07 Mar जनगणना 2027 : पहली डिजिटल और जातिगत जनगणना का आगाज ‘प्रगति और विकास’ बनेंगे सारथी
जनगणना की UPSC मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन पेपर में प्रासंगिकता :
- सामान्य अध्ययन पेपर- 1 (भूगोल/समाज) : जनसंख्या वृद्धि, वितरण, घनत्व, साक्षरता, लिंगानुपात, ग्रामीण-शहरी प्रवास, भारतीय समाज, जनसंख्या और उससे संबंधित मुद्दे।
- सामान्य अध्ययन पेपर- 2 (राजव्यवस्था/शासन) : संवैधानिक अनुच्छेद 246 के तहत संघ से संबंधित विषय, प्रशासनिक डेटा, और नीति-निर्माण (जैसे 2027 की डिजिटल जनगणना)।
- सामान्य अध्ययन पेपर- 3 (अर्थव्यवस्था/सामाजिक मुद्दे): सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) का उपयोग गरीबों की पहचान, गरीबी उन्मूलन, और विकास योजनाओं (जैसे मनरेगा) के लिए।
- निबंध (Essay) : जनगणना के आंकड़ों का उपयोग सामाजिक-आर्थिक विकास पर निबंध लिखने में किया जा सकता है।
- प्रारंभिक परीक्षा के लिए – ‘प्रगति’, ‘विकास’, संविधान की सातवीं अनुसूची, संघ सूची, जनगणना अधिनियम, 1948, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023’ खण्ड से संबंधित है।
ख़बरों में क्यों ?

- हाल ही में 5 मार्च, 2026 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जनगणना 2027 के लिए दो शुभंकर ‘प्रगति’ (महिला गणनाकर्मी) और ‘विकास’ (पुरुष गणनाकर्मी) का अनावरण किया।
- इसके साथ ही, इस प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल बनाने के लिए चार प्रमुख डिजिटल उपकरणों का सॉफ्ट लॉन्च किया गया।
- यह जनगणना इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह भारत की पहली डिजिटल जनगणना होगी और इसमें जातिगत डेटा भी एकत्र किया जाएगा।
जनगणना :
- जनगणना किसी राष्ट्र की जनसंख्या के जनसांख्यिकीय, सामाजिक और आर्थिक आंकड़ों के व्यवस्थित एकत्रीकरण और विश्लेषण की प्रक्रिया है। यह न केवल संपूर्ण जनसंख्या की गिनती है, बल्कि सरकारी नीतियों के निर्माण, संसाधनों के उचित आवंटन और परिसीमन का मुख्य आधार होती है।
- उद्देश्य : यह केवल जनसंख्या की गिनती नहीं है, बल्कि संसाधनों के आवंटन, परिसीमन और भविष्य की सरकारी नीतियों के निर्माण का आधार है।
- कानूनी आधार या वैधानिक ढांचा : भारत में जनगणना ‘जनगणना अधिनियम, 1948’ के तहत आयोजित की जाती है। संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, यह ‘संघ सूची’ का एक महत्वपूर्ण विषय है।
जनगणना का ऐतिहासिक विकास-क्रम :
- भारत में जनगणना का इतिहास प्राचीन काल से लेकर आधुनिक डिजिटल युग तक फैला हुआ है:
प्राचीन और मध्यकालीन काल :
- ऋग्वेद : जनसंख्या गणना के कुछ प्रारंभिक प्रमाण मिलते हैं।
- कौटिल्य का अर्थशास्त्र (321-296 ई.पू.) : कराधान के लिए विस्तृत जनसंख्या डेटा संग्रह का उल्लेख है।
- आईन-ए-अकबरी : मुगल काल में प्रशासनिक सुविधा हेतु जनसंख्या और आर्थिक आंकड़ों का संकलन किया गया था।
आधुनिक काल ( ब्रिटिश भारत में जनगणना ) :
- 1872 : भारत में गवर्नर-जनरल लॉर्ड मेयो के काल में पहली (गैर-तुल्यकालिक) जनगणना हुई।
- 1881 : लॉर्ड रिपन के कार्यकाल में भारत में पहली व्यवस्थित और पूर्ण जनगणना (Synchronous Census) सन 1881 में शुरू हुई। तब से प्रति 10 साल में जनगणना की यह प्रक्रिया और परंपरा निरंतर जारी है।
स्वतंत्र भारत में जनगणना :
- सन 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना हुई।
- भारत में 2011 ई. तक कुल 15 जनगणनाएँ हो चुकी हैं। 2021 की जनगणना कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित कर दी गई थी, जो अब जनगणना 2027 के रूप में होने जा रही है।
डिजिटल जनगणना : एक तकनीकी क्रांति
- जनगणना 2027 पारंपरिक ‘कागज-कलम’ की परंपरागतपद्धति से हटकर पूरी तरह डिजिटल प्लेटफॉर्म पर आधारित होगी। इसके मुख्य तकनीकी स्तंभ निम्नलिखित हैं:
प्रमुख डिजिटल उपकरण :
- HLBC (हाउसलिस्टिंग ब्लॉक क्रिएटर) : इससे उपग्रह इमेजरी के माध्यम से भौगोलिक क्षेत्रों का सटीक डिजिटल मानचित्रण करता है।
- HLO ऐप : गणनाकर्मियों के लिए 16 भाषाओं में उपलब्ध मोबाइल ऐप, जो ऑफलाइन डेटा संग्रह की सुविधा देता है।
- स्व-गणना (Self-Enumeration) पोर्टल : नागरिकों को स्वयं अपनी जानकारी ऑनलाइन भरने की सुविधा और विकल्प प्रदान करता है।
- CMMS पोर्टल : रीयल-टाइम डेटा की निगरानी और प्रबंधन के लिए एक केंद्रीकृत डैशबोर्ड।
जनगणना, डिजिटल जनगणना और जातिगत जनगणना में मुख्य अंतर :
| विशेषता | पारंपरिक जनगणना | डिजिटल जनगणना (2027) | जातिगत जनगणना (Caste Census) |
| माध्यम | कागज के फॉर्म और मैनुअल एंट्री। | मोबाइल ऐप, पोर्टल और क्लाउड सर्वर। | विशिष्ट रूप से ओबीसी और अन्य जातियों का विवरण। |
| शुद्धता | मानवीय त्रुटि की संभावना अधिक। | सॉफ्टवेयर द्वारा डेटा सत्यापन, उच्च शुद्धता। | सामाजिक संरचना की सटीक पहचान। |
| समय | डेटा प्रोसेसिंग में वर्षों लग जाते थे। | त्वरित डेटा प्रोसेसिंग और परिणाम। | आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं का आधार। |
| प्रविष्टि | केवल गणनाकर्ता द्वारा। | स्व-गणना (Self-Enumeration) का विकल्प। | प्रगणक द्वारा पूछे जाने वाले विशिष्ट प्रश्न। |
वर्तमान भारत में जनगणना 2027 का महत्व :
- जनगणना 2027 केवल एक सांख्यिकीय अभ्यास नहीं है, बल्कि यह ‘विकसित भारत @2047’ के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए एक रणनीतिक आधारशिला है। इसका महत्व निम्नलिखित है –
- साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण : शुभंकर ‘विकास’ और ‘प्रगति’ का मूल उद्देश्य डेटा के माध्यम से सुशासन को सुदृढ़ करना है। भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश में संसाधनों का न्यायसंगत और सटीक वितरण तभी संभव है जब सरकार के पास जनसंख्या की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का अद्यतन डेटा हो।
- संवैधानिक और राजनीतिक अनिवार्यता (परिसीमन) : आगामी वर्षों में लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (Delimitation) के लिए 2027 के आंकड़े अनिवार्य आधार बनेंगे। यह प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को जनसंख्या के वर्तमान अनुपात के साथ संतुलित करने के लिए आवश्यक है।
- लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण : जनगणना प्रक्रिया में महिला गणनाकर्मी के प्रतीक ‘प्रगति’ का उपयोग यह संदेश देता है कि राष्ट्र के विकास में महिलाओं की भूमिका केवल लाभार्थी तक सीमित नहीं, बल्कि नेतृत्वकारी भी है। यह डेटा ‘लिंग-संवेदी नीतियों (Gender-sensitive policies)’ को बनाने और श्रम बल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में सहायक होगा।
- समावेशी विकास हेतु लक्षित हस्तक्षेप : पहली बार व्यापक स्तर पर जातिगत डेटा के संग्रह से समाज के उन वंचित वर्गों की पहचान की जा सकेगी जो विकास की मुख्यधारा से पीछे रह गए हैं। यह डेटा ‘अंतिम मील तक पहुँच’ (Last Mile Delivery) सुनिश्चित करने के लिए ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ के संकल्प को सिद्ध करेगा।
प्रमुख चुनौतियाँ :
- डिजिटल और जातिगत जनगणना के इस महाभियान के समक्ष कुछ गंभीर संरचनात्मक और कार्यात्मक चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं। जो निम्नलिखित है –
- डिजिटल विभाजन : यद्यपि भारत में इंटरनेट की पैठ बढ़ी है, किंतु ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्मार्टफोन की उपलब्धता और डिजिटल साक्षरता का अभाव स्व-गणना के लक्ष्य में बड़ी बाधा बन सकता है।
- डेटा सुरक्षा और गोपनीयता की चिंता : लगभग 1.4 बिलियन नागरिकों की व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक जानकारी का डिजिटल संग्रहण इसे साइबर हमलों, डेटा ब्रीच और अनधिकृत उपयोग के प्रति संवेदनशील बनाता है। इतने बड़े पैमाने पर क्लाउड स्टोरेज की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है।
- सामाजिक-राजनीतिक संवेदनशीलता : जातिगत आंकड़ों का संग्रहण भारत जैसे समाज में ‘पहचान की राजनीति’ (Identity Politics) को पुनः सक्रिय कर सकता है, जिससे सामाजिक ध्रुवीकरण की संभावना और आरक्षण जैसे संवेदनशील विषयों पर विवाद बढ़ सकता है।
- विशाल मानव संसाधन का तकनीकी प्रशिक्षण : 30 लाख से अधिक गणनाकर्मियों और पर्यवेक्षकों को अल्प समय में जटिल डिजिटल उपकरणों (HLO App, CMMS) के उपयोग में दक्ष बनाना एक कठिन प्रशासनिक कार्य है।
समाधान की राह और आगे का मार्ग :
- इन चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार और संबंधित निकायों को एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा। जो निम्नलिखित है –
- हाइब्रिड और लचीला मॉडल : डिजिटल विभाजन को पाटने के लिए सरकार को एक लचीली व्यवस्था अपनानी चाहिए। जहाँ इंटरनेट कनेक्टिविटी का अभाव है, वहाँ ‘HLO ऐप’ के ऑफलाइन डेटा सिंक मोड का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित किया जाए, ताकि डेटा की निरंतरता बनी रहे।
- सुदृढ़ कानूनी सुरक्षा ढांचा : नागरिकों के विश्वास को बनाए रखने के लिए संपूर्ण डिजिटल डेटा को ‘डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (DPDP), 2023’ के कड़े प्रावधानों के तहत रखा जाना चाहिए। डेटा का एन्क्रिप्शन और एंड-टू-एंड सुरक्षा सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
- व्यापक जन-जागरूकता अभियान : ‘प्रगति’ और ‘विकास’ शुभंकरों को केवल प्रतीकों तक सीमित न रखकर, उन्हें जन-आंदोलन का चेहरा बनाना चाहिए। क्षेत्रीय भाषाओं में सूचना-शिक्षा-संचार (IEC) गतिविधियों के माध्यम से नागरिकों को स्व-गणना के लाभों के प्रति प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
- पारदर्शिता और वैज्ञानिक पद्धति : जातिगत और सामाजिक-आर्थिक डेटा के संग्रह में किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रह से बचने के लिए एक तटस्थ और वैज्ञानिक सत्यापन पद्धति अपनानी चाहिए। डेटा का विश्लेषण विशेषज्ञों की देखरेख में होना चाहिए ताकि इसका उपयोग केवल लोक कल्याण के लिए हो।
निष्कर्ष :
- निष्कर्षतः, जनगणना 2027 केवल एक सांख्यिकीय गणना मात्र नहीं है, बल्कि यह अत्याधुनिक ‘नवाचार और सामाजिक समावेशिता’ का एक अनूठा संगम है। HLBC, HLO और स्व-गणना (SE) पोर्टल जैसे डिजिटल उपकरणों का एकीकृत उपयोग न केवल पर्यावरण अनुकूल (कागज रहित) प्रशासन को बढ़ावा देगा, बल्कि शासन व्यवस्था में अभूतपूर्व पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी सुनिश्चित करेगा।
- पहली बार व्यापक स्तर पर जातिगत गणना को सम्मिलित करना, “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” के राष्ट्रीय मंत्र को धरातल पर उतारने की दिशा में एक साहसिक और प्रगतिशील कदम है। यह डेटा आधारित नीति-निर्माण के एक नए युग का सूत्रपात करेगा, जहाँ अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक लाभ पहुँचाना संभव होगा।
- जनगणना 2027 भारत के लिए एक ‘डिजिटल लीप’ लेने का ऐतिहासिक अवसर है। यदि डेटा सुरक्षा, डिजिटल विभाजन और प्रशिक्षण जैसी चुनौतियों का समयबद्ध एवं कुशलतापूर्वक प्रबंधन कर लिया जाता है, तो तकनीक और समावेशिता का यह समन्वय न केवल प्रशासनिक दक्षता में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा, बल्कि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण की सबसे सशक्त और विश्वसनीय आधारशिला भी सिद्ध होगा।
स्त्रोत – पी. आई. बी. एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. जनगणना 2027 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इसके लिए ‘प्रगति’ और ‘विकास’ नामक दो शुभंकरों का अनावरण किया है।
- यह भारत के इतिहास की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी।
- इसमें पहली बार व्यापक स्तर पर जातिगत डेटा भी एकत्र किया जाएगा।
- जनगणना अधिनियम, 1951 के तहत इस प्रक्रिया का वैधानिक संचालन किया जाता है।
उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
A. केवल कथन 1 और 2
B. केवल कथन 1, 2 और 3
C. केवल कथन 2, 3 और 4
D. कथन 1, 2, 3 और 4 सभी।
उत्तर – B. केवल कथन 1, 2 और 3
व्याख्या : कथन 4 गलत है क्योंकि भारत में जनगणना जनगणना अधिनियम, 1951 के तहत नहीं बल्कि ‘जनगणना अधिनियम, 1948’ के तहत आयोजित की जाती है।)
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत की पहली डिजिटल और जातिगत जनगणना के महत्व का विश्लेषण करते हुए इसमें प्रयुक्त तकनीकी नवाचारों तथा इसके कार्यान्वयन में आने वाली मुख्य चुनौतियों और उससे संबंधित समाधान के उपायों की विवेचना कीजिए। ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

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