राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST)

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST)

मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र – 2 – के अंतर्गत ‘ भारतीय संविधान एवं शासन व्यवस्था ’ से संबंधित।

प्रारंभिक परीक्षा के अंतर्गत – ‘ राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST), संवैधानिक निकाय, अनुच्छेद 342, अनुच्छेद 338A, 89वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2003, PESA अधिनियम, 1996, नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955, वन अधिकार अधिनियम, 2006, भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची ’ से संबंधित।

 

ख़बरों में क्यों ?

 

 

  • हाल ही में जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) का 23वाँ स्थापना दिवस मनाया। 
  • इस अवसर पर इस आयोग के संवैधानिक दायित्वों को पुनः रेखांकित किया गया और जनजातीय समुदायों के अधिकारों की सुरक्षा, उनके सामाजिक-आर्थिक विकास और सांस्कृतिक पहचान को अक्षुण्ण रखने के संकल्प को दोहराया गया।

 

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का परिचय और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : 

 

  • भारत में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग एक संवैधानिक निकाय है। भारत के मूल संविधान में अनुच्छेद 338 के तहत अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए एक साझा आयोग का प्रावधान था।
  • 89वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 : इस संशोधन के माध्यम से पूर्ववर्ती संयुक्त आयोग को दो भागों में विभाजित किया गया।
  • अनुच्छेद 338A : इसके तहत 19 फरवरी 2004 को पृथक ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग’ अस्तित्व में आया। इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों की विशिष्ट समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना है।

 

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग की संरचना, कार्यकाल और सेवा शर्तें : 

 

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग में कुल 5 सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
  • अध्यक्ष : इन्हें केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।
  • उपाध्यक्ष : इन्हें राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।
  • तीन अन्य सदस्य : इनमें से कम-से-कम एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य है। इन्हें भारत सरकार के सचिव का दर्जा प्राप्त होता है।
  • इनका कार्यकाल 3 वर्ष का होता है।
  • कोई भी सदस्य दो से अधिक कार्यकाल के लिए नियुक्त नहीं किया जा सकता है।
  • इनकी सेवा शर्तों और पदावधि का निर्धारण भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है।

 

राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का प्रमुख कार्य एवं मुख्य उद्देश्य : 

 

  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के प्रमुख कार्यों एवं उत्तरदायित्वों को मुख्य रूप से संवैधानिक अधिदेश और वर्ष 2005 के राष्ट्रपति के विशिष्ट आदेशों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के कार्यों को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – संवैधानिक उत्तरदायित्व और विशिष्ट (अतिरिक्त) कार्य।

 

संवैधानिक कार्य (अनुच्छेद 338A के अंतर्गत) : 

 

  • सुरक्षा उपायों की निगरानी करना : आयोग का प्राथमिक कर्तव्य अनुसूचित जनजातियों (STs) को संविधान अथवा संसद द्वारा निर्मित किसी भी अन्य कानून के तहत प्रदान किए गए विधिक और सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन की निरंतर जाँच, अन्वेषण और निगरानी करना है।
  • शिकायत निवारण (न्यायिक शक्ति) और जाँच करना : जनजातीय अधिकारों के उल्लंघन या उनके हितों की सुरक्षा से संबंधित विशिष्ट शिकायतों की सूक्ष्मता से जाँच करना और उनका विधिवत निवारण सुनिश्चित करना है। इस प्रक्रिया में आयोग को दीवानी न्यायालय (Civil Court) की शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
  • नीतिगत योजना प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेना : इसका एक प्रमुख कार्य संघ (केंद्र) अथवा किसी भी राज्य सरकार द्वारा अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान हेतु निर्मित की जाने वाली नीतिगत योजना प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेना और उचित परामर्श प्रदान करना है।
  • जनजातियों के विकास का मूल्यांकन करना : इसके मुख्य कार्यों में केंद्र और राज्यों के प्रशासनिक नियंत्रण में चल रही विभिन्न योजनाओं के माध्यम से जनजातीय विकास की प्रगति का समय-समय पर वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन करना भी शामिल है।
  • राष्ट्रपति को वार्षिक प्रतिवेदन प्रस्तुत करना : इन सुरक्षा उपायों के कार्यकरण और प्रभावशीलता पर वार्षिक रूप से भारत के राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करना; आवश्यकता पड़ने पर आयोग अंतरिम या विशेष रिपोर्ट भी सौंप सकता है।
  • अनुशंसात्मक भूमिका निभाना : उन उपायों और नीतियों के संबंध में सिफारिशें करना जो इन समुदायों के संरक्षण, कल्याण और सर्वांगीण विकास के लिए अनिवार्य रूप से लागू किए जाने चाहिए।

 

राष्ट्रपति के आदेशानुसार विशिष्ट अतिरिक्त कार्य ( वर्ष 2005) : 

 

  • भारत के राष्ट्रपति द्वारा वर्ष 2005 में आयोग को निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील उत्तरदायित्व सौंपे गए हैं:
  • वन स्वामित्व एवं लघु वन उपज (MFP) पर स्वामित्व और संग्रहण का अधिकार सुनिश्चित करना : वन क्षेत्रों में निवास करने वाली अनुसूचित जनजातियों को लघु वन उपज (Minor Forest Produce) पर स्वामित्व और संग्रहण का अधिकार सुनिश्चित करना ताकि उनकी पारंपरिक आजीविका अक्षुण्ण रहे।
  • वैधानिक अधिकारों की रक्षा और संसाधन सुरक्षा सुनिश्चित करना : जनजातीय क्षेत्रों में स्थित खनिज संसाधनों, जल निकायों और भूमि संपदा पर उनके वैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाना।
  • विस्थापन एवं गरिमापूर्ण एवं प्रभावी पुनर्वास प्रबंधन सुनिश्चित करना : विकास परियोजनाओं (जैसे खनन, बाँध या औद्योगिकीकरण) के कारण विस्थापित होने वाले आदिवासियों के लिए राहत कार्यों की निगरानी करना और उनके लिए गरिमापूर्ण एवं प्रभावी पुनर्वास सुनिश्चित करना।
  • भूमि के अवैध हस्तांतरण को रोकने के लिए नियंत्रण और निवारक उपाय करना : जनजातीय भूमि के गैर-जनजातीय लोगों को होने वाले अवैध हस्तांतरण को रोकने के लिए निवारक उपाय करना और पहले से हस्तांतरित भूमि की वैध वापसी (Restoration) के लिए कार्य करना।
  • PESA अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन और सशक्तिकरण करना : पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम, 1996 को उसकी मूल भावना के अनुरूप लागू करते हुए ग्राम सभाओं को स्वशासन, संसाधन प्रबंधन और निर्णय लेने की वास्तविक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए। जिससे जनजातीय क्षेत्रों में ग्राम सभाओं को स्वशासन की वास्तविक शक्ति प्राप्त हो सके।
  • झूम खेती का उन्मूलन एवं धारणीय विकल्प : ‘झूम खेती’ (स्थानांतरित कृषि) की प्रथा को धीरे-धीरे समाप्त करने के प्रयास करना और इसके स्थान पर जनजातियों को स्थायी कृषि व वैकल्पिक रोजगार से जोड़कर उनके आर्थिक सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करना, जिससे उनका आर्थिक स्तर सुधरे।

 

भारत में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रमुख प्रावधान :

 

  • भारत का संविधान जनजातियों के संरक्षण के लिए एक त्रि-आयामी रणनीति (रक्षात्मक, सकारात्मक भेदभाव और विकास) अपनाता है।

 

संवैधानिक सुरक्षा उपाय :

 

  • अनुच्छेद 342(1) : राष्ट्रपति को किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में जनजातियों को ‘अनुसूचित जनजाति’ के रूप में निर्दिष्ट करने की शक्ति देता है।
  • अनुच्छेद 366(25) : अनुसूचित जनजातियों को परिभाषित करने की प्रक्रिया को अनुच्छेद 342 से जोड़ता है।
  • पाँचवीं अनुसूची : यह अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम को छोड़कर अन्य राज्यों के ‘अनुसूचित क्षेत्रों’ के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित है।
  • छठी अनुसूची : यह उत्तर-पूर्व के चार राज्यों (असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम) में ‘स्वायत्त जिला परिषदों’ के माध्यम से जनजातीय प्रशासन का प्रावधान करती है।
  • अनुच्छेद 15 और 16 : शिक्षण संस्थानों और सार्वजनिक नियुक्तियों में आरक्षण का प्रावधान।
  • अनुच्छेद 46 : राज्य को कमजोर वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का निर्देश देता है।

 

कानूनी सुरक्षा उपाय :

 

  • अत्याचार निवारण अधिनियम, 1989 : आदिवासियों के विरुद्ध भेदभाव और हिंसा को रोकने के लिए कठोर दंड का प्रावधान।
  • PESA अधिनियम, 1996 : ग्राम सभाओं को स्वशासन की शक्ति प्रदान करता है।
  • वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 : वनवासी अनुसूचित जनजातियों के भूमि और वन संसाधनों के अधिकारों को मान्यता देता है।

 

भारत में अनुसूचित जनजातियों से संबंधित प्रमुख चुनौतियाँ : 

 

 

  • इतने सुरक्षा उपायों के बावजूद, जनजातीय समुदाय आज भी कई संकटों से जूझ रहे हैं:
  • भूमि अलगाव (Land Alienation) : औद्योगीकरण, खनन और बांध निर्माण के कारण आदिवासियों को उनकी पैतृक भूमि से बेदखल किया गया है।
  • गरीबी और ऋणग्रस्तता : जनजातीय आबादी का एक बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे है और वे अक्सर स्थानीय साहूकारों के कर्ज के जाल में फंसे रहते हैं।
  • शिक्षा और स्वास्थ्य का अभाव : दूरदराज के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्कूलों और अस्पतालों की कमी है। कुपोषण और सिकल सेल एनीमिया जैसी बीमारियाँ इन समुदायों में अधिक व्याप्त हैं।
  • सांस्कृतिक क्षरण : बाहरी दुनिया के संपर्क और शहरीकरण के कारण उनकी विशिष्ट भाषाएँ, परंपराएँ और कलाएँ लुप्त हो रही हैं।
  • PESA और FRA का कमजोर कार्यान्वयन : कानून कागजों पर मजबूत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर ग्राम सभाओं को अभी भी वह स्वायत्तता नहीं मिली है जिसकी परिकल्पना की गई थी।
  • नक्सलवाद और आंतरिक सुरक्षा : कई जनजातीय क्षेत्र संघर्ष के केंद्र बने हुए हैं, जिससे सामान्य विकास बाधित होता है।

 

समाधान / आगे की राह : 

 

  • अनुसूचित जनजातियों के सर्वांगीण उत्थान और उनके अधिकारों के संरक्षण हेतु एक बहुआयामी एवं समावेशी दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है, जिसे निम्नलिखित रणनीतियों के माध्यम से पूर्ण किया जा सकता है – 
  • विधिक और विधायी ढाँचे का सुदृढ़ीकरण करना : वन अधिकार अधिनियम (FRA) के अंतर्गत सामुदायिक दावों के निस्तारण में तीव्रता लाना और PESA अधिनियम को उसकी मूल भावना के साथ धरातल पर क्रियान्वित करना अनिवार्य है।
  • शैक्षिक सुदृढ़ीकरण एवं कौशल उन्नयन करना : एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालयों (EMRS) के नेटवर्क का विस्तार करना और ‘ड्रॉप-आउट’ दर कम करने हेतु प्राथमिक शिक्षा स्थानीय जनजातीय भाषाओं में प्रदान करना सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
  • आधुनिक स्वास्थ्य अवसंरचना विस्तार करना : ‘राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन’ को सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचाने के साथ-साथ दुर्गम बस्तियों में मोबाइल हेल्थ यूनिट्स की सक्रियता बढ़ानी चाहिए।
  • आर्थिक सशक्तिकरण एवं आजीविका सुरक्षा को सुनिश्चित करना : लघु वन उपज (MFP) के लिए लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सुनिश्चित करना और TRIFED के माध्यम से जनजातीय उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग व मार्केटिंग को बढ़ावा देना आवश्यक है।
  • डिजिटल समावेशन, सुशासन और तकनीकी पहुँच सुनिश्चित करना : ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी का विस्तार किया जाना चाहिए ताकि सरकारी योजनाओं का लाभ ‘प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण’ (DBT) के माध्यम से बिना किसी अवरोध के उन तक पहुँच सके।
  • NCST की संस्थागत क्षमता का विस्तार और सशक्तिकरण करने की आवश्यकता : राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) को और अधिक सशक्त बनाने हेतु इसकी सिफारिशों को सरकार के लिए परामर्शदात्री के स्थान पर यथासंभव बाध्यकारी बनाने पर विचार किया जाना चाहिए। वित्तीय एवं प्रशासनिक स्वायत्तता के अंतर्गत आयोग को पर्याप्त वित्तीय संसाधन और स्वतंत्र प्रशासनिक शक्तियाँ प्रदान की जानी चाहिए ताकि वह अपने संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन अधिक प्रभावी ढंग से कर सके।

 

निष्कर्ष : 

 

 

  • निष्कर्षतः, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) मात्र एक संवैधानिक निगरानी निकाय नहीं है, बल्कि यह भारत के करोड़ों आदिवासियों की आकांक्षाओं और सुरक्षा का सशक्त केंद्र है। आयोग एक सजग प्रहरी के रूप में यह सुनिश्चित करने हेतु प्रतिबद्ध है कि जनजातीय समुदाय अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान और ‘जल, जंगल, जमीन’ के पारंपरिक अधिकारों को अक्षुण्ण रखते हुए विकास की मुख्यधारा में सम्मानजनक स्थान प्राप्त कर सकें।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के 23 वर्षों की इस संवैधानिक यात्रा के पश्चात, अब समय आ गया है कि जनजातीय नीतियों को केवल ‘प्रतीकात्मकता’ तक सीमित न रखकर वास्तविक ‘सशक्तिकरण’ की ओर ले जाया जाए। भारत के समावेशी विकास का लक्ष्य तभी पूर्ण होगा, जब अंतिम पायदान पर खड़ा जनजातीय व्यक्ति राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में एक सक्रिय और समर्थ भागीदार के रूप में उभरेगा। अतः उनकी सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण और उनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान करना राष्ट्र का न केवल संवैधानिक, अपितु एक सर्वोच्च नैतिक दायित्व भी है।

 

स्रोत – पी.आई.बी एवं द हिन्दू।

 

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न : 

 

Q.1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) की संवैधानिक स्थिति और संरचना के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. NCST एक संवैधानिक निकाय है, जिसे 89वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 द्वारा स्थापित किया गया था।
  2. आयोग में एक अध्यक्ष, एक उपाध्यक्ष और तीन अन्य सदस्य होते हैं, जिनकी नियुक्ति भारत के प्रधानमंत्री द्वारा की जाती है।
  3. आयोग के अध्यक्ष को केंद्रीय कैबिनेट मंत्री का और उपाध्यक्ष को राज्य मंत्री का दर्जा प्राप्त होता है।
  4. आयोग में कम-से-कम एक महिला सदस्य का होना अनिवार्य है और सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है।

उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं? 

A. केवल कथन 1 और 2

B. केवल कथन 1 और 3 

C. केवल कथन 2, 3 और 4 

D. कथन 1, 2, 3 और 4 सभी। 

  • उत्तर : B. केवल 1 और 3 
  • व्याख्या : कथन 2 गलत है क्योंकि इनकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कथन 4 गलत है क्योंकि इस आयोग के सदस्यों का कार्यकाल 5 वर्ष का नहीं, बल्कि 3 वर्ष का होता है। अतः विकल्प B सही उत्तर है।

 

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

 

Q.1. राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) के संवैधानिक अधिदेशों की विवेचना कीजिए। जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा और उनके सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण में इस आयोग की भूमिका तथा इसके समक्ष मौजूद चुनौतियों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करते हुए सुधार के उपाय सुझाइए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

Dr. Akhilesh Kumar Shrivastava
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