भारत में नगरीकरण की स्थिति (The state of urbanization in India)

भारत में नगरीकरण की स्थिति (The state of urbanization in India)

भारत में नगरीकरण की स्थिति (The state of urbanization in India)

सामान्य अध्ययन-I : भारतीय समाज शहरीकरण जनसंख्या और संबद्ध मुद्देगरीबी और विकास संबंधी मुद्देसरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप
प्रिलिम्स के लिये : वैधानिक नगर, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY), भारतनेट, श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन, म्यूनिसिपल बॉण्ड, ईको-सेंसिटिव ज़ोन, AMRUT, जनांकिकीय लाभांश, शहरी स्थानीय निकाय (ULB), AMRUT 2.0, स्वच्छ भारत मिशन-नगरी 2.0, वित्त आयोग, प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना (PMFME), VB-G RAM G।

मेन्स के लिये : भारत में नगरीकरण की स्थिति, नगरीकरण को छोटे नगरों की ओर ले जाने वाले मुख्य कारक, इससे संबंधित चुनौतियाँ और आगे की राह

चर्चा में क्यों?

भारत में नगरीकरण का ट्रेंड तेज़ी से छोटे नगरों की ओर हो रहा है। यह तेज़ और अनियोजित वृद्धि संतुलित क्षेत्रीय विकास के लिये चुनौतियाँ और अवसर, दोनों प्रस्तुत करती है।
लगभग 9,000 वैधानिक कस्बों/नगरों में से केवल 500 बड़े नगर हैं, शेष नगरों में से अधिकांश ऐसे छोटे नगर हैं जिनकी जनसंख्या 1,00,000 से कम है और जो भारत के नगरी भविष्य को आकार देने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

भारत में नगरीकरण का छोटे नगरों की ओर रूपांतरण के पीछे मुख्य कारण क्या हैं?

महानगरों का संकुचन : दिल्ली, मुंबई और बंगलूरू जैसे महानगर आर्थिक रूप से संकुचित हो गए हैं, जहाँ भूमि की कीमतों में वृद्धि, अत्यधिक भीड़भाड़ और कर्मचारियों व मध्यम आकार के उद्योगों के लिये असहनीय जीवन-यापन लागत, लोगों को पूंजी कमाने के विकल्प तलाशने के लिये प्रेरित कर रही है।

विकेंद्रीकृत आर्थिक विकास : छोटे नगर ग्रामीण गैर-कृषि विविधीकरण के केंद्र के रूप में कार्य करते हैं, जो कृषि पर निर्भरता को कम करने के लिये कृषि-प्रसंस्करण, रसद और सेवाओं में रोज़गार प्रदान करते हैं।
सत्तेनपल्ले (आंध्र प्रदेश), धमतरी (छत्तीसगढ़) और बोगाईगाँव (असम) जैसे नगर इस बदलाव के उदाहरण हैं, जो मुख्य रसद केंद्र और सेवा केंद्रों के रूप में विकसित हुए हैं।
अवसंरचना और नीतिगत सुविधाकारक : प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (PMGSY) और राजकीय राजमार्गों जैसी अवसंरचना ने भौतिक पहुँच में सुधार किया है, हालाँकि डिजिटल कनेक्टिविटी (भारतनेट, मोबाइल एक्सेस) नगरों को व्यापक नेटवर्क में एकीकृत करती है। श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन और राज्य औद्योगिक एवं निवेश नीतियों जैसी नीतिगत पहलें नगरी सुविधाएँ प्रदान करने के साथ-साथ टियर-2 या 3 नगरों में इकाइयों को प्रोत्साहित करके विकास को और प्रोत्साहित करती हैं।
जनांकिकीय और सामाजिक कारक : शिक्षा और रोज़गार की तलाश में युवा ग्रामीण आबादी का नज़दीकी छोटे नगरों की ओर प्रवास बढ़ रहा है। साथ ही, बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और मनोरंजन सुविधाओं की बढ़ती मांग बड़े गाँवों को सेवा-केंद्रित नगरी केंद्रों में तेज़ी से रूपांतरित कर रही है।
जलवायु संवेदनशीलताओं के प्रति सहनशीलता : उनका छोटा आकार विकेंद्रीकृत प्रणालियों के माध्यम से बेहतर पर्यावरणीय प्रबंधन को संभव बनाता है और हीट आइलैंड प्रभाव को कम करता है, जिससे स्पंज सिटी लक्ष्यों के अनुरूप एक जलवायु-अनुकूल नगरीकरण मॉडल उपलब्ध होता है।
महानगरों की तुलना में छोटे नगर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकटों (जैसे– कोविड-19) के प्रति कम संवेदनशील होते हैं और आपदा-सहनीय अवसंरचना के क्रियान्वयन में अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं।
सामाजिक-सांस्कृतिक ताने-बाने का संरक्षण : छोटे नगर महानगरीय संस्कृति के एकरूपीकरण प्रभाव का प्रतिकार करते हुए आधुनिक आर्थिक अवसरों को स्थानीय भाषाओं, शिल्पों और परंपराओं के संरक्षण के साथ एकीकृत करते हैं। उदाहरण के लिये, कर्नाटक का श्रीरंगपट्टन नगरीय केंद्र के रूप में विकसित हुआ है, साथ ही उसने अपनी सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक संरचना को सूक्ष्मता से संरक्षित रखा है।

भारत में नगरीकरण की स्थिति : 

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, देश की कुल शहरी जनसंख्या 377 मिलियन से अधिक है, जो कुल जनसंख्या का 31.16% है।
संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (UN DESA) के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2025 तक भारत की लगभग 36% जनसंख्या नगरीय क्षेत्रों में निवास करेगी, जो वर्ष 2050 तक बढ़कर 50% तक हो जाने की संभावना है।
केवल भारत में ही वर्ष 2025 से 2050 के बीच 20 करोड़ से अधिक नए नगरी निवासी जुड़ेंगे।
नीति आयोग के अनुसार, नगरी क्षेत्र भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 63% का योगदान करते हैं, जो वर्ष 2030 तक 75% से अधिक और वर्ष 2050 तक 80% तक पहुँचने का अनुमान है।

नगरीकरण के समर्थन हेतु प्रमुख सरकारी पहल : 

स्मार्ट सिटीज़ मिशन (SCM) : सतत एवं समावेशी अवसंरचना, स्वच्छ पर्यावरण और स्मार्ट सिटी मैनेजमेंट के माध्यम से 100 चयनित नगरों का विकास करने का लक्ष्य।
अमृत 2.0 : सभी वैधानिक नगरों में सार्वभौमिक कार्यात्मक घरेलू नल जल आपूर्ति तथा 500 अमृत नगरों में 100% मल जल प्रबंधन सुनिश्चित करने का लक्ष्य।
प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी (PMAY-U) : सभी के लिये आवास के लक्ष्य के अंतर्गत बुनियादी सुविधाओं सहित पक्के मकान उपलब्ध कराना। लक्ष्य में मांग के अनुरूप मकानों की स्वीकृति एवं पूर्णता शामिल है (1.22 करोड़ से अधिक मकान स्वीकृत तथा PMAY-U 2.0 के अंतर्गत अतिरिक्त 1 करोड़ नगरीय परिवारों को कवर करने का लक्ष्य)।
दीन दयाल अंत्योदय योजना – राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (DAY-NULM): प्रशिक्षण, स्वरोज़गार सहायता, स्वयं सहायता समूहों की गतिशीलता और औपचारिकीकरण के माध्यम से सभी ज़िला मुख्यालयों और 1 लाख से अधिक जनसंख्या वाले नगरों में नगरीय गरीब परिवारों को कवर करने का लक्ष्य।

भारत में नगरीकरण के छोटे नगरों की ओर स्थानांतरण के साथ क्या चिंताएँ जुड़ी हैं?

गरीबी का नगरीकरण : मुख्य चिंता यह है कि छोटे नगर “ग्रामीण गरीबी के नगरीकरण” के स्थल बनते जा रहे हैं। वे गरीब आबादी को तो आत्मसात् कर लेते हैं, परंतु गरीबी से बाहर निकलने का मार्ग प्रदान करने में असफल रहते हैं।
रोज़गार मुख्यतः अत्यधिक अनौपचारिक और असुरक्षित कार्यों पर आधारित है। उदाहरण के लिये, बिना अनुबंध और सामाजिक सुरक्षा के निर्माण श्रमिक का कार्य।

शोषणकारी स्थानीय पदानुक्रमों का उदय : नई अनियमित अर्थव्यवस्थाएँ स्थानीय अभिजात वर्ग, रियल एस्टेट दलालों, ठेकेदारों, सूक्ष्म-वित्त संस्थाओं और राजनीतिक मध्यस्थों को भूमि, ऋण और श्रम पर नियंत्रण सुदृढ़ करने का अवसर देते हैं, जिससे स्थानीय असमानता और शोषण और गहरा होता जाता है।

शासन और संस्थागत कमियाँ : छोटे नगरों में अपनी आय के सीमित साधन तथा म्यूनिसिपल बॉण्ड जैसी संस्थागत वित्तीय सुविधाओं तक अपर्याप्त पहुँच होती है, जिससे वे लगातार राज्य एवं केंद्रीय अनुदानों पर निर्भर रहते हैं और स्वायत्त योजना बनाना मुश्किल हो जाता है। इसके साथ ही अधिकांश नगर मास्टर प्लान या भवन निर्माण नियमों के बिना विकसित होते हैं, जिससे अनियमित निर्माण, पर्यावरणीय संवेदनशील क्षेत्रों पर अतिक्रमण व भूमि के असंगत उपयोग की समस्या उत्पन्न होती है।
अवसंरचना और पारिस्थितिक कमी : अमृत (AMRUT) जैसे प्रमुख शहरी मिशनों का केंद्र मुख्य रूप से महानगर (Metropolitan cities) ही रहे हैं जिससे छोटे नगरों में अवसंरचना खंडित तथा अपर्याप्त रहती है। पाइप जलापूर्ति की कमी के कारण ये नगर निजी “टैंकर इकॉनमी” पर निर्भर हो जाते हैं और भूजल का अनियंत्रित दोहन होता है, जिससे गंभीर पारिस्थितिक दबाव उत्पन्न होता है।
जल आपूर्ति, सीवरेज नेटवर्क, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) और वर्षा जल निकासी में लगातार और गंभीर कमी बनी हुई है।
जनसांख्यिकीय लाभ का अपव्यय : इन शहरों की ओर पलायन करने वाली युवा आबादी के लिये गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास और औपचारिक नौकरियों के अभाव के कारण जनसांख्यिकीय लाभांश के व्यर्थ होने का जोखिम बढ़ गया है। उदाहरण के लिये डिलीवरी और राइड-हेलिंग जैसी गिग नौकरियाँ, जिनमें न तो नौकरी की सुरक्षा है और न ही कोई लाभ

संधारणीय नगरीकरण हेतु किन उपायों की आवश्यकता है?

अनौपचारिक नगरीय क्षेत्रों का औपचारिकीकरण : छोटे कस्बों को सशक्त बनाने के लिये, पात्रता रखने वाले ‘जनगणना वाले कस्बों’ को अनिवार्य रूप से ‘वैधानिक कस्बों’ के रूप में अधिसूचित किया जाना चाहिये। इसके बाद नवगठित शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) के लिये योजना और वित्त के क्षेत्र में व्यापक क्षमता निर्माण किया जाए। तत्पश्चात मौजूदा बस्तियों और प्राकृतिक संपदाओं (जल निकायों, वनों) को एकीकृत करने हेतु GIS-आधारित सहभागी मानचित्रण (जैसे– स्वामित्व योजना) का उपयोग करते हुए सरल, लचीली एवं लागू करने योग्य मास्टर प्लान व स्थानीय क्षेत्र योजनाएँ विकसित की जाएँ।

आधारभूत अवसंरचना का निर्माण : AMRUT 2.0, स्वच्छ भारत मिशन–शहरी 2.0 और वित्त आयोग अनुदानों के अभिसरण के माध्यम से जल आपूर्ति, विकेंद्रीकृत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) तथा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) जैसी सतत बुनियादी सेवाओं की 100% कवरेज सुनिश्चित की जाए। योजना निर्माण में गैर-मोटर चालित परिवहन नेटवर्क (पैदल पथ, साइकिल ट्रैक) को प्राथमिकता दी जाए एवं कार-केंद्रित मॉडल से बचा जाए।
स्थान-आधारित अर्थव्यवस्थाओं का उपयोग : स्थानीय तुलनात्मक लाभ के आधार पर अर्थव्यवस्थाओं का रणनीतिक विकास किया जाए, जैसे– एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर, हथकरघा व हस्तशिल्प हब, लॉजिस्टिक्स केंद्र या ईको-टूरिज़्म जैसा कि सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यमों के औपचारिकीकरण की योजना (PMFME) में परिकल्पित है।
“रूर्बन” क्लस्टर दृष्टिकोण अपनाना : श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन को उसकी मूल भावना में लागू करते हुए ऐसे रूर्बन क्लस्टर विकसित किये जाएँ, जहाँ छोटे शहर सेवा प्रदायगी में पैमाने की अर्थव्यवस्थाओं तथा आसपास के गाँवों के लिये केंद्र (एंकर) की भूमिका निभाएँ। एकीकृत विकास सुनिश्चित करने हेतु PMGSY, VB-GRAM सहित सभी केंद्रीय व राज्य योजनाओं का अभिसरण छोटे शहरों के शहरी स्थानीय निकाय (ULB) स्तर पर अनिवार्य किया जाए।

निष्कर्ष :

भारत में छोटे शहरों की तेज़ी से बढ़ती संख्या आर्थिक दबाव, जनसांख्यिकीय बदलाव और नीतिगत प्रोत्साहनों द्वारा प्रेरित संरचनात्मक शहरी परिवर्तन को दर्शाती है। ये शहर स्थानीयकृत विकास तथा जलवायु-सहनीय शहरीकरण के अवसर प्रदान करते हैं, लेकिन अनौपचारिकता, शासन संबंधी कमज़ोरियाँ, अवसंरचना की खामियाँ एवं शहरीकृत गरीबी जैसी चुनौतियाँ सतत शहरीकरण के लिये तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की मांग करती हैं।

  प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजियेः (2020)
1. शहरी क्षेत्रों में श्रमिक उत्पादकता (2004-05 की कीमतों पर प्रति कार्यकर्त्ता रुपए) में वृद्धि हुई, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह घट गई।
2. कार्यबल में ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिशत हिस्सेदारी में लगातार वृद्धि हुई।
3. ग्रामीण क्षेत्रों में गैर-कृषि अर्थव्यवस्था में वृद्धि हुई।
4. ग्रामीण रोज़गार में वृद्धि दर में कमी आई है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 3 और 4
(c) केवल 3
(d) केवल 1, 2 और 4
उत्तर: (b)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

“भारत में छोटे शहरों का बढ़ना समावेशी विकास के बजाय ‘ग्रामीण गरीबी का शहरीकरण’ का प्रतिनिधित्व करता है।” भारत के हालिया शहरी बदलाव के संदर्भ में इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये।    

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