27 Jul सुप्रीम कोर्ट दल-बदल कानून की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करेगा: जानिए पूरा मामला


मानचित्र व माइंड-मैप: Supreme Court Notice on Anti-Defection Law
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और मूल संरचना | GS Paper II — संसद और राज्य विधायिका – संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय | GS Paper II — विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्तियाँ और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व
- Prelims: दल-बदल विरोधी कानून, संविधान की दसवीं अनुसूची, अयोग्यता का आधार, विलय का प्रावधान, न्यायिक समीक्षा, संसद की भूमिका, संविधान का मूल ढाँचा
- Essay: लोकतंत्र में दल-बदल: चुनौतियाँ और समाधान, संवैधानिक नैतिकता और राजनीतिक जवाबदेही
त्वरित पुनरावृत्ति: दल-बदल विरोधी कानून, संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित, राजनीतिक दल-बदल को रोकने और राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है, लेकिन इसके विलय संबंधी प्रावधानों पर न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
पूर्व में पूछा गया: Asked in UPSC Prelims 2013, 2014, 2022; Asked in UPSC Mains 2018
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) से संबंधित एक याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है, जिसमें इस कानून की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग की गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल द्वारा दायर इस याचिका में उस प्रावधान को चुनौती दी गई है, जो विधायकों और सांसदों को किसी अन्य पार्टी में विलय का दावा करके अयोग्यता से बचने की अनुमति देता है। न्यायालय ने इस मामले में केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है और टिप्पणी की है कि दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) संसद द्वारा बनाई गई थी और इसके लिए एक प्रणाली (सिस्टम) तैयार करना भी उसी का काम है।
पृष्ठभूमि
- संविधान की दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था, जिसका उद्देश्य दल-बदल की बुराई को रोकना था।
- यह कानून सांसदों और विधायकों को एक राजनीतिक दल से दूसरे राजनीतिक दल में दल-बदल करने पर अयोग्य ठहराने का प्रावधान करता है।
- दसवीं अनुसूची का पैरा 4, जिसे याचिका में चुनौती दी गई है, विलय (Merger) के आधार पर दल-बदल को अयोग्यता से छूट देता है, यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं।
- याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान दल-बदल को बढ़ावा देता है और संविधान के मूल ढाँचे (Basic Structure) का उल्लंघन करता है, जिससे थोक में दल-बदल, हॉर्स-ट्रेडिंग और जनादेश को पलटने जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं।
- पिछले एक दशक में गोवा, अरुणाचल प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में दल-बदल के कारण सरकारें गिरी हैं या बनने से रुकी हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने इस याचिका को गोवा से संबंधित एक समान लंबित मामले के साथ टैग कर दिया है, जो दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या से संबंधित है।
दल-बदल विरोधी कानून क्या है?
- दल-बदल विरोधी कानून भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में निहित है, जिसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन द्वारा शामिल किया गया था।
- इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल को रोकना और राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देना है, ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए दल न बदल सकें।
- यह कानून संसद और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों पर लागू होता है।
- अयोग्यता के मुख्य आधारों में स्वेच्छा से अपनी मूल पार्टी की सदस्यता छोड़ना, पार्टी के निर्देशों के विरुद्ध मतदान करना या मतदान से अनुपस्थित रहना शामिल है।
- यदि कोई निर्दलीय सदस्य किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो उसे भी अयोग्य ठहराया जा सकता है।
- मनोनीत सदस्य (Nominated Members) यदि शपथ लेने के छह महीने बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होते हैं, तो उन्हें अयोग्य ठहराया जा सकता है।
- कानून में एक अपवाद विलय का है (पैरा 4), जिसके तहत यदि किसी पार्टी के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य पार्टी में विलय कर लेते हैं, तो उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।
- अयोग्यता संबंधी मामलों पर निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष या सभापति) द्वारा लिया जाता है, जिसका निर्णय न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के अधीन होता है, जैसा कि किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्हू मामले (1992) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| दल-बदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) | राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करने और विधायकों/सांसदों द्वारा व्यक्तिगत लाभ के लिए पार्टी बदलने पर रोक लगाने हेतु। |
| संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) | दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों को समाहित करती है, जो संसद सदस्यों और राज्य विधानसभा सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित है। |
| पैरा 4 (Para 4) | दल-बदल विरोधी कानून का वह प्रावधान जो किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों के विलय (Merger) की स्थिति में अयोग्यता से छूट देता है। |
| अयोग्यता (Disqualification) | दल-बदल के आधार पर किसी विधायक या सांसद को सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य घोषित करना। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | न्यायालयों द्वारा विधायी और कार्यकारी कार्यों की संवैधानिकता की जांच करने की शक्ति, जो संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा है। |
महत्व
लोकतांत्रिक शासन (Democratic Governance)
- यह याचिका दल-बदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता और लोकतंत्र में जनादेश के सम्मान पर इसके प्रभाव पर सवाल उठाती है।
- यह राजनीतिक दलों के भीतर अनुशासन बनाए रखने और ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ (Horse Trading) जैसी प्रथाओं को रोकने के लिए कानून की भूमिका को उजागर करती है।
संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सक्रियता (Parliamentary Sovereignty and Judicial Activism)
- उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी कि दसवीं अनुसूची संसद द्वारा बनाई गई थी और इसके लिए प्रणाली तैयार करना भी उन्हीं का काम है, विधायी क्षेत्र में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा पर बहस को जन्म देती है।
- यह मामला विधायिका की सर्वोच्चता और न्यायपालिका की संवैधानिक व्याख्या की भूमिका के बीच संतुलन को दर्शाता है।
संघवाद और राज्य की स्वायत्तता (Federalism and State Autonomy)
- दल-बदल के कारण कई राज्यों में सरकारों के गिरने या बनने से रुकने का उल्लेख राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता पर इसके प्रभाव को दर्शाता है।
- यह केंद्र-राज्य संबंधों और राज्य विधानसभाओं के कामकाज पर दल-बदल के व्यापक प्रभावों पर प्रकाश डालता है।
चुनौतियाँ
1. कानून की अस्पष्टता और दुरुपयोग (Ambiguity and Misuse of Law)
- दल-बदल विरोधी कानून के पैरा 4 की व्याख्या को लेकर अस्पष्टता है, जिससे इसका दुरुपयोग संभव है।
- यह प्रावधान विलय की आड़ में थोक में दल-बदल को बढ़ावा दे सकता है, जिससे जनादेश का उल्लंघन होता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान, संसदीय कार्यप्रणाली
2. राजनीतिक अस्थिरता (Political Instability)
- दल-बदल के कारण विभिन्न राज्यों में सरकारों के गिरने या बनने से रुकने के कई उदाहरण सामने आए हैं।
- यह राजनीतिक अस्थिरता शासन और विकास परियोजनाओं को बाधित करती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजनीति, शासन
3. लोकतांत्रिक मूल्यों का क्षरण (Erosion of Democratic Values)
- ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और जनादेश को पलटने जैसी प्रथाएं मतदाताओं के विश्वास को कमजोर करती हैं।
- यह जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही और नैतिकता पर सवाल उठाता है।
यूपीएससी लिंक: लोकतंत्र, नैतिकता
4. अध्यक्ष की भूमिका (Role of Speaker)
- दल-बदल के मामलों में सदन के अध्यक्ष की भूमिका अक्सर विवादास्पद रही है, क्योंकि निर्णय लेने में देरी या पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं।
- अध्यक्ष के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा की सीमा भी एक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: संसद, राज्य विधानमंडल
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पैरा 4 की व्याख्या | यह प्रावधान विलय की आड़ में थोक में दल-बदल को बढ़ावा देता है, जिससे जनादेश का उल्लंघन होता है। |
| राजनीतिक अस्थिरता | दल-बदल के कारण राज्य सरकारों का गिरना या बनने से रुकना, जिससे शासन बाधित होता है। |
| लोकतंत्र का क्षरण | ‘हॉर्स ट्रेडिंग’ और जनादेश को पलटने जैसी प्रथाएं मतदाताओं के विश्वास को कमजोर करती हैं। |
| अध्यक्ष की भूमिका | दल-बदल के मामलों में अध्यक्ष के निर्णयों में देरी या पक्षपात के आरोप। |
आगे की राह
- दल-बदल विरोधी कानून के पैरा 4 की स्पष्ट और व्यापक व्याख्या की जानी चाहिए ताकि विलय और दल-बदल के बीच के अंतर को स्पष्ट किया जा सके।
- कानून में संशोधन करके अध्यक्ष की निर्णय लेने की शक्ति को एक स्वतंत्र निकाय या उच्च न्यायालय को हस्तांतरित करने पर विचार किया जा सकता है, ताकि निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके।
- दल-बदल के मामलों में निर्णय लेने के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जानी चाहिए ताकि मामलों को अनावश्यक रूप से लंबित होने से रोका जा सके।
- राजनीतिक दलों को आंतरिक लोकतंत्र को मजबूत करना चाहिए ताकि असंतोष को दल-बदल के बजाय पार्टी के भीतर ही संबोधित किया जा सके।
- जनप्रतिनिधियों के लिए नैतिक आचार संहिता (Code of Conduct) विकसित की जानी चाहिए ताकि वे अपने जनादेश के प्रति जवाबदेह रहें।
- मतदाताओं को दल-बदल के परिणामों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए ताकि वे सूचित निर्णय ले सकें और ऐसे कृत्यों के लिए राजनीतिक दलों को जवाबदेह ठहरा सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
दल-बदल विरोधी कानून · दसवीं अनुसूची · अयोग्यता · विलय प्रावधान · लोकतंत्र का मूल ढाँचा · जनादेश का उल्लंघन · न्यायिक समीक्षा · संसदीय संप्रभुता · विधायिका की स्वायत्तता · राजनीतिक नैतिकता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 102(2): संसद सदस्यों की अयोग्यता
- अनुच्छेद 191(2): राज्य विधानसभा सदस्यों की अयोग्यता
- दसवीं अनुसूची: दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधान
- अनुच्छेद 32: मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय की शक्ति
अवधारणा प्रवाह
विधायक/सांसद पार्टी बदलते हैं या विलय का दावा करते हैं। → दल-बदल विरोधी कानून (दसवीं अनुसूची) लागू होता है। → पैरा 4 के तहत विलय के प्रावधान का उपयोग। → अयोग्यता से बचने का प्रयास। → याचिका दायर कर कानून की व्याख्या पर पुनर्विचार की मांग। → उच्चतम न्यायालय द्वारा केंद्र सरकार को नोटिस जारी। → कानून की व्याख्या और लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रभाव।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसे 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था।
2. यह संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को दल-बदल के आधार पर अयोग्य घोषित करने का प्रावधान करती है।
3. यह किसी राजनीतिक दल के एक-तिहाई सदस्यों के विलय को अयोग्यता से छूट देती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा जोड़ा गया था। कथन 2 भी सही है। यह दल-बदल के आधार पर संसद और राज्य विधानमंडलों के सदस्यों की अयोग्यता से संबंधित है। कथन 3 गलत है। मूल रूप से, यह एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन को छूट देती थी, लेकिन 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने इस प्रावधान को हटा दिया और अब केवल दो-तिहाई सदस्यों के विलय को अयोग्यता से छूट मिलती है।
Q2. दल-बदल विरोधी कानून के तहत, किसी सदस्य की अयोग्यता के संबंध में अंतिम निर्णय कौन लेता है?
- भारत का सर्वोच्च न्यायालय
- संबंधित सदन का पीठासीन अधिकारी
- भारत का राष्ट्रपति
- भारत का चुनाव आयोग
उत्तर: संबंधित सदन का पीठासीन अधिकारी — दल-बदल विरोधी कानून के तहत, किसी सदस्य की अयोग्यता के संबंध में अंतिम निर्णय संबंधित सदन का पीठासीन अधिकारी (लोकसभा में अध्यक्ष और राज्यसभा में सभापति) लेता है। हालांकि, इस निर्णय की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की जा सकती है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ दल-बदल विरोधी कानून, जिसे संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल किया गया है, का उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना था, किंतु इसके क्रियान्वयन में कई चुनौतियाँ सामने आई हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस पर सुनवाई के संदर्भ में, दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए और लोकतंत्र पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन कीजिए।
रूपरेखा: प्रश्न दल-बदल विरोधी कानून के प्रावधानों का आलोचनात्मक विश्लेषण करने और लोकतंत्र पर इसके प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए कहता है। परिचय में दल-बदल विरोधी कानून और दसवीं अनुसूची का संक्षिप्त उल्लेख करें। मुख्य भाग में, कानून के प्रमुख प्रावधानों की व्याख्या करें, विशेष रूप से विलय से संबंधित प्रावधानों पर ध्यान केंद्रित करें। इसकी आलोचनात्मक समीक्षा करें, जिसमें ‘थोक दल-बदल’, ‘हॉर्स ट्रेडिंग’, जनादेश के उल्लंघन और पीठासीन अधिकारी की भूमिका जैसे मुद्दों को शामिल करें। लोकतंत्र पर इसके सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों का मूल्यांकन करें। निष्कर्ष में, कानून में सुधार के लिए संभावित उपायों का सुझाव दें ताकि इसके मूल उद्देश्य को बेहतर ढंग से प्राप्त किया जा सके।
स्रोत: bhaskar.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
- KWML’s Feasibility Reports for Water Metro in 18 Cities: UPSC & PCS Insights - October 3, 2026
- ओडिशा में वन्यजीव अनुसंधान अनुदान कार्यक्रम शुरू, सिमिलिपाल में 300 कैमरे और बढ़ेंगे - October 3, 2026
- India Summons Pakistan High Commission Official Over Violation - October 3, 2026

No Comments