13 Aug कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी ने तेलंगाना सरकार से ट्रांस कानून संशोधन का विरोध करने को कहा
✎ ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में हालिया संशोधन संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — सामाजिक न्याय, संविधान एवं राजव्यवस्था | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा, मानवाधिकार
- Prelims: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019, स्व-पहचान का अधिकार, राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद, अनुच्छेद 14, 15, 19, 21, न्यायिक समीक्षा
- Essay: सामाजिक न्याय और समावेशी विकास, भारत में मानवाधिकारों का संरक्षण
त्वरित पुनरावृत्ति: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 में हालिया संशोधन संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप में सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, एक कांग्रेस सांसद ने तेलंगाना सरकार से सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 (Transgender Persons (Protection of Rights) Act, 2019) में किए गए संशोधनों का विरोध करने का आग्रह किया है। सांसद ने राज्य सरकार से इन संशोधनों के प्रशासनिक, वित्तीय और कार्यान्वयन संबंधी प्रभावों की जांच करने का भी अनुरोध किया है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे राज्य की मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा की प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष न करें।
पृष्ठभूमि
- ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 को भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अधिनियमित किया गया था।
- इस अधिनियम के मूल प्रावधानों में लिंग पहचान की स्व-पहचान का अधिकार शामिल था, जो ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण मांग थी।
- इन संशोधनों के कारण देश भर में ट्रांसजेंडर समुदाय द्वारा व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए हैं, और राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (National Council for Transgender Persons) के सदस्यों ने भी इस्तीफा दे दिया है।
- सर्वोच्च न्यायालय वर्तमान में इन संशोधनों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।
- कांग्रेस पार्टी ने इन संशोधनों का विरोध किया है, यह तर्क देते हुए कि वे गरिमा, समानता और स्व-पहचान के सिद्धांतों को कमजोर करते हैं, और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत गारंटीकृत अधिकारों का उल्लंघन करते हैं।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 क्या है?
- यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को पहचान का प्रमाण पत्र प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है, जो उन्हें ट्रांसजेंडर के रूप में मान्यता देता है।
- मूल अधिनियम में, यह प्रमाण पत्र स्व-पहचान के आधार पर जारी किया जाना था, जिसमें किसी चिकित्सा हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं थी।
- अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के खिलाफ भेदभाव को प्रतिबंधित करता है, जिसमें शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवा और सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच शामिल है।
- यह अधिनियम ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के कल्याण के लिए विभिन्न उपायों का भी प्रावधान करता है, जैसे कि स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा।
- अधिनियम के तहत, केंद्र सरकार को राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (NCTP) का गठन करना अनिवार्य है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों से संबंधित नीतियों, कार्यक्रमों और कानूनों पर केंद्र सरकार को सलाह देती है।
- इन संशोधनों को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन माना जा रहा है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| लैंगिक पहचान का स्व-निर्धारण | यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अपनी पहचान को स्वयं परिभाषित करने का अधिकार है, जो उनकी गरिमा और स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण है। |
| चिकित्सा प्रमाणन की अनिवार्यता | संशोधित कानून में लैंगिक पहचान के लिए चिकित्सा प्रमाणन को अनिवार्य किया गया है, जो स्व-निर्धारण के अधिकार का उल्लंघन करता है। |
| राज्यों की भूमिका | राज्य सरकारें ट्रांसजेंडर अधिकारों से संबंधित कानूनों के कार्यान्वयन और उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। |
| संवैधानिक चुनौतियाँ | संशोधित कानून को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है, जिसमें तर्क दिया गया है कि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 का उल्लंघन करता है। |
| राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद | यह परिषद ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों और कल्याण से संबंधित मामलों पर सरकार को सलाह देती है, लेकिन इसके कुछ सदस्यों ने संशोधन के विरोध में इस्तीफा दे दिया है। |
महत्व
सामाजिक महत्व
- यह मुद्दा ट्रांसजेंडर समुदाय के आत्म-सम्मान और गरिमा से जुड़ा है, जो उन्हें समाज में समान नागरिक के रूप में मान्यता देने के लिए आवश्यक है।
- संशोधित कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है, जिससे उनके सामाजिक समावेश और स्वीकार्यता में बाधा आ सकती है।
कानूनी एवं संवैधानिक महत्व
- यह मामला संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality), समानता (Equality), गैर-भेदभाव (Non-Discrimination) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता (Personal Liberty) के सिद्धांतों से संबंधित है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में स्थापित किया गया है।
- राज्यों को केंद्र के कानूनों के कार्यान्वयन के प्रशासनिक, वित्तीय और व्यावहारिक निहितार्थों की जांच करने का अधिकार है, विशेष रूप से जब वे राज्य की मौजूदा कल्याणकारी नीतियों से टकराते हों।
शासनिक महत्व
- यह केंद्र और राज्य सरकारों के बीच विधायी और कार्यकारी शक्तियों के संतुलन को दर्शाता है, खासकर जब संवैधानिक अधिकारों से संबंधित मामले हों।
- यह कानून बनाने की प्रक्रिया में हितधारकों, विशेषकर प्रभावित समुदायों के साथ उचित परामर्श के महत्व को रेखांकित करता है।
चुनौतियाँ
1. लैंगिक पहचान का स्व-निर्धारण
- संशोधित कानून लैंगिक पहचान के स्व-निर्धारण के अधिकार को हटाता है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने मान्यता दी थी।
- यह ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की स्वायत्तता और गरिमा का उल्लंघन करता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: कमजोर वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं
2. चिकित्सा प्रमाणन की अनिवार्यता
- लैंगिक पहचान के लिए चिकित्सा प्रमाणन को अनिवार्य करना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए बोझिल और अपमानजनक हो सकता है।
- यह निजता के अधिकार का भी उल्लंघन कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक न्याय: स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे
3. संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
- संशोधित कानून को अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 15 (भेदभाव का निषेध), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करने वाला माना जा रहा है।
- यह न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में आता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: मौलिक अधिकार
4. राज्यों पर प्रशासनिक और वित्तीय प्रभाव
- संशोधित कानून के कारण राज्यों को अपने मौजूदा कल्याणकारी ढांचे और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के साथ संभावित संघर्षों का सामना करना पड़ सकता है।
- कानून के कार्यान्वयन में राज्यों को अतिरिक्त प्रशासनिक और वित्तीय बोझ उठाना पड़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| स्व-निर्धारण का अधिकार | संशोधित कानून ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अपनी लैंगिक पहचान को स्वयं परिभाषित करने के अधिकार को छीनता है, जो उनकी गरिमा और स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण है। |
| चिकित्सा प्रमाणन | लैंगिक पहचान के लिए चिकित्सा प्रमाणन को अनिवार्य करना ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अपमानजनक और बोझिल हो सकता है, और यह निजता के अधिकार का उल्लंघन करता है। |
| संवैधानिक अधिकार | संशोधित कानून को संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने वाला माना जा रहा है। |
| राज्य की कल्याणकारी नीतियां | संशोधित कानून राज्य की मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के साथ संघर्ष कर सकता है। |
| राष्ट्रीय परिषद का विरोध | राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद के सदस्यों ने संशोधन के विरोध में इस्तीफा दे दिया है, जो कानून की स्वीकार्यता पर सवाल उठाता है। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक सिद्धांतों और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए कानून की वैधता की समीक्षा करनी चाहिए।
- सरकार को ट्रांसजेंडर समुदाय और अन्य हितधारकों के साथ व्यापक परामर्श करके कानून में आवश्यक संशोधन करने चाहिए।
- लैंगिक पहचान के स्व-निर्धारण के सिद्धांत को कानून में पुनः स्थापित किया जाना चाहिए, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व निर्णयों में मान्यता दी गई है।
- चिकित्सा प्रमाणन के बजाय स्व-पहचान पर आधारित एक सरल और सम्मानजनक प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
- राज्यों को कानून के कार्यान्वयन में आने वाली प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियों का समाधान करने के लिए केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करना चाहिए।
- ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए समावेशी नीतियों और कल्याणकारी योजनाओं को मजबूत किया जाना चाहिए, जो उनके अधिकारों और गरिमा का सम्मान करती हों।
- जन जागरूकता अभियान चलाकर समाज में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के प्रति संवेदनशीलता और स्वीकार्यता बढ़ाई जानी चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
ट्रांसजेंडर अधिकार · स्व-पहचान · लैंगिक पहचान · संवैधानिक नैतिकता · अनुच्छेद 14 · अनुच्छेद 15 · अनुच्छेद 19 · अनुच्छेद 21 · न्यायिक समीक्षा · संघवाद · सामाजिक न्याय · समावेशन
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समानता और विधियों का समान संरक्षण।
- अनुच्छेद 15: धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।
- अनुच्छेद 19: वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सहित कुछ अधिकारों का संरक्षण।
- अनुच्छेद 21: प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण।
- अनुच्छेद 32: मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उपचार।
अवधारणा प्रवाह
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम में संशोधन → लैंगिक पहचान के स्व-निर्धारण के अधिकार का हटना → चिकित्सा प्रमाणन की अनिवार्यता → ट्रांसजेंडर समुदाय और कार्यकर्ताओं का विरोध → सर्वोच्च न्यायालय में संवैधानिक चुनौती
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को स्व-पहचान के आधार पर अपनी लैंगिक पहचान को मान्यता देने का अधिकार देता है।
2. राष्ट्रीय ट्रांसजेंडर व्यक्ति परिषद (National Council for Transgender Persons) का गठन ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और उनके कल्याण के लिए किया गया है।
3. भारत का संविधान ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 के तहत समानता, गैर-भेदभाव, स्वतंत्रता और जीवन के अधिकार की गारंटी देता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 गलत है क्योंकि हालिया संशोधनों ने स्व-पहचान के अधिकार को हटाकर चिकित्सा प्रमाणन को अनिवार्य कर दिया है। कथन 2 और 3 सही हैं, राष्ट्रीय परिषद का गठन ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों और कल्याण के लिए किया गया है, और संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19 और 21 ट्रांसजेंडर व्यक्तियों सहित सभी नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान करते हैं।
Q2. निम्नलिखित में से कौन सा अनुच्छेद भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के गरिमापूर्ण जीवन और समानता के अधिकार से सीधे संबंधित है?
- अनुच्छेद 16
- अनुच्छेद 20
- अनुच्छेद 21
- अनुच्छेद 22
उत्तर: अनुच्छेद 21 — अनुच्छेद 21 ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार’ की गारंटी देता है, जिसमें गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार भी शामिल है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न निर्णयों में इस अधिकार को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों तक भी विस्तारित किया है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों के संरक्षण से संबंधित हालिया विधायी संशोधनों ने स्व-पहचान के सिद्धांत को कमजोर किया है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों के संदर्भ में इन संशोधनों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और चर्चा कीजिए कि ये संशोधन ट्रांसजेंडर समुदाय के संवैधानिक अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019 के हालिया संशोधनों का संक्षिप्त उल्लेख, विशेष रूप से स्व-पहचान के अधिकार को हटाने पर केंद्रित।
2. स्व-पहचान का सिद्धांत: सर्वोच्च न्यायालय के ‘नालसा बनाम भारत संघ’ (NALSA v. Union of India, 2014) निर्णय का उल्लेख, जिसमें स्व-पहचान को ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी। इस निर्णय के प्रमुख बिंदुओं को रेखांकित करें (जैसे अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 के तहत अधिकार)।
3. विधायी संशोधन: उन प्रावधानों का विवरण दें जिन्होंने स्व-पहचान के बजाय चिकित्सा प्रमाणन को अनिवार्य किया है। इन संशोधनों के पीछे के तर्कों (यदि कोई हों) का संक्षिप्त उल्लेख।
4. संवैधानिक अधिकारों पर प्रभाव: चर्चा करें कि ये संशोधन अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) के तहत ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के अधिकारों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं। गरिमा और निजता के अधिकार पर पड़ने वाले प्रभावों पर विशेष ध्यान दें।
5. समालोचनात्मक परीक्षण: इन संशोधनों के प्रशासनिक, वित्तीय और कार्यान्वयन संबंधी निहितार्थों का विश्लेषण करें, जैसा कि तेलंगाना सरकार से अनुरोध किया गया है। राज्य के मौजूदा कल्याणकारी ढांचे और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता के साथ संभावित संघर्षों पर चर्चा करें।
6. संघवाद और न्यायिक समीक्षा: राज्य सरकारों की भूमिका और न्यायिक समीक्षा के माध्यम से इन संशोधनों को चुनौती देने की संभावना पर संक्षिप्त टिप्पणी।
7. निष्कर्ष: ट्रांसजेंडर समुदाय के अधिकारों की रक्षा के महत्व और संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांतों को बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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