03 Aug लोकसभा ने बिना बहस के सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने वाला विधेयक पारित किया
✎ सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 करना है, जो न्यायिक दक्षता और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
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- Essay: न्यायिक सुधार और भारतीय लोकतंत्र, भारत में त्वरित न्याय की चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 करना है, जो न्यायिक दक्षता और त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
लोकसभा ने हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 पारित किया है। इस विधेयक का उद्देश्य भारत के सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को वर्तमान 33 से बढ़ाकर 37 करना है। यह विधेयक बिना किसी बहस के पारित हो गया, क्योंकि विपक्षी सदस्य NEET पेपर लीक और राम मंदिर के दान की कथित चोरी को लेकर नारेबाजी कर रहे थे। सरकार का तर्क है कि न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से सर्वोच्च न्यायालय अधिक कुशलता और प्रभावशीलता से कार्य कर पाएगा, जिससे न्याय की त्वरित डिलीवरी सुनिश्चित होगी।
पृष्ठभूमि
- सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 मूल कानून है जो सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या का प्रावधान करता है।
- इस अधिनियम में समय-समय पर संशोधन किए गए हैं ताकि बढ़ती हुई कार्यभार और लंबित मामलों को देखते हुए न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई जा सके।
- वर्ष 2019 में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या को 30 से बढ़ाकर 33 किया गया था।
- यह वृद्धि न्यायिक दक्षता बढ़ाने और मामलों के त्वरित निपटान को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की जाती है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का निर्णय आमतौर पर लंबित मामलों की बढ़ती संख्या, न्यायिक कार्यभार और न्याय तक पहुँच में सुधार की आवश्यकता जैसे कारकों पर आधारित होता है।
सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या का निर्धारण
- संसद इस शक्ति का प्रयोग अधिनियम बनाकर करती है, जैसे कि सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956।
- मूल रूप से, सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 8 न्यायाधीश थे। समय के साथ, कार्यभार में वृद्धि के कारण इस संख्या को कई बार बढ़ाया गया है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का मुख्य उद्देश्य न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम करना और लंबित मामलों की संख्या को नियंत्रित करना है।
- यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि न्यायपालिका के पास पर्याप्त मानव संसाधन हों ताकि वह नागरिकों को त्वरित और प्रभावी न्याय प्रदान कर सके।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से पीठों की संख्या बढ़ सकती है, जिससे अधिक मामलों की सुनवाई एक साथ की जा सकेगी और निर्णय प्रक्रिया में तेजी आएगी।
- यह कदम न्यायिक प्रणाली में जनता के विश्वास को बनाए रखने और ‘न्याय में देरी, न्याय से इनकार’ की धारणा को दूर करने में भी सहायक होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि | सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 33 से बढ़ाकर 37 (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) की जाएगी। |
| विधेयक का नाम | सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026। |
| अधिनियम में संशोधन | यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करेगा। |
| पिछली वृद्धि | न्यायाधीशों की संख्या में अंतिम वृद्धि 2019 में 30 से 33 की गई थी। |
| उद्देश्य | सर्वोच्च न्यायालय की दक्षता और प्रभावशीलता में सुधार करना तथा न्याय के त्वरित वितरण को सुनिश्चित करना। |
महत्व
न्यायिक दक्षता
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से सर्वोच्च न्यायालय पर मुकदमों का बोझ कम होगा, जिससे मामलों का तेजी से निपटारा संभव हो सकेगा।
- यह लंबित मामलों की संख्या को कम करने और न्याय वितरण प्रणाली को सुदृढ़ करने में सहायक होगा।
न्याय तक पहुंच
- त्वरित न्याय सुनिश्चित होने से नागरिकों की न्यायपालिका में आस्था बढ़ेगी और न्याय तक उनकी पहुंच बेहतर होगी।
- यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार के एक महत्वपूर्ण पहलू, यानी त्वरित न्याय के अधिकार को मजबूत करेगा।
संस्थागत सुदृढ़ीकरण
- यह कदम सर्वोच्च न्यायालय को अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम बनाएगा, जिससे न्यायिक प्रणाली की समग्र क्षमता में वृद्धि होगी।
- बढ़ी हुई संख्या विभिन्न पीठों (बेंचों) के गठन और विशेष मामलों से निपटने में अधिक लचीलापन प्रदान करेगी।
चुनौतियाँ
1. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया
- न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने के बावजूद, यदि नियुक्ति प्रक्रिया में देरी होती है, तो रिक्तियों को भरने में समय लगेगा और उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
- कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) में पारदर्शिता और जवाबदेही से संबंधित चिंताएं बनी हुई हैं, जो नियुक्तियों को प्रभावित कर सकती हैं।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: न्यायपालिका
2. बुनियादी ढांचा और संसाधन
- बढ़े हुए न्यायाधीशों के लिए पर्याप्त न्यायिक बुनियादी ढांचा, जैसे कोर्ट रूम, स्टाफ और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराना एक चुनौती हो सकती है।
- तकनीकी सहायता और डिजिटल संसाधनों का उचित प्रावधान भी आवश्यक है ताकि बढ़ी हुई संख्या का अधिकतम लाभ उठाया जा सके।
यूपीएससी लिंक: शासन: न्यायपालिका का कार्यकरण
3. संसद में बहस का अभाव
- महत्वपूर्ण विधेयकों पर बिना बहस के पारित होना संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के लिए चिंता का विषय है।
- यह कानून बनाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता और जनभागीदारी को कम करता है, जिससे कानून की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संसद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी | स्वीकृत पदों के बावजूद रिक्तियां बनी रहने से उद्देश्य की पूर्ति में बाधा। |
| बुनियादी ढांचे की कमी | बढ़े हुए न्यायाधीशों के लिए पर्याप्त कोर्ट रूम, स्टाफ और अन्य सुविधाओं का अभाव। |
| संसदीय बहस का अभाव | महत्वपूर्ण कानून पर बिना चर्चा के पारित होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए हानिकारक। |
| न्यायिक जवाबदेही | न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने के साथ-साथ उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने की आवश्यकता। |
आगे की राह
- न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और पारदर्शी बनाना, ताकि रिक्तियों को समय पर भरा जा सके।
- न्यायिक बुनियादी ढांचे को मजबूत करना, जिसमें कोर्ट रूम, स्टाफ और तकनीकी सुविधाओं का विस्तार शामिल है।
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ न्यायिक जवाबदेही और प्रदर्शन मूल्यांकन के तंत्र विकसित करना।
- संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर सार्थक बहस और चर्चा को प्रोत्साहित करना, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखा जा सके।
- न्यायपालिका में सूचना प्रौद्योगिकी (Information Technology) के उपयोग को बढ़ाना, जिससे मामलों का प्रबंधन और निपटारा अधिक कुशल हो सके।
- न्यायिक अधिकारियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण कार्यक्रमों का आयोजन करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 124’, ‘note’: ‘सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना और गठन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन का अधिकार, त्वरित न्याय का निहितार्थ’}
अवधारणा प्रवाह
सर्वोच्च न्यायालय में लंबित मामले बढ़ते हैं। → न्यायाधीशों पर कार्यभार बढ़ता है। → सरकार न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव करती है। → संसद विधेयक पारित करती है। → न्यायाधीशों की संख्या बढ़ती है। → न्याय वितरण प्रणाली में सुधार होता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या को 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव करता है, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) शामिल नहीं हैं।
2. यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है।
3. भारत के संविधान का अनुच्छेद 124 सर्वोच्च न्यायालय के गठन और न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि विधेयक CJI को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से 37 करने का प्रस्ताव करता है। कथन 2 सही है क्योंकि यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 124 सर्वोच्च न्यायालय के गठन और न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित है।
Q2. अभिकथन (A): सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाने से न्यायिक दक्षता में वृद्धि हो सकती है और न्याय वितरण में तेजी आ सकती है।
कारण (R): न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से लंबित मामलों के बोझ को कम करने में मदद मिलेगी।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि न्यायाधीशों की संख्या बढ़ने से कार्यभार कम होगा और दक्षता बढ़ेगी। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या है क्योंकि अधिक न्यायाधीश लंबित मामलों को तेजी से निपटाने में सक्षम होंगे, जिससे न्यायिक दक्षता में सुधार होगा।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के हालिया विधेयक के आलोक में, भारत में न्यायिक दक्षता और न्याय तक पहुंच सुनिश्चित करने में इस तरह के कदमों के महत्व का आलोचनात्मक परीक्षण करें। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन विधेयक, 2026 और न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि का संक्षिप्त उल्लेख।
2. न्यायिक दक्षता में वृद्धि का महत्व: लंबित मामलों का बोझ, त्वरित न्याय का अधिकार, न्यायिक विलंब के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव।
3. न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि के लाभ: कार्यभार में कमी, विशेष पीठों का गठन, निर्णय की गुणवत्ता में सुधार।
4. आलोचनात्मक परीक्षण: केवल संख्या वृद्धि ही पर्याप्त नहीं है – अन्य आवश्यक सुधारों पर चर्चा (जैसे न्यायिक अवसंरचना, प्रौद्योगिकी का उपयोग, वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र, न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार)।
5. न्याय तक पहुंच: दूरदराज के क्षेत्रों के लिए प्रभाव, गरीबों और वंचितों के लिए न्याय सुलभ बनाना।
6. संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 124 और संसद की शक्ति का उल्लेख।
7. निष्कर्ष: न्यायिक सुधारों के लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल देते हुए संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: Times of India
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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