राज्यों द्वारा खनिजों पर कर लगाने पर रोक हेतु संसद में विधेयक पेश, विपक्ष ने समिति की मांग की

Bill to bar state taxes on minerals tabled in Parliament, Oppn calls for committee review — concept mind map

राज्यों द्वारा खनिजों पर कर लगाने पर रोक हेतु संसद में विधेयक पेश, विपक्ष ने समिति की मांग की

Mines Bill 2026State mineral tax banBars states from taxing mineral rightsProtects mining sector viabilitySC July 2024 rulingStates can levy mineral taxesSeparate from royalty under MMDR 1957Retrospective taxation₹70k cr burden on PSUsOpposed by mining firmsRevenue impactStates may lose ₹1.5-2L crInvestment uncertainty reduced
Mines Bill 2026

✎ खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकना है, जिससे केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और संघवाद पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध, शक्तियों का पृथक्करण  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था: खनिज संसाधन, खनन क्षेत्र, सरकारी नीतियाँ
  • Prelims: खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957, खनिज अधिकार, राज्य सूची, संघ सूची, समवर्ती सूची, राजस्व बंटवारा, संघवाद, न्यायिक समीक्षा
  • Essay: भारत में संघवाद की चुनौतियाँ और भविष्य, प्राकृतिक संसाधनों का प्रबंधन और सतत विकास, केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध: मुद्दे और सुधार

त्वरित पुनरावृत्ति: खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का उद्देश्य राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकना है, जिससे केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों और संघवाद पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ेगा।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, केंद्र सरकार ने लोकसभा में खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Bill, 2026) पेश किया है। इस विधेयक का उद्देश्य राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य शुल्क लगाने से रोकना है। सरकार का तर्क है कि अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान से खनन क्षेत्र व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य हो जाएगा, जबकि विपक्ष ने इसे राज्यों की राजकोषीय शक्तियों और संघवाद पर हमला बताया है। यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2024 के एक निर्णय के बाद लाया गया है, जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा गया था।

पृष्ठभूमि

  • जुलाई 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया था, जिसमें यह माना गया था कि राज्य सरकारों के पास खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने की शक्ति है। यह रॉयल्टी (royalty) से अलग है, जो खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957) के तहत देय है।
  • सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि MMDR अधिनियम, 1957 राज्यों की खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति को सीमित नहीं करता है।
  • इस निर्णय को झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान जैसे खनिज-समृद्ध राज्यों के लिए एक बड़ी वित्तीय जीत के रूप में देखा गया, जिससे उन्हें संभावित रूप से ₹1.5-2 लाख करोड़ का राजस्व प्राप्त हो सकता था।
  • हालांकि, इस निर्णय से खनन कंपनियों को 1 अप्रैल, 2005 से पूर्वव्यापी कराधान (retrospective taxation) का सामना करना पड़ा, जिससे उद्योग और केंद्र सरकार चिंतित थे। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर लगभग ₹70,000 करोड़ का बोझ पड़ने का अनुमान था।
  • केंद्र और निजी खनन संस्थाएँ अभी भी इस पूर्वव्यापी लेवी और इसके प्रतिस्पर्धी प्रभावों का विरोध कर रही हैं।

खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957

  • खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 भारत में खनन क्षेत्र को विनियमित करने वाला एक प्रमुख कानून है।
  • यह अधिनियम खनिजों के विकास और विनियमन के लिए केंद्र सरकार को व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है।
  • इसका मुख्य उद्देश्य देश में खनिजों के व्यवस्थित और सतत विकास को सुनिश्चित करना है।
  • यह अधिनियम खनन पट्टों (mining leases) और पूर्वेक्षण लाइसेंस (prospecting licenses) के अनुदान और नवीनीकरण के लिए नियम निर्धारित करता है।
  • अधिनियम के तहत, केंद्र सरकार कुछ खनिजों को ‘प्रमुख खनिज’ (major minerals) के रूप में अधिसूचित कर सकती है, जिनके विनियमन की शक्ति मुख्य रूप से केंद्र के पास होती है। अन्य खनिजों को ‘लघु खनिज’ (minor minerals) के रूप में वर्गीकृत किया जाता है, जिनके विनियमन की शक्ति राज्यों के पास होती है।
  • यह अधिनियम रॉयल्टी के भुगतान का भी प्रावधान करता है, जो खनन गतिविधियों के लिए सरकार को देय होता है।
  • संविधान की सातवीं अनुसूची के तहत, ‘खनिज’ संघ सूची (Union List) की प्रविष्टि 54 और राज्य सूची (State List) की प्रविष्टि 23 के तहत आते हैं, जो केंद्र और राज्यों दोनों को इस क्षेत्र में कानून बनाने की शक्ति प्रदान करते हैं, लेकिन संघ सूची की प्रविष्टि 54 केंद्र को ‘विकास और विनियमन’ के लिए कानून बनाने की विशेष शक्ति देती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
राज्य करों पर प्रतिबंध यह विधेयक राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर किसी भी प्रकार का कर, उपकर या शुल्क लगाने से प्रतिबंधित करता है।
केंद्र की नियामक शक्ति का विस्तार यह खानों और खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र सरकार की नियामक शक्ति को बढ़ाता है, जिसका उद्देश्य खनिजों का सतत और समान विकास सुनिश्चित करना है।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का प्रभाव यह संशोधन विधेयक जुलाई 2024 के सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय के प्रत्युत्तर में लाया गया है, जिसमें राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखा गया था।
सार्वजनिक हित का तर्क सरकार का तर्क है कि यह विधेयक बड़े सार्वजनिक हित में है, क्योंकि अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान से खनन क्षेत्र व्यावसायिक रूप से अव्यवहार्य हो जाएगा।
पूर्वव्यापी कराधान का मुद्दा यह विधेयक 1 अप्रैल, 2005 से पूर्वव्यापी कराधान के मुद्दे को संबोधित करने का प्रयास करता है, जिससे खनन कंपनियों पर भारी वित्तीय बोझ पड़ रहा था।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • यह विधेयक खनन क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि यह कराधान की अनिश्चितता को कम करेगा।
  • खनन कंपनियों, विशेषकर सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों पर पूर्वव्यापी करों का भारी वित्तीय बोझ कम हो सकता है, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति में सुधार होगा।
  • खनिज संसाधनों के सतत और समान विकास को सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी, जो देश की औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण है।

राजकोषीय प्रभाव

  • खनिज-समृद्ध राज्यों (जैसे झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़ और राजस्थान) के लिए राजस्व का संभावित नुकसान हो सकता है, क्योंकि वे खनिज अधिकारों पर कर लगाने की अपनी शक्ति खो देंगे।
  • केंद्र सरकार के लिए खनन क्षेत्र से संबंधित नीतियों में अधिक एकरूपता और नियंत्रण स्थापित करने का अवसर प्रदान करता है।

शासन और नियामक महत्व

  • यह विधेयक केंद्र सरकार को खनन क्षेत्र पर अधिक नियामक नियंत्रण प्रदान करता है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर एक सुसंगत नीति ढांचा तैयार हो सकता है।
  • यह खनन क्षेत्र में ‘व्यावसायिक सुगमता’ (Ease of Doing Business) को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है, जिससे निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।

चुनौतियाँ

1. संघवाद पर प्रभाव

  • विपक्षी दलों का तर्क है कि यह विधेयक राज्यों की राजकोषीय शक्तियों और संघवाद (Federalism) को कमजोर करेगा, क्योंकि यह राज्यों के राजस्व के एक महत्वपूर्ण स्रोत पर प्रतिबंध लगाता है।
  • संविधान के तहत राज्यों को कर लगाने की जो शक्ति प्राप्त है, उस पर केंद्र द्वारा अतिक्रमण के रूप में देखा जा सकता है।

2. राज्यों के राजस्व पर असर

  • खनिज-समृद्ध राज्यों को इस विधेयक के कारण राजस्व का भारी नुकसान हो सकता है, जिससे उनकी विकास परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
  • यह राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को कम कर सकता है और उन्हें केंद्र पर अधिक निर्भर बना सकता है।

3. न्यायिक समीक्षा का मुद्दा

  • यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2024 के निर्णय को ‘अधिनियमित’ (legislatively override) करने का प्रयास करता है, जिसमें राज्यों के कर लगाने के अधिकार को बरकरार रखा गया था। यह विधायिका और न्यायपालिका के बीच संभावित टकराव का कारण बन सकता है।
  • क्या विधायिका के पास न्यायिक निर्णयों को इस तरह से पलटने की शक्ति है, यह एक संवैधानिक बहस का विषय हो सकता है।

4. उद्योग के लिए पूर्वव्यापी कराधान

  • हालांकि विधेयक पूर्वव्यापी कराधान के मुद्दे को संबोधित करता है, लेकिन इसके पूर्ण प्रभाव और उद्योग पर पड़ने वाले दीर्घकालिक परिणामों का मूल्यांकन आवश्यक है।
  • उद्योग अभी भी 1 अप्रैल, 2005 से शुरू होने वाले पिछले बकाया को लेकर चिंतित है, जिसका वित्तीय प्रभाव 1.5-2 लाख करोड़ रुपये अनुमानित है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
राज्यों की कराधान शक्ति विधेयक राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकता है, जिससे उनकी राजकोषीय स्वायत्तता और संघवाद के सिद्धांत कमजोर होते हैं।
राजस्व का नुकसान खनिज-समृद्ध राज्यों को राजस्व का भारी नुकसान होगा, जिससे उनकी वित्तीय स्थिति और विकास क्षमता प्रभावित होगी।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लंघन यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय के उस निर्णय को पलटता है जिसने राज्यों के कर लगाने के अधिकार को बरकरार रखा था, जिससे विधायिका और न्यायपालिका के बीच तनाव बढ़ सकता है।
पूर्वव्यापी कराधान का समाधान हालांकि विधेयक पूर्वव्यापी कराधान को संबोधित करता है, लेकिन उद्योग पर इसके पूर्ण वित्तीय प्रभाव और कानूनी जटिलताओं को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं।
संसदीय समिति की समीक्षा विपक्ष द्वारा विधेयक को जल्दबाजी में पारित करने के बजाय संसदीय समिति द्वारा विस्तृत समीक्षा की मांग की जा रही है, ताकि इसके सभी पहलुओं पर विचार किया जा सके।

आगे की राह

  • विधेयक को संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee) को भेजा जाना चाहिए ताकि इसके सभी पहलुओं, विशेषकर संघवाद और राज्यों के राजस्व पर पड़ने वाले प्रभावों पर विस्तृत चर्चा और विचार-विमर्श हो सके।
  • केंद्र और राज्य सरकारों के बीच खनिज कराधान के मुद्दे पर व्यापक परामर्श और सहमति बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए, ताकि सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा मिल सके।
  • राज्यों के राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए वैकल्पिक तंत्रों पर विचार किया जाना चाहिए, जैसे कि केंद्र द्वारा विशेष अनुदान या रॉयल्टी के हिस्से में वृद्धि।
  • खनन क्षेत्र में ‘व्यावसायिक सुगमता’ सुनिश्चित करने के साथ-साथ राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता के बीच संतुलन स्थापित करने वाला एक स्थायी समाधान खोजना महत्वपूर्ण है।
  • पूर्वव्यापी कराधान के मुद्दे पर उद्योग की चिंताओं को दूर करने और एक स्पष्ट तथा अनुमानित कराधान व्यवस्था स्थापित करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए।
  • संविधान के तहत केंद्र और राज्यों के बीच विधायी शक्तियों के विभाजन का सम्मान करते हुए एक ऐसा ढांचा विकसित किया जाना चाहिए जो राष्ट्रीय हित और क्षेत्रीय आवश्यकताओं दोनों को पूरा करे।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

खनिज अधिकार · खनिज-युक्त भूमि · राज्य कराधान · संघवाद · राजकोषीय संघवाद · संविधान का अनुच्छेद 246 · सातवीं अनुसूची · खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 · सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय · केंद्र-राज्य संबंध · खनिज नीति · आर्थिक व्यवहार्यता

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 246’, ‘note’: ‘केंद्र और राज्यों के बीच विधायी विषयों का वितरण’}
  • {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ’}
  • {‘article’: ‘सूची II (राज्य सूची), प्रविष्टि 50’, ‘note’: ‘खनिज अधिकारों पर कर लगाने की राज्यों की शक्ति’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 265’, ‘note’: ‘कानून के प्राधिकार के बिना कोई कर नहीं’}

अवधारणा प्रवाह

सर्वोच्च न्यायालय का जुलाई 2024 का निर्णय राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति को बरकरार रखता है।  →  इस निर्णय से खनिज-समृद्ध राज्यों को राजस्व लाभ, लेकिन खनन कंपनियों पर पूर्वव्यापी करों का भारी बोझ।  →  केंद्र सरकार और खनन उद्योग पूर्वव्यापी कराधान और व्यावसायिक अव्यवहार्यता पर चिंता व्यक्त करते हैं।  →  सरकार खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 संसद में पेश करती है।  →  यह विधेयक राज्यों को खनिज अधिकारों पर कर लगाने से रोकता है और केंद्र की नियामक शक्ति का विस्तार करता है।  →  विपक्ष विधेयक को संघवाद और राज्यों की राजकोषीय शक्तियों पर अतिक्रमण के रूप में देखता है, समिति समीक्षा की मांग करता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II (राज्य सूची) में ‘खनिज अधिकार’ पर कर लगाने की शक्ति शामिल है।
2. खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 के तहत देय रॉयल्टी (Royalty) को सर्वोच्च न्यायालय ने ‘कर’ के रूप में वर्गीकृत किया है।
3. हाल ही में पेश किया गया खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026, राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने से रोकता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने जुलाई 2024 के फैसले में कहा था कि राज्यों के पास खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति है, जो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II के तहत आती है। कथन 2 गलत है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने जुलाई 2024 के फैसले में स्पष्ट किया था कि MMDR अधिनियम के तहत देय रॉयल्टी एक कर नहीं है। कथन 3 सही है। विधेयक का उद्देश्य राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर कर, उपकर या अन्य लेवी लगाने से रोकना है।

Q2. अभिकथन (A): केंद्र सरकार ने खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्य करों को प्रतिबंधित करने के लिए एक संशोधन विधेयक पेश किया है।
कारण (R): यह विधेयक खनन क्षेत्र में अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान को रोकने तथा खनिजों के सतत और समान विकास को सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, क्योंकि केंद्र सरकार ने वास्तव में ऐसा एक विधेयक पेश किया है। कारण (R) भी सही है, क्योंकि विधेयक का मुख्य उद्देश्य अत्यधिक कराधान से बचना और क्षेत्र के सतत विकास को बढ़ावा देना है, जैसा कि सरकार ने स्वयं कहा है। कारण (R) अभिकथन (A) की सही व्याख्या करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर राज्य कराधान को प्रतिबंधित करने वाले हालिया विधेयक के निहितार्थों का परीक्षण करें। यह विधेयक भारत में संघवाद और राजकोषीय स्वायत्तता के सिद्धांतों को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है? (15 अंक)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: विधेयक का संक्षिप्त परिचय (खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026) और इसका मुख्य उद्देश्य (खनिज अधिकारों पर राज्य करों पर रोक)।
2. विधेयक के निहितार्थ:
a. केंद्र की नियामक शक्ति में वृद्धि: खनिजों के सतत और समान विकास के लिए केंद्र का अधिक नियंत्रण।
b. खनन क्षेत्र की आर्थिक व्यवहार्यता: अत्यधिक और अप्रत्याशित कराधान से बचाव, निवेश को बढ़ावा।
c. सर्वोच्च न्यायालय के जुलाई 2024 के फैसले का संदर्भ: राज्यों के कर लगाने के अधिकार को बरकरार रखने वाले फैसले के बाद विधेयक की आवश्यकता।
d. राज्यों के राजस्व पर प्रभाव: खनिज-समृद्ध राज्यों (जैसे झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, राजस्थान) के लिए संभावित राजस्व हानि।
3. संघवाद और राजकोषीय स्वायत्तता पर प्रभाव:
a. संवैधानिक प्रावधान: संविधान की सातवीं अनुसूची (सूची II – राज्य सूची) में ‘खनिज अधिकारों पर कर’ लगाने की राज्यों की शक्ति का उल्लेख।
b. राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव: राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता में कमी की आशंका, राज्यों के राजस्व स्रोतों पर केंद्र का नियंत्रण।
c. केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव: राज्यों द्वारा ‘संघवाद पर हमले’ के रूप में देखे जाने की संभावना।
d. नीतिगत बहस: क्या केंद्र का हस्तक्षेप ‘बड़े जनहित’ में आवश्यक है या यह राज्यों के अधिकारों का अतिक्रमण है।
4. निष्कर्ष: एक संतुलित दृष्टिकोण प्रस्तुत करें, जिसमें विधेयक के संभावित लाभों (खनन क्षेत्र का विकास, निवेश) और संघवाद पर इसके संभावित नकारात्मक प्रभावों (राज्यों की राजकोषीय स्वायत्तता का क्षरण) दोनों पर विचार किया गया हो।

स्रोत: Hindustan Times


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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