डीएमके ने खोले नहीं पत्ते, परिसीमन बिल पर संसद में होगी रणनीति तय

'संसद में बिल आने के बाद तय होगी रणनीति': परिसीमन पर DMK ने नहीं खोले पत्ते; दक्षिण के राज्यों को क्या मिलेगा? — diagram

डीएमके ने खोले नहीं पत्ते, परिसीमन बिल पर संसद में होगी रणनीति तय

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परिसीमन प्रक्रिया

✎ परिसीमन का उद्देश्य 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को बनाए रखते हुए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, लेकिन 2026 में इसकी समय-सीमा समाप्त होने से जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान, संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।  |  GS Paper II — संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध।
  • Prelims: परिसीमन आयोग, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170, जनसंख्या नियंत्रण, लोकसभा सीटें, राज्य विधानसभा सीटें
  • Essay: भारत में संघवाद और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की चुनौतियाँ, जनसंख्या नियंत्रण बनाम राजनीतिक प्रतिनिधित्व: एक संतुलनकारी कार्य

त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन का उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखते हुए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, लेकिन 2026 में इसकी समय-सीमा समाप्त होने से जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों के प्रतिनिधित्व पर संभावित नकारात्मक प्रभाव को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

संसद में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक 2026 को लेकर राजनीतिक हलचल तेज है। तमिलनाडु की विपक्षी पार्टी DMK ने इस पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि वह विधेयक का आधिकारिक मसौदा आने के बाद ही समर्थन या विरोध का फैसला करेगी। DMK नेता आरएस भारती ने बताया कि पार्टी विधेयक के हर पहलू का गहन अध्ययन करेगी और देखेगी कि उनके पुराने सुझावों को इसमें शामिल किया गया है या नहीं। यह विधेयक विशेष रूप से दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताएँ बढ़ा रहा है, जहाँ जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों के कारण भविष्य में उनकी लोकसभा सीटों में कमी आने की आशंका है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करने की प्रक्रिया को परिसीमन (Delimitation) कहा जाता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 82 (लोकसभा) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं) के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान है।
  • पिछला परिसीमन 2002 में हुआ था। हालाँकि, सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं किया गया था।
  • लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या को 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया गया था, ताकि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित न किया जाए।
  • अब 2026 में यह रोक समाप्त हो रही है, और सरकार एक नए परिसीमन विधेयक पर विचार कर रही है, जो अगली जनगणना के आंकड़ों पर आधारित होगा।
  • दक्षिण भारतीय राज्यों, जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, को आशंका है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण होने से संसद में उनका प्रतिनिधित्व घट जाएगा, जबकि अधिक जनसंख्या वाले उत्तरी राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ जाएगा।

परिसीमन क्या है?

  • परिसीमन का अर्थ है किसी देश या एक विधायी निकाय वाले प्रांत में क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का निर्धारण करना।
  • इसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के समान खंडों के लिए समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, ताकि ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत का पालन हो सके।
  • भारत में, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है। इसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • परिसीमन आयोग में सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त और संबंधित राज्य निर्वाचन आयुक्त पदेन सदस्य होते हैं।
  • आयोग का कार्य निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या और उनकी सीमाओं का निर्धारण करना, आरक्षित सीटों (अनुसूचित जाति/जनजाति) की पहचान करना और जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आवंटन करना है।
  • परिसीमन का उद्देश्य यह भी सुनिश्चित करना है कि भौगोलिक क्षेत्रों को यथासंभव अखंड रखा जाए और प्रशासनिक इकाइयों की सीमाओं का सम्मान किया जाए।
  • भारत में अब तक चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया है – 1952, 1963, 1973 और 2002 में।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
परिसीमन का आधार जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन। यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक के वोट का समान मूल्य हो।
पिछला परिसीमन 2002 में हुआ था, लेकिन सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर रखी गई थी। यह जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित होने से बचाने के लिए था।
वर्तमान प्रस्ताव लोकसभा सीटों को 543 से बढ़ाकर 816 करने का प्रस्ताव है, जिससे राज्यों का प्रतिनिधित्व उनकी वर्तमान जनसंख्या के अनुपात में हो सके।
दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंता जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के कारण उन्हें डर है कि उनकी संसदीय सीटें कम हो सकती हैं या उनकी आनुपातिक हिस्सेदारी घट सकती है।
DMK का रुख विधेयक के अंतिम मसौदे का इंतजार कर रही है और अपने पुराने सुझावों को शामिल किए जाने पर विचार करेगी। यह विधेयक के प्रावधानों के गहन अध्ययन के बाद ही अंतिम निर्णय लेगी।

महत्व

राजनीतिक महत्व

  • परिसीमन का सीधा प्रभाव राज्यों के संसदीय प्रतिनिधित्व पर पड़ता है, जिससे केंद्र में उनकी राजनीतिक शक्ति प्रभावित होती है।
  • जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को ‘दंडित’ किए जाने की आशंका संघवाद (Federalism) और राज्यों के बीच विश्वास के मुद्दे उठाती है।
  • यह विधेयक विभिन्न राजनीतिक दलों के बीच गठबंधन और विरोध की नई रणनीतियों को जन्म दे सकता है, विशेषकर क्षेत्रीय दलों के लिए।

सामाजिक महत्व

  • परिसीमन के माध्यम से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण होता है, जिससे इन समुदायों का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित होता है।
  • जनसंख्या वृद्धि और शहरीकरण के कारण बदलती जनसांख्यिकी को संसदीय प्रतिनिधित्व में प्रतिबिंबित करना आवश्यक है, ताकि सभी वर्गों की आवाज संसद तक पहुंच सके।

संवैधानिक महत्व

  • संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत परिसीमन का प्रावधान है, जो प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के पुनर्समायोजन की अनुमति देता है।
  • यह ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है, जो लोकतांत्रिक समानता का आधार है।

चुनौतियाँ

1. जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व

  • दक्षिण भारतीय राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे उन्हें डर है कि नए परिसीमन से उनकी संसदीय सीटें कम हो सकती हैं।
  • यह उन राज्यों को हतोत्साहित कर सकता है जिन्होंने राष्ट्रीय हित में जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों में सहयोग किया है।

2. संघवाद पर प्रभाव

  • यदि परिसीमन से कुछ राज्यों का प्रतिनिधित्व घटता है और दूसरों का बढ़ता है, तो यह राज्यों के बीच असंतोष और केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है।
  • यह राज्यों के बीच क्षेत्रीय असमानताओं को और बढ़ा सकता है।

3. राजनीतिक अस्थिरता की आशंका

  • परिसीमन एक संवेदनशील मुद्दा है और इस पर राजनीतिक सहमति बनाना मुश्किल हो सकता है, जिससे संसद में गतिरोध और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ सकती है।
  • विभिन्न दलों के बीच हितों का टकराव निर्णय लेने की प्रक्रिया को जटिल बना सकता है।

4. लोकतांत्रिक समानता का सिद्धांत

  • जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्समायोजन ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के सिद्धांत के अनुरूप है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को अनदेखा करने से नैतिक प्रश्न उठते हैं।
  • प्रतिनिधित्व और जनसंख्या नियंत्रण के बीच संतुलन स्थापित करना एक बड़ी चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्य परिसीमन से उनकी संसदीय सीटों में कमी या आनुपातिक हिस्सेदारी में गिरावट का डर।
राज्यों के बीच असंतोष यदि प्रतिनिधित्व में बड़ा बदलाव आता है, तो यह संघवाद पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है और केंद्र-राज्य संबंधों को तनावपूर्ण बना सकता है।
राजनीतिक ध्रुवीकरण परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच गहरे मतभेद और ध्रुवीकरण की संभावना।
प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता सीटों की संख्या बढ़ने से लोकसभा का आकार बड़ा हो सकता है, जिससे बहस की गुणवत्ता और प्रबंधन पर असर पड़ सकता है।
समयबद्धता और पारदर्शिता परिसीमन प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से पूरा करना, जिससे सभी हितधारकों का विश्वास बना रहे।

आगे की राह

  • परिसीमन प्रक्रिया में सभी राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए व्यापक परामर्श और संवाद स्थापित किया जाना चाहिए।
  • जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को उनके प्रयासों के लिए किसी अन्य तरीके से पुरस्कृत करने पर विचार किया जा सकता है, ताकि उन्हें परिसीमन के कारण नुकसान न हो।
  • परिसीमन के लिए एक स्पष्ट और पारदर्शी कार्यप्रणाली अपनाई जानी चाहिए, जिसमें सभी हितधारकों को शामिल किया जाए और उनके सुझावों पर गंभीरता से विचार किया जाए।
  • एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जा सकता है जो जनसंख्या नियंत्रण और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाने के लिए विभिन्न मॉडलों का अध्ययन करे और व्यवहार्य समाधान प्रस्तुत करे।
  • परिसीमन के प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण किया जाना चाहिए, जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आयाम शामिल हों, ताकि किसी भी अनपेक्षित परिणाम से बचा जा सके।
  • संसद में विधेयक पर व्यापक बहस और चर्चा सुनिश्चित की जानी चाहिए, जिससे सभी दृष्टिकोणों को सुना जा सके और एक सर्वसम्मत समाधान तक पहुंचा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

परिसीमन आयोग · संसदीय निर्वाचन क्षेत्र · जनसंख्या प्रतिनिधित्व · लोकसभा सीटें · राज्य प्रतिनिधित्व · संघवाद · संवैधानिक प्रावधान · अनुच्छेद 82 · जनसांख्यिकीय लाभांश · दक्षिण भारतीय राज्य · राजनीतिक विवाद · समान प्रतिनिधित्व

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 82’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा सीटों का पुनर्समायोजन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 170’, ‘note’: ‘प्रत्येक जनगणना के बाद विधानसभा सीटों का पुनर्समायोजन’}

अवधारणा प्रवाह

जनसंख्या वृद्धि और जनसांख्यिकीय परिवर्तन  →  संसदीय और विधानसभा सीटों के पुनर्गठन की आवश्यकता (परिसीमन)  →  परिसीमन विधेयक का संसद में प्रस्तुत होना  →  दक्षिण भारतीय राज्यों द्वारा प्रतिनिधित्व घटने की आशंका  →  विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा विधेयक पर रुख का निर्धारण  →  परिसीमन के माध्यम से ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ सिद्धांत का कार्यान्वयन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है।
2. 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया था।
3. परिसीमन आयोग के आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 82 संसद को प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन अधिनियम बनाने का अधिकार देता है। कथन 2 गलत है। 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 ने सीटों के परिसीमन को वर्ष 2000 तक के लिए स्थगित कर दिया था, लेकिन बाद में 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने इसे 2026 तक बढ़ा दिया। कथन 3 सही है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के तहत अंतिम माना जाता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।

Q2. परिसीमन आयोग के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. परिसीमन आयोग के अध्यक्ष भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त होते हैं।
2. आयोग के आदेशों को राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही लागू किया जा सकता है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2

उत्तर: न तो 1 और न ही 2 — कथन 1 गलत है। परिसीमन आयोग का अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय का एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश होता है, न कि मुख्य चुनाव आयुक्त। मुख्य चुनाव आयुक्त और संबंधित राज्यों के चुनाव आयुक्त इसके पदेन सदस्य होते हैं। कथन 2 गलत है। परिसीमन आयोग के आदेशों को कानून के तहत अंतिम माना जाता है और उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता नहीं होती। वे संसद या राज्य विधानमंडल के समक्ष रखे जाते हैं, लेकिन उनमें कोई संशोधन नहीं किया जा सकता।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की प्रक्रिया और इसके संवैधानिक आधार की विवेचना कीजिए। दक्षिण भारतीय राज्यों द्वारा व्यक्त की जा रही चिंताओं के आलोक में, क्या आपको लगता है कि वर्तमान परिसीमन मॉडल संघवाद के सिद्धांतों के अनुरूप है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिसीमन की परिभाषा और उद्देश्य से शुरुआत करें। संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 82, 170) का उल्लेख करें। परिसीमन आयोग की संरचना और कार्यप्रणाली का वर्णन करें। दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को स्पष्ट करें (जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व)। संघवाद के सिद्धांतों (राज्यों की स्वायत्तता, समान प्रतिनिधित्व) के साथ वर्तमान मॉडल की तुलना करें। इसके पक्ष और विपक्ष में तर्क दें, जैसे जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व का लोकतांत्रिक तर्क और राज्यों के बीच असमानता बढ़ने का जोखिम। निष्कर्ष में एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।

स्रोत: amarujala.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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