
एकीकृत कानूनी ढांचा: वर्तमान कानूनों जैसे परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962; CLNDA, 2010; और अन्य संबंधित नियमों को एक ही अधिनियम में समाहित किया जाएगा। इससे विनियामकीय अस्पष्टता दूर होगी और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
सुरक्षा और पर्यावरण मानक: विधेयक में सख्त सुरक्षा प्रोटोकॉल, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के मानकों का पालन और पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (EIA) अनिवार्य किया गया है। स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs) जैसी नई तकनीकों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
निवेश प्रोत्साहन: कर छूट, सब्सिडी और विजिबिलिटी गैप फंडिंग (VGF) जैसे प्रावधान शामिल हैं, जो दीर्घकालिक परियोजनाओं को आकर्षक बनाएंगे।

महत्व और लाभ

शांति विधेयक भारत की ऊर्जा परिदृश्य को बदल सकता है। इसके प्रमुख लाभ निम्न हैं:

आर्थिक विकास: निजी निवेश से लाखों रोजगार सृजित होंगे और जीडीपी में योगदान बढ़ेगा। वर्ष 2047 तक 100 गीगावाट क्षमता से ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम होगी, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी।
प्रौद्योगिकी नवाचार: निजी क्षेत्र SMRs, थोरियम-आधारित रिएक्टर और उन्नत सुरक्षा प्रणालियों को अपनाएगा, जो भारत को वैश्विक परमाणु बाजार में प्रतिस्पर्धी बनाएगा।
ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण: परमाणु ऊर्जा स्वच्छ है, जो कोयला-आधारित बिजली से उत्सर्जन कम करेगी। यह भारत के पेरिस समझौते के प्रतिबद्धताओं को पूरा करेगा और ऊर्जा मिश्रण में विविधता लाएगा।
राष्ट्रीय सुरक्षा: घरेलू उत्पादन से ईंधन आयात पर निर्भरता कम होगी, जो भू-राजनीतिक जोखिमों से बचाव करेगा।

चुनौतियां और जोखिम

विधेयक के बावजूद कई चुनौतियां हैं:

सुरक्षा और दायित्व: CLNDA के तहत दायित्व सीमा (1500 करोड़ रुपये) निजी निवेशकों को हतोत्साहित कर सकती है। फुकुशिमा जैसी दुर्घटनाओं का डर बना रहता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा: संवेदनशील तकनीकों का निजीकरण अप्रसार (non-proliferation) जोखिम बढ़ा सकता है। कड़ी निगरानी और ट्रेसेबिलिटी आवश्यक है।
रियोजना विलंब: परमाणु संयंत्रों की लंबी अवधि (7-10 वर्ष) और उच्च लागत निवेशकों को दूर रख सकती है। स्थानीय विरोध और भूमि अधिग्रहण मुद्दे भी बाधा बन सकते हैं।
मानव संसाधन: कुशल जनशक्ति की कमी और प्रशिक्षण की आवश्यकता है।

आगे की राह : 

शांति विधेयक को सफल बनाने के लिए निम्न कदम उठाए जाने चाहिए:

विनियामकीय सुधार: AERB को स्वतंत्र और मजबूत बनाना, IAEA के साथ सहयोग बढ़ाना।
निवेश प्रोत्साहन: पीपीपी मॉडल, जोखिम-साझेदारी और अंतरराष्ट्रीय भागीदारी (जैसे US-India सिविल न्यूक्लियर डील) को मजबूत करना।
जन जागरूकता: परमाणु ऊर्जा की सुरक्षा और लाभों पर अभियान चलाना ताकि स्थानीय विरोध कम हो।
अनुसंधान फोकस: थोरियम-आधारित तकनीक पर निवेश, जो भारत के थोरियम भंडार का उपयोग करे।

निष्कर्ष : 

शांति विधेयक 2025 भारत को परमाणु ऊर्जा के माध्यम से आत्मनिर्भर और सतत विकास की ओर ले जाने वाला महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करेगा बल्कि जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में भी योगदान देगा। हालांकि, सुरक्षा और विनियामकीय चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। यह विधेयक ऊर्जा नीति, पर्यावरण और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े प्रश्नों के लिए प्रासंगिक है।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.निम्नलिखित में से कौन-सा विधेयक भारत में परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने का उद्देश्य रखता है?
(a) परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962
(b) सिविल लायबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज एक्ट, 2010
(c) शांति विधेयक, 2025
(d) राष्ट्रीय ऊर्जा नीति, 2017
उत्तर: (c) शांति विधेयक, 2025

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.शांति विधेयक 2025 के संदर्भ में भारत में परमाणु ऊर्जा विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी के महत्व, चुनौतियों और आगे की राह पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

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