क्या भारत में वन्यजीव मानवीय हस्तक्षेप के बिना फल-फूल सकते हैं?

क्या भारत में वन्यजीव मानवीय हस्तक्षेप के बिना फल-फूल सकते हैं?

क्या भारत में वन्यजीव मानवीय हस्तक्षेप के बिना फल-फूल सकते हैं?

वन्यजीव पुनर्स्थापना प्रक्रियालक्ष्य निर्धारणप्रजाति/स्थल चयनस्थल तैयारीआवास गुणवत्ताचरणबद्ध छोड़ा जानाबाघिन/चीतानिगरानी मूल्यांकनस्व-पोषित आबादीसंतुलन स्थापनासमुदाय-पर्यटन-वन
वन्यजीव पुनर्स्थापना प्रक्रिया

✎ वन्यजीव संरक्षण केवल आर्थिक समृद्धि का परिणाम नहीं, बल्कि विज्ञान, नीति, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सामाजिक सहमति के संयोजन से सफल होता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव विविधता और जलवायु परिवर्तन (Environment, Ecology, Biodiversity)  |  GS Paper II — सरकारी नीतियाँ और हस्तक्षेप; अनुसूचित जनजातियों और वनवासियों से संबंधित योजनाएँ व अधिकार (Government Policies and Interventions; Welfare of Vulnerable Sections)
  • Prelims: बाघ परियोजना (Project Tiger), 1973 — बाघ संरक्षण की केंद्र-प्रायोजित योजना, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 — अनुसूची I (Schedule I) की प्रजातियों को प्राप्त विधिक सुरक्षा, राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (National Tiger Conservation Authority — NTCA) और बाघ अभयारण्य का दर्जा, प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) — नामीबिया से चीतों का पुनर्प्रवर्तन, कूनो राष्ट्रीय उद्यान, बफर क्षेत्र (Buffer Zone) और कोर/क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट की अवधारणा, न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या (Minimum Viable Population) की संरक्षण-विज्ञान अवधारणा, अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (International Union for the Conservation of Nature — IUCN) और रेड लिस्ट (Red List), अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पारंपरिक वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006
  • Essay: क्या संरक्षण केवल समृद्धि का परिणाम है? विकासशील देशों के संदर्भ में जैव विविधता संरक्षण का विश्लेषण, संरक्षण में विज्ञान, भावना और समुदाय: वन्यजीव प्रबंधन में मानव की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: वन्यजीव संरक्षण केवल आर्थिक समृद्धि का परिणाम नहीं, बल्कि विज्ञान, नीति, स्थानीय समुदायों के अधिकारों और सामाजिक सहमति के संयोजन से सफल होता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

अक्टूबर में बुक्सा बाघ अभयारण्य (पश्चिम बंगाल) में एक तीन वर्षीय बाघिन को छोड़ा गया, जो वहाँ बाघों की चरणबद्ध पुनर्स्थापना और आत्मनिर्भर आबादी स्थापित करने की योजना का आरंभ है। इसी क्रम में मध्य प्रदेश में 2022 में प्रोजेक्ट चीता के अंतर्गत चीतों का पुनर्प्रवर्तन किया गया था। इन घटनाओं से यह प्रश्न उठा है कि क्या वन्यजीव मानवीय हस्तक्षेप सीमित होने पर भी स्वतः फल-फूल सकते हैं। एक अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन की उस टिप्पणी के बाद, जिसमें भारत द्वारा निर्धन होते हुए भी बाघों के संरक्षण को असामान्य रूप में देखा गया था, यह बहस भी सामने आई कि संरक्षण और आर्थिक समृद्धि के बीच क्या संबंध है। इस चर्चा में वन्यजीव संरक्षण की नीतिगत, वैज्ञानिक और सामाजिक आयामों को समझना प्रासंगिक है।

पृष्ठभूमि

  • ब्रिटिश काल में कृषि विस्तार, नई तकनीकों और मनुष्य द्वारा प्रकृति पर नियंत्रण की धारणा से वन्यजीवों की संख्या में व्यापक कमी आई। इसी दौर में वनवासी समुदायों के पारंपरिक वन-अधिकार भी सीमित हुए।
  • स्वतंत्रता के बाद वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 लागू हुआ और 1973 में बाघ परियोजना आरंभ हुई। इसके बाद बाघ अभयारण्यों का विस्तार हुआ और 2005 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण का गठन किया गया।
  • पश्चिमी संरक्षण आंदोलन में रेचल कार्सन की सायलेंट स्प्रिंग (1962) और पॉल एहरलिच की द पॉपुलेशन बॉम्ब जैसी कृतियों से जनजागरण हुआ, जबकि 1980 के दशक में संरक्षण-विज्ञान में न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या जैसी अवधारणाएँ विकसित हुईं।
  • कोस्टा रिका, ब्राज़ील, रवांडा और कोलंबिया जैसे अपेक्षाकृत कम आय वाले देशों ने संरक्षण को अपनी विकास रणनीति का अंग बनाया है, जिसमें पारिस्थितिक पर्यटन से राजस्व सृजन भी एक पक्ष है।
  • वन्यजीव संरक्षण में पर्यावरणीय विज्ञान के साथ नैतिक और भावनात्मक पक्ष भी जुड़े रहते हैं, और इसमें स्थानीय समुदायों की आजीविका तथा वनों पर उनकी निर्भरता को संतुलित करना एक प्रमुख चुनौती है।

वन्यजीव पुनर्प्रवर्तन (Wildlife Reintroduction) क्या है?

  • पुनर्प्रवर्तन का अर्थ है किसी ऐसे क्षेत्र में किसी प्रजाति को पुनः स्थापित करना, जहाँ वह स्थानीय रूप से विलुप्त हो चुकी हो, ताकि वहाँ स्वव्यवस्थित (self-sustaining) आबादी बन सके।
  • इसे प्रायः इन-सीटू (In-situ) संरक्षण के अंतर्गत देखा जाता है, जिसमें प्रजाति को उसके प्राकृतिक आवास में संरक्षित किया जाता है; एक्स-सीटू (Ex-situ) संरक्षण में प्रजाति को चिड़ियाघर या प्रजनन केंद्र में रखा जाता है।
  • सफल पुनर्प्रवर्तन के लिए शिकार-योग्य पर्याप्त शिकार (prey base), उपयुक्त आवास, पर्याप्त क्षेत्र और स्थानीय समुदायों का सहयोग आवश्यक होता है।
  • न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या वह न्यूनतम संख्या है जिससे आनुवंशिक विविधता बनी रहे और प्रजाति दीर्घकाल तक जीवित रह सके; इससे कम संख्या में आनुवंशिक ह्रास का खतरा रहता है।
  • भारत में बाघ परियोजना के अंतर्गत बाघ अभयारण्य घोषित होते हैं, और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण इनकी निगरानी और प्रबंधन में सहयोग करता है।
  • प्रोजेक्ट चीता के अंतर्गत चीते अफ्रीका से लाए गए, क्योंकि भारत में चीता 1952 में विलुप्त घोषित हो चुका था; यह किसी विलुप्त महाद्वीपीय प्रजाति का भारत में पहला पुनर्प्रवर्तन प्रयोग था।
  • रेड लिस्ट (Red List) IUCN द्वारा प्रजातियों के संरक्षण-स्तर का वैश्विक आकलन है, जो नीति-निर्माण और प्राथमिकता-निर्धारण का एक प्रमुख आधार है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
पुनःप्रवेश कार्यक्रम (Reintroduction Programme) बफर क्षेत्र और आरक्षित क्षेत्र में विलुप्त या घटती प्रजाति को पुनः स्थापित कर स्व-पोषित (self-sustaining) आबादी बनाने का प्रयास। बक्सा बाघ आरक्षित क्षेत्र (पश्चिम बंगाल) में 2 अक्टूबर को एक तीन वर्षीय बाघिन का छोड़ा जाना इसका उदाहरण है।
प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) 2022 में मध्य प्रदेश में चीतों का पुनःप्रवेश किया गया। यह भारत में विलुप्त हो चुकी प्रजाति को अफ्रीका से लाकर पुनः बसाने का प्रयास है और इसमें वैज्ञानिक निगरानी की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger) 1973 में आरंभ यह केंद्र प्रायोजित योजना बाघ आरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन और बाघों की संख्या संरक्षण पर केंद्रित है। स्रोत में उल्लेखित यह वही कार्यक्रम है, जिस पर इस बहस में चेतावनी दी गई कि राष्ट्रीय उद्यान कहीं सफारी पार्क में न बदल जाएँ।
न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या (Minimum Viable Population) संरक्षण विज्ञान की वह अवधारणा, जो बताती है कि किसी प्रजाति की आनुवंशिक और जनसांख्यिकीय रूप से टिकाऊ आबादी कितनी होनी चाहिए। पुनःप्रवेश की सफलता इसी मानदंड पर परखी जाती है।
संरक्षण का आर्थिक आयाम जैव-विविधता आधारित पर्यटन से राजस्व प्राप्त हो सकता है, जैसा कि कोस्टा रिका में देखा गया है। इससे संरक्षण को विकास नीति का हिस्सा बनाया जा सकता है।

महत्व

पारिस्थितिक (Ecological)

  • खाद्य शृंखला में शीर्ष शिकारी (apex predator) जैसे बाघ की उपस्थिति से पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का संतुलन बना रहता है।
  • प्रजाति-आधारित संरक्षण से आवास की गुणवत्ता और जैव-विविधता दोनों की रक्षा होती है।

आर्थिक (Economic)

  • जैव-विविधता पर्यटन से स्थानीय रोज़गार और राजस्व सृजित होता है, जो संरक्षण के लिए समर्थन जुटाने में सहायक है।
  • कोस्टा रिका, ब्राज़ील और रवांडा जैसे अपेक्षाकृत कम आय वाले देशों के उदाहरण बताते हैं कि संरक्षण आर्थिक विकास के विरुद्ध नहीं है।

सामाजिक-सांस्कृतिक (Socio-cultural)

  • वनवासी समुदायों की आजीविका वनों पर निर्भर है, इसलिए संरक्षण नीति में उनके अधिकारों और भागीदारी को शामिल करना आवश्यक है।
  • संरक्षण के पीछे नैतिक और दार्शनिक चिंता भी है, जो नीति निर्माण में जनसमर्थन का आधार बनती है।

वैज्ञानिक-नीतिगत (Scientific and Policy)

  • संरक्षण विज्ञान प्रजाति की प्राथमिकता तय करने में साक्ष्य उपलब्ध कराता है, जिससे नीतिगत निर्णय तर्कसंगत बनते हैं।
  • अंतरराष्ट्रीय संगठन जैसे प्रकृति संरक्षण हेतु अंतरराष्ट्रीय संघ (IUCN) वैश्विक मानक और लाल सूची (Red List) के माध्यम से राष्ट्रीय नीतियों को दिशा देते हैं।

चुनौतियाँ

1. प्रजाति चयन में असमानता

  • बाघ और शेर जैसी करिश्माई (charismatic) प्रजातियों को अधिक ध्यान मिलता है, जबकि गिद्ध और कैराकल जैसी प्रजातियाँ उपेक्षित रह जाती हैं।
  • गिद्धों की संख्या में गिरावट जैसे मामले पारिस्थितिकी और सफाई-तंत्र पर गंभीर प्रभाव डालते हैं, फिर भी उन्हें कम संसाधन मिलते हैं।

2. राष्ट्रीय उद्यानों का सफारी पार्कों में बदलना

  • पर्यटन पर अधिक ज़ोर देने से संरक्षित क्षेत्रों की मूल पारिस्थितिक भूमिका कमज़ोर हो सकती है।
  • 1970 के दशक में प्रोजेक्ट टाइगर के समय इस प्रवृत्ति के विरुद्ध चेतावनी दी गई थी, जो आज भी प्रासंगिक है।

3. वनवासी समुदायों के अधिकार और आजीविका

  • औपनिवेशिक काल में वनवासी समुदायों के पारंपरिक अधिकार सीमित हुए और वे आज भी वनों पर निर्भर हैं।
  • संरक्षण और आजीविका के बीच टकराव से स्थानीय समर्थन कमज़ोर हो सकता है, इसलिए सहभागी प्रबंधन आवश्यक है।

4. पुनःप्रवेश की वैज्ञानिक और प्रबंधकीय चुनौतियाँ

  • छोड़े गए जानवरों के लिए पर्याप्त शिकार, जल और सुरक्षित आवास सुनिश्चित करना कठिन है।
  • न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या तक पहुँचने और आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में समय और निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है।

5. संघ और राज्यों के बीच समन्वय

  • वन और वन्यजीव विषय समवर्ती सूची में हैं, इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच नीति और क्रियान्वयन का समन्वय आवश्यक है।
  • अंतर-राज्यीय बाघ और चीता गलियारों के प्रबंधन में प्रशासनिक सहमति की कमी बाधा बन सकती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
प्रजाति प्राथमिकता करिश्माई प्रजातियों पर अधिक ध्यान, गिद्ध और कैराकल जैसी प्रजातियों की उपेक्षा।
पर्यटन दबाव राष्ट्रीय उद्यानों का सफारी पार्कों में परिवर्तन होने से पारिस्थितिक अखंडता पर खतरा।
वनवासी अधिकार औपनिवेशिक काल से चली आ रही अधिकार-हानि और वन-निर्भर आजीविका का संघर्ष।
पुनःप्रवेश की सफलता स्व-पोषित आबादी, आनुवंशिक विविधता और शिकार-उपलब्धता सुनिश्चित करने की कठिनाई।
समन्वय वन और वन्यजीव के समवर्ती विषय होने के कारण केंद्र और राज्यों के बीच नीतिगत तालमेल की आवश्यकता।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रोजेक्ट टाइगर (Project Tiger)
  • प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah)

आगे की राह

  • पुनःप्रवेश कार्यक्रमों में वैज्ञानिक मानदंड, जैसे न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या और आनुवंशिक विविधता, को पूर्व-निर्धारित और सार्वजनिक रूप से मापने योग्य बनाया जाए।
  • गिद्ध और कैराकल जैसी कम-चर्चित प्रजातियों के लिए भी प्रजाति-विशिष्ट कार्य-योजनाएँ बनाई जाएँ।
  • वनवासी समुदायों को संरक्षण निर्णयों और लाभ-साझेदारी में शामिल करने के लिए वन अधिकार अधिनियम, 2006 के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन हो।
  • जैव-विविधता पर्यटन को स्थानीय समुदायों की आय से जोड़ा जाए, ताकि संरक्षण आर्थिक रूप से टिकाऊ बने।
  • राष्ट्रीय उद्यानों के भीतर पर्यटन की सीमा और पारिस्थितिक वहन क्षमता (carrying capacity) का वैज्ञानिक निर्धारण किया जाए।
  • केंद्र और राज्यों के बीच अंतर-राज्यीय गलियारों और पुनःप्रवेश योजनाओं के लिए स्पष्ट समन्वय तंत्र स्थापित किया जाए।
  • पुनःप्रवेश के बाद दीर्घकालिक निगरानी और मूल्यांकन को अनिवार्य किया जाए, ताकि नीति को साक्ष्य के आधार पर सुधारा जा सके।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संरक्षण-आधारित विकास (Conservation-led Development) · बाघ परियोजना (Project Tiger) · बाघ अभयारण्य में पुनःप्रवेश (Reintroduction) · मानव-वन्यजीव संघर्ष (Human-Wildlife Conflict) · वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 38V · अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 · सामुदायिक वन संसाधन और ग्राम सभा · न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या (Minimum Viable Population) · पारिस्थितिक तंत्र सेवाएँ (Ecosystem Services) · अनुच्छेद 48क और अनुच्छेद 51क(छ) · पर्यावरण-न्याय और सहभागी शासन · सह-अस्तित्व मॉडल (Coexistence Model)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 48A: राज्य का पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(g): नागरिकों का प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का कर्तव्य
  • सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: वन और वन्यजीव संरक्षण (प्रविष्टि 17A, 17B)

अवधारणा प्रवाह

विलुप्त या घटती प्रजाति के लिए संरक्षण-लक्ष्य तय होता है (जैसे बक्सा में बाघ और भारत में चीता)।  →  वैज्ञानिक साक्ष्य और न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या के आधार पर प्रजाति और स्थल का चयन होता है।  →  बाघिन या चीते जैसे जीव को आरक्षित क्षेत्र या बफर क्षेत्र में चरणबद्ध रूप से छोड़ा जाता है।  →  स्थानीय समुदायों, पर्यटन और वन प्रबंधन के बीच संतुलन बनाकर आवास की गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती है।  →  निगरानी और मूल्यांकन से पता चलता है कि आबादी स्व-पोषित हो रही है या नहीं।  →  सफलता या असफलता के आधार पर नीति, प्रजाति-प्राथमिकता और सह-अस्तित्व के उपाय संशोधित किए जाते हैं।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए, जो अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 से संबंधित हैं:
1. यह अधिनियम वन-निवासी समुदायों के परंपरागत वन अधिकारों को मान्यता देता है।
2. व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की पहचान की प्रक्रिया का प्रारंभ ग्राम सभा के माध्यम से होता है।
3. यह अधिनियम वन-निवासी समुदायों को वन, वन्यजीव और जैव विविधता की रक्षा का दायित्व और अधिकार भी प्रदान करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: अधिनियम परंपरागत वन अधिकारों को मान्यता देता है। कथन 2 सही है: वन अधिकारों की पहचान का दावा ग्राम सभा की पहल पर आरंभ होता है। कथन 3 सही है: धारा 5 के अंतर्गत ग्राम सभाओं को वन, वन्यजीव और जैव विविधता की रक्षा का अधिकार और कर्तव्य दिया गया है। अतः तीनों कथन सही हैं।

Q2. निम्नलिखित में से दो कथनों के बीच सही संबंध का चयन कीजिए।
अभिकथन (A): भारत में 1990 के दशक में गिद्धों की संख्या में तीव्र गिरावट दर्ज की गई।
कारण (R): पशु-चिकित्सा में प्रयुक्त डाइक्लोफेनाक (Diclofenac) की विषाक्तता से गिद्धों में गुर्दे की विफलता होती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट दर्ज हुई, जो दक्षिण एशिया में व्यापक रूप से चर्चित रही। इसका प्रमुख कारण डाइक्लोफेनाक का पशु-चिकित्सा में उपयोग था, जिसके अवशेष मृत मवेशियों के मांस के माध्यम से गिद्धों तक पहुँचते थे और उनमें गुर्दे की विफलता उत्पन्न करते थे। इसलिए (R), (A) की सही व्याख्या है।

Q3. निम्नलिखित स्तंभों का सही मिलान कीजिए:
स्तंभ I (कार्यक्रम/पहल):
A. बाघ परियोजना (Project Tiger)
B. हाथी परियोजना (Project Elephant)
C. चीता परियोजना (Project Cheetah)

स्तंभ II (विशेषता):
1. वर्ष 1973 में आरंभ
2. वर्ष 1992 में आरंभ
3. वर्ष 2022 में अफ्रीकी चीतों का भारत में पुनःप्रवेश

सही मिलान वाला विकल्प चुनिए:

  1. A-1, B-2, C-3
  2. A-2, B-1, C-3
  3. A-1, B-3, C-2
  4. A-3, B-2, C-1

उत्तर: A-1, B-2, C-3 — बाघ परियोजना वर्ष 1973 में आरंभ हुई थी, इसलिए A-1 सही है। हाथी परियोजना वर्ष 1992 में आरंभ हुई, इसलिए B-2 सही है। चीता परियोजना के अंतर्गत वर्ष 2022 में मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में अफ्रीकी चीते लाए गए, इसलिए C-3 सही है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में वन्यजीव संरक्षण प्रायः सक्रिय राज्य-हस्तक्षेप और संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन पर आधारित रहा है। क्या वन्यजीव बिना सक्रिय मानवीय हस्तक्षेप के फल-फूल सकते हैं? इस प्रश्न का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही स्पष्ट कीजिए कि वन-निवासी समुदायों के वन अधिकारों की मान्यता इस दृष्टिकोण को किस प्रकार प्रभावित करती है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल उत्तर बिंदु):
1. भूमिका: हाल के उदाहरण, जैसे बक्सा बाघ अभयारण्य (पश्चिम बंगाल) में बाघिन का चरणबद्ध पुनःप्रवेश और वर्ष 2022 में कूनो राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश) में चीता परियोजना के अंतर्गत अफ्रीकी चीतों का पुनःप्रवेश, इस प्रश्न को प्रासंगिक बनाते हैं। द इकोनॉमिस्ट की टिप्पणी पर उठी बहस का उल्लेख कीजिए, परंतु उसे नैतिक निर्णय के बजाय विश्लेषणात्मक प्रश्न के रूप में लीजिए।
2. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: औपनिवेशिक काल में वनों का व्यावसायिक दोहन और वन्यजीवों की हानि; स्वतंत्रता के बाद पारंपरिक एवं पश्चिमी दृष्टिकोणों का मिश्रण। रचेल कार्सन की ‘साइलेंट स्प्रिंग’ (1962) और पॉल एर्लिक की ‘द पॉपुलेशन बम’ (1968) से आधुनिक संरक्षण आंदोलन की प्रेरणा।
3. हाथ-से-दूर (हस्तक्षेप-रहित) मॉडल के पक्ष में तर्क: कोस्टा रिका का उदाहरण, जहाँ संरक्षण पर्यावरण-पर्यटन और पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं के माध्यम से राजस्व देता है; ब्राज़ील, रवांडा और कोलंबिया जैसे विकासशील देशों ने भी संरक्षण को विकास-पथ का हिस्सा बनाया है। संरक्षण केवल धनी देशों का विशेषाधिकार नहीं है।
4. सक्रिय प्रबंधन के पक्ष में तर्क: पुनःप्रवेश और न्यूनतम व्यवहार्य जनसंख्या (Minimum Viable Population) की अवधारणा के अनुसार आनुवंशिक विविधता और जनसंख्या की व्यवहार्यता के लिए सक्रिय प्रबंधन आवश्यक हो सकता है। डाइक्लोफेनाक प्रकरण दिखाता है कि नीतिगत हस्तक्षेप के बिना प्रजाति-विनाश हो सकता है।
5. विधिक और संस्थागत ढाँचा: वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972; वर्ष 2006 के संशोधन द्वारा राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की स्थापना; धारा 38V के अंतर्गत कोर/क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट से निवासियों के स्थानांतरण के लिए ग्राम सभा की सहमति और पुनर्वास पैकेज की शर्तें। अनुच्छेद 48क (राज्य का पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का दायित्व) और अनुच्छेद 51क(छ) (नागरिकों का मौलिक कर्तव्य)। टी.एन. गोदावर्मन मामला (1996) में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वन की व्यापक व्याख्या।
6. वन अधिकार अधिनियम, 2006 की भूमिका: धारा 3(1)(i) के अंतर्गत सामुदायिक वन संसाधनों की रक्षा का अधिकार और धारा 5 के अंतर्गत ग्राम सभाओं के संरक्षण-दायित्व। किरण-उन्मुख संरक्षण बनाम सहभागी संरक्षण की बहस; केवल सुरक्षित क्षेत्रों से लोगों को हटाने के बजाय सह-प्रबंधन की संभावना।
7. विद्वानों के दृष्टिकोण: किरण-विवेचन में क़मर कुरैशी द्वारा ‘संरक्षण को सफारी पार्क में बदलने’ की चेतावनी (1970 के दशक में बाघ परियोजना के संदर्भ में) और उमा रामकृष्णन द्वारा संरक्षण-विज्ञान में भावनात्मक एवं दार्शनिक आधारों का विश्लेषण।
8. संतुलित निष्कर्ष: ‘सह-अस्तित्व मॉडल’ जिसमें सामुदायिक अधिकार, वैज्ञानिक निगरानी (अनुकूली प्रबंधन) और स्थानीय सहमति (मुक्त, पूर्व और सूचित सहमति) का समन्वय हो। यह स्पष्ट करें कि पूर्णतः हस्तक्षेप-रहित मॉडल सभी प्रजातियों और सभी क्षेत्रों में व्यवहार्य नहीं है, जबकि अत्यधिक सक्रिय प्रबंधन स्थानीय जीवनयापन और न्याय के प्रश्न उठाता है।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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