07 Aug आरबीआई ने बैंकों के लिए लीवरेज अनुपात में संशोधन का मसौदा जारी किया
✎ RBI का नवीनतम मसौदा बेसल समिति के 'लीवरेज अनुपात 2017 मानक' को अपनाकर भारतीय वाणिज्यिक बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंडों को मजबूत करने और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। | GS Paper III — सरकारी बजट। | GS Paper III — निवेश मॉडल।
- Prelims: पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Norms), लीवरेज अनुपात (Leverage Ratio), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), बेसल समिति (Basel Committee), बैंकिंग विनियमन, वित्तीय स्थिरता, वाणिज्यिक बैंक
- Essay: वित्तीय स्थिरता और आर्थिक विकास में नियामक निकायों की भूमिका।, वैश्विक बैंकिंग मानकों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव।
त्वरित पुनरावृत्ति: RBI का नवीनतम मसौदा बेसल समिति के ‘लीवरेज अनुपात 2017 मानक’ को अपनाकर भारतीय वाणिज्यिक बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंडों को मजबूत करने और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने का प्रयास करता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में ‘भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – पूंजी पर्याप्तता पर विवेकपूर्ण मानदंड) ग्यारहवें संशोधन निर्देश, 2026’ का मसौदा जारी किया है। इस मसौदे का उद्देश्य ‘भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – पूंजी पर्याप्तता पर विवेकपूर्ण मानदंड) निर्देश, 2025’ के ‘अध्याय VII: लीवरेज अनुपात ढांचा’ में संशोधन करना है। यह संशोधन बेसल समिति ऑन बैंकिंग सुपरविज़न (Basel Committee on Banking Supervision) द्वारा जारी नवीनतम लीवरेज अनुपात ढांचे (‘लीवरेज अनुपात 2017 मानक’) को लागू करने का प्रयास करता है। RBI ने 28 अगस्त, 2026 तक इस मसौदे पर टिप्पणियाँ आमंत्रित की हैं, जो बैंकिंग क्षेत्र में नियामक सुधारों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Norms) बैंकों को अपनी जोखिम-भारित परिसंपत्तियों (Risk-Weighted Assets) के मुकाबले एक निश्चित न्यूनतम पूंजी बनाए रखने के लिए अनिवार्य करते हैं, ताकि वे अप्रत्याशित नुकसान को अवशोषित कर सकें और वित्तीय प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित कर सकें।
- बेसल मानदंड (Basel Norms) अंतर्राष्ट्रीय बैंकिंग नियामक समझौते हैं जो बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता, तनाव परीक्षण और बाजार जोखिम आवश्यकताओं पर सिफारिशें प्रदान करते हैं। इनका उद्देश्य वैश्विक वित्तीय स्थिरता को मजबूत करना है।
- भारत में, RBI बेसल मानदंडों को घरेलू बैंकिंग प्रणाली के लिए अनुकूलित करता है और उन्हें समय-समय पर संशोधित करता रहता है।
- लीवरेज अनुपात (Leverage Ratio) एक गैर-जोखिम-आधारित पूरक उपाय है जो बैंक की कुल जोखिम-भारित परिसंपत्तियों के बजाय उसकी कुल एक्सपोजर (Total Exposure) के मुकाबले उसकी टियर-1 पूंजी (Tier-1 Capital) को मापता है। यह अत्यधिक लीवरेजिंग (Over-leveraging) को रोकने में मदद करता है।
- बेसल III फ्रेमवर्क के तहत, लीवरेज अनुपात को एक महत्वपूर्ण नियामक उपकरण के रूप में पेश किया गया था, जिसका उद्देश्य बैंकों की बैलेंस शीट (Balance Sheet) में पारदर्शिता बढ़ाना और अत्यधिक ऋण लेने की प्रवृत्ति को नियंत्रित करना था।
- ‘लीवरेज अनुपात 2017 मानक’ बेसल समिति द्वारा लीवरेज अनुपात के गणना और अनुप्रयोग में कुछ संशोधन और स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है, जिसका उद्देश्य इस अनुपात को और अधिक प्रभावी बनाना है।
लीवरेज अनुपात क्या है?
- लीवरेज अनुपात एक वित्तीय माप है जो बैंक की टियर-1 पूंजी को उसकी कुल एक्सपोजर से विभाजित करके प्राप्त किया जाता है। इसे प्रतिशत में व्यक्त किया जाता है।
- यह एक गैर-जोखिम-आधारित उपाय है, जिसका अर्थ है कि यह परिसंपत्तियों से जुड़े जोखिमों पर विचार नहीं करता है, बल्कि बैंक की समग्र लीवरेजिंग का एक सरल और सीधा माप प्रदान करता है।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य अत्यधिक लीवरेजिंग को रोकना है, जो वित्तीय संकटों के दौरान बैंकों की भेद्यता को बढ़ा सकता है।
- लीवरेज अनुपात पूंजी पर्याप्तता अनुपात (Capital Adequacy Ratio) का पूरक है, जो जोखिम-भारित परिसंपत्तियों पर आधारित होता है। यह दोनों मिलकर बैंकों की वित्तीय सुदृढ़ता का व्यापक मूल्यांकन प्रदान करते हैं।
- बेसल III फ्रेमवर्क के तहत, बैंकों के लिए एक न्यूनतम लीवरेज अनुपात बनाए रखना अनिवार्य है, जो आमतौर पर 3% निर्धारित किया गया है।
- यह अनुपात बैंकों को अपनी बैलेंस शीट को बहुत अधिक बढ़ाने से रोकता है, भले ही उनकी जोखिम-भारित परिसंपत्तियां कम जोखिम वाली दिखें।
- उच्च लीवरेज अनुपात एक बैंक की मजबूत पूंजी स्थिति और वित्तीय झटकों का सामना करने की बेहतर क्षमता को इंगित करता है।
- RBI द्वारा प्रस्तावित संशोधन ‘लीवरेज अनुपात 2017 मानक’ को अपनाकर भारतीय बैंकों के लिए इस अनुपात की गणना और रिपोर्टिंग को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के अनुरूप लाएगा।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Norms) | यह सुनिश्चित करते हैं कि बैंकों के पास अप्रत्याशित हानियों को अवशोषित करने और जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त पूंजी है। |
| लीवरेज अनुपात (Leverage Ratio) | यह बैंक की टियर-1 पूंजी (Tier-1 Capital) और उसकी कुल जोखिम-भारित परिसंपत्तियों (Risk-Weighted Assets) के बीच का अनुपात है। यह अत्यधिक लीवरेजिंग को रोकता है और वित्तीय स्थिरता बनाए रखता है। |
| बेसल समिति (Basel Committee on Banking Supervision) | यह बैंकिंग पर्यवेक्षण के लिए वैश्विक मानक-निर्धारक है। इसके दिशानिर्देशों का उद्देश्य विश्वव्यापी वित्तीय स्थिरता को मजबूत करना है। |
| ड्राफ्ट संशोधन (Draft Amendment) | यह भारतीय वाणिज्यिक बैंकों के लिए बेसल समिति के नवीनतम लीवरेज अनुपात फ्रेमवर्क (Leverage Ratio 2017 Standard) को लागू करने का प्रस्ताव करता है, जिससे भारतीय बैंकिंग प्रणाली वैश्विक मानकों के अनुरूप हो सके। |
| सार्वजनिक टिप्पणी (Public Comments) | RBI द्वारा ड्राफ्ट दिशानिर्देशों पर सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित करना नियामक प्रक्रिया में पारदर्शिता और सहभागिता सुनिश्चित करता है। |
महत्व
आर्थिक स्थिरता
- बेहतर पूंजी पर्याप्तता मानदंड बैंकों को वित्तीय झटकों का सामना करने में सक्षम बनाते हैं, जिससे समग्र आर्थिक स्थिरता बनी रहती है।
- लीवरेज अनुपात में संशोधन बैंकों की अत्यधिक जोखिम लेने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाएगा, जिससे वित्तीय संकट की संभावना कम होगी।
नियामक सामंजस्य
- बेसल समिति के नवीनतम मानकों को अपनाने से भारतीय बैंकिंग प्रणाली वैश्विक नियामक ढांचे के साथ संरेखित होगी, जिससे अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय लेनदेन में विश्वास बढ़ेगा।
- यह भारत को वैश्विक वित्तीय प्रणाली में एक जिम्मेदार हितधारक के रूप में स्थापित करता है।
जमाकर्ता सुरक्षा
- बैंकों की मजबूत पूंजी स्थिति जमाकर्ताओं के धन की सुरक्षा सुनिश्चित करती है, जिससे बैंकिंग प्रणाली में जनता का विश्वास बना रहता है।
बैंकिंग क्षेत्र में पारदर्शिता
- ड्राफ्ट दिशानिर्देशों पर सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित करने से नियामक प्रक्रिया में पारदर्शिता आती है और हितधारकों को अपनी राय व्यक्त करने का अवसर मिलता है।
चुनौतियाँ
1. पूंजी की लागत
- उच्च पूंजी पर्याप्तता आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बैंकों को अधिक पूंजी बनाए रखनी होगी, जिससे उनकी उधार देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है या पूंजी जुटाने की लागत बढ़ सकती है।
- छोटे और क्षेत्रीय बैंकों के लिए इन मानकों को पूरा करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय।
2. कार्यान्वयन की जटिलता
- नए लीवरेज अनुपात फ्रेमवर्क को लागू करने के लिए बैंकों को अपनी आंतरिक प्रणालियों और प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण बदलाव करने पड़ सकते हैं, जिसमें समय और संसाधन लगेंगे।
- डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग में सटीकता सुनिश्चित करना एक चुनौती हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: सरकारी बजट।
3. उधार पर प्रभाव
- कठोर पूंजी आवश्यकताओं के कारण बैंक अधिक सतर्क हो सकते हैं और ऋण देने में कमी कर सकते हैं, जिससे आर्थिक गतिविधियों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- विशेष रूप से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए ऋण उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: निवेश मॉडल।
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पूंजी की उपलब्धता | कुछ बैंकों के लिए नई पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त पूंजी जुटाना मुश्किल हो सकता है। |
| लाभप्रदता पर दबाव | उच्च पूंजी बनाए रखने से बैंकों की रिटर्न ऑन इक्विटी (Return on Equity) कम हो सकती है, जिससे उनकी लाभप्रदता पर दबाव पड़ेगा। |
| नियामक मध्यस्थता | यह सुनिश्चित करना कि नए नियम सभी बैंकों पर समान रूप से और प्रभावी ढंग से लागू हों, एक नियामक चुनौती है। |
| वैश्विक आर्थिक मंदी का प्रभाव | यदि वैश्विक अर्थव्यवस्था मंदी का सामना करती है, तो बैंकों के लिए इन कठोर पूंजी मानकों को बनाए रखना और भी कठिन हो सकता है। |
आगे की राह
- भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को बैंकों के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि नए दिशानिर्देशों के सुचारु और प्रभावी कार्यान्वयन को सुनिश्चित किया जा सके।
- छोटे और क्षेत्रीय बैंकों को पूंजी आवश्यकताओं को पूरा करने में सहायता प्रदान करने के लिए विशेष उपाय या संक्रमणकालीन व्यवस्थाएं (Transitional Arrangements) अपनाई जा सकती हैं।
- बैंकों को अपनी पूंजी नियोजन रणनीतियों (Capital Planning Strategies) को मजबूत करना चाहिए और पूंजी जुटाने के लिए विभिन्न विकल्पों का पता लगाना चाहिए।
- नियामक ढांचे को लगातार समीक्षा और अद्यतन किया जाना चाहिए ताकि यह बदलती आर्थिक परिस्थितियों और वैश्विक मानकों के अनुरूप बना रहे।
- बैंकों को जोखिम प्रबंधन प्रणालियों (Risk Management Systems) में निवेश करना चाहिए ताकि वे अपनी परिसंपत्ति गुणवत्ता में सुधार कर सकें और पूंजी पर दबाव कम कर सकें।
- RBI को बैंकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों (Capacity Building Programs) का आयोजन करना चाहिए ताकि वे नए नियामक आवश्यकताओं को समझ सकें और उनका पालन कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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अवधारणा प्रवाह
RBI ने पूंजी पर्याप्तता पर ड्राफ्ट संशोधन जारी किए। → ये संशोधन बेसल समिति के नवीनतम लीवरेज अनुपात मानकों को लागू करते हैं। → बैंकों को अपनी पूंजी पर्याप्तता और लीवरेज अनुपात में सुधार करना होगा। → इससे बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता और लचीलापन बढ़ेगा। → परिणामस्वरूप, जमाकर्ताओं का विश्वास मजबूत होगा और वित्तीय प्रणाली सुरक्षित होगी। → यह वैश्विक नियामक मानकों के साथ भारतीय बैंकिंग प्रणाली का संरेखण सुनिश्चित करेगा।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) वाणिज्यिक बैंकों के लिए पूंजी पर्याप्तता मानदंड निर्धारित करता है।
2. लीवरेज अनुपात बैंकों की कुल संपत्ति के सापेक्ष उनकी टियर-1 पूंजी का माप है।
3. बेसल समिति ऑन बैंकिंग सुपरविज़न (BCBS) एक वैश्विक मानक-निर्धारण निकाय है जो बैंकिंग पर्यवेक्षण को मजबूत करने के लिए दिशानिर्देश जारी करता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। RBI भारत में वाणिज्यिक बैंकों के लिए नियामक प्राधिकरण है और पूंजी पर्याप्तता मानदंड निर्धारित करता है। कथन 2 सही है। लीवरेज अनुपात वास्तव में टियर-1 पूंजी को कुल एक्सपोजर माप से विभाजित करके गणना की जाती है, जो बैंक की कुल संपत्ति का एक व्यापक माप है। कथन 3 सही है। BCBS एक अंतरराष्ट्रीय निकाय है जो बैंकिंग नियमों के लिए वैश्विक मानक विकसित करता है, जिसमें पूंजी पर्याप्तता और लीवरेज अनुपात शामिल हैं।
Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक (वाणिज्यिक बैंक – पूंजी पर्याप्तता पर विवेकपूर्ण मानदंड) ग्यारहवें संशोधन निर्देश, 2026 का मसौदा, किस अंतरराष्ट्रीय मानक को लागू करने का प्रयास करता है?
- बेसल I मानक
- बेसल II मानक
- लीवरेज अनुपात 2017 मानक (Leverage Ratio 2017 Standard)
- वित्तीय स्थिरता बोर्ड (Financial Stability Board) दिशानिर्देश
उत्तर: लीवरेज अनुपात 2017 मानक (Leverage Ratio 2017 Standard) — समाचार के अनुसार, यह संशोधन बैंकिंग पर्यवेक्षण पर बेसल समिति द्वारा जारी नवीनतम लीवरेज अनुपात ढाँचे (‘लीवरेज अनुपात 2017 मानक’) को लागू करने का प्रयास करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पूंजी पर्याप्तता मानदंड (Capital Adequacy Norms) क्या हैं और वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में उनकी क्या भूमिका है? भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा लीवरेज अनुपात (Leverage Ratio) के संबंध में नवीनतम बेसल मानकों को अपनाने के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में पूंजी पर्याप्तता मानदंड की परिभाषा और उनके महत्व को संक्षेप में समझाएँ। मुख्य भाग में, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने में पूंजी पर्याप्तता मानदंडों की भूमिका का विस्तार से वर्णन करें, जिसमें बैंकों को झटकों से बचाने, जमाकर्ताओं के हितों की रक्षा करने और प्रणालीगत जोखिम को कम करने जैसे बिंदु शामिल हों। इसके बाद, लीवरेज अनुपात की अवधारणा और बेसल समिति ऑन बैंकिंग सुपरविज़न (BCBS) द्वारा निर्धारित इसके मानकों पर प्रकाश डालें। भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ‘लीवरेज अनुपात 2017 मानक’ को अपनाने के निहितार्थों का विश्लेषण करें, जिसमें बैंकों पर पूंजी आवश्यकताओं का प्रभाव, ऋण देने की क्षमता, जोखिम प्रबंधन प्रथाओं में सुधार, और समग्र वित्तीय प्रणाली पर प्रभाव शामिल हों। निष्कर्ष में, इन उपायों के माध्यम से बैंकिंग क्षेत्र की सुदृढ़ता और वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने के महत्व पर बल दें।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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