04 Oct सुप्रीम कोर्ट 5 अक्टूबर को सीईसी ग्यानेश कुमार के निलंबन पर सुनेगा याचिकाएं

✎ भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है, और इसके निर्णय सामूहिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा लिए जाते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान – संवैधानिक पद, विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियाँ, कार्य और उत्तरदायित्व | GS Paper II — शासन व्यवस्था – पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पक्ष, संस्थागत और अन्य उपाय
- Prelims: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC), भारत निर्वाचन आयोग (ECI), अनुच्छेद 324, बहु-सदस्यीय निकाय, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023, न्यायिक समीक्षा
- Essay: भारत में लोकतांत्रिक संस्थाओं का सुदृढ़ीकरण, संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और जवाबदेही
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार है, और इसके निर्णय सामूहिक रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा लिए जाते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय 5 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के निलंबन और उनके द्वारा कथित तौर पर ‘अनधिकृत’ रूप से लिए गए निर्णयों को रद्द करने की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि CEC ने दो अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना निर्णय लिए हैं, जिससे निर्वाचन आयोग की बहु-सदस्यीय प्रकृति का उल्लंघन हुआ है। यह मामला निर्वाचन आयोग की निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके संवैधानिक अधिदेश पर महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर आरोप लगाया है कि उन्होंने निर्वाचन आयोग के सामूहिक निर्णय लेने के सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए व्यक्तिगत रूप से निर्णय लिए हैं।
- याचिकाओं में CEC को अंतरिम रूप से अपने कार्यों का निर्वहन करने से रोकने और इस अवधि के दौरान आयोग के कामकाज को अन्य दो चुनाव आयुक्तों के सर्वसम्मत निर्णय से संचालित करने की मांग की गई है।
- यह विवाद ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (Special Intensive Revision – SIR) के तहत मतदाता सूचियों से संबंधित निर्णयों और आदेशों को लेकर उत्पन्न हुआ है, जिन पर कथित तौर पर अन्य चुनाव आयुक्तों ने आपत्ति जताई थी।
- निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों का खंडन करते हुए कहा है कि किसी भी संस्था में अलग-अलग विचार और अवलोकन सामान्य हैं तथा उसके सभी आदेशों को पूर्ण कानूनी स्वीकृति प्राप्त है और वे स्थापित वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन करते हैं।
- याचिकाकर्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य अधिकारियों के खिलाफ आधिकारिक कर्तव्य के उल्लंघन के लिए आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की भी मांग की है।
भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) क्या है?
- भारत निर्वाचन आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय है जो भारत में संघ और राज्य चुनाव प्रक्रियाओं के प्रशासन के लिए जिम्मेदार है।
- इसका गठन भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत किया गया था, जो संसद, राज्य विधानसभाओं, भारत के राष्ट्रपति और भारत के उपराष्ट्रपति के कार्यालयों के चुनाव के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति आयोग में निहित करता है।
- मूल रूप से आयोग में केवल एक चुनाव आयुक्त होता था, लेकिन वर्तमान में इसमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त शामिल हैं।
- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उनका कार्यकाल 6 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक, जो भी पहले हो, होता है।
- मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही प्रक्रिया और आधार पर पद से हटाया जा सकता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
- आयोग का मुख्य कार्य स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है, जिसमें मतदाता सूचियों की तैयारी, चुनाव कार्यक्रम निर्धारित करना, राजनीतिक दलों को मान्यता देना और चुनाव आचार संहिता लागू करना शामिल है।
- निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है, और इसके निर्णयों की न्यायिक समीक्षा की जा सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बहु-सदस्यीय निकाय | चुनाव आयोग (Election Commission – EC) एक मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) और दो चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners – ECs) से मिलकर बना एक बहु-सदस्यीय निकाय है। यह सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया सुनिश्चित करता है। |
| सामूहिक निर्णय-निर्माण | चुनाव आयोग से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं, जहाँ मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की राय का महत्व होता है। यह आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को बढ़ाता है। |
| मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 | यह अधिनियम चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और निर्णय लेने की प्रक्रिया को विनियमित करता है। विशेष रूप से, धारा 18 बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान करती है। |
| न्यायिक समीक्षा | उच्चतम न्यायालय (Supreme Court) के पास चुनाव आयोग के निर्णयों और कार्यप्रणाली की न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) करने की शक्ति है, ताकि संवैधानिक सिद्धांतों और कानूनी प्रावधानों का पालन सुनिश्चित किया जा सके। |
| स्वतंत्रता और निष्पक्षता | चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है। यह सुनिश्चित करता है कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष तरीके से आयोजित हों, जो नागरिकों के विश्वास के लिए महत्वपूर्ण है। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- यह मामला चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक निकाय की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए आवश्यक है।
- यह सामूहिक निर्णय-निर्माण के सिद्धांत को बनाए रखने में मदद करता है, जो आयोग की विश्वसनीयता और वैधता के लिए महत्वपूर्ण है।
- यह मामला भारत के लोकतांत्रिक सिद्धांतों और संस्थागत अखंडता को बनाए रखने में न्यायपालिका की भूमिका को रेखांकित करता है।
संवैधानिक महत्व
- यह अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग की संवैधानिक स्थिति और शक्तियों की व्याख्या को प्रभावित कर सकता है।
- यह मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 के प्रावधानों, विशेष रूप से निर्णय लेने की प्रक्रिया से संबंधित धारा 18 के क्रियान्वयन पर प्रकाश डालता है।
- यह संवैधानिक निकायों के भीतर आंतरिक कार्यप्रणाली और शक्ति संतुलन से संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी मिसालें स्थापित कर सकता है।
प्रशासनिक महत्व
- यह चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रियाओं और प्रोटोकॉल को स्पष्ट करने में मदद करेगा, जिससे भविष्य में ऐसी विवादित स्थितियों से बचा जा सके।
- यह आयोग के सदस्यों के बीच समन्वय और सहयोग के महत्व को रेखांकित करता है ताकि प्रभावी और सुचारू कामकाज सुनिश्चित किया जा सके।
- यह सार्वजनिक संस्थानों में सुशासन (Good Governance) और प्रक्रियात्मक निष्पक्षता के सिद्धांतों को मजबूत करता है।
चुनौतियाँ
1. चुनाव आयोग की स्वायत्तता और अखंडता
- आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया में कथित अनियमितताएं इसकी स्वायत्तता और अखंडता पर सवाल उठाती हैं, जो स्वतंत्र चुनाव के लिए महत्वपूर्ण है।
- यदि निर्णय सामूहिक रूप से नहीं लिए जाते हैं, तो यह आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को कमजोर कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: शासन, संविधान और राजव्यवस्था
2. सामूहिक निर्णय-निर्माण का सिद्धांत
- याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा कथित रूप से ‘अनधिकृत’ कार्यों का आरोप लगाया गया है, जो चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय चरित्र और सामूहिक निर्णय-निर्माण के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।
- यह सिद्धांत आयोग के भीतर शक्ति के केंद्रीकरण को रोकता है और विभिन्न दृष्टिकोणों को सुनिश्चित करता है।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक निकाय, शासन
3. मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 का क्रियान्वयन
- यह मामला अधिनियम की धारा 18 के प्रावधानों के उचित क्रियान्वयन पर सवाल उठाता है, जो बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान करती है।
- अधिनियम के प्रावधानों की गलत व्याख्या या उल्लंघन आयोग के कामकाज को प्रभावित कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: संवैधानिक और सांविधिक निकाय
4. न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा
- उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह चुनौती संवैधानिक निकायों के आंतरिक कामकाज में न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा और प्रकृति से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है।
- न्यायपालिका को संवैधानिक संतुलन बनाए रखते हुए संस्थागत स्वायत्तता का सम्मान करना होता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका, न्यायिक समीक्षा
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| सामूहिक निर्णय-निर्माण का उल्लंघन | मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा कथित रूप से बिना अन्य चुनाव आयुक्तों की सहमति के निर्णय लेना, चुनाव आयोग के बहु-सदस्यीय चरित्र और सामूहिक निर्णय-निर्माण के सिद्धांत को कमजोर करता है। |
| आयोग की निष्पक्षता पर संदेह | यदि आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शी और समावेशी नहीं है, तो यह चुनाव आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता पर सार्वजनिक संदेह पैदा कर सकता है। |
| कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन | मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का कथित उल्लंघन आयोग के कानूनी आधार को चुनौती देता है। |
| लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रभाव | एक कमजोर या विवादित चुनाव आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की अपनी क्षमता को प्रभावित कर सकता है, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अखंडता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। |
आगे की राह
- उच्चतम न्यायालय को मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 की स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया में अस्पष्टता दूर हो सके।
- चुनाव आयोग को अपने आंतरिक कार्यप्रणाली प्रोटोकॉल की समीक्षा करनी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सभी महत्वपूर्ण निर्णय सामूहिक रूप से और पारदर्शी तरीके से लिए जाएं।
- आयोग के सदस्यों के बीच बेहतर समन्वय और संचार स्थापित करने के लिए तंत्र विकसित किए जाने चाहिए ताकि मतभेदों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सके।
- सरकार को भविष्य में चुनाव आयोग के सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी और सर्वसम्मति-आधारित बनाने पर विचार करना चाहिए।
- सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने के लिए चुनाव आयोग को अपनी कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता अपनानी चाहिए और महत्वपूर्ण निर्णयों के पीछे के तर्क को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करना चाहिए।
- संवैधानिक निकायों की स्वायत्तता और जवाबदेही के बीच संतुलन बनाए रखने के लिए एक मजबूत ढांचा विकसित किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भारत निर्वाचन आयोग · मुख्य निर्वाचन आयुक्त · निर्वाचन आयुक्त · बहु-सदस्यीय निकाय · सामूहिक निर्णय · मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 · अनुच्छेद 324 · न्यायिक समीक्षा · संवैधानिक स्वायत्तता · लोकतंत्र की शुचिता · अधिकारों का पृथक्करण · कार्यपालिका पर नियंत्रण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 324’, ‘note’: ‘चुनाव आयोग की स्थापना और शक्तियां’}
अवधारणा प्रवाह
मुख्य चुनाव आयुक्त पर ‘अनधिकृत’ कार्यों का आरोप → याचिकाकर्ताओं द्वारा उच्चतम न्यायालय में याचिका दायर → याचिका में सामूहिक निर्णय-निर्माण के उल्लंघन का आरोप → उच्चतम न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई → न्यायिक समीक्षा के माध्यम से संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा → चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और स्वायत्तता पर प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) एक संवैधानिक निकाय है।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त (Chief Election Commissioner) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (Election Commissioners) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने जैसी होती है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीनों
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीनों — कथन 1 सही है। भारत निर्वाचन आयोग का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 324 में है। कथन 2 सही है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। कथन 3 सही है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के समान है, जबकि अन्य निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
Q2. अभिकथन (A): भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है और इसके निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए।
कारण (R): मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023, बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान करता है।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है। निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है और इसके निर्णयों में सभी सदस्यों की सहभागिता अपेक्षित है। कारण (R) भी सही है और A की सही व्याख्या करता है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि आयोग के निर्णय बहुमत के आधार पर लिए जाएंगे, जो सामूहिक निर्णय लेने के सिद्धांत को पुष्ट करता है।
Q3. भारत के संविधान का कौन सा अनुच्छेद भारत निर्वाचन आयोग के गठन और शक्तियों से संबंधित है?
- अनुच्छेद 324
- अनुच्छेद 325
- अनुच्छेद 326
- अनुच्छेद 327
उत्तर: अनुच्छेद 324 — अनुच्छेद 324 भारत निर्वाचन आयोग के गठन, संरचना, सदस्यों की नियुक्ति और सेवा शर्तों तथा चुनाव कराने की शक्तियों से संबंधित है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत निर्वाचन आयोग के बहु-सदस्यीय स्वरूप और सामूहिक निर्णय लेने के महत्व पर चर्चा कीजिए। हाल ही में मुख्य निर्वाचन आयुक्त के कथित ‘अनधिकृत’ कार्यों से संबंधित विवाद के आलोक में इस संवैधानिक निकाय की स्वायत्तता और कार्यप्रणाली के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) का संवैधानिक आधार (अनुच्छेद 324) और इसकी भूमिका का संक्षिप्त परिचय।
2. बहु-सदस्यीय स्वरूप और सामूहिक निर्णय का महत्व: आयोग के बहु-सदस्यीय चरित्र (मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त) की व्याख्या। सामूहिक निर्णय लेने के पीछे का तर्क – पारदर्शिता, निष्पक्षता, जवाबदेही सुनिश्चित करना और किसी एक व्यक्ति के मनमानेपन को रोकना। मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 18 का उल्लेख, जो बहुमत से निर्णय लेने का प्रावधान करती है।
3. हालिया विवाद और चुनौतियाँ: मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा कथित रूप से अन्य निर्वाचन आयुक्तों की सहमति के बिना निर्णय लेने के आरोपों का उल्लेख। इससे उत्पन्न होने वाली चुनौतियाँ:
क. आयोग की संवैधानिक स्वायत्तता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न।
ख. निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव।
ग. लोकतांत्रिक प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता पर संभावित प्रभाव।
घ. निर्वाचन आयुक्तों के बीच मतभेद से उत्पन्न आंतरिक संघर्ष।
4. समाधान और आगे की राह: न्यायिक समीक्षा की भूमिका। आयोग की कार्यप्रणाली में सुधार हेतु सुझाव – नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता, सदस्यों के बीच बेहतर समन्वय तंत्र, वैधानिक प्रावधानों का कठोर अनुपालन।
5. निष्कर्ष: भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए निर्वाचन आयोग के बहु-सदस्यीय और सामूहिक निर्णय लेने वाले स्वरूप को बनाए रखने की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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