भारत के आर्थिक सुधारों के 35 वर्ष: रंगा राजन का नीति पुनर्विचार सुझाव

Tariffs, conflicts demand policy rethink: C. Rangarajan — diagram

भारत के आर्थिक सुधारों के 35 वर्ष: रंगा राजन का नीति पुनर्विचार सुझाव

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India's economic policy shift

✎ सी. रंगराजन ने बदलते वैश्विक परिदृश्य, विशेषकर संघर्षों और टैरिफ के बढ़ते उपयोग के मद्देनजर, भारत को अपनी आर्थिक नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन व आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करने का…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतर्राष्ट्रीय संबंध  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था एवं नियोजन
  • Prelims: नई आर्थिक नीति 1991, संरक्षणवाद, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला, आत्मनिर्भर भारत, टैरिफ, व्यापार युद्ध
  • Essay: बदलते वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की आर्थिक संवृद्धि की चुनौतियाँ और अवसर, उदारीकरण के 35 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य की राह

त्वरित पुनरावृत्ति: सी. रंगराजन ने बदलते वैश्विक परिदृश्य, विशेषकर संघर्षों और टैरिफ के बढ़ते उपयोग के मद्देनजर, भारत को अपनी आर्थिक नीतियों का पुनर्मूल्यांकन करने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन व आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव दिया है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष सी. रंगराजन ने भारत की नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) के 35 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित एक विशेष व्याख्यान में कहा कि वर्तमान वैश्विक स्थिति, जिसमें देशों के बीच संघर्ष और टैरिफ (Tariffs) का बढ़ता उपयोग शामिल है, भारत को अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करता है। उन्होंने घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया, भले ही यह उदारीकरण के कुछ नियमों के विपरीत हो।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने 1991 में एक गंभीर आर्थिक संकट के जवाब में नई आर्थिक नीति अपनाई थी, जिसमें उदारीकरण (Liberalisation), निजीकरण (Privatisation) और वैश्वीकरण (Globalisation) (LPG सुधार) शामिल थे।
  • इन सुधारों का उद्देश्य अर्थव्यवस्था को खोलना, विदेशी निवेश को आकर्षित करना और आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति देना था।
  • पिछले कुछ वर्षों में, वैश्विक व्यापार और भू-राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव आए हैं, जिनमें व्यापार युद्ध (Trade Wars), आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में व्यवधान और विभिन्न देशों के बीच बढ़ते संघर्ष शामिल हैं।
  • सी. रंगराजन ने इन बाहरी झटकों को भारत की वर्तमान आर्थिक चुनौतियों का मुख्य कारण बताया है, न कि घरेलू कमजोरियों को।
  • उन्होंने रक्षा उत्पादन, चिप निर्माण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) के अनुकूलन जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की वकालत की है।
  • यह दृष्टिकोण भारत सरकार की ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में देश की आत्मनिर्भरता को बढ़ाना है।

नई आर्थिक नीति (1991) और उसके बाद के आर्थिक सुधार

  • नई आर्थिक नीति 1991 में भारत को भुगतान संतुलन (Balance of Payment) के गंभीर संकट से निकालने के लिए शुरू की गई थी।
  • इसके मुख्य स्तंभ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण थे, जिन्हें सामूहिक रूप से LPG सुधार कहा जाता है।
  • उदारीकरण का अर्थ था अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण और प्रतिबंधों को कम करना, जैसे लाइसेंस राज को समाप्त करना।
  • निजीकरण का अर्थ था सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (Public Sector Undertakings – PSUs) में सरकारी हिस्सेदारी को बेचना और निजी क्षेत्र की भूमिका को बढ़ाना।
  • वैश्वीकरण का अर्थ था भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना, जिसमें विदेशी व्यापार और निवेश पर प्रतिबंधों को कम करना शामिल था।
  • इन सुधारों के परिणामस्वरूप भारत की आर्थिक संवृद्धि दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, विदेशी मुद्रा भंडार में सुधार हुआ और गरीबी में कमी आई।
  • हालांकि, इन सुधारों ने कुछ चुनौतियाँ भी पेश कीं, जैसे क्षेत्रीय असमानताएँ और कुछ क्षेत्रों में रोजगार संवृद्धि की धीमी गति।
  • वर्तमान वैश्विक परिदृश्य, जिसमें संरक्षणवाद (Protectionism) का उदय और भू-राजनीतिक अस्थिरता शामिल है, भारत को अपनी आर्थिक रणनीति में लचीलापन लाने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में घरेलू क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल देता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
टैरिफ (Tariffs) का बढ़ता प्रयोग वैश्विक व्यापार नियमों में बदलाव और संरक्षणवाद की ओर झुकाव, जिससे मुक्त व्यापार बाधित होता है।
भू-राजनीतिक संघर्ष आपूर्ति श्रृंखलाओं (supply chains) में व्यवधान, ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता।
घरेलू उत्पादन पर जोर महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे रक्षा, चिप निर्माण और AI अनुकूलन में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता।
उदारीकरण के नियमों में बदलाव बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप आर्थिक नीतियों का पुनर्मूल्यांकन, भले ही वे पारंपरिक उदारीकरण सिद्धांतों से हटकर हों।
35 वर्ष की नई आर्थिक नीति भारत की आर्थिक सुधार यात्रा का मूल्यांकन और भविष्य की दिशा तय करने का अवसर।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • वैश्विक व्यापार में संरक्षणवादी प्रवृत्तियों के कारण भारत को अपनी व्यापार नीतियों पर पुनर्विचार करना होगा।
  • आपूर्ति श्रृंखलाओं के विविधीकरण (diversification) और महत्वपूर्ण इनपुट के घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
  • बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के बीच आर्थिक स्थिरता और संवृद्धि (growth) बनाए रखने के लिए नई रणनीतियाँ बनाना आवश्यक है।

सामरिक महत्व

  • रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता (self-reliance) राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।
  • सेमीकंडक्टर चिप्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence – AI) जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों में घरेलू क्षमता का विकास सामरिक स्वायत्तता सुनिश्चित करेगा।
  • भू-राजनीतिक संघर्षों के कारण उत्पन्न होने वाले बाहरी झटकों से निपटने के लिए लचीली आर्थिक और औद्योगिक नीतियाँ आवश्यक हैं।

नीतिगत महत्व

  • भारत की नई आर्थिक नीति के 35 वर्षों के बाद, वैश्विक परिवर्तनों के अनुरूप नीतियों में समायोजन की आवश्यकता है।
  • मुक्त व्यापार और उदारीकरण के सिद्धांतों को वैश्विक वास्तविकताओं के साथ संतुलित करना होगा।
  • सरकार को उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी जहाँ घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देना आवश्यक है, भले ही यह उदारीकरण के कुछ नियमों से विचलन हो।

चुनौतियाँ

1. वैश्विक संरक्षणवाद का उदय

  • कई देश टैरिफ बढ़ा रहे हैं और व्यापार बाधाएँ खड़ी कर रहे हैं, जिससे भारतीय निर्यातकों के लिए चुनौतियाँ बढ़ रही हैं।
  • यह विश्व व्यापार संगठन (WTO) के सिद्धांतों के विपरीत है और वैश्विक व्यापार संवृद्धि को धीमा कर सकता है।

2. भू-राजनीतिक अस्थिरता

  • देशों के बीच संघर्ष वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर रहे हैं, जिससे कच्चे माल और ऊर्जा की कीमतों में अस्थिरता आ रही है।
  • यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है।

3. तकनीकी आत्मनिर्भरता की आवश्यकता

  • रक्षा उपकरण, सेमीकंडक्टर चिप्स और AI जैसी महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में आयात पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता के लिए जोखिम पैदा करती है।
  • इन क्षेत्रों में घरेलू क्षमताओं का विकास एक बड़ी चुनौती है, जिसमें भारी निवेश और विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।

4. उदारीकरण के सिद्धांतों का पुनर्मूल्यांकन

  • वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव के कारण भारत को अपनी उदारीकरण नीतियों की समीक्षा करनी पड़ सकती है, जो कुछ क्षेत्रों में घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने की मांग कर सकती हैं।
  • यह एक नाजुक संतुलन है, क्योंकि अत्यधिक संरक्षणवाद प्रतिस्पर्धा और दक्षता को कम कर सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
टैरिफ का बढ़ता प्रयोग वैश्विक व्यापार में बाधा, निर्यात प्रतिस्पर्धा में कमी।
भू-राजनीतिक संघर्ष आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान, ऊर्जा और वस्तु की कीमतों में अस्थिरता।
महत्वपूर्ण इनपुट पर निर्भरता राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संप्रभुता के लिए जोखिम।
उदारीकरण के नियमों में बदलाव नीतिगत स्थिरता और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों पर संभावित प्रभाव।
तकनीकी पिछड़ापन रक्षा, चिप निर्माण और AI जैसे क्षेत्रों में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रहना।

आगे की राह

  • महत्वपूर्ण क्षेत्रों जैसे रक्षा, सेमीकंडक्टर और AI में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए लक्षित नीतियाँ और प्रोत्साहन प्रदान करना।
  • आपूर्ति श्रृंखलाओं में लचीलापन (resilience) लाने के लिए विविधीकरण और रणनीतिक भंडार (strategic reserves) का निर्माण करना।
  • अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश बढ़ाना और तकनीकी नवाचार को प्रोत्साहित करना ताकि भारत इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भर बन सके।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भारत के हितों की रक्षा करना और संरक्षणवादी प्रवृत्तियों का मुकाबला करने के लिए बहुपक्षीय मंचों पर सक्रिय भूमिका निभाना।
  • राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों को वैश्विक झटकों के प्रति अधिक लचीला बनाना ताकि आर्थिक स्थिरता बनी रहे।
  • कौशल विकास (skill development) और शिक्षा पर ध्यान केंद्रित करना ताकि नई प्रौद्योगिकियों के लिए आवश्यक मानव संसाधन तैयार किए जा सकें।
  • घरेलू उद्योगों को अनावश्यक संरक्षण दिए बिना प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने के लिए संरचनात्मक सुधारों को जारी रखना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

नई आर्थिक नीति · उदारीकरण · वैश्वीकरण · संरक्षणवाद · आयात शुल्क · घरेलू उत्पादन · आत्मनिर्भरता · भू-राजनीतिक संघर्ष · आर्थिक संप्रभुता · नीतिगत पुनर्गठन · आपूर्ति श्रृंखला · रणनीतिक क्षेत्र

अवधारणा प्रवाह

वैश्विक टैरिफ वृद्धि और भू-राजनीतिक संघर्ष  →  आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधान और आर्थिक अस्थिरता  →  महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आयात पर निर्भरता का जोखिम  →  घरेलू उत्पादन और आत्मनिर्भरता की आवश्यकता  →  आर्थिक नीतियों का पुनर्मूल्यांकन और समायोजन  →  राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक संवृद्धि सुनिश्चित करना

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में नई आर्थिक नीति (New Economic Policy) 1991 में शुरू की गई थी।
2. इस नीति का मुख्य उद्देश्य भारतीय अर्थव्यवस्था को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करना था।
3. डॉ. सी. रंगराजन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर रहे हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। भारत में नई आर्थिक नीति 1991 में तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गई थी।
कथन 2 सही है। इस नीति के तहत उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के माध्यम से अर्थव्यवस्था को खोला गया था।
कथन 3 सही है। डॉ. सी. रंगराजन भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर और प्रधान मंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व अध्यक्ष रहे हैं।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से कारक वर्तमान वैश्विक आर्थिक चुनौतियों में योगदान दे रहा/रहे है/हैं, जैसा कि डॉ. सी. रंगराजन ने उल्लेख किया है?
1. देशों द्वारा आयात शुल्क (Tariffs) का अधिरोपण।
2. भू-राजनीतिक संघर्ष और युद्ध।
3. घरेलू आर्थिक नीतियों में निरंतरता का अभाव।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. केवल 1 और 2
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — डॉ. सी. रंगराजन ने अपने व्याख्यान में विशेष रूप से आयात शुल्क के अधिरोपण और देशों के बीच संघर्षों को वर्तमान वैश्विक आर्थिक चुनौतियों के प्रमुख कारणों के रूप में उजागर किया। उन्होंने घरेलू आर्थिक नीतियों में निरंतरता के अभाव का उल्लेख नहीं किया।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ डॉ. सी. रंगराजन के अनुसार, वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक परिदृश्य में भारत को अपनी आर्थिक नीति का पुनर्गठन क्यों करना चाहिए? उन प्रमुख क्षेत्रों पर चर्चा कीजिए जहाँ भारत को घरेलू उत्पादन बढ़ाने की आवश्यकता है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर की शुरुआत डॉ. सी. रंगराजन के हालिया बयान और नई आर्थिक नीति के 35 वर्ष पूरे होने के संदर्भ से करें।

**भाग 1: आर्थिक नीति के पुनर्गठन की आवश्यकता (लगभग 100-120 शब्द)**
* **वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्ष:** देशों के बीच बढ़ते संघर्ष (जैसे रूस-यूक्रेन युद्ध) वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं (Supply Chains) को बाधित कर रहे हैं और व्यापार अनिश्चितता पैदा कर रहे हैं।
* **संरक्षणवाद का उदय:** आयात शुल्क (Tariffs) का बढ़ता उपयोग और व्यापार बाधाएं मुक्त व्यापार के सिद्धांतों को चुनौती दे रही हैं, जिससे देशों को अपनी अर्थव्यवस्थाओं की सुरक्षा के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।
* **उदारीकरण के नियमों का टूटना:** रंगराजन का यह कथन कि ‘हम उदारीकरण के नियमों को तोड़ रहे हैं’ यह दर्शाता है कि वैश्विक परिस्थितियां बदल गई हैं और अब केवल मुक्त व्यापार पर निर्भर रहना जोखिम भरा है।
* **बाह्य आघातों से सुरक्षा:** इन बाहरी आघातों से अर्थव्यवस्था को बचाने और आत्मनिर्भरता (Self-reliance) बढ़ाने की आवश्यकता।

**भाग 2: घरेलू उत्पादन बढ़ाने के प्रमुख क्षेत्र (लगभग 100-120 शब्द)**
* **महत्वपूर्ण इनपुट और आवश्यक वस्तुएं:** उन क्षेत्रों की पहचान जहाँ इनपुट या वस्तुएं अत्यधिक आवश्यक हैं और जिनकी आपूर्ति बाधित होने पर अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
* **रक्षा उत्पादन:** राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण, आयात पर निर्भरता कम करना। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत इस पर जोर।
* **सेमीकंडक्टर चिप्स का उत्पादन:** आधुनिक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण घटक, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में व्यवधानों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील। भारत सरकार की ‘सेमीकंडक्टर मिशन’ जैसी पहल का उल्लेख।
* **कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का अनुकूलन और विकास:** भविष्य की प्रौद्योगिकी में आत्मनिर्भरता और नवाचार के लिए महत्वपूर्ण।
* **अन्य रणनीतिक क्षेत्र:** ऊर्जा सुरक्षा (नवीकरणीय ऊर्जा), फार्मास्यूटिकल्स, महत्वपूर्ण खनिज आदि।

**निष्कर्ष:**
* एक संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता, जहाँ वैश्विक एकीकरण के लाभों को बनाए रखते हुए घरेलू लचीलापन और संप्रभुता सुनिश्चित की जा सके।
* नीतिगत पुनर्गठन भारत को भविष्य के वैश्विक झटकों के लिए अधिक प्रतिरोधी बनाएगा।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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