मेकेडाटू परियोजना: सीडब्ल्यूसी ने कर्नाटक से संशोधित डीपीआर प्रस्तुत करने का अनुरोध किया

Mekedatu: CWC asks Karnataka to submit revised Detailed Project Report — diagram

मेकेडाटू परियोजना: सीडब्ल्यूसी ने कर्नाटक से संशोधित डीपीआर प्रस्तुत करने का अनुरोध किया

Mekedatu Project ComponentsMekedatu ReservoirBalancing reservoirKarnatakaDrinking Water SupplyBengaluru region6.95 tmcftHydroelectric PowerSRRP component4.75 tmcftCWDT AllocationInter-state dispute1990 tribunalCWC ReviewRevised DPR rejectedExcess consumptive use
Mekedatu Project Components

✎ मेकेदातु परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक की एक प्रस्तावित बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य पेयजल और पनबिजली उत्पादन है, लेकिन यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के जल आवंटन मानदंडों के अनुपालन को लेकर केंद्रीय जल आयोग की जांच…

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, अंतर-राज्यीय जल विवाद  |  GS Paper III — पर्यावरण: जल संसाधन प्रबंधन, नदी घाटी परियोजनाएँ
  • Prelims: मेकेदातु परियोजना, कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT), केंद्रीय जल आयोग (CWC), कावेरी नदी, अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR)
  • Essay: भारत में अंतर-राज्यीय जल विवाद: संघवाद के समक्ष चुनौतियाँ और समाधान, जल सुरक्षा और टिकाऊ विकास: बहुउद्देशीय नदी घाटी परियोजनाओं की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: मेकेदातु परियोजना कावेरी नदी पर कर्नाटक की एक प्रस्तावित बहुउद्देशीय परियोजना है, जिसका उद्देश्य पेयजल और पनबिजली उत्पादन है, लेकिन यह कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण के जल आवंटन मानदंडों के अनुपालन को लेकर केंद्रीय जल आयोग की जांच के दायरे में है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केंद्रीय जल आयोग (CWC) ने कर्नाटक की प्रस्तावित मेकेदातु संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना की संशोधित विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को वापस कर दिया है। CWC ने परियोजना में प्रस्तावित जल के उपभोग्य उपयोग (consumptive use) को कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के आवंटन से अधिक पाया है और कर्नाटक से CWDT के निर्णय तथा CWC की टिप्पणियों के अनुपालन में एक संशोधित DPR प्रस्तुत करने को कहा है।

पृष्ठभूमि

  • मेकेदातु परियोजना कावेरी नदी पर प्रस्तावित है, जो कर्नाटक के बेंगलुरु ग्रामीण जिले में स्थित है। यह परियोजना बेंगलुरु महानगर क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराने तथा पनबिजली उत्पादन के लिए एक संतुलन जलाशय का निर्माण करना चाहती है।
  • कावेरी नदी जल विवाद भारत के सबसे पुराने और सबसे जटिल अंतर-राज्यीय जल विवादों में से एक है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी शामिल हैं।
  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) का गठन 1990 में अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956 के तहत किया गया था। न्यायाधिकरण ने 2007 में अपना अंतिम निर्णय दिया था, जिसे बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने 2018 में संशोधित किया।
  • कर्नाटक ने जनवरी 2019 में पहली बार CWC को मेकेदातु परियोजना की DPR प्रस्तुत की थी, जिसमें 4.75 tmcft अतिरिक्त उपभोग्य उपयोग का प्रस्ताव था। बाद में अप्रैल 2026 में संशोधित योजना में इसे बढ़ाकर 6.95 tmcft कर दिया गया, साथ ही शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना जैसे अतिरिक्त घटक भी जोड़े गए।

मेकेदातु परियोजना क्या है?

  • मेकेदातु परियोजना कर्नाटक सरकार द्वारा कावेरी नदी पर प्रस्तावित एक बहुउद्देशीय परियोजना है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य बेंगलुरु महानगर क्षेत्र और उसके आसपास के क्षेत्रों के लिए पेयजल उपलब्ध कराना है।
  • परियोजना में एक संतुलन जलाशय का निर्माण शामिल है, जिसका उद्देश्य अधिशेष मानसून जल का भंडारण करना है।
  • प्रारंभिक प्रस्ताव में 4.75 tmcft अतिरिक्त उपभोग्य जल का लक्ष्य था, जिसे बाद में संशोधित DPR में 6.95 tmcft तक बढ़ा दिया गया।
  • संशोधित योजना में शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना जैसे पनबिजली उत्पादन के घटक भी शामिल हैं।
  • यह परियोजना कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के आदेश द्वारा निर्धारित जल आवंटन के दायरे में आती है।
  • परियोजना की मंजूरी के लिए केंद्रीय जल आयोग (CWC) की स्वीकृति आवश्यक है, जो अंतर-राज्यीय जल विवादों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
मेकेदाटू परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु महानगर क्षेत्र और आसपास के इलाकों को पेयजल उपलब्ध कराना।
परियोजना का स्थान बेंगलुरु दक्षिण ज़िला (पूर्व रामनगर ज़िला), कर्नाटक।
प्रस्तावित जल उपयोग शुरुआत में 4.75 tmcft, संशोधित DPR में 6.95 tmcft।
CWC की आपत्ति प्रस्तावित उपभोग्य जल उपयोग कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के आवंटन से अधिक।
सर्वोच्च न्यायालय का आवंटन कर्नाटक के शहरी और ग्रामीण आबादी के लिए कुल 6.5 tmcft उपभोग्य उपयोग निर्धारित।
अतिरिक्त घटक संशोधित योजना में शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना भी शामिल।

महत्व

अंतर-राज्यीय जल विवाद

  • यह परियोजना कावेरी नदी जल-बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच चल रहे दशकों पुराने विवाद को और जटिल बनाती है।
  • राज्यों के बीच जल संसाधनों के न्यायसंगत वितरण और उपयोग की आवश्यकता को रेखांकित करती है।

पर्यावरणीय प्रभाव

  • बड़े बांधों और जलाशयों के निर्माण से पारिस्थितिक तंत्र, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (EIA) और सतत विकास प्रथाओं का पालन आवश्यक है।

शहरीकरण और जल सुरक्षा

  • बेंगलुरु जैसे तेजी से बढ़ते महानगरों की पेयजल आवश्यकताओं को पूरा करने की चुनौती को दर्शाता है।
  • शहरीकरण के कारण बढ़ती जल मांग और उपलब्ध संसाधनों के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता पर प्रकाश डालता है।

संघवाद और नियामक भूमिका

  • केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका राज्यों के बीच जल विवादों के समाधान और परियोजनाओं के मूल्यांकन में महत्वपूर्ण है।
  • यह केंद्र और राज्यों के बीच सहयोगात्मक संघवाद (Cooperative Federalism) के महत्व को दर्शाता है।

न्यायिक हस्तक्षेप का प्रभाव

  • सर्वोच्च न्यायालय और कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के निर्णयों का अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान पर सीधा प्रभाव पड़ता है।
  • न्यायिक निर्णयों का पालन सुनिश्चित करना जल प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

चुनौतियाँ

1. अंतर-राज्यीय जल-बंटवारा

  • कावेरी नदी जल-बंटवारे को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच लंबे समय से विवाद चल रहा है।
  • मेकेदाटू परियोजना इस विवाद को और गहरा कर सकती है, क्योंकि तमिलनाडु ने परियोजना पर आपत्ति जताई है।

2. नियामक अनुपालन

  • CWC ने कर्नाटक को CWDT अवार्ड और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुपालन में DPR को संशोधित करने को कहा है।
  • परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए सभी नियामक आवश्यकताओं और दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक है।

3. पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

  • परियोजना के निर्माण से स्थानीय पारिस्थितिकी, वनस्पति और जीव-जंतुओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • विस्थापन और पुनर्वास के मुद्दे भी उत्पन्न हो सकते हैं, जिससे सामाजिक अशांति पैदा हो सकती है।

4. बढ़ती शहरी जल मांग

  • बेंगलुरु जैसे शहरों की बढ़ती जनसंख्या के कारण पेयजल की मांग लगातार बढ़ रही है।
  • यह चुनौती जल संरक्षण, कुशल जल प्रबंधन और वैकल्पिक जल स्रोतों की आवश्यकता को उजागर करती है।

5. तकनीकी और वित्तीय व्यवहार्यता

  • CWC ने प्रस्तावित मेकेदाटू जलाशय की लाइव स्टोरेज क्षमता के निर्धारण के आधार पर भी सवाल उठाए हैं।
  • परियोजना की तकनीकी व्यवहार्यता और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
जल आवंटन से अधिक उपभोग CWC ने पाया कि प्रस्तावित उपभोग्य जल उपयोग CWDT आवंटन से अधिक है।
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का उल्लंघन कर्नाटक के लिए सर्वोच्च न्यायालय द्वारा आवंटित 6.5 tmcft की सीमा का उल्लंघन।
संशोधित DPR में अतिरिक्त घटक शिवनसमुद्र रन-ऑफ-रिवर पावर (SRRP) परियोजना को बिना उचित अनुमोदन के शामिल करना।
भंडारण क्षमता का आधार मेकेदाटू जलाशय की प्रस्तावित लाइव स्टोरेज क्षमता (59.46 tmcft) के निर्धारण का आधार अनुचित।
अंतर-राज्यीय सहमति का अभाव तमिलनाडु द्वारा परियोजना पर लगातार आपत्ति, जिससे विवाद बढ़ता है।

आगे की राह

  • कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) के अंतिम निर्णय और सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जाए।
  • केंद्रीय जल आयोग (CWC) के दिशा-निर्देशों के अनुसार विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) को संशोधित किया जाए।
  • जल-बंटवारे के मुद्दों को हल करने के लिए संबंधित राज्यों (कर्नाटक और तमिलनाडु) के बीच रचनात्मक संवाद और सहयोग को बढ़ावा दिया जाए।
  • परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का गहन मूल्यांकन किया जाए और शमन उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए।
  • शहरी क्षेत्रों में जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन (Rainwater Harvesting) और अपशिष्ट जल उपचार (Wastewater Treatment) जैसी वैकल्पिक जल प्रबंधन रणनीतियों को अपनाया जाए।
  • जल विवादों के त्वरित और न्यायसंगत समाधान के लिए एक प्रभावी तंत्र विकसित किया जाए।
  • तकनीकी व्यवहार्यता और वित्तीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए परियोजना के सभी पहलुओं की समीक्षा की जाए।
  • अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में केंद्र सरकार की मध्यस्थता भूमिका को और मजबूत किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मेकेदाटू परियोजना · कावेरी जल विवाद · अंतर-राज्यीय जल विवाद · केंद्रीय जल आयोग (CWC) · विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) · कावेरी जल विवाद न्यायाधिकरण (CWDT) · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · संघवाद और जल विवाद · जल प्रशासन · सतत जल उपयोग

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 262’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय नदी जल विवादों का न्यायनिर्णयन’}
  • {‘Article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: “राज्य सूची में ‘जल’ का विषय”}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 131’, ‘note’: ‘राज्यों के बीच विवादों में सर्वोच्च न्यायालय का मूल क्षेत्राधिकार’}
  • {‘Article’: ‘अनुच्छेद 263’, ‘note’: ‘अंतर-राज्यीय परिषदों का गठन’}

अवधारणा प्रवाह

कर्नाटक द्वारा मेकेदाटू परियोजना का प्रस्ताव  →  CWC को संशोधित DPR प्रस्तुत करना  →  CWC द्वारा DPR में आपत्तियां उठाना (अधिक जल उपयोग)  →  CWC द्वारा DPR को संशोधन के लिए वापस भेजना  →  कर्नाटक द्वारा संशोधित DPR प्रस्तुत करने की तैयारी  →  परियोजना पर अंतर-राज्यीय विवाद का जारी रहना  →  CWC और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का अनुपालन

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मेकेदाटू परियोजना का उद्देश्य बेंगलुरु महानगर क्षेत्र को पेयजल उपलब्ध कराना है।
2. यह परियोजना कावेरी नदी पर प्रस्तावित है।
3. केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल संसाधनों के मूल्यांकन, विकास और विनियमन के लिए जिम्मेदार है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि मेकेदाटू परियोजना का प्राथमिक उद्देश्य बेंगलुरु और आसपास के क्षेत्रों को पेयजल उपलब्ध कराना है। कथन 2 सही है क्योंकि यह परियोजना कावेरी नदी पर एक संतुलन जलाशय-सह-पेयजल परियोजना के रूप में प्रस्तावित है। कथन 3 सही है क्योंकि CWC जल संसाधनों के प्रबंधन और अंतर-राज्यीय जल विवादों में तकनीकी सहायता प्रदान करने वाली एक प्रमुख संस्था है।

Q2. कथन (A): अंतर-राज्यीय जल विवादों का समाधान भारतीय संघवाद के लिए एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है।

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, लेकिन R गलत है।
  4. A गलत है, लेकिन R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — कथन (A) सही है क्योंकि जल एक संवेदनशील मुद्दा है और अंतर-राज्यीय विवाद अक्सर राज्यों के बीच तनाव पैदा करते हैं, जो संघवाद के सिद्धांतों को चुनौती देते हैं। कारण (R) भी सही है क्योंकि अनुच्छेद 262 संसद को अंतर-राज्यीय नदी विवादों के न्यायनिर्णयन के लिए कानून बनाने का अधिकार देता है, जैसे कि नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 और अंतर-राज्यीय जल विवाद अधिनियम, 1956। यह प्रावधान इन विवादों को हल करने के लिए एक संवैधानिक तंत्र प्रदान करता है, जिससे कथन (A) की व्याख्या होती है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ अंतर-राज्यीय नदी जल विवाद भारतीय संघवाद के समक्ष एक बड़ी चुनौती प्रस्तुत करते हैं। मेकेदाटू परियोजना के संदर्भ में, भारत में अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में केंद्रीय जल आयोग (CWC) की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर कंकाल:
1. परिचय: अंतर-राज्यीय जल विवादों की प्रकृति और भारतीय संघवाद पर उनके प्रभाव का संक्षिप्त परिचय। मेकेदाटू परियोजना का संदर्भ दें।
2. मेकेदाटू परियोजना और कावेरी विवाद: परियोजना का संक्षिप्त विवरण, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच विवाद का मूल कारण (जल आवंटन, उपभोग्य उपयोग) और CWC द्वारा DPR को वापस करने का नवीनतम घटनाक्रम।
3. CWC की भूमिका: अंतर-राज्यीय जल विवादों के समाधान में CWC की बहुआयामी भूमिका का विस्तृत वर्णन करें:
* तकनीकी मूल्यांकन और सलाह: DPRs का मूल्यांकन, तकनीकी व्यवहार्यता, जल उपलब्धता और उपयोग का आकलन।
* दिशानिर्देश और मानक: परियोजनाओं के लिए दिशानिर्देश (जैसे CWC दिशानिर्देश 2017) निर्धारित करना।
* डेटा संग्रह और विश्लेषण: जल संसाधनों से संबंधित विश्वसनीय डेटा प्रदान करना।
* विवाद समाधान में सहायता: न्यायाधिकरणों और अदालतों को तकनीकी इनपुट प्रदान करना।
* निगरानी और विनियमन: जल परियोजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी।
4. समालोचनात्मक परीक्षण (चुनौतियाँ और सीमाएँ):
* केवल सलाहकार प्रकृति: CWC के निर्णय बाध्यकारी नहीं होते, जिससे राज्यों द्वारा अनुपालन में समस्या आती है।
* राजनीतिक हस्तक्षेप: जल एक राजनीतिक मुद्दा होने के कारण तकनीकी सिफारिशों पर अक्सर राजनीतिक दबाव हावी होता है।
* डेटा की कमी/विवाद: राज्यों के बीच डेटा साझाकरण और उसकी विश्वसनीयता पर विवाद।
* कार्यान्वयन में देरी: परियोजनाओं की मंजूरी और विवाद समाधान में अत्यधिक देरी।
* समन्वय का अभाव: विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी।
5. आगे का मार्ग/सुधार: विवाद समाधान तंत्र को मजबूत करने के लिए सुझाव, जैसे कि स्थायी न्यायाधिकरण, डेटा साझाकरण प्रोटोकॉल, एकीकृत जल संसाधन प्रबंधन, केंद्र की भूमिका को मजबूत करना।
6. निष्कर्ष: संघवाद के सिद्धांतों को बनाए रखते हुए जल विवादों के स्थायी समाधान की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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