17 Oct आरबीआई द्वारा 91, 182 और 364 दिनीय ट्रेजरी बिलों की नीलामी: प्रमुख तथ्य

✎ ट्रेज़री बिल एक वर्ष से कम अवधि के शून्य-कूपन सरकारी प्रतिभूति हैं, जो बट्टे पर जारी होकर अंकित मूल्य पर परिपक्व होते हैं और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ई-कुबेर प्रणाली पर मूल्य-आधारित नीलामी से बेचे जाते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था (सार्वजनिक वित्त, सरकारी ऋण प्रबंधन, मौद्रिक नीति और मुद्रा बाज़ार)
- Prelims: ट्रेज़री बिल (Treasury Bill) के तीन प्रकार: 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय, शून्य-कूपन प्रतिभूति (Zero-coupon Security) और बट्टे पर निर्गम (Issue at Discount), मूल्य-आधारित बहु-मूल्य नीलामी पद्धति (Multiple Price Auction Method), गैर-प्रतिस्पर्धी बोली (Non-competitive Bid) और खुदरा निवेशक की 5 प्रतिशत सीमा, ई-कुबेर (E-Kuber) — भारतीय रिज़र्व बैंक की कोर बैंकिंग प्रणाली, रिटेल डायरेक्ट पोर्टल (Retail Direct Portal) और सरकारी प्रतिभूति बाज़ार में खुदरा भागीदारी, लोक ऋण कार्यालय (Public Debt Office) की भूमिका, सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006 (Government Securities Act, 2006)
- Essay: अल्पकालिक सरकारी उधारी और राजकोषीय प्रबंधन: संतुलन की चुनौती, सार्वजनिक ऋण प्रबंधन में पारदर्शिता और बाज़ार-आधारित मूल्य निर्धारण की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: ट्रेज़री बिल एक वर्ष से कम अवधि के शून्य-कूपन सरकारी प्रतिभूति हैं, जो बट्टे पर जारी होकर अंकित मूल्य पर परिपक्व होते हैं और भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ई-कुबेर प्रणाली पर मूल्य-आधारित नीलामी से बेचे जाते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने 16 अक्टूबर 2026 को सरकार की ओर से 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेज़री बिल की नीलामी की घोषणा की है। इसमें कुल ₹23,000 करोड़ की अधिसूचित राशि है, जिसमें 91-दिवसीय और 182-दिवसीय बिलों के लिए ₹8,000-₹8,000 करोड़ तथा 364-दिवसीय बिल के लिए ₹7,000 करोड़ निर्धारित हैं। नीलामी 21 अक्टूबर 2026 (बुधवार) को होगी और भुगतान 22 अक्टूबर 2026 (गुरुवार) को किया जाएगा। यह नियमित प्रक्रिया सरकार की अल्पकालिक नकदी आवश्यकताओं के प्रबंधन और सार्वजनिक ऋण कार्यक्रम के सुचारु संचालन से जुड़ी है। इसके लिए राज्य सरकारें, विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश, पात्र भविष्य निधियाँ और विदेशी केंद्रीय बैंक भी गैर-प्रतिस्पर्धी आधार पर भाग ले सकते हैं।
पृष्ठभूमि
- ट्रेज़री बिल भारत सरकार की ओर से जारी किए जाते हैं और इनकी अवधि एक वर्ष तक होती है। ये मुद्रा बाज़ार के उपकरण हैं, जो सरकार की अल्पकालिक उधारी की आवश्यकताएँ पूरी करते हैं।
- भारत में ट्रेज़री बिल की नीलामी का संचालन भारतीय रिज़र्व बैंक करता है, क्योंकि रिज़र्व बैंक सरकार के बैंकर और ऋण-प्रबंधन एजेंट के रूप में कार्य करता है। यह भूमिका भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 से जुड़ी है।
- सार्वजनिक ऋण के विधिक ढाँचे में लोक ऋण अधिनियम, 1944 (Public Debt Act, 1944) और सरकारी प्रतिभूति अधिनियम, 2006 महत्त्वपूर्ण हैं। नीलामी की शर्तें वित्त मंत्रालय की सामान्य अधिसूचना के अनुसार होती हैं, जिसका उल्लेख प्रेस विज्ञप्ति में है।
- नीलामी की बिक्री प्रक्रिया ई-कुबेर प्रणाली पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से होती है। तकनीकी व्यवधान की स्थिति में ही भौतिक बोली की अनुमति दी जाती है, जो प्रशासनिक सुधार और डिजिटल भुगतान प्रणाली की ओर बढ़ते कदम को दर्शाता है।
- पहले खुदरा निवेशकों के लिए सीधी भागीदारी की सुविधा सीमित थी। रिटेल डायरेक्ट पोर्टल के माध्यम से व्यक्तिगत निवेशक सरकारी प्रतिभूतियों में सीधे निवेश कर सकते हैं, जिससे सरकारी प्रतिभूति बाज़ार में खुदरा भागीदारी को बढ़ावा मिला है।
ट्रेज़री बिल (Treasury Bill) क्या है?
- ट्रेज़री बिल भारत सरकार द्वारा अल्पकालिक ऋण लेने का एक साधन है, जिसकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है। वर्तमान नीलामी में 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय बिल शामिल हैं।
- ये शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ हैं, अर्थात् इन पर नियमित ब्याज नहीं दिया जाता। निवेशक इन्हें बट्टे पर खरीदता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य (Face Value) प्राप्त करता है। अंकित मूल्य और खरीद मूल्य का अंतर ही आय होती है।
- मूल्य-आधारित नीलामी में प्रत्येक सफल बोलीदाता अपनी बोली के अनुसार मूल्य चुकाता है। इसे बहु-मूल्य नीलामी (Multiple Price Method) कहा जाता है, जिसमें अलग-अलग बोलीदाता अलग-अलग मूल्य पर बिल प्राप्त कर सकते हैं।
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली में भाग लेने वाले निवेशक नीलामी में मूल्य निर्धारित नहीं करते, बल्कि औसत कट-ऑफ मूल्य पर बिल प्राप्त करते हैं। इस श्रेणी का आवंटन अधिसूचित राशि से बाहर होता है।
- खुदरा निवेशकों के लिए गैर-प्रतिस्पर्धी आवंटन अधिसूचित राशि के अधिकतम 5 प्रतिशत तक सीमित है। इससे छोटे निवेशकों को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश का अवसर मिलता है।
- ट्रेज़री बिल मुद्रा बाज़ार का सबसे सुरक्षित और तरल उपकरण माने जाते हैं, क्योंकि इनके पीछे भारत सरकार की संप्रभु गारंटी होती है। इसलिए बैंक, बीमा कंपनियाँ और म्यूचुअल फंड इन्हें अपने तरल परिसंपत्ति प्रबंधन में प्रयोग करते हैं।
- ट्रेज़री बिल सरकार की अल्पकालिक नकदी प्रबंधन और खुले बाज़ार की गतिविधियों का भी माध्यम हैं। मौद्रिक नीति के संदर्भ में इनका उपयोग तरलता प्रबंधन में होता है, परंतु यह कार्य रिज़र्व बैंक की नीतिगत व्यवस्था के अंतर्गत होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| अवधि और परिपक्वता | 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) अल्पकालिक सरकारी प्रतिभूतियाँ हैं, जिनकी परिपक्वता एक वर्ष से कम है। इनसे सरकार की अल्पकालिक नकदी आवश्यकता पूरी होती है। |
| जारीकर्ता और प्रबंधन | ये भारत सरकार की ओर से भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा नीलाम किए जाते हैं। RBI सरकार के ऋण प्रबंधन (Debt Management) का कार्य करता है। |
| नीलामी की पद्धति | यह नीलामी मूल्य-आधारित और बहु-मूल्य पद्धति (Multiple Price Method) में होती है। इसमें सफल बोलीदाता अपनी-अपनी बोली के मूल्य पर भुगतान करते हैं। |
| गैर-प्रतिस्पर्धी बोली | राज्य सरकारें, विधानमंडल वाले केंद्र शासित प्रदेश, पात्र भविष्य निधि, विदेशी केंद्रीय बैंक और खुदरा निवेशक गैर-प्रतिस्पर्धी आधार पर भाग ले सकते हैं। इस आवंटन की राशि अधिसूचित राशि से बाहर होती है। |
| खुदरा निवेशकों की सीमा | खुदरा निवेशकों का आवंटन अधिसूचित राशि के अधिकतम 5 प्रतिशत तक सीमित है। वे रिटेल डायरेक्ट पोर्टल (Retail Direct Portal) के माध्यम से बोली लगा सकते हैं। |
| भुगतान और निपटान | परिणाम नीलामी के दिन घोषित होते हैं और सफल बोलीदाताओं का भुगतान अगले दिन (T+1) होता है। बोलियाँ E-Kuber प्रणाली पर इलेक्ट्रॉनिक रूप से जमा की जाती हैं। |
महत्व
आर्थिक
- ट्रेजरी बिल सरकार को अल्पकालिक वित्तपोषण का स्रोत देते हैं, जिससे राजकोषीय प्रबंधन में नकदी का अंतराल कम होता है।
- मुद्रा बाजार (Money Market) में ये सबसे सुरक्षित साधनों में गिने जाते हैं, इसलिए इनकी प्रतिफल दर (Yield) को जोखिम-मुक्त दर के संदर्भ के रूप में देखा जाता है।
- ब्याज दरों की संरचना और प्रतिफल वक्र (Yield Curve) के अल्पकालिक भाग का संकेत इन नीलामियों से मिलता है।
मौद्रिक और तरलता प्रबंधन
- बैंकों के लिए ट्रेजरी बिल तरलता संचालन का एक सुरक्षित साधन हैं और बैंकिंग प्रणाली की अतिरिक्त तरलता को अवशोषित करने में सहायक होते हैं।
- RBI इन नीलामियों के माध्यम से मौद्रिक नीति के संचरण (Transmission) की दिशा को प्रभावित करता है।
संस्थागत और प्रशासनिक
- नीलामी की समय-सारणी, भुगतान तिथि और संपर्क तंत्र पहले से घोषित होने से बाज़ार में पारदर्शिता और पूर्वानुमेयता बनी रहती है।
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली की व्यवस्था छोटे और संस्थागत निवेशकों को सरकारी प्रतिभूति बाज़ार में सीधी पहुँच देती है।
चुनौतियाँ
1. तरलता और ब्याज दर का दबाव
- बड़ी मात्रा में ट्रेजरी बिल जारी होने से अल्पकालिक ब्याज दरों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है, जिससे निजी क्षेत्र की उधारी महँगी हो सकती है।
- बाज़ार की तरलता की स्थिति और मौद्रिक नीति के रुख के बीच तालमेल बनाए रखना आवश्यक होता है।
यूपीएससी लिंक: मौद्रिक नीति और ब्याज दर संचरण (GS-III: अर्थव्यवस्था)
2. राजकोषीय घाटे के प्रबंधन की चुनौती
- अल्पकालिक ऋण पर निर्भरता अधिक होने से ऋण का पुनर्भुगतान और ब्याज लागत का जोखिम बढ़ता है।
- राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को नियंत्रित रखते हुए सरकार को बाज़ार से ऋण लेने की संरचना संतुलित रखनी होती है।
यूपीएससी लिंक: राजकोषीय नीति, सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय उत्तरदायित्व (GS-III: अर्थव्यवस्था)
3. खुदरा निवेशकों की सीमित पहुँच
- खुदरा भागीदारी को अधिसूचित राशि के 5 प्रतिशत तक सीमित रखा गया है, जिससे व्यक्तिगत निवेशकों की भागीदारी सीमित रहती है।
- डिजिटल पोर्टल पर पहुँच, वित्तीय साक्षरता और जानकारी का अभाव सरकारी प्रतिभूति बाज़ार में व्यापक भागीदारी में बाधा बनता है।
यूपीएससी लिंक: वित्तीय समावेशन और पूँजी बाज़ार (GS-III: अर्थव्यवस्था)
4. प्रणालीगत परिचालन जोखिम
- E-Kuber प्रणाली में तकनीकी विफलता की स्थिति में ही भौतिक बोली स्वीकार की जाती है, जिससे नीलामी की सुचारुता पर परिचालन जोखिम बना रहता है।
- समय-सीमित बोली विंडो और भुगतान की एक दिन की अवधि में चूक होने पर निपटान में व्यवधान आ सकता है।
यूपीएससी लिंक: वित्तीय बाज़ार का बुनियादी ढाँचा और साइबर सुरक्षा (GS-III: आंतरिक सुरक्षा और प्रौद्योगिकी)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| ब्याज दर का दबाव | बड़ी नीलामी से अल्पकालिक दरें बढ़ सकती हैं और निजी उधारी महँगी हो सकती है। |
| राजकोषीय जोखिम | अल्पकालिक ऋण पर निर्भरता से पुनर्भुगतान और ब्याज लागत का दबाव बढ़ता है। |
| खुदरा भागीदारी की सीमा | 5 प्रतिशत की सीमा और जागरूकता की कमी से व्यक्तिगत निवेशकों की पहुँच सीमित रहती है। |
| परिचालन विफलता | प्रणाली की तकनीकी विफलता या समय-सीमा चूक से नीलामी और निपटान बाधित हो सकते हैं। |
| बाज़ार की गहराई | सीमित प्रतिभागी आधार से प्रतिफल पर अस्थिरता और मूल्य-खोज की कुशलता प्रभावित हो सकती है। |
आगे की राह
- अल्पकालिक ऋण और दीर्घकालिक ऋण के बीच संतुलन बनाकर सरकार ऋण की परिपक्वता संरचना को व्यवस्थित रखे।
- नीलामी कैलेंडर की नियमित और पूर्व-घोषित प्रकृति बनाए रखी जाए, ताकि बाज़ार की अपेक्षाएँ स्थिर रहें।
- मौद्रिक नीति और सरकारी ऋण प्रबंधन के बीच समन्वय को संस्थागत रूप से मजबूत किया जाए।
- खुदरा निवेशकों के लिए वित्तीय साक्षरता अभियान और डिजिटल पहुँच को बढ़ाया जाए।
- E-Kuber जैसी भुगतान और निपटान प्रणालियों में साइबर सुरक्षा और बैकअप व्यवस्था को सुदृढ़ किया जाए।
- गैर-प्रतिस्पर्धी बोली की भागीदारी का विस्तार करते हुए संस्थागत और छोटे निवेशकों की पहुँच को व्यापक बनाया जाए।
- राजकोषीय उत्तरदायित्व के लक्ष्यों के साथ ऋण संग्रहण की योजना को जोड़कर सार्वजनिक ऋण का स्थायित्व सुनिश्चित किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
ट्रेजरी बिल · सरकारी प्रतिभूतियाँ · मौद्रिक नीति · राजकोषीय घाटा · भारतीय रिज़र्व बैंक · खुले बाज़ार परिचालन · मुद्रा बाज़ार · सरकारी ऋण प्रबंधन · गैर-प्रतिस्पर्धी बोली · मुद्रास्फीति नियंत्रण
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 292: केंद्र सरकार की उधारी की सीमा संसद द्वारा तय होती है।
- अनुच्छेद 293: राज्यों की उधारी और भारत सरकार की गारंटी का नियम।
अवधारणा प्रवाह
सरकार की अल्पकालिक नकदी आवश्यकता उत्पन्न होती है। → RBI सरकार की ओर से 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेजरी बिल की नीलामी की घोषणा करता है। → प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी बोलियाँ E-Kuber प्रणाली पर निश्चित समय-सीमा में जमा होती हैं। → मूल्य-आधारित बहु-मूल्य पद्धति से आवंटन तय होता है और परिणाम उसी दिन घोषित होते हैं। → सफल बोलीदाता अगले दिन भुगतान करते हैं और सरकार को धन प्राप्त होता है। → इस धन से सरकार की अल्पकालिक ऋण आवश्यकता पूरी होती है और मुद्रा बाजार की तरलता तथा प्रतिफल दरों पर प्रभाव पड़ता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं।
2. ट्रेजरी बिल केवल 91-दिन, 182-दिन और 364-दिन की परिपक्वता अवधि में उपलब्ध होते हैं।
3. राज्य सरकारें और केंद्र शासित प्रदेश ट्रेजरी बिल की नीलामी में गैर-प्रतिस्पर्धी आधार पर भाग ले सकते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। ट्रेजरी बिल (Treasury Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है। कथन 2 गलत है। ट्रेजरी बिल 91-दिन, 182-दिन और 364-दिन की परिपक्वता अवधि में जारी किए जाते हैं, लेकिन इन्हें ‘केवल’ इन्हीं अवधियों तक सीमित करना गलत है क्योंकि भविष्य में अन्य अवधियाँ भी लाई जा सकती हैं। वर्तमान में ये तीन मुख्य अवधियाँ हैं। कथन 3 सही है। राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश, पात्र भविष्य निधि और निर्दिष्ट विदेशी केंद्रीय बैंक गैर-प्रतिस्पर्धी आधार पर ट्रेजरी बिल की नीलामी में भाग ले सकते हैं।
Q2. ट्रेजरी बिलों की नीलामी के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- ट्रेजरी बिलों की नीलामी केवल प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive Bidding) के माध्यम से की जाती है।
- व्यक्तिगत निवेशक (Retail Investors) ट्रेजरी बिलों की नीलामी में भाग नहीं ले सकते हैं।
- भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत सरकार की ओर से ट्रेजरी बिलों की नीलामी करता है।
- ट्रेजरी बिलों पर ब्याज का भुगतान परिपक्वता पर किया जाता है।
उत्तर: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत सरकार की ओर से ट्रेजरी बिलों की नीलामी करता है। — विकल्प C सही है। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) भारत सरकार के ऋण प्रबंधक के रूप में ट्रेजरी बिलों और अन्य सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी करता है। विकल्प A गलत है क्योंकि नीलामी प्रतिस्पर्धी और गैर-प्रतिस्पर्धी दोनों आधारों पर होती है। विकल्प B गलत है क्योंकि व्यक्तिगत निवेशक भी ‘रिटेल डायरेक्ट पोर्टल’ के माध्यम से गैर-प्रतिस्पर्धी आधार पर भाग ले सकते हैं। विकल्प D गलत है क्योंकि ट्रेजरी बिल ‘शून्य-कूपन बांड’ होते हैं, जो छूट पर जारी किए जाते हैं और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाए जाते हैं, उन पर सीधे ब्याज का भुगतान नहीं किया जाता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ट्रेजरी बिल क्या हैं और भारत सरकार के राजकोषीय प्रबंधन में इनकी क्या भूमिका है? भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा ट्रेजरी बिलों की नीलामी के माध्यम से मौद्रिक नीति के संचालन में यह कैसे सहायक होते हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: परिचय में ट्रेजरी बिलों को परिभाषित करें और उनकी विशेषताओं (अल्पकालिक, शून्य-कूपन) का उल्लेख करें। मुख्य भाग में, भारत सरकार के राजकोषीय प्रबंधन में उनकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा करें, जिसमें अल्पकालिक धन जुटाना, नकदी प्रवाह का प्रबंधन और ऋण प्रबंधन शामिल हो। दूसरे भाग में, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा ट्रेजरी बिलों की नीलामी के माध्यम से मौद्रिक नीति के संचालन में उनकी सहायता पर प्रकाश डालें। इसमें खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO), तरलता प्रबंधन (Liquidity Management) और ब्याज दरों को प्रभावित करने की क्षमता शामिल होनी चाहिए। निष्कर्ष में, ट्रेजरी बिलों के महत्व को संक्षेप में प्रस्तुत करें।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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