07 Oct आरबीआई ने वित्त वर्ष 2027 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ाकर 5.2% किया
✎ भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना आर्थिक स्थिरता और सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें रेपो दर जैसे उपकरण और 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' जैसे नीतिगत रुख का उपयोग किया जाता है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय | GS Paper III — सरकारी बजटिंग
- Prelims: मुद्रास्फीति (Inflation), उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI), रेपो दर (Repo Rate), मौद्रिक नीति समिति (MPC), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation), राजकोषीय वर्ष (Fiscal Year)
- Essay: भारत में आर्थिक स्थिरता और विकास के लिए मौद्रिक नीति की भूमिका, मुद्रास्फीति नियंत्रण: चुनौतियाँ और समाधान
त्वरित पुनरावृत्ति: भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मौद्रिक नीति के माध्यम से मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना आर्थिक स्थिरता और सतत विकास के लिए महत्वपूर्ण है, जिसमें रेपो दर जैसे उपकरण और ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ जैसे नीतिगत रुख का उपयोग किया जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय बैंक ने अल नीनो (El Nino) की स्थिति, दक्षिण-पश्चिम मानसून (South-West Monsoon) की कमी और अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में अस्थिरता के कारण खाद्य तथा ईंधन घटकों में बढ़ते दबाव का उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त, कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) में वृद्धि और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) बास्केट के एक बड़े हिस्से में मुद्रास्फीति के बढ़ने से यह संकेत मिलता है कि मूल्य दबाव अब अधिक व्यापक हो रहा है। इन परिस्थितियों के आलोक में, मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) ने प्रमुख ब्याज दर (रेपो दर) में 25 आधार अंकों (basis points) की वृद्धि कर 5.5 प्रतिशत कर दी है और अपने रुख को ‘तटस्थ’ से ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ (calibrated tightening) में बदल दिया है।
पृष्ठभूमि
- मुद्रास्फीति किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों के सामान्य स्तर में निरंतर वृद्धि को संदर्भित करती है, जिससे मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है।
- भारत में खुदरा मुद्रास्फीति को मुख्य रूप से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) द्वारा मापा जाता है, जो परिवारों द्वारा उपभोग की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं की एक टोकरी की कीमतों में औसत परिवर्तन को दर्शाता है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक को सरकार द्वारा मुद्रास्फीति को 2-6 प्रतिशत की सीमा में रखने का अधिदेश दिया गया है, जिसका लक्ष्य 4 प्रतिशत है।
- मौद्रिक नीति समिति (MPC) एक छह सदस्यीय निकाय है, जिसमें तीन सदस्य RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं, जो भारत में बेंचमार्क ब्याज दर निर्धारित करती है।
- रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक धन उधार देता है। इसमें वृद्धि से बैंकों के लिए उधार लेना महंगा हो जाता है, जिससे अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति कम होती है और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
- कोर मुद्रास्फीति खाद्य और ईंधन जैसे अस्थिर घटकों को छोड़कर मुद्रास्फीति को मापती है, जो अंतर्निहित मूल्य दबावों का बेहतर संकेतक मानी जाती है।
मौद्रिक नीति और मुद्रास्फीति नियंत्रण
- मौद्रिक नीति केंद्रीय बैंक द्वारा अर्थव्यवस्था में धन की आपूर्ति और ऋण की उपलब्धता को नियंत्रित करने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपायों का एक समूह है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत में मौद्रिक नीति का संचालन करता है, जिसके लिए वह विभिन्न उपकरणों जैसे रेपो दर, रिवर्स रेपो दर (Reverse Repo Rate), नकद आरक्षित अनुपात (Cash Reserve Ratio – CRR) और सांविधिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio – SLR) का उपयोग करता है।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण मौद्रिक नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि उच्च मुद्रास्फीति क्रय शक्ति को कम करती है, आर्थिक अनिश्चितता पैदा करती है और निवेश को हतोत्साहित करती है।
- जब मुद्रास्फीति बढ़ती है, तो RBI आमतौर पर रेपो दर बढ़ाता है, जिससे वाणिज्यिक बैंकों के लिए उधार लेना महंगा हो जाता है। यह बदले में, बैंकों को अपनी उधार दरों को बढ़ाने के लिए प्रेरित करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में ऋण प्रवाह कम हो जाता है और कुल मांग (aggregate demand) पर अंकुश लगता है।
- ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ का रुख यह संकेत देता है कि RBI भविष्य में भी नीतिगत दरों में वृद्धि कर सकता है, लेकिन यह आर्थिक आंकड़ों के आधार पर विवेकपूर्ण और चरणबद्ध तरीके से होगा।
- मुद्रास्फीति के अनुमानों को जारी करना केंद्रीय बैंक की पारदर्शिता को बढ़ाता है और व्यवसायों तथा उपभोक्ताओं को भविष्य की आर्थिक स्थितियों के बारे में सूचित निर्णय लेने में मदद करता है।
- खाद्य और ईंधन की कीमतें भारत में मुद्रास्फीति को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं, जो अक्सर आपूर्ति-पक्ष के झटकों, जैसे खराब मानसून या अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती हैं।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| खुदरा मुद्रास्फीति (Retail Inflation) अनुमान में वृद्धि | भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वित्तीय वर्ष 2027 के लिए खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान 5.0 प्रतिशत से बढ़ाकर 5.2 प्रतिशत कर दिया है, जो बढ़ती कीमतों के दबाव को दर्शाता है। |
| खाद्य और ईंधन घटकों का दबाव | खाद्य पदार्थों (विशेषकर चीनी और प्याज) और ईंधन की कीमतों में वृद्धि मुद्रास्फीति का मुख्य कारण है, जो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित है। |
| कोर मुद्रास्फीति में वृद्धि | खाद्य और ईंधन को छोड़कर, कोर मुद्रास्फीति (Core Inflation) में भी वृद्धि देखी गई है, जो दर्शाता है कि मूल्य दबाव अब अधिक व्यापक हो रहा है। |
| मौद्रिक नीति समिति (MPC) का निर्णय | मुद्रास्फीति के बिगड़ते परिदृश्य को देखते हुए, MPC ने रेपो दर (Repo Rate) में 25 आधार अंकों की वृद्धि कर इसे 5.5 प्रतिशत कर दिया है और नीतिगत रुख को ‘तटस्थ’ से ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ में बदल दिया है। |
| आपूर्ति-पक्ष के कारक | कम दक्षिण-पश्चिम मॉनसून (Southwest Monsoon), अल नीनो (El Nino) की स्थिति और अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में अस्थिरता जैसे आपूर्ति-पक्ष के कारक मुद्रास्फीति के निकट-अवधि के दृष्टिकोण को प्रभावित कर रहे हैं। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- मुद्रास्फीति में वृद्धि से उपभोक्ताओं की क्रय शक्ति (Purchasing Power) कम होती है, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) प्रभावित हो सकती है।
- उच्च मुद्रास्फीति से निवेश पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, क्योंकि अनिश्चितता बढ़ती है और वास्तविक रिटर्न (Real Return) कम हो जाता है।
- रेपो दर में वृद्धि का उद्देश्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है, लेकिन इससे ऋण महंगा हो सकता है, जिससे उपभोग और निवेश पर असर पड़ेगा।
नीतिगत महत्व
- RBI का यह कदम मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के माध्यम से मूल्य स्थिरता (Price Stability) बनाए रखने की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जो उसका प्राथमिक जनादेश है।
- नीतिगत रुख में बदलाव ‘तटस्थ’ से ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ की ओर, भविष्य में दरों में और वृद्धि की संभावना का संकेत देता है, यदि मुद्रास्फीति का दबाव बना रहता है।
- यह सरकार और RBI के बीच समन्वय की आवश्यकता को उजागर करता है, क्योंकि आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने के लिए राजकोषीय उपायों (Fiscal Measures) की भी आवश्यकता होती है।
सामाजिक महत्व
- खाद्य और ईंधन की कीमतों में वृद्धि से समाज के कमजोर वर्गों पर सबसे अधिक बोझ पड़ता है, क्योंकि उनकी आय का एक बड़ा हिस्सा इन आवश्यक वस्तुओं पर खर्च होता है।
- मुद्रास्फीति आय असमानता (Income Inequality) को बढ़ा सकती है, क्योंकि निश्चित आय वाले लोगों की वास्तविक आय में कमी आती है।
चुनौतियाँ
1. आपूर्ति-पक्ष के झटके
- कम मॉनसून और अल नीनो जैसी मौसमी घटनाएं कृषि उत्पादन को प्रभावित करती हैं, जिससे खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं।
- अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में अस्थिरता आयातित मुद्रास्फीति (Imported Inflation) को जन्म देती है, जिस पर घरेलू मौद्रिक नीति का सीमित नियंत्रण होता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मुद्रास्फीति के कारण
2. कोर मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण
- कोर मुद्रास्फीति में वृद्धि यह संकेत देती है कि मूल्य दबाव केवल कुछ वस्तुओं तक सीमित नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था के व्यापक क्षेत्रों में फैल रहा है।
- यह मौद्रिक नीति के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसे नियंत्रित करना अधिक कठिन हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति के उपकरण
3. नीतिगत दुविधा
- RBI को मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाना होता है। रेपो दर में वृद्धि से मुद्रास्फीति तो नियंत्रित हो सकती है, लेकिन यह संवृद्धि को धीमा कर सकती है।
- ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ का रुख भविष्य की नीतिगत कार्रवाइयों के लिए अनिश्चितता पैदा करता है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति समिति
4. वैश्विक आर्थिक कारक
- वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और अन्य देशों की मौद्रिक नीतियां भी भारत की मुद्रास्फीति को प्रभावित कर सकती हैं।
- डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में उतार-चढ़ाव आयात को महंगा कर सकता है, जिससे मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
यूपीएससी लिंक: अंतर्राष्ट्रीय संबंध: वैश्विक आर्थिक रुझान
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| खाद्य मुद्रास्फीति | कम मॉनसून, अल नीनो और विशिष्ट वस्तुओं (जैसे चीनी, प्याज) में तेज वृद्धि से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे आम आदमी पर बोझ पड़ रहा है। |
| ईंधन मुद्रास्फीति | अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में अस्थिरता और प्रतिकूल आधार प्रभाव (Base Effect) के कारण ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं, जिससे परिवहन लागत और अन्य वस्तुओं की कीमतें प्रभावित होती हैं। |
| कोर मुद्रास्फीति का विस्तार | खाद्य और ईंधन को छोड़कर भी कीमतों में वृद्धि, यह दर्शाती है कि मुद्रास्फीति अब अधिक व्यापक हो गई है, जिससे इसे नियंत्रित करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है। |
| आपूर्ति-पक्ष के दबाव | मौसम संबंधी कारक और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के मुद्दे लगातार मूल्य दबाव बनाए हुए हैं, जिन पर मौद्रिक नीति का सीधा नियंत्रण नहीं होता। |
| नीतिगत रुख में बदलाव | रेपो दर में वृद्धि और ‘कैलिब्रेटेड टाइटनिंग’ का रुख, भविष्य में उच्च ब्याज दरों की संभावना का संकेत देता है, जो आर्थिक संवृद्धि को प्रभावित कर सकता है। |
आगे की राह
- आपूर्ति-पक्ष के मुद्दों को संबोधित करने के लिए लक्षित राजकोषीय उपाय (Targeted Fiscal Measures) अपनाना, जैसे कि आवश्यक वस्तुओं के बफर स्टॉक (Buffer Stock) का प्रबंधन और आपूर्ति श्रृंखला में सुधार।
- कृषि उत्पादकता बढ़ाने और मौसमी झटकों के प्रति लचीलापन लाने के लिए कृषि क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा देना।
- नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता बढ़ाकर और ऊर्जा दक्षता में सुधार करके ईंधन आयात पर निर्भरता कम करना।
- मुद्रास्फीति के दबाव को कम करने के लिए व्यापार नीति (Trade Policy) का विवेकपूर्ण उपयोग करना, जैसे कि कुछ वस्तुओं के आयात-निर्यात पर उचित नियंत्रण।
- मौद्रिक नीति और राजकोषीय नीति के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करना ताकि मुद्रास्फीति नियंत्रण और संवृद्धि के लक्ष्यों को एक साथ प्राप्त किया जा सके।
- दीर्घकालिक मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए संरचनात्मक सुधारों (Structural Reforms) को लागू करना, जैसे कि श्रम बाजार सुधार और बुनियादी ढांचे का विकास।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
मुद्रास्फीति · भारतीय रिज़र्व बैंक · मौद्रिक नीति समिति · रेपो दर · उपभोक्ता मूल्य सूचकांक · कोर मुद्रास्फीति · राजकोषीय नीति · आपूर्ति-पक्ष के कारक · एल नीनो · आर्थिक स्थिरता · विकास बनाम मुद्रास्फीति · कैलिब्रेटेड टाइटनिंग
अवधारणा प्रवाह
कम मॉनसून, अल नीनो, वैश्विक तेल की कीमतें → आपूर्ति-पक्ष के झटके, कृषि उत्पादन में कमी → खाद्य और ईंधन की कीमतों में वृद्धि, कोर मुद्रास्फीति का विस्तार → उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति में वृद्धि → RBI द्वारा रेपो दर में वृद्धि और नीतिगत रुख में बदलाव → मुद्रास्फीति नियंत्रण का प्रयास, आर्थिक संवृद्धि पर संभावित प्रभाव
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत में मौद्रिक नीति का संचालन करता है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है।
2. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) पर आधारित खुदरा मुद्रास्फीति RBI के मौद्रिक नीति निर्धारण का प्रमुख बेंचमार्क है।
3. रेपो दर में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में तरलता (liquidity) बढ़ती है, जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 और 2 सही हैं। RBI मौद्रिक नीति का संचालन करता है और CPI खुदरा मुद्रास्फीति इसका प्रमुख बेंचमार्क है। कथन 3 गलत है क्योंकि रेपो दर में वृद्धि से अर्थव्यवस्था में तरलता कम होती है, जिससे मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद मिलती है, न कि तरलता बढ़ती है।
Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (MPC) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. MPC में छह सदस्य होते हैं, जिनमें से तीन RBI से और तीन केंद्र सरकार द्वारा नामित होते हैं।
2. RBI गवर्नर MPC का पदेन अध्यक्ष होता है और उसके पास टाई होने की स्थिति में निर्णायक मत (casting vote) होता है।
3. MPC का मुख्य कार्य भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करना है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर: 1, 2 और 3 — कथन 1, 2 और 3 तीनों सही हैं। MPC में छह सदस्य होते हैं, RBI गवर्नर पदेन अध्यक्ष होता है और उसके पास निर्णायक मत होता है, तथा इसका मुख्य कार्य मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करना है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा मुद्रास्फीति के अनुमानों में हालिया वृद्धि के प्रमुख कारणों का विश्लेषण कीजिए। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मौद्रिक नीति की भूमिका और इसकी सीमाओं पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर में निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया जाना चाहिए:
1. **परिचय:** RBI द्वारा FY27 के लिए मुद्रास्फीति अनुमान में वृद्धि का संदर्भ दें।
2. **मुद्रास्फीति वृद्धि के कारण:**
* **आपूर्ति-पक्ष के कारक:** दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी, एल नीनो की स्थिति, अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में अस्थिरता।
* **खाद्य मुद्रास्फीति:** खाद्य घटकों में व्यापक मूल्य वृद्धि (जैसे चीनी, प्याज)।
* **कोर मुद्रास्फीति:** कोर मुद्रास्फीति में वृद्धि और CPI बास्केट के बड़े हिस्से में मुद्रास्फीति का सामान्यीकरण।
* **आधार प्रभाव:** ईंधन मुद्रास्फीति पर प्रतिकूल आधार प्रभाव।
3. **मौद्रिक नीति की भूमिका:**
* **उद्देश्य:** मूल्य स्थिरता बनाए रखना (मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण)।
* **उपकरण:** रेपो दर में वृद्धि (नीति दर), कैलिब्रेटेड टाइटनिंग की नीति।
* **तंत्र:** रेपो दर में वृद्धि से तरलता में कमी, ऋण महंगा होना, मांग में कमी और अंततः मुद्रास्फीति पर नियंत्रण।
* **मौद्रिक नीति समिति (MPC):** इसके निर्णय लेने की प्रक्रिया और महत्व।
4. **मौद्रिक नीति की सीमाएँ:**
* **आपूर्ति-पक्ष के झटके:** मौद्रिक नीति आपूर्ति-पक्ष के कारकों (जैसे खराब मानसून, तेल की कीमतें) को सीधे संबोधित नहीं कर सकती।
* **समय अंतराल:** नीतिगत परिवर्तनों का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव दिखने में समय लगता है।
* **विकास पर प्रभाव:** अत्यधिक सख्त मौद्रिक नीति आर्थिक विकास को धीमा कर सकती है।
* **राजकोषीय नीति के साथ समन्वय:** राजकोषीय नीति (सरकार के व्यय और कराधान) के साथ प्रभावी समन्वय की आवश्यकता।
5. **निष्कर्ष:** मुद्रास्फीति नियंत्रण के लिए मौद्रिक और राजकोषीय नीतियों के बीच संतुलन और समन्वय की आवश्यकता पर बल दें।
स्रोत: orissapost.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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