02 Oct राज्यों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी: ₹25,100 करोड़ का लक्ष्य, जानिए महत्वपूर्ण बिंदु
✎ राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने हेतु RBI द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं, जो संप्रभु गारंटी द्वारा समर्थित होते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। | GS Paper III — सरकारी बजटिंग।
- Prelims: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), राजकोषीय घाटा, खुला बाजार परिचालन (OMO), गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा, ई-कुबेर प्रणाली
- Essay: राज्यों के वित्तीय स्वास्थ्य का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, भारत में वित्तीय संघवाद की चुनौतियाँ और अवसर
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे को वित्तपोषित करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने हेतु RBI द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं, जो संप्रभु गारंटी द्वारा समर्थित होते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कुल ₹25,100 करोड़ (अंकित मूल्य) की राज्य सरकारी प्रतिभूतियों (State Government Securities – SGS) की नीलामी की घोषणा की है। यह नीलामी 06 अक्टूबर, 2026 को RBI की कोर बैंकिंग सॉल्यूशन (E-Kuber) प्रणाली के माध्यम से आयोजित की जाएगी। इस नीलामी में आंध्र प्रदेश, दिल्ली, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, मेघालय, पंजाब, राजस्थान, तेलंगाना और पश्चिम बंगाल सहित कई राज्य भाग ले रहे हैं, जो विभिन्न अवधियों के लिए धन जुटा रहे हैं। यह कदम राज्यों के राजकोषीय प्रबंधन और उनके विकासात्मक व्यय के वित्तपोषण के लिए महत्वपूर्ण है।
पृष्ठभूमि
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को वित्तपोषित करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने हेतु जारी किए गए ऋण साधन (Debt Instruments) हैं।
- ये प्रतिभूतियाँ भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा केंद्र सरकार के परामर्श से जारी की जाती हैं, जो राज्यों के लिए बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है।
- SGS को ‘राज्य विकास ऋण’ (State Development Loans – SDLs) के रूप में भी जाना जाता है और ये केंद्र सरकार की प्रतिभूतियों की तरह ही संप्रभु गारंटी (Sovereign Guarantee) द्वारा समर्थित होती हैं।
- इन प्रतिभूतियों की नीलामी प्रतिस्पर्धी (Competitive) और गैर-प्रतिस्पर्धी (Non-competitive) दोनों बोलियों के माध्यम से की जाती है, जिससे खुदरा निवेशकों सहित विभिन्न प्रकार के निवेशकों को भागीदारी का अवसर मिलता है।
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा (Non-competitive Bidding Facility) छोटे निवेशकों को बिना उपज या मूल्य बोली लगाए भाग लेने की अनुमति देती है, जिससे उन्हें नीलामी में आवंटित कुल राशि का एक निश्चित प्रतिशत प्राप्त होता है।
- RBI की ‘रिटेल डायरेक्ट पोर्टल’ (Retail Direct Portal) योजना के तहत व्यक्तिगत निवेशक भी गैर-प्रतिस्पर्धी योजना के माध्यम से बोली लगा सकते हैं, जिससे सरकारी प्रतिभूतियों में खुदरा भागीदारी को बढ़ावा मिलता है।
राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) क्या हैं?
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (SGS) भारत में राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए दीर्घकालिक ऋण साधन हैं, जिनका उपयोग वे अपने बजटीय घाटे को पूरा करने और पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) के लिए धन जुटाने हेतु करती हैं।
- ये प्रतिभूतियाँ एक निश्चित अवधि (जैसे 8, 10, 15, 20 वर्ष) के लिए जारी की जाती हैं और इन पर एक निश्चित ब्याज दर (कूपन दर) का भुगतान किया जाता है, या इन्हें छूट पर जारी किया जाता है।
- RBI, जो केंद्र और राज्य सरकारों के लिए बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है, इन प्रतिभूतियों की नीलामी का संचालन करता है।
- SGS को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 293 (3) के तहत केंद्र सरकार की सहमति से जारी किया जाता है, यदि राज्य पर केंद्र सरकार का कोई बकाया ऋण हो।
- इन प्रतिभूतियों में निवेश को सुरक्षित माना जाता है क्योंकि ये राज्य सरकार की संप्रभु गारंटी द्वारा समर्थित होती हैं, जिसका अर्थ है कि राज्य सरकार मूलधन और ब्याज का भुगतान करने के लिए बाध्य है।
- SGS बाजार में मुख्य निवेशकों में वाणिज्यिक बैंक, बीमा कंपनियाँ, भविष्य निधि (Provident Funds) और अन्य वित्तीय संस्थान शामिल हैं, जो अपने वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR) की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी इनमें निवेश करते हैं।
- नीलामी प्रक्रिया RBI की ई-कुबेर (E-Kuber) प्रणाली के माध्यम से इलेक्ट्रॉनिक रूप से संचालित की जाती है, जो पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) | राज्यों द्वारा बाज़ार से धन जुटाने का एक साधन, जो उनकी विकासात्मक और व्यय आवश्यकताओं को पूरा करता है। |
| नीलामी प्रक्रिया | भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ‘ई-कुबेर’ प्रणाली के माध्यम से आयोजित, जो पारदर्शिता और दक्षता सुनिश्चित करती है। |
| पुनः-जारी (Re-issue) और नई प्रतिभूतियाँ | राज्य अपनी मौजूदा प्रतिभूतियों को पुनः-जारी कर सकते हैं या नई प्रतिभूतियाँ जारी कर सकते हैं, जिससे बाज़ार में तरलता (liquidity) बनी रहती है। |
| गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा (Non-competitive Bidding Facility) | छोटे निवेशकों (व्यक्तियों और संस्थाओं) को बाज़ार जोखिम के बिना सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने का अवसर प्रदान करती है। |
| खुदरा प्रत्यक्ष पोर्टल (Retail Direct Portal) | व्यक्तिगत निवेशकों को सीधे RBI के साथ सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश करने की सुविधा देता है, वित्तीय समावेशन (financial inclusion) को बढ़ावा देता है। |
महत्व
राजकोषीय प्रबंधन (Fiscal Management)
- राज्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी राज्यों को अपने राजकोषीय घाटे (fiscal deficit) को वित्तपोषित करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए आवश्यक धन जुटाने में सक्षम बनाती है।
- यह राज्यों को अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए बाज़ार-आधारित उधार पर निर्भर रहने की अनुमति देता है, जिससे केंद्र सरकार पर निर्भरता कम होती है।
आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth)
- राज्यों द्वारा जुटाए गए धन का उपयोग बुनियादी ढाँचा परियोजनाओं (जैसे सड़क, बिजली, सिंचाई) और सामाजिक क्षेत्रों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य) में निवेश के लिए किया जाता है, जो अंततः आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देता है।
- यह राज्यों को अपनी विशिष्ट क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार व्यय करने की स्वायत्तता प्रदान करता है, जिससे संतुलित क्षेत्रीय विकास संभव होता है।
वित्तीय बाज़ार विकास (Financial Market Development)
- सरकारी प्रतिभूतियों का नियमित रूप से जारी होना और नीलामी प्रक्रिया भारतीय ऋण बाज़ार (debt market) की गहराई और तरलता को बढ़ाती है।
- यह विभिन्न निवेशकों (बैंकों, वित्तीय संस्थानों, बीमा कंपनियों, व्यक्तियों) को सुरक्षित निवेश विकल्प प्रदान करता है, जिससे बचत को उत्पादक उपयोग में लाया जा सकता है।
मुद्रास्फीति प्रबंधन (Inflation Management)
- RBI द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी के माध्यम से धन जुटाना, अप्रत्यक्ष रूप से बाज़ार में तरलता को प्रभावित कर सकता है, जो मुद्रास्फीति प्रबंधन में सहायक होता है।
- यह RBI को अपनी मौद्रिक नीति (monetary policy) के उद्देश्यों को प्राप्त करने में भी सहायता करता है।
चुनौतियाँ
1. राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline)
- राज्यों द्वारा अत्यधिक उधार लेने से उनके ऋण-सेवा बोझ (debt-servicing burden) में वृद्धि हो सकती है, जिससे भविष्य में वित्तीय स्थिरता प्रभावित हो सकती है।
- राज्यों के बीच उधार लेने की लागत में अंतर हो सकता है, जिससे कुछ राज्यों के लिए धन जुटाना अधिक महंगा हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: सरकारी बजट और राजकोषीय नीति
2. बाज़ार जोखिम (Market Risk)
- ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव से सरकारी प्रतिभूतियों के मूल्य प्रभावित हो सकते हैं, जिससे निवेशकों को नुकसान हो सकता है।
- तरलता जोखिम (liquidity risk) भी हो सकता है यदि बाज़ार में पर्याप्त खरीदार न हों।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: भारतीय वित्तीय बाज़ार
3. केंद्र-राज्य वित्तीय संबंध (Centre-State Financial Relations)
- राज्यों की उधार लेने की क्षमता केंद्र सरकार की नीतियों और वित्तीय स्थिति से प्रभावित हो सकती है।
- राज्यों के लिए उधार लेने की सीमाएँ और शर्तें केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित की जाती हैं, जिससे उनकी स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| बढ़ता राज्य ऋण | राज्यों द्वारा लगातार अधिक उधार लेने से उनके ऋण का स्तर बढ़ सकता है, जिससे भविष्य में वित्तीय संकट का जोखिम उत्पन्न हो सकता है। |
| ब्याज दर में अस्थिरता | ब्याज दरों में बदलाव से राज्यों के लिए उधार लेने की लागत बढ़ सकती है, जिससे उनके बजट पर दबाव पड़ सकता है। |
| राजकोषीय उत्तरदायित्व का अभाव | कुछ राज्यों में राजकोषीय अनुशासन की कमी देखी जा सकती है, जिससे वे अपनी वित्तीय स्थिति को बिगड़ने दे सकते हैं। |
| बाज़ार की सीमित पहुँच | छोटे या आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों को बाज़ार से प्रतिस्पर्धी दरों पर धन जुटाने में कठिनाई हो सकती है। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली सुविधा योजना (Scheme for Non-competitive Bidding Facility)
- RBI खुदरा प्रत्यक्ष योजना (RBI Retail Direct Scheme)
आगे की राह
- राज्यों को राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (Fiscal Responsibility and Budget Management – FRBM Act) के सिद्धांतों का पालन करते हुए अपने राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने के लिए कड़े उपाय करने चाहिए।
- राज्यों को अपनी राजस्व सृजन क्षमताओं को बढ़ाने के लिए उपाय करने चाहिए, जैसे कि कर आधार का विस्तार करना और गैर-कर राजस्व स्रोतों का पता लगाना।
- भारतीय रिज़र्व बैंक को राज्य सरकारी प्रतिभूतियों के बाज़ार को और गहरा और अधिक तरल बनाने के लिए कदम उठाने चाहिए, जिससे सभी राज्यों के लिए धन जुटाना आसान हो।
- राज्यों को अपनी उधार लेने की रणनीतियों में विविधता लानी चाहिए, केवल बाज़ार उधार पर निर्भर रहने के बजाय अन्य वित्तपोषण विकल्पों का भी पता लगाना चाहिए।
- केंद्र सरकार को राज्यों के लिए वित्तीय सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करना चाहिए, विशेष रूप से उन राज्यों के लिए जो वित्तीय कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, ताकि सहकारी संघवाद को बढ़ावा मिल सके।
- निवेशकों के बीच सरकारी प्रतिभूतियों के बारे में जागरूकता बढ़ानी चाहिए, विशेष रूप से खुदरा निवेशकों के लिए, ताकि उनकी भागीदारी को प्रोत्साहित किया जा सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ · राजकोषीय घाटा · राजकोषीय नीति · भारतीय रिज़र्व बैंक · खुले बाज़ार परिचालन · राज्यों का ऋण · गैर-प्रतिस्पर्धी बोली · ई-कुबेर प्रणाली · राजकोषीय संघवाद · सार्वजनिक ऋण प्रबंधन · मुद्रास्फीति प्रबंधन · ब्याज दरें
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 292’, ‘note’: ‘केंद्र सरकार द्वारा उधार लेना’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 293’, ‘note’: ‘राज्यों द्वारा उधार लेना’}
- {‘article’: ‘सातवीं अनुसूची’, ‘note’: ‘संघ और राज्य सूची में वित्तीय विषय’}
अवधारणा प्रवाह
राज्य सरकारें विकासात्मक व्यय के लिए धन की आवश्यकता महसूस करती हैं। → राज्य सरकारें भारतीय रिज़र्व बैंक के माध्यम से राज्य सरकारी प्रतिभूतियाँ जारी करती हैं। → RBI ‘ई-कुबेर’ प्रणाली पर इन प्रतिभूतियों की नीलामी आयोजित करता है। → बैंकों, वित्तीय संस्थानों और व्यक्तियों जैसे निवेशक इन प्रतिभूतियों को खरीदते हैं। → राज्य सरकारों को धन प्राप्त होता है, जिसका उपयोग वे अपनी परियोजनाओं के लिए करती हैं। → निवेशकों को प्रतिभूतियों पर ब्याज मिलता है, जिससे उन्हें सुरक्षित निवेश का अवसर मिलता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं।
2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) राज्य सरकारों के लिए SGS की नीलामी का संचालन करता है।
3. SGS का उपयोग राज्य सरकारों द्वारा अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को वित्तपोषित करने के लिए किया जाता है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि SGS वास्तव में राज्य सरकारों द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं। कथन 2 सही है क्योंकि RBI राज्य सरकारों के लिए SGS की नीलामी का प्रबंधन करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि SGS राज्य सरकारों के लिए अपने राजकोषीय घाटे को पूरा करने और विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण तरीका है।
Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के ‘ई-कुबेर’ प्रणाली के संबंध में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. यह RBI का कोर बैंकिंग समाधान (Core Banking Solution) है।
2. सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी के लिए केवल प्रतिस्पर्धी बोलियाँ (Competitive Bids) इस प्रणाली के माध्यम से प्रस्तुत की जा सकती हैं।
3. खुदरा निवेशक (Retail Investors) ‘रिटेल डायरेक्ट पोर्टल’ के माध्यम से गैर-प्रतिस्पर्धी बोलियाँ (Non-competitive Bids) प्रस्तुत कर सकते हैं, जो ई-कुबेर से जुड़ा है।
उपरोक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: केवल 1 और 3 — कथन 1 सही है। ई-कुबेर RBI का कोर बैंकिंग समाधान है। कथन 2 गलत है क्योंकि प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी दोनों बोलियाँ ई-कुबेर प्रणाली के माध्यम से प्रस्तुत की जा सकती हैं। कथन 3 सही है, खुदरा निवेशक रिटेल डायरेक्ट पोर्टल के माध्यम से गैर-प्रतिस्पर्धी बोलियाँ लगा सकते हैं, जो ई-कुबेर से जुड़ा है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राज्य सरकार प्रतिभूतियाँ (State Government Securities – SGS) क्या हैं? भारत में राज्यों के राजकोषीय प्रबंधन में उनकी भूमिका का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय: राज्य सरकार प्रतिभूतियों (SGS) को परिभाषित करें और बताएं कि वे क्या हैं।
मुख्य भाग:
1. SGS की प्रकृति: वे कैसे जारी की जाती हैं (नीलामी के माध्यम से, RBI द्वारा), उनकी अवधि (Tenor) और ब्याज दरें।
2. राजकोषीय प्रबंधन में भूमिका:
क. राजकोषीय घाटे का वित्तपोषण: राज्य अपने राजस्व और व्यय के अंतर को कैसे पूरा करते हैं।
ख. विकासात्मक परियोजनाओं के लिए धन जुटाना: बुनियादी ढांचा और सामाजिक क्षेत्र में निवेश।
ग. ऋण प्रबंधन: राज्यों के ऋण पोर्टफोलियो का हिस्सा।
घ. बाजार अनुशासन: SGS के माध्यम से बाजार से धन जुटाने में राज्यों पर पड़ने वाला अनुशासन।
3. आलोचनात्मक परीक्षण:
क. बढ़ती ऋणग्रस्तता: राज्यों पर बढ़ते ऋण का बोझ और उसके निहितार्थ।
ख. ब्याज दरों का प्रभाव: उच्च ब्याज दरों का राज्यों के वित्त पर प्रभाव।
ग. राजकोषीय विवेक: कुछ राज्यों द्वारा राजकोषीय विवेक की कमी और ऋण का गैर-उत्पादक उपयोग।
घ. केंद्र-राज्य संबंध: केंद्र सरकार की भूमिका और राजकोषीय संघवाद पर प्रभाव।
ङ. बाजार पर निर्भरता: बाजार की स्थितियों और निवेशकों की धारणा पर राज्यों की निर्भरता।
निष्कर्ष: SGS के महत्व को स्वीकार करते हुए, राज्यों के लिए एक स्थायी और जिम्मेदार राजकोषीय नीति की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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