लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2 – के अंतर्गत ‘ भारतीय संविधान एवं शासन व्यवस्था ’ से संबंधित। 

 

खबरों में क्यों ?

 

  • हाल ही में भारत के संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) पद की भूमिका और उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव (No-Confidence Motion) पेश होने की चर्चाएँ राजनीतिक गलियारों में ख़बरों में है।
  • वर्तमान में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा के पीछे मुख्य रूप से पक्षपात के आरोप और संसदीय कार्यवाही के संचालन को लेकर विपक्षी दलों में व्याप्त असंतोष है। 
  • भारत के संसदीय लोकतंत्र में लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) का पद लोकतांत्रिक मर्यादा, निष्पक्षता और शक्ति का प्रतीक होता है। 

 

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश होने का प्रमुख कारण : 

 

लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं – 

  1. विपक्षी सदस्यों का निलंबन : भारत में हाल के संसद सत्रों में रिकॉर्ड संख्या में सांसदों के निलंबन ने इस बहस को जन्म दिया है कि क्या अध्यक्ष सत्तापक्ष के दबाव में कार्य कर रहे हैं।
  2. दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) : हाल ही में महाराष्ट्र और अन्य राज्यों के उदाहरणों ने यह सवाल खड़ा किया है कि क्या स्पीकर दलबदल के मामलों में निर्णय लेने में अनावश्यक देरी करते हैं या पक्षपातपूर्ण निर्णय लेते हैं।
  3. विधेयकों को ‘धन विधेयक’ घोषित करना : कई बार सरकार पर आरोप लगता है कि वह राज्यसभा को दरकिनार करने के लिए सामान्य विधेयकों को स्पीकर के माध्यम से ‘धन विधेयक’ (Money Bill) घोषित करवा देती है।

 

लोकसभा स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया : 

 

  • भारत के संविधान के अनुच्छेद 94 और अनुच्छेद 96 में लोकसभा अध्यक्ष को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया का विस्तृत रूप से वर्णन किया गया है।

 

चरणबद्ध प्रक्रिया :

 

  1. लिखित रूप में 14 दिनों का नोटिस देना अनिवार्य होना : लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश करने से कम से कम 14 दिन पहले अध्यक्ष को लिखित रूप से सूचना देनी अनिवार्य है।
  2. लोकसभा की सहमति होना : प्रस्ताव को सदन में पेश करने के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
  3. प्रभावी बहुमत (Effective Majority) की आवश्यकता : स्पीकर को हटाने के लिए सदन के ‘तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत’ (Majority of all the then members) की आवश्यकता होती है। 
  4. इसका अर्थ है – कुल सीटें – रिक्त सीटें = प्रभावी संख्या। इस संख्या का 50% से अधिक मत अनिवार्य है।
  5. प्रक्रिया के दौरान स्पीकर की स्थिति : जब उन्हें हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो, तो वे सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकते हैं। हालांकि, उन्हें सदन में बोलने और कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होता है। उन्हें प्रथम दृष्टया मत देने का अधिकार होता है, लेकिन मत बराबर होने पर ‘कास्टिंग वोट’ देने का अधिकार नहीं होता है।

 

अविश्वास प्रस्ताव क्यों लाया जाता है ?

 

  • सदन में स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास लाने के पीछे कई राजनीतिक और संवैधानिक कारण होते हैं। जो निम्नलिखित है – 
  • संवैधानिक निष्पक्षता का अभाव होना : जब विपक्ष को लगता है कि अध्यक्ष केवल सरकार के एजेंडे को लागू कर रहे हैं और विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है।
  • राष्ट्रीय रूप से महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहस की अनुमति न देना या चर्चा से बचना : संसद में महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों (जैसे – बेरोजगारी, सुरक्षा, या आर्थिक संकट) पर स्थगन प्रस्ताव या चर्चा की अनुमति न देना भी सदन में स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास लाने के पीछे का एक महत्वपूर्ण कारण है।
  • सदन में स्पीकर द्वारा संसदीय गरिमा का उल्लंघन करना : यदि अध्यक्ष का आचरण सदन की नियमावली के अनुरूप न हो और वह यदि सदन में स्पीकर द्वारा संसदीय गरिमा का उल्लंघन करते हैं तो ऐसी स्थिति में भी सदन में स्पीकर के विरुद्ध अविश्वास लाया जा सकता है।

 

समाधान की राह :

 

  • भारत में लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आना संसदीय लोकतंत्र के लिए एक ‘संघर्ष या तनाव बिंदु’ है। इसका समाधान निम्नलिखित तरीकों से निकाला जाता है – 

 

संवैधानिक रूप से समाधान :

 

  • अंतिम निर्णय प्रक्रिया के रूप में मतदान होना : यदि लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो सदन में मतदान ही अंतिम निर्णय प्रक्रिया होता है। यदि बहुमत अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में है, तो लोकसभा के अध्यक्ष को तुरंत त्यागपत्र देना पड़ता है।

 

प्रक्रियात्मक रूप से समाधान :

 

  • सर्वदलीय बैठक : सदन में गतिरोध होने पर स्पीकर अक्सर सर्वदलीय बैठक बुलाते हैं ताकि विपक्ष की शिकायतों का निवारण किया जा सके।
  • स्पीकर का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आना और न्यायिक हस्तक्षेप : हालांकि सदन के भीतर की कार्यवाही में न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करता, लेकिन ‘किहोतो होलोहन’ (Kihoto Hollohan) केस के बाद भारत के सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दलबदल विरोधी मामलों में स्पीकर का निर्णय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है।

 

सुधार के सुझाव या आगे की राह :

 

लोकसभा अध्यक्ष के पद को विवादों से दूर रखने के लिए विशेषज्ञ कई सुझाव देते हैं:

  1. ब्रिटिश मॉडल का अपनाना : ब्रिटेन में परंपरा है कि ‘एक बार स्पीकर, हमेशा स्पीकर’। वहां अध्यक्ष चुने जाने के बाद व्यक्ति अपनी पार्टी से इस्तीफा दे देता है। भारत में भी स्पीकर को औपचारिक रूप से दलगत राजनीति से ऊपर उठना चाहिए।
  2. स्वतंत्र न्यायाधिकरण की आवश्यकता : दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यों की अयोग्यता का निर्णय स्पीकर के बजाय एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल को दिया जाना चाहिए, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया है।
  3. निर्णय लेने के लिए निश्चित समय सीमा तय करने की जरूरत : सदन में महत्वपूर्ण विधेयकों और अयोग्यता की याचिकाओं पर निर्णय लेने के लिए अध्यक्ष के लिए एक समय सीमा तय होनी चाहिए।
  4. डिप्टी स्पीकर की भूमिका को स्पष्ट करने की आवश्यकता : विपक्षी दल से उपाध्यक्ष (डिप्टी स्पीकर) का चयन करने की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए ताकि भारत में सदन में संतुलन बना रहे।

 

निष्कर्ष :

 

  • भारत के संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में लोकसभा का अध्यक्ष केवल एक दल का ही प्रतिनिधि नहीं होता है , बल्कि वह पूरे सदन का संरक्षक भी होता है। उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव एक ओर जहाँ भारत में लोकतंत्र की मजबूती का भी संकेत है कि कोई भी पद जवाबदेही से ऊपर नहीं है, वहीं दूसरी ओर इसका बार-बार प्रयोग होना भारत में संसद के सदन की स्थिरता के लिए हानिकारक भी हो सकता है। 
  • इस समस्या का समाधान केवल नियमों के अनुपालन भर में ही नहीं है, बल्कि संसदीय संवाद और निष्पक्षता की संस्कृति को पुनर्जीवित करने में भी है, ताकि देश में संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली में लोकसभा के अध्यक्ष पद पर आसीन व्यक्ति के प्रति न केवल सत्ताधारी दल, बल्कि विपक्षी दलों सभी नागरिकों का विश्वास बना रहे।

 

स्त्रोत – द हिन्दू। 

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

प्रश्न. 1. लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाए जाने की प्रक्रिया के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव सदन में पेश करने के लिए कम से कम 100 सदस्यों का समर्थन आवश्यक है।
  2. ऐसा प्रस्ताव पेश करने से पहले अध्यक्ष को 14 दिनों का लिखित नोटिस देना अनिवार्य है।
  3. प्रस्ताव विचाराधीन होने के दौरान, अध्यक्ष सदन की कार्यवाही में भाग ले सकते हैं और मत बराबरी की स्थिति में ‘कास्टिंग वोट’ (Casting Vote) दे सकते हैं।
  4. अध्यक्ष को हटाने के लिए ‘प्रभावी बहुमत’ (Effective Majority) की आवश्यकता होती है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं? 

(A) केवल 1 और 3 

(B) केवल 2 और 4 

(C) केवल 2, 3 और 4 

(D) 1, 2, 3 और 4

उत्तर : (B)

व्याख्या : 

  • कथन 1 गलत है क्योंकि इसके लिए 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए। 
  • कथन 3 गलत है क्योंकि विचाराधीन स्थिति में वे प्रथम दृष्टया मत दे सकते हैं, लेकिन ‘कास्टिंग वोट’ नहीं दे सकते हैं। 
  • अतः विकल्प B सही उत्तर है।

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

प्रश्न.1. लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव के संवैधानिक आधारों की विवेचना करते हुए इस पद की निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक सुझाव दीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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