05 Oct सुप्रीम कोर्ट में सीईसी के एकतरफा निर्णयों पर चुनौती, जानिए पूरा मामला

✎ भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति रखता है, और इसके निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान — संवैधानिक निकाय | GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था — चुनाव और संबंधित मुद्दे
- Prelims: मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC), भारत निर्वाचन आयोग (ECI), अनुच्छेद 324, सामूहिक निर्णय-निर्माण, मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023, सर्वोच्च न्यायालय
- Essay: भारत में लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने में संवैधानिक निकायों की भूमिका, सामूहिक निर्णय-निर्माण और जवाबदेही: सुशासन के लिए अनिवार्य
त्वरित पुनरावृत्ति: भारत निर्वाचन आयोग एक संवैधानिक निकाय है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति रखता है, और इसके निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) द्वारा भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India – ECI) की शक्तियों के कथित एकल प्रयोग को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने संवैधानिक रूप से पूरे बहु-सदस्यीय चुनाव पैनल के लिए निर्धारित शक्तियों का अकेले प्रयोग किया है, जिससे आयोग के भीतर सामूहिक निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है।
पृष्ठभूमि
- याचिका में संविधान के अनुच्छेद 324 का हवाला दिया गया है, जो चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति ‘आयोग’ में निहित करता है, न कि किसी व्यक्तिगत मुख्य चुनाव आयुक्त में।
- याचिका ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ की धारा 18 पर भी निर्भर करती है, जो सामूहिक निर्णय-निर्माण का प्रावधान करती है, जिसमें सर्वसम्मति न होने वाले मामलों को बहुमत से तय किया जाता है।
- याचिका में कथित तौर पर चुनाव आयुक्तों द्वारा अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 आपत्तियों का उल्लेख किया गया है, जो ECI के नाम पर उनकी मंजूरी के बिना लिए गए निर्णयों और कदमों से संबंधित हैं।
- इन आपत्तियों में आयोग की मंजूरी के बिना जारी किए गए संचार और आदेश, बैठकों से पहले एजेंडा और बाद में कार्यवृत्त की अनुपस्थिति, बिना अनुमोदन के की गई विदेश यात्राएं, फॉर्म 6 में बदलाव, मतदाता सूची डेटाबेस तक पहुंच और पश्चिम बंगाल में न्यायाधिकरणों के समक्ष अपील दायर करना शामिल है।
- याचिका में ‘मतदाता सूची डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण’ और आयोग के IT प्रतिष्ठान के कार्य आवंटन में बदलाव पर चुनाव आयुक्तों द्वारा उठाई गई चिंताओं का भी उल्लेख है।
- याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई है कि अनुच्छेद 324 के तहत ECI में निहित शक्तियों का प्रयोग या प्रतिनिधित्व आयोग को नियंत्रित करने वाले संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के अनुसार ही किया जा सकता है।
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) और उसकी शक्तियाँ
- भारत निर्वाचन आयोग एक स्थायी और स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है जिसे भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से स्थापित किया गया है।
- संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत, संसद, राज्य विधानमंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के लिए चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति ECI में निहित है।
- मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। उनका कार्यकाल छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक होता है, जो भी पहले हो।
- मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान ही प्रक्रिया और आधार पर पद से हटाया जा सकता है, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश पर राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकता है।
- आयोग के सभी सदस्यों के पास समान शक्तियाँ होती हैं और उनका वेतन, भत्ते और अन्य लाभ सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान होते हैं।
- किसी भी मामले पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद होने पर, बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
- ECI मतदाता सूचियों को तैयार करने और अद्यतन करने, चुनाव कार्यक्रम घोषित करने, राजनीतिक दलों को मान्यता देने और चुनाव चिन्ह आवंटित करने, चुनाव आचार संहिता लागू करने और चुनाव संबंधी विवादों का निपटारा करने जैसे कई महत्वपूर्ण कार्य करता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बहु-सदस्यीय निकाय | चुनाव आयोग (Election Commission of India – ECI) एक मुख्य चुनाव आयुक्त (Chief Election Commissioner – CEC) और दो चुनाव आयुक्तों (Election Commissioners) से मिलकर बनता है, जो सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया सुनिश्चित करता है। |
| सामूहिक निर्णय-निर्माण | संविधान के अनुच्छेद 324 और मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 की धारा 18 के तहत, आयोग के सभी निर्णय सामूहिक रूप से लिए जाने चाहिए। |
| अध्यक्षता, निर्देशन और नियंत्रण | अनुच्छेद 324 चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति ‘आयोग’ में निहित करता है, न कि किसी एक व्यक्ति में, जिससे आयोग की स्वायत्तता और निष्पक्षता सुनिश्चित होती है। |
| न्यायिक समीक्षा | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) का हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करता है कि संवैधानिक प्रावधानों और वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन किया जाए, जिससे लोकतंत्र में विश्वास बना रहे। |
महत्व
लोकतांत्रिक महत्व
- यह मामला भारत के लोकतांत्रिक ढांचे में चुनाव आयोग की भूमिका और उसके कामकाज की पारदर्शिता एवं जवाबदेही पर प्रकाश डालता है।
- सामूहिक निर्णय-निर्माण का सिद्धांत आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता के लिए महत्वपूर्ण है, जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करता है।
संवैधानिक महत्व
- सर्वोच्च न्यायालय का हस्तक्षेप अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को प्रदत्त शक्तियों के सही प्रयोग की व्याख्या करेगा, जिससे संवैधानिक प्रावधानों का सम्मान सुनिश्चित होगा।
- यह मामला मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 के प्रावधानों के कार्यान्वयन को भी स्पष्ट करेगा।
संस्थागत अखंडता
- यह याचिका चुनाव आयोग जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक निकाय की आंतरिक कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता और सर्वसम्मति के महत्व को रेखांकित करती है।
- यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि आयोग के भीतर कोई भी निर्णय व्यक्तिगत रूप से न लिया जाए, बल्कि सामूहिक विचार-विमर्श के माध्यम से हो, ताकि संस्था की अखंडता बनी रहे।
चुनौतियाँ
1. सामूहिक निर्णय-निर्माण का उल्लंघन
- याचिका में आरोप लगाया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग की शक्तियों का ‘एकल-हाथ’ से प्रयोग किया है, जो सामूहिक निर्णय-निर्माण के सिद्धांत का उल्लंघन है।
- चुनाव आयुक्तों द्वारा कथित तौर पर दर्ज की गई आपत्तियां दर्शाती हैं कि महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी सहमति नहीं ली गई।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: चुनाव आयोग
2. आंतरिक पारदर्शिता और जवाबदेही का अभाव
- बैठकों के एजेंडे और कार्यवृत्त की अनुपस्थिति, तथा बिना अनुमोदन के विदेशी यात्राएं जैसे आरोप आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी का संकेत देते हैं।
- यह स्थिति आयोग के भीतर जवाबदेही को कमजोर कर सकती है, जिससे उसके निर्णयों की वैधता पर सवाल उठ सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: शासन: पारदर्शिता और जवाबदेही
3. चुनावी रोल डेटाबेस का केंद्रीकरण
- चुनाव आयुक्तों द्वारा ‘चुनावी रोल डेटाबेस के क्रमिक केंद्रीकरण’ और IT प्रतिष्ठान के कार्य आवंटन में बदलाव पर चिंता व्यक्त की गई है।
- यह डेटा सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और आयोग के भीतर शक्ति संतुलन के लिए गंभीर निहितार्थ हो सकता है।
यूपीएससी लिंक: ई-गवर्नेंस: डेटा सुरक्षा
4. संवैधानिक जनादेश का अनुपालन
- यह चुनौती संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग के तरीके से संबंधित है।
- यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि आयोग का प्रत्येक कार्य संवैधानिक और वैधानिक ढांचे के अनुरूप हो।
यूपीएससी लिंक: भारतीय संविधान: संवैधानिक निकाय
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा एकल-हाथ से शक्तियों का प्रयोग | सामूहिक निर्णय-निर्माण के संवैधानिक और वैधानिक सिद्धांत का उल्लंघन। |
| चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां | महत्वपूर्ण निर्णयों, संचारों और आदेशों में अन्य आयुक्तों की सहमति का अभाव। |
| बैठकों के एजेंडा और कार्यवृत्त की अनुपस्थिति | आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की कमी। |
| चुनावी रोल डेटाबेस का केंद्रीकरण | डेटा सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और आयोग के भीतर शक्ति संतुलन पर संभावित प्रभाव। |
| फॉर्म 6 में बदलाव और अपील दायर करना | बिना उचित अनुमोदन के महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं और कानूनी कार्रवाइयों में परिवर्तन। |
आगे की राह
- सर्वोच्च न्यायालय को संवैधानिक प्रावधानों और मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यालय की अवधि) अधिनियम, 2023 के तहत सामूहिक निर्णय-निर्माण के सिद्धांत की स्पष्ट व्याख्या करनी चाहिए।
- चुनाव आयोग को अपनी आंतरिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए, जिसमें बैठकों के एजेंडा और कार्यवृत्त का नियमित प्रकाशन शामिल है।
- आयोग के भीतर सभी महत्वपूर्ण निर्णयों पर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के बीच प्रभावी विचार-विमर्श और सर्वसम्मति सुनिश्चित करने के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित किया जाना चाहिए।
- चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों और चिंताओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए और उनका समाधान एक संस्थागत ढांचे के भीतर किया जाना चाहिए।
- चुनावी रोल डेटाबेस के केंद्रीकरण और IT प्रतिष्ठान के कार्य आवंटन से संबंधित चिंताओं को दूर करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और प्रक्रियाएं स्थापित की जानी चाहिए, ताकि निष्पक्षता और डेटा सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
- भविष्य में ऐसे विवादों से बचने के लिए चुनाव आयोग के सदस्यों के बीच संचार और समन्वय को मजबूत किया जाना चाहिए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
भारत निर्वाचन आयोग · मुख्य निर्वाचन आयुक्त · सामूहिक निर्णय प्रक्रिया · अनुच्छेद 324 · मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 · न्यायिक समीक्षा · संवैधानिक निकाय · चुनाव सुधार · लोकतंत्र · संघवाद
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 324: चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण
- अनुच्छेद 327: चुनावों के संबंध में कानून बनाने की संसद की शक्ति
- अनुच्छेद 328: चुनावों के संबंध में कानून बनाने की राज्य विधानमंडल की शक्ति
अवधारणा प्रवाह
मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा कथित एकल-हाथ से शक्तियों का प्रयोग → अन्य चुनाव आयुक्तों द्वारा आपत्तियां और चिंताएं दर्ज करना → सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर करना → अनुच्छेद 324 और 2023 अधिनियम के तहत सामूहिक निर्णय-निर्माण के सिद्धांत पर सवाल → सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मामले की सुनवाई और संवैधानिक व्याख्या → चुनाव आयोग के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्व स्थापित करना
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 324 भारत निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है।
2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023, निर्वाचन आयोग में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का प्रावधान करता है।
3. भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्त शामिल होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 324 भारत निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति प्रदान करता है। कथन 2 सही है: अधिनियम, 2023 स्पष्ट रूप से सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का प्रावधान करता है, जहाँ सर्वसम्मति न होने पर बहुमत से निर्णय लिए जाते हैं। कथन 3 सही है: निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय निकाय है जिसमें एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो निर्वाचन आयुक्त होते हैं।
Q2. भारत निर्वाचन आयोग के संदर्भ में, ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ के प्रावधानों के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- यह अधिनियम मुख्य निर्वाचन आयुक्त को आयोग के सभी निर्णय लेने का एकमात्र अधिकार देता है।
- यह अधिनियम आयोग में सर्वसम्मति न होने पर बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान करता है।
- यह अधिनियम निर्वाचन आयुक्तों को मुख्य निर्वाचन आयुक्त के निर्णयों पर आपत्ति दर्ज करने से रोकता है।
- यह अधिनियम भारत निर्वाचन आयोग को एक एकल-सदस्यीय निकाय में परिवर्तित करता है।
उत्तर: यह अधिनियम आयोग में सर्वसम्मति न होने पर बहुमत के आधार पर निर्णय लेने का प्रावधान करता है। — अधिनियम, 2023 की धारा 18 स्पष्ट रूप से सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का प्रावधान करती है, जिसमें सर्वसम्मति न होने पर बहुमत से निर्णय लिए जाते हैं। यह मुख्य निर्वाचन आयुक्त को एकमात्र निर्णय लेने का अधिकार नहीं देता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारत निर्वाचन आयोग एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक निकाय है जो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में, ‘मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023’ के तहत सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के महत्व का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या इस अधिनियम के प्रावधान आयोग की स्वायत्तता और कार्यप्रणाली को सुदृढ़ करते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) की संवैधानिक स्थिति (अनुच्छेद 324) और स्वतंत्र तथा निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने में इसकी भूमिका का संक्षिप्त परिचय।
2. सामूहिक निर्णय प्रक्रिया का महत्व: बहु-सदस्यीय निकाय के रूप में ECI में सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के महत्व पर प्रकाश डालें। यह कैसे पारदर्शिता, जवाबदेही और निर्णयों की वैधता सुनिश्चित करता है।
3. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023: इस अधिनियम के प्रमुख प्रावधानों का उल्लेख करें, विशेष रूप से धारा 18 का, जो सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और बहुमत से निर्णय लेने का प्रावधान करती है।
4. समालोचनात्मक परीक्षण: इस अधिनियम के प्रावधानों का विश्लेषण करें कि वे आयोग की स्वायत्तता और कार्यप्रणाली को कैसे प्रभावित करते हैं।
– सकारात्मक प्रभाव: निर्णयों में व्यापक विचार-विमर्श, मनमानी पर रोक, संस्थागत विश्वसनीयता में वृद्धि।
– संभावित चुनौतियाँ/चिंताएँ: यदि सामूहिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया जाता है तो उत्पन्न होने वाली समस्याएँ (जैसा कि वर्तमान समाचार में उठाया गया है), निर्णयों में देरी की संभावना।
5. आयोग की स्वायत्तता और कार्यप्रणाली पर प्रभाव: चर्चा करें कि क्या ये प्रावधान आयोग को आंतरिक रूप से अधिक मजबूत बनाते हैं या बाहरी हस्तक्षेप के लिए नए रास्ते खोलते हैं। न्यायिक समीक्षा की भूमिका का उल्लेख करें।
6. निष्कर्ष: एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें जिसमें आयोग की संस्थागत अखंडता और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के महत्व पर जोर दिया जाए।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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