AI and Judiciary ( What is ethical and not ethical)

AI and Judiciary ( What is ethical and not ethical)

“प्रौद्योगिकी पुलिस, फोरेंसिक विभाग, जेलों और अदालतों को एकीकृत करेगी और उनके काम में तेजी लाएगी। हम एक ऐसी न्याय प्रणाली की ओर बढ़ रहे हैं जो भविष्य के लिए पूरी तरह से तैयार होगी।”

                                                                                                         –     प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी

भारत की न्यायपालिका और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बीच का तनाव मुख्य रूप से एआई की तकनीकी सीमाओं और न्यायिक स्वतंत्रता के टकराव से उपजा है
1. एआई-निर्मित ‘फर्जी’ मामलों का हवाला (AI Hallucinations):
सबसे बड़ा विवाद तब पैदा हुआ जब वकीलों और निचली अदालतों ने एआई द्वारा गढ़े गए (मनगढ़ंत) फैसलों और कानूनी उद्धरणों (केस लॉ) पर भरोसा किया。 [
2. सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी:
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति की कड़ी आलोचना की है。 शीर्ष अदालत ने एआई की गलत जानकारी को “मिथाइल आइसोसाइनेट” (भोपाल गैस त्रासदी में शामिल जहरीली गैस) की तरह घातक बताया है。 कोर्ट ने इसे “पेशेवर कदाचार” माना और स्पष्ट किया कि नकली एआई सामग्री से प्रभावित कोई भी फैसला कानून की नजर में कोई निर्णय नहीं है。
3. विनियम (Regulations) का मसौदा:
न्यायपालिका में एआई के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने [अदालतों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के लिए विनियम, 2026] का मसौदा तैयार किया है。 
4. सीमाएं और प्रतिबंध:
इस मसौदे के तहत न्यायिक-निर्णय करने (सजा तय करने, जमानत देने) और गवाहों की विश्वसनीयता का मूल्यांकन करने जैसे कार्यों में एआई के उपयोग पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया गया है。 
5. एक सहायक उपकरण के रूप में उपयोग:
तनाव के बावजूद, न्यायपालिका एआई के खिलाफ नहीं है。 इसका उपयोग केवल सहायक कार्यों, जैसे- अदालती कार्यवाही का लाइव ट्रांसक्रिप्शन (ऑटोमैटिक स्पीच रिकग्निशन), कानूनी अनुसंधान, और फैसलों के क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद के लिए किया जा रहा है。 
संक्षेप में, न्यायपालिका और एआई के बीच का तनाव इस बात को लेकर है कि तकनीक को न्याय प्रक्रिया में इंसान (न्यायाधीशों) की जगह लेने या फैसलों में हेरफेर करने की अनुमति न दी जाए

विनियमों की प्रमुख विशेषताएँ

  • प्रशासनिक कार्यों जैसे वाद प्रबंधन , कारण सूची की तैयारी, सुनवाई का निर्धारण, न्यायालयीय कार्यवाहियों का प्रतिलेखन तथा निर्णयों के अनुवाद हेतु एआई के उपयोग की अनुमति प्रदान की गई है।
  • न्यायिक प्रक्रियाओं में “जोखिम मूल्यांकन” के लिए एआई प्रणालियों का उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इसमें फरार होने की संभावना का आकलन, पुनः अपराध करने की संभावना का पूर्वानुमान, जमानत पात्रता का मूल्यांकन अथवा पक्षकारों एवं गवाहों की विश्वसनीयता का निर्धारण शामिल है।
  • एआई प्रणालियों के माध्यम से व्यक्तिगत डेटा का प्रसंस्करण डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के अनुसार संचालित होगा।
  • एआई प्रणालियाँ जाति, धर्म, नस्ल, लिंग, जेंडर, विकलांगता, भाषा, आर्थिक स्थिति अथवा संविधान द्वारा निषिद्ध किसी अन्य आधार पर पक्षपात को प्रोत्साहन  नहीं देंगी।
  • एआई-सहायित न्यायिक प्रणालियाँ “डिजिटल विभाजन” को व्यापक नहीं करेंगी तथा सभी हितधारकों के लिए सुलभ बनी रहेंगी।
  • न्यायपालिका में एआई के उपयोग एवं अपनाने की निगरानी हेतु उच्चतम न्यायालय में एक पूर्णकालिक “शीर्ष निकाय” के गठन का प्रस्ताव किया गया है।

भारत की न्यायपालिका में एआई के उपयोग का महत्व

  •  मामलों के लंबित भार में कमी: भारत की न्यायिक व्यवस्था लंबे समय से लंबित मामलों के अत्यधिक भार का सामना कर रही है, जिससे समयबद्ध न्याय में जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
    • एआई वाद प्रबंधन को अधिक कुशल बनाकर लंबित मामलों में कमी ला सकता है।
    • यह न्यायिक प्रक्रियाओं को तीव्र एवं प्रभावी बनाने में सहायक हो सकता है।
  • कारागारों में भीड़भाड़ की समस्या: भारतीय कारागार दशकों से अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक कैदियों को समायोजित कर रहे हैं।
    • एआई शिकायत पंजीकरण प्रक्रिया को सुव्यवस्थित कर सकता है।
    • जांच की प्रगति पर निगरानी रख सकता है।
    • आवश्यक कार्रवाई को चिह्नित कर सकता है।
    • जांच की गुणवत्ता का मूल्यांकन करने में सहायता कर सकता है।
  • अनुवाद एवं सुलभता: भारत में 22 अनुसूचित भाषाएँ तथा सैकड़ों बोलियाँ प्रचलित हैं।
    • एआई-संचालित अनुवाद न्यायिक दस्तावेजों एवं निर्णयों को भाषाई बाधाओं से परे अधिक सुलभ बना सकता है।
    • सुवास (SUVAAS – उच्चतम न्यायालय विधिक अनुवाद सॉफ्टवेयर) परियोजना के माध्यम से हजारों निर्णयों का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जा चुका है।
  •  सटीकता में वृद्धि: एआई महत्वपूर्ण साक्ष्यों की उपेक्षा को रोक सकता है।
    • यह आपराधिक न्याय प्रक्रिया को अधिक सूक्ष्म, सटीक एवं विश्वसनीय बनाने में सहायता कर सकता है।
  • न्याय तक पहुँच में सुधार: एआई आधारित चैटबॉट एवं वर्चुअल सहायक वादकारियों को न्यायिक प्रक्रियाओं को समझने में सहायता कर सकते हैं।
    • विशेष रूप से वे व्यक्ति जो विधिक प्रतिनिधित्व से वंचित हैं, उनके लिए यह अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकता है।
    • इसके माध्यम से वाद की स्थिति का पता लगाना तथा याचिकाएँ दायर करना अधिक सरल हो सकता है
  • विगत एक दशक में न्यायालयों ने सामान्य कंप्यूटरीकरण से आगे बढ़कर राष्ट्रव्यापी डिजिटल मंचों, वास्तविक समय डेटा प्रणालियों, आभासी न्यायालयों तथा बहुभाषी निर्णय उपलब्धता की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
  • ई-कोर्ट्स परियोजना के अंतर्गत विकसित सॉफ्टवेयर अनुप्रयोगों में एआई तथा इसकी उप-प्रौद्योगिकियों जैसे—
    • मशीन लर्निंग (ML)
    • ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR)
    • प्राकृतिक भाषा संसाधन (NLP) का उपयोग किया जा रहा है।

कानून प्रवर्तन में प्रमुख एआई अनुप्रयोग

  • भविष्यवाणी आधारित पुलिसिंग
    एआई मॉडल अपराध के पैटर्न, उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों और आपराधिक व्यवहार का विश्लेषण करते हैं , जिससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को सक्रिय उपाय करने में मदद मिलती है ।

  • निगरानी और जांच के लिए एआई
    • अपराध स्थल की निगरानी और संदिग्धों का पता लगाने के लिए स्वचालित ड्रोन ।
    • राष्ट्रीय आपराधिक डेटाबेस के साथ एकीकृत चेहरे की पहचान प्रणाली ।
    • साक्ष्यों और डिजिटल अप
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