18 Aug कन्नूर का दुर्लभ ‘कन्नम्पोट्टी’ मैन्ग्रोव बचाने की मुहिम: एक पौधे से 2000 तक
Mangrove speciesRoot systemSeed podsTidal zoneCanopy cover✎ मैंग्रोव वन तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के महत्वपूर्ण संरक्षक हैं, जो जैव विविधता, तटीय सुरक्षा और कार्बन पृथक्करण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और इनके संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी और जैव विविधता | GS Paper III — आपदा प्रबंधन
- Prelims: मैंग्रोव वनस्पति, कन्नमपोट्टी (एक्सोकेरिया अगालोचा), तटीय पारिस्थितिकी तंत्र, जैव विविधता संरक्षण, पारिस्थितिकीय संतुलन, प्लास्टिक प्रदूषण
- Essay: पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास, स्थानीय समुदायों की भूमिका और जैव विविधता का महत्व
त्वरित पुनरावृत्ति: मैंग्रोव वन तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के महत्वपूर्ण संरक्षक हैं, जो जैव विविधता, तटीय सुरक्षा और कार्बन पृथक्करण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, और इनके संरक्षण के लिए स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल के कन्नूर जिले में, मछुआरे और मैंग्रोव संरक्षणवादी परायिल राजन ने ‘कन्नमपोट्टी’ (एक्सोकेरिया अगालोचा) नामक एक दुर्लभ मैंग्रोव प्रजाति को विलुप्त होने से बचाने का बीड़ा उठाया है। उन्होंने इस प्रजाति के 2,000 से अधिक पौधे अपनी नर्सरी में तैयार किए हैं, जो तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण में स्थानीय प्रयासों के महत्व को रेखांकित करता है।
पृष्ठभूमि
- मैंग्रोव (Mangrove) उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में खारे पानी में उगने वाले विशेष प्रकार के पेड़ और झाड़ियाँ हैं।
- ये तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों (Coastal Ecosystems) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो समुद्री जीवन के लिए नर्सरी का काम करते हैं और तटीय रेखा को कटाव से बचाते हैं।
- भारत में मैंग्रोव वन मुख्य रूप से सुंदरबन (पश्चिम बंगाल), भितरकनिका (ओडिशा), मन्नार की खाड़ी (तमिलनाडु) और अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पाए जाते हैं।
- कन्नमपोट्टी (एक्सोकेरिया अगालोचा) एक दुर्लभ मैंग्रोव प्रजाति है, जिसके बारे में आशंका है कि यह कन्नूर के ज्वारीय परिदृश्य से गायब हो सकती है।
- परायिल राजन जैसे स्थानीय संरक्षणवादी दशकों से मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्रों की रक्षा के लिए काम कर रहे हैं, जो जमीनी स्तर पर संरक्षण प्रयासों का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।
- मैंग्रोव वनों को प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution) जैसे मानवीय गतिविधियों से उत्पन्न खतरों का सामना करना पड़ता है, जो उनके अस्तित्व के लिए एक गंभीर चुनौती है।
मैंग्रोव वन और उनका महत्व
- मैंग्रोव ऐसे पेड़ और झाड़ियाँ हैं जो खारे पानी में पनपते हैं, विशेष रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के तटीय और मुहाने वाले (Estuarine) वातावरण में।
- इनमें विशेष जड़ प्रणालियाँ होती हैं, जैसे कि प्रॉप रूट्स (Prop Roots) और न्यूमेटोफोर्स (Pneumatophores), जो उन्हें ऑक्सीजन-रहित मिट्टी और ज्वारीय जल में जीवित रहने में मदद करती हैं।
- मैंग्रोव वन समुद्री जीवों, जैसे मछली, झींगा और केकड़ों के लिए प्रजनन और पोषण स्थल (Breeding and Nursery Grounds) प्रदान करते हैं, जिससे मत्स्य पालन को बढ़ावा मिलता है।
- ये तटीय क्षेत्रों को तूफान, सुनामी और कटाव से बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, क्योंकि इनकी जड़ें मिट्टी को स्थिर करती हैं और तलछट को फँसाती हैं।
- मैंग्रोव कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में भी सहायक होते हैं, क्योंकि वे बड़ी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं और उसे अपनी मिट्टी में जमा करते हैं।
- कन्नमपोट्टी (एक्सोकेरिया अगालोचा) जैसी दुर्लभ मैंग्रोव प्रजातियों का संरक्षण जैव विविधता (Biodiversity) बनाए रखने और पारिस्थितिकीय संतुलन (Ecological Balance) सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है।
- इन वनों का संरक्षण जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों को कम करने और तटीय समुदायों की आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए आवश्यक है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| कन्नमपोट्टी (एक्सोकेरिया अगालोचा) मैंग्रोव | यह एक दुर्लभ मैंग्रोव प्रजाति है जो कन्नूर के ज्वारीय परिदृश्य से विलुप्त होने के कगार पर है। इसके संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। |
| बीज अंकुरण और रोपण | बीज लगभग दो सप्ताह में अंकुरित हो सकते हैं और रोपण के लिए तैयार होने से पहले चार पत्तियां विकसित करते हैं। यह कीचड़ वाले इलाकों में भी स्थापित हो सकता है। |
| अनूठी अंकुरण प्रक्रिया | एक बार जब बीज अंकुरित हो जाता है और युवा पौधा लगभग दो इंच तक बढ़ता है, तो मूल बीज शूट से जुड़ा रहता है और अंततः खाली होने से पहले युवा पौधे को पोषण देता रहता है। |
| खारे और ताजे पानी में विकास | यह पौधा ताजे और खारे दोनों पानी में उग सकता है, बशर्ते मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे। |
| पारिस्थितिक भूमिका | मैंग्रोव मछली, झींगा और केकड़ों को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, नदी के किनारों को स्थिर करते हैं, तलछट को फँसाते हैं और कटाव को कम करते हैं। |
महत्व
पर्यावरण और पारिस्थितिकी
- दुर्लभ मैंग्रोव प्रजातियों का संरक्षण जैव विविधता (Biodiversity) के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये प्रजातियाँ अद्वितीय पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा होती हैं।
- मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्र के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो समुद्री जीवन के लिए नर्सरी के रूप में कार्य करते हैं और तटीय कटाव को रोकते हैं।
- मैंग्रोव कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration) में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के प्रभावों को कम करने में मदद मिलती है।
सामाजिक और आर्थिक
- मैंग्रोव वन स्थानीय समुदायों, विशेषकर मछुआरों के लिए आजीविका का स्रोत हैं, क्योंकि वे मछली और अन्य समुद्री जीवों के लिए आवास प्रदान करते हैं।
- तटीय समुदायों को तूफान और सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं से बचाने में मैंग्रोव महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान कम होता है।
शासन और नीति
- मैंग्रोव संरक्षण के प्रयास सतत विकास लक्ष्यों (Sustainable Development Goals – SDGs) को प्राप्त करने में योगदान करते हैं, विशेष रूप से लक्ष्य 14 (पानी के नीचे जीवन) और लक्ष्य 15 (भूमि पर जीवन) से संबंधित।
- स्थानीय स्तर पर संरक्षण के प्रयासों को बढ़ावा देना जमीनी स्तर पर पर्यावरण जागरूकता और भागीदारी को बढ़ाता है।
चुनौतियाँ
1. दुर्लभ प्रजातियों का विलुप्त होने का खतरा
- कन्नमपोट्टी जैसी दुर्लभ मैंग्रोव प्रजातियाँ मानव गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन के कारण विलुप्त होने के कगार पर हैं।
- इन प्रजातियों की पहचान और उनके संरक्षण के लिए विशिष्ट ज्ञान और प्रयासों की कमी एक बड़ी चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण संरक्षण; जैव विविधता
2. प्लास्टिक प्रदूषण
- मैंग्रोव जड़ों में फंसी प्लास्टिक की बोतलें और अन्य कचरा मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।
- यह प्रदूषण मैंग्रोव के विकास को बाधित करता है और समुद्री जीवों के लिए खतरा पैदा करता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रदूषण; पारिस्थितिकी तंत्र
3. वैज्ञानिक अध्ययन और सत्यापन की कमी
- कन्नमपोट्टी जैसी दुर्लभ प्रजातियों पर वैज्ञानिक अध्ययन की कमी उनके औषधीय गुणों या अन्य विशिष्ट विशेषताओं के सत्यापन को कठिन बनाती है।
- वैज्ञानिक डेटा की अनुपस्थिति प्रभावी संरक्षण रणनीतियों को विकसित करने में बाधा डालती है।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी; अनुसंधान
4. पर्यावरण जागरूकता का अभाव
- कई लोगों को कन्नमपोट्टी जैसी दुर्लभ प्रजातियों के महत्व और पहचान के बारे में जानकारी नहीं है, जिससे उनके संरक्षण के प्रयास कमजोर पड़ जाते हैं।
- पर्यावरण शिक्षा और जागरूकता की कमी संरक्षण के प्रयासों में जनभागीदारी को सीमित करती है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण शिक्षा; जन जागरूकता
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| दुर्लभ मैंग्रोव प्रजातियों का विलुप्त होना | जैव विविधता का नुकसान और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं में कमी। |
| प्लास्टिक और अन्य कचरा | मैंग्रोव जड़ों में फंसकर पौधों के विकास को बाधित करना और समुद्री जीवन को नुकसान पहुँचाना। |
| वैज्ञानिक अध्ययन का अभाव | दुर्लभ प्रजातियों के गुणों और उनके संरक्षण के लिए प्रभावी रणनीतियों को समझने में बाधा। |
| स्थानीय पहचान की कमी | समुदायों द्वारा दुर्लभ प्रजातियों के महत्व को न समझ पाना, जिससे संरक्षण प्रयासों में कमी। |
| पर्यावास का विनाश | मानवीय अतिक्रमण, शहरीकरण और कृषि विस्तार के कारण मैंग्रोव क्षेत्रों का सिकुड़ना। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- तटीय विनियमन क्षेत्र अधिसूचना (Coastal Regulation Zone Notification)
आगे की राह
- दुर्लभ मैंग्रोव प्रजातियों जैसे कन्नमपोट्टी के लिए विशिष्ट संरक्षण कार्यक्रम और नर्सरी विकास को बढ़ावा देना।
- मैंग्रोव क्षेत्रों में प्लास्टिक और अन्य अपशिष्ट प्रदूषण को कम करने के लिए प्रभावी अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों को लागू करना।
- दुर्लभ मैंग्रोव प्रजातियों के औषधीय और पारिस्थितिक महत्व पर वैज्ञानिक अनुसंधान और सत्यापन को प्रोत्साहित करना।
- स्थानीय समुदायों और मछुआरों को मैंग्रोव संरक्षण के महत्व के बारे में शिक्षित करना और उनकी भागीदारी को बढ़ावा देना।
- तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) मानदंडों को सख्ती से लागू करना ताकि मैंग्रोव पर्यावासों का अतिक्रमण रोका जा सके।
- मैंग्रोव वनीकरण और पुनर्स्थापन कार्यक्रमों को बढ़ाना, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ मैंग्रोव का क्षरण हुआ है।
- स्थानीय संरक्षण नायकों जैसे परायिल राजन के प्रयासों को पहचानना और उनका समर्थन करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मैंग्रोव संरक्षण · तटीय पारिस्थितिकी तंत्र · जैव विविधता · पर्यावरण संरक्षण · स्थानीय संरक्षण प्रयास · जलवायु परिवर्तन अनुकूलन · पारिस्थितिकीय संतुलन · दुर्लभ प्रजातियों का संरक्षण · समुद्री पारिस्थितिकी · प्लास्टिक प्रदूषण · सतत विकास · समुदायों की भागीदारी
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 48A’, ‘note’: ‘पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 51A (g)’, ‘note’: ‘प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार’}
अवधारणा प्रवाह
दुर्लभ मैंग्रोव प्रजाति (कन्नमपोट्टी) की पहचान → प्रजाति के विलुप्त होने का खतरा → स्थानीय संरक्षणवादी द्वारा बीज संग्रह और नर्सरी विकास → मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र पर प्लास्टिक प्रदूषण का प्रभाव → मैंग्रोव संरक्षण और पुनर्स्थापन की आवश्यकता
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों को स्थिर करने और कटाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
2. ‘कन्नमपोट्टी’ (एक्सोकेरिया अगालोचा) मैंग्रोव की एक दुर्लभ किस्म है जो ताजे और खारे दोनों पानी में उग सकती है।
3. मैंग्रोव केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में ही पाए जाते हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि मैंग्रोव अपनी जड़ों से मिट्टी को बांधकर तटीय कटाव को रोकते हैं और तलछट को फँसाते हैं। कथन 2 भी सही है क्योंकि कन्नमपोट्टी एक दुर्लभ मैंग्रोव किस्म है और यह ताजे व खारे दोनों पानी में उग सकती है, बशर्ते मिट्टी में पर्याप्त नमी हो। कथन 3 गलत है क्योंकि मैंग्रोव मुख्य रूप से उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाए जाते हैं, न कि केवल उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में।
Q2. मैंग्रोव पारिस्थितिकी तंत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सबसे उपयुक्त है?
- वे केवल मीठे पानी के आवासों में पनपते हैं।
- वे समुद्री जीवन के लिए प्रजनन और नर्सरी स्थल प्रदान करते हैं।
- उनकी जड़ें ऑक्सीजन रहित मिट्टी में जीवित नहीं रह सकतीं।
- वे केवल शुष्क जलवायु में पाए जाते हैं।
उत्तर: वे समुद्री जीवन के लिए प्रजनन और नर्सरी स्थल प्रदान करते हैं। — मैंग्रोव समुद्री जीवन जैसे मछली, झींगा और केकड़ों के लिए महत्वपूर्ण प्रजनन और नर्सरी स्थल प्रदान करते हैं। वे खारे पानी में पनपते हैं, उनकी जड़ें ऑक्सीजन रहित मिट्टी में विशेष अनुकूलन के साथ जीवित रहती हैं, और वे उष्णकटिबंधीय व उपोष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु में पाए जाते हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ मैंग्रोव तटीय पारिस्थितिकी तंत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण ढाल के रूप में कार्य करते हैं। भारत में मैंग्रोव संरक्षण के महत्व और चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: मैंग्रोव की परिभाषा और तटीय पारिस्थितिकी तंत्र में उनकी भूमिका का संक्षिप्त परिचय।
2. मैंग्रोव संरक्षण का महत्व (मुख्य बिंदु):
क. तटीय कटाव नियंत्रण और तूफान सुरक्षा (जैसे चक्रवात, सुनामी)।
ख. जैव विविधता हॉटस्पॉट: मछली, झींगा, केकड़ों और अन्य समुद्री जीवों के लिए प्रजनन व नर्सरी स्थल।
ग. कार्बन पृथक्करण (Carbon Sequestration): जलवायु परिवर्तन शमन में भूमिका।
घ. जल गुणवत्ता में सुधार: तलछट और प्रदूषकों को छानना।
ङ. स्थानीय आजीविका: मत्स्य पालन और पर्यटन का समर्थन।
3. मैंग्रोव संरक्षण में चुनौतियाँ (मुख्य बिंदु):
क. शहरीकरण और औद्योगिक विकास के कारण आवास का नुकसान।
ख. प्रदूषण: प्लास्टिक, औद्योगिक अपशिष्ट और कृषि अपवाह।
ग. जलवायु परिवर्तन: समुद्र के स्तर में वृद्धि और चरम मौसमी घटनाएँ।
घ. अतिक्रमण और अवैध कटाई।
ङ. जागरूकता की कमी और अपर्याप्त प्रवर्तन।
च. विशिष्ट दुर्लभ प्रजातियों के संरक्षण में कठिनाई (जैसे कन्नमपोट्टी का उदाहरण)।
4. सरकारी पहल और सामुदायिक प्रयास: राष्ट्रीय मैंग्रोव संरक्षण कार्यक्रम, तटीय विनियमन क्षेत्र (CRZ) अधिसूचना, स्थानीय समुदायों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की भूमिका (जैसे परायिल राजन का उदाहरण)।
5. निष्कर्ष: सतत संरक्षण रणनीतियों, सामुदायिक भागीदारी और नीतिगत समर्थन की आवश्यकता पर बल देते हुए एक संतुलित निष्कर्ष।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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