तमिलनाडु में 2026 में भी सड़कों के नामों में जाति क्यों? मद्रास हाईकोर्ट का सवाल

How can caste appellations exist in names of streets, roads in Tamil Nadu even in 2026, asks Madras High Court — labelled illustration

तमिलनाडु में 2026 में भी सड़कों के नामों में जाति क्यों? मद्रास हाईकोर्ट का सवाल

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✎ मद्रास उच्च न्यायालय ने सड़कों और गलियों के नाम से जातिगत उपाधियों को हटाने के लिए स्वतः संज्ञान लिया है, जो संवैधानिक रूप से परिकल्पित जातिविहीन समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper I — भारतीय समाज, सामाजिक सशक्तिकरण  |  GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; सरकार की नीतियां और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप तथा उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे
  • Prelims: जातिगत उपाधियाँ, मद्रास उच्च न्यायालय, सुओ मोटो मामला, सामाजिक न्याय विभाग, आदि द्रविड़र कल्याण विभाग, अनुच्छेद 15, भेदभाव का निषेध
  • Essay: जातिविहीन समाज की ओर: संवैधानिक आदर्श और जमीनी हकीकत, न्यायपालिका की भूमिका: सामाजिक परिवर्तन का एक साधन

त्वरित पुनरावृत्ति: मद्रास उच्च न्यायालय ने सड़कों और गलियों के नाम से जातिगत उपाधियों को हटाने के लिए स्वतः संज्ञान लिया है, जो संवैधानिक रूप से परिकल्पित जातिविहीन समाज के निर्माण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में सड़कों और गलियों के नाम से जातिगत उपाधियों (caste appellations) के लगातार अस्तित्व पर चिंता व्यक्त की है। न्यायालय ने 1978 से जारी सरकारी आदेशों और न्यायिक निर्देशों के बावजूद ऐसी उपाधियों के बने रहने पर आश्चर्य जताया। न्यायमूर्ति एन. रमेश ने एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान ‘पल्लार स्ट्रीट’ नाम देखा, जिसके बाद उन्होंने इस मुद्दे पर स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने का निर्देश दिया।

पृष्ठभूमि

  • तमिलनाडु सरकार ने 1978 में एक सरकारी आदेश जारी किया था, जिसमें स्थानीय निकायों को सड़कों और गलियों के नाम से जातिगत उपाधियों की पहचान करने और उन्हें बदलने का निर्देश दिया गया था।
  • मद्रास उच्च न्यायालय ने 2018 में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए थे, जिसमें सड़कों और गलियों के नाम से जातिगत संदर्भों को हटाने पर जोर दिया गया था।
  • हाल ही में, मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी. भरत चक्रवर्ती ने तमिलनाडु के सभी स्कूलों और कॉलेजों के नाम से जातिगत उपाधियों को हटाने का आदेश दिया था।
  • तमिलनाडु सरकार ने हाल ही में आदि द्रविड़र कल्याण विभाग (Adi Dravidar Welfare Department) का नाम बदलकर सामाजिक न्याय विभाग (Social Justice Department) कर दिया है, ताकि जाति के संदर्भ से बचा जा सके।
  • न्यायालय का मानना है कि जातिगत नाम वाले स्थानों के निवासियों की पहचान उनकी जाति से होती है, और ये नाम राशन कार्ड, आधार कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे आधिकारिक दस्तावेजों में भी परिलक्षित होते हैं, जिससे गंभीर परिणाम होते हैं।
  • संविधान एक जातिविहीन समाज के निर्माण का संवैधानिक अधिदेश (constitutional imperative) देता है, और यह कदम उसी दिशा में एक प्रयास है।

भारत में जातिगत भेदभाव और संवैधानिक प्रावधान

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करता है।
  • संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता (untouchability) का उन्मूलन करता है और किसी भी रूप में इसके आचरण को निषिद्ध करता है।
  • राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत (Directive Principles of State Policy) सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए राज्य को निर्देश देते हैं, जिसमें समाज के कमजोर वर्गों की सुरक्षा भी शामिल है।
  • न्यायपालिका ने समय-समय पर सामाजिक समानता और भेदभाव रहित समाज के निर्माण के लिए महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं।
  • जातिगत पहचान का सार्वजनिक स्थानों, विशेषकर सड़कों और गलियों के नामों में बने रहना, सामाजिक समानता के संवैधानिक आदर्श के विपरीत है।
  • सरकार और न्यायपालिका दोनों का प्रयास है कि ऐसे प्रतीकों को हटाया जाए जो जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं और सामाजिक विभाजन को मजबूत करते हैं।
  • इस तरह के कदम का उद्देश्य नागरिकों के बीच समानता और बंधुत्व की भावना को बढ़ावा देना है, जैसा कि संविधान की प्रस्तावना में परिकल्पित है।
  • स्वैच्छिक संगठनों और नागरिक समाज की भूमिका भी जातिगत भेदभाव के खिलाफ जागरूकता बढ़ाने और सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
जाति-आधारित नामों का अस्तित्व तमिलनाडु में सड़कों और गलियों के नामकरण में जाति-सूचक शब्दों का प्रयोग अभी भी जारी है, जबकि 1978 से सरकारी आदेश और न्यायिक निर्देश इसके विरुद्ध रहे हैं।
मद्रास उच्च न्यायालय की चिंता न्यायमूर्ति एन. रमेश ने ‘पल्लार स्ट्रीट’ जैसे नामों के अस्तित्व पर हैरानी व्यक्त की और इसे संवैधानिक अनिवार्यता के विरुद्ध बताया।
आधिकारिक दस्तावेजों पर प्रभाव सड़कों के जाति-आधारित नाम निवासियों की पहचान को जाति से जोड़ते हैं, जो राशन कार्ड, आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे आधिकारिक दस्तावेजों में भी परिलक्षित होता है।
पूर्व न्यायिक निर्देश उच्च न्यायालय ने 2018 में भी इसी तरह के निर्देश जारी किए थे, और हाल ही में स्कूलों तथा कॉलेजों के नामों से जाति-सूचक शब्दों को हटाने का आदेश दिया था।
सुओ मोटो मामला उच्च न्यायालय ने सड़कों और गलियों के नामों से जाति-सूचक शब्दों को हटाने के संबंध में स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए एक मामला दर्ज करने का निर्देश दिया है।

महत्व

सामाजिक महत्व

  • जाति-आधारित नामों को हटाना एक जातिविहीन समाज बनाने की संवैधानिक अनिवार्यता को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
  • यह कदम व्यक्तियों को उनकी जाति से जोड़कर देखी जाने वाली पहचान को समाप्त करने में मदद करेगा, जिससे सामाजिक समानता और भाईचारा बढ़ेगा।
  • यह पहल समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को कम करने और सभी नागरिकों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने में सहायक होगी।

प्रशासनिक महत्व

  • सरकारी आदेशों और न्यायिक निर्देशों का प्रभावी कार्यान्वयन सुशासन (Good Governance) के लिए आवश्यक है।
  • यह कदम स्थानीय निकायों और राज्य सरकार की जवाबदेही को बढ़ाएगा कि वे पूर्व में जारी निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें।
  • आधिकारिक दस्तावेजों में जाति-आधारित पहचान के उन्मूलन से प्रशासनिक प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और निष्पक्षता आएगी।

संवैधानिक महत्व

  • यह पहल संविधान के अनुच्छेद 14 (समता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध) के सिद्धांतों को मजबूत करती है।
  • जाति-आधारित नामों को हटाना सामाजिक न्याय (Social Justice) के संवैधानिक लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायक है।
  • यह कदम भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है।

चुनौतियाँ

1. कार्यान्वयन में देरी

  • 1978 से जारी सरकारी आदेशों और न्यायिक निर्देशों के बावजूद जाति-आधारित नामों का अभी भी अस्तित्व में होना कार्यान्वयन तंत्र की कमजोरी को दर्शाता है।
  • स्थानीय निकायों और संबंधित अधिकारियों द्वारा इन निर्देशों का पूरी तरह से पालन न करना एक बड़ी चुनौती है।

2. सामाजिक प्रतिरोध

  • कुछ समुदायों या व्यक्तियों द्वारा जाति-आधारित नामों को हटाने का विरोध किया जा सकता है, जिससे सामाजिक तनाव उत्पन्न हो सकता है।
  • नाम बदलने की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी और सहमति सुनिश्चित करना एक संवेदनशील कार्य है।

3. पहचान का मुद्दा

  • जाति-आधारित नामों से जुड़े निवासियों को अपनी पहचान और आधिकारिक दस्तावेजों में बदलाव के कारण असुविधा का सामना करना पड़ सकता है।
  • नए नामों को स्वीकार करने और उन्हें दैनिक जीवन में अपनाने में समय लग सकता है।

4. व्यापकता और समन्वय

  • केवल सड़कों और गलियों के नाम ही नहीं, बल्कि अन्य सार्वजनिक स्थानों, संस्थानों और यहां तक कि व्यक्तिगत पहचान पत्रों से भी जाति-सूचक शब्दों को हटाना एक व्यापक समन्वय की आवश्यकता है।
  • विभिन्न सरकारी विभागों और स्थानीय निकायों के बीच प्रभावी समन्वय स्थापित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
पुराने सरकारी आदेशों का अनुपालन न होना 1978 और 2018 के निर्देशों के बावजूद जाति-आधारित नामों का जारी रहना, प्रशासनिक शिथिलता को दर्शाता है।
आधिकारिक दस्तावेजों पर जाति का प्रतिबिंब सड़कों के जाति-आधारित नाम राशन कार्ड, आधार कार्ड आदि में भी जातिगत पहचान को बढ़ावा देते हैं।
जातिविहीन समाज की संवैधानिक अनिवार्यता संविधान के मूल सिद्धांतों के बावजूद जातिगत पहचान का सार्वजनिक स्थानों पर बने रहना चिंताजनक है।
विभागीय समन्वय की कमी विभिन्न विभागों और स्थानीय निकायों के बीच निर्देशों के प्रभावी कार्यान्वयन में समन्वय की कमी प्रतीत होती है।
सामाजिक न्याय विभाग का अधूरा कार्य आदि द्रविड़र कल्याण विभाग का नाम बदलकर सामाजिक न्याय विभाग करने के बावजूद, जाति-आधारित नामों का अस्तित्व कार्य को अधूरा बनाता है।

आगे की राह

  • राज्य सरकार को सभी संबंधित विभागों और स्थानीय निकायों के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध कार्य योजना (Action Plan) बनानी चाहिए।
  • जाति-आधारित नामों की पहचान करने और उन्हें बदलने के लिए एक समर्पित टास्क फोर्स या समिति का गठन किया जाना चाहिए।
  • जन जागरूकता अभियान चलाकर नागरिकों को जाति-आधारित नामों को हटाने के महत्व और लाभों के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।
  • नाम बदलने की प्रक्रिया को सुगम और पारदर्शी बनाने के लिए एक ऑनलाइन पोर्टल या शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जा सकता है।
  • स्थानीय निकायों को इस प्रक्रिया में सक्रिय रूप से शामिल किया जाना चाहिए और उन्हें आवश्यक संसाधन तथा प्रशिक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
  • उच्च न्यायालय के निर्देशों का अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने के लिए नियमित निगरानी और आवधिक रिपोर्टिंग प्रणाली लागू की जानी चाहिए।
  • नए नामों का चयन करते समय स्थानीय इतिहास, संस्कृति और स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को ध्यान में रखा जा सकता है, ताकि किसी भी विवाद से बचा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

जातिगत भेदभाव · समानता का अधिकार · सामाजिक न्याय · न्यायिक सक्रियता · राज्य नीति के निदेशक सिद्धांत · स्थानीय स्वशासन · संवैधानिक नैतिकता · जातिविहीन समाज · मौलिक अधिकार · न्यायिक समीक्षा

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 14’, ‘note’: ‘विधि के समक्ष समता’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 15’, ‘note’: ‘भेदभाव का प्रतिषेध’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 17’, ‘note’: ‘अस्पृश्यता का उन्मूलन’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार’}

अवधारणा प्रवाह

जाति-आधारित सड़क/गली के नाम  →  निवासियों की पहचान जाति से जोड़ना  →  आधिकारिक दस्तावेजों में जाति का प्रतिबिंब  →  सामाजिक समानता और न्याय का उल्लंघन  →  मद्रास उच्च न्यायालय की चिंता और निर्देश  →  जाति-आधारित नामों को हटाने की आवश्यकता  →  संवैधानिक मूल्यों की स्थापना

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मद्रास उच्च न्यायालय ने 1978 से सड़कों और गलियों के नामकरण में जातिगत संदर्भों से बचने के लिए सरकारी आदेशों और न्यायिक निर्देशों की एक श्रृंखला के बावजूद जातिगत नामों के निरंतर अस्तित्व पर चिंता व्यक्त की है।
2. भारतीय संविधान का अनुच्छेद 15 राज्य को किसी भी नागरिक के विरुद्ध केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान या इनमें से किसी के आधार पर कोई विभेद करने से प्रतिषेध करता है।
3. सर्वोच्च न्यायालय ने ‘जातिविहीन समाज’ के निर्माण को संवैधानिक अनिवार्यता बताया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि मद्रास उच्च न्यायालय ने 1978 से जारी निर्देशों के बावजूद जातिगत नामों के अस्तित्व पर चिंता व्यक्त की है। कथन 2 सही है क्योंकि अनुच्छेद 15 भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। कथन 3 सही नहीं है क्योंकि यह मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा व्यक्त किया गया विचार है, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नहीं।

Q2. अभिकथन (A): सड़कों और गलियों के नामकरण में जातिगत उपाधियों का उपयोग व्यक्तियों की पहचान को उनकी जाति से जोड़ता है और आधिकारिक दस्तावेजों में भी परिलक्षित होता है।
कारण (R): भारत का संविधान एक जातिविहीन समाज के निर्माण की अनिवार्यता पर बल देता है।
उपरोक्त कथनों के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा सही है?

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सत्य है क्योंकि जातिगत नाम व्यक्ति की पहचान को जाति से जोड़ते हैं और आधिकारिक दस्तावेजों में भी दिखते हैं, जैसा कि उच्च न्यायालय ने कहा है। कारण (R) भी सत्य है क्योंकि संविधान एक जातिविहीन समाज के निर्माण की संवैधानिक अनिवार्यता पर बल देता है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या है क्योंकि जातिगत नामों को हटाने का प्रयास जातिविहीन समाज के निर्माण की संवैधानिक अनिवार्यता के अनुरूप है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मद्रास उच्च न्यायालय द्वारा सड़कों और गलियों से जातिगत उपाधियों को हटाने के निर्देश के आलोक में, भारत में जातिविहीन समाज के निर्माण की संवैधानिक अनिवार्यता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इस दिशा में राज्य और न्यायपालिका की भूमिका पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: परिचय में मद्रास उच्च न्यायालय के हालिया निर्देश का उल्लेख करें। संवैधानिक अनिवार्यता को अनुच्छेद 15, 17, 38, 46 और प्रस्तावना में निहित सामाजिक न्याय के आदर्शों के माध्यम से समझाएं। जातिविहीन समाज की अवधारणा और इसके महत्व पर प्रकाश डालें। राज्य की भूमिका में विधायी उपाय (जैसे जातिगत नामों को हटाने के लिए सरकारी आदेश), प्रशासनिक प्रयास (विभागों का नाम बदलना) और शिक्षा के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन शामिल होने चाहिए। न्यायपालिका की भूमिका में न्यायिक सक्रियता (जैसे सुओ मोटो मामले दर्ज करना), मौलिक अधिकारों का प्रवर्तन, और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों को बनाए रखना शामिल होना चाहिए। चुनौतियों और सीमाओं का भी उल्लेख करें, जैसे कि सामाजिक जड़ता और निर्देशों के कार्यान्वयन में देरी। निष्कर्ष में एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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