भारत क्यों शामिल करे ‘ग्लोबल कार्बन कोएलिशन’ में? जानिए पूरी रणनीति

भारत क्यों शामिल करे 'ग्लोबल कार्बन कोएलिशन' में? जानिए पूरी रणनीति

भारत क्यों शामिल करे ‘ग्लोबल कार्बन कोएलिशन’ में? जानिए पूरी रणनीति

भारत बनाम वैश्विक कार्बन बाज़ार गठबंधनभारत (CCTS)वैश्विक कार्बन बाज़ार गठबंधन (OCCCउद्देश्यराष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट व्यापारअनुपालन कार्बन बाज़ारों में समन्वयस्थापना2022 (ऊर्जा संरक्षण अधिनियम संशोधन)मई 2024 (फ्लोरेंस में)पहला चरणअनुपालन रिपोर्ट (31 जुलाई)कार्य-योजना (14 सितंबर, वुहान)सदस्यलगभग 500 कंपनियाँ (7 क्षेत्र)यूरोपीय संघ, चीन, ब्राज़ील + 8 अन्यनियम-निर्माण में भूमिकानहीं (बाहर)हाँ (MRV, लेखा-पद्धति, ऑफसेट नियम)कार्बन क्रेडिट जारीअक्टूबर 2024अनुपलब्ध
भारत बनाम वैश्विक कार्बन बाज़ार गठबंधन

✎ भारत की CCTS (कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना) अनुपालन कार्बन बाज़ार है, जबकि OCCCM जैसे गठबंधन में नियम-निर्माण की भागीदारी ही भारत के वैश्विक जलवायु-शासन में प्रभाव को तय करेगी।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — अंतरराष्ट्रीय संबंध (पेरिस समझौता, बहुपक्षीय पर्यावरण सहयोग, वैश्विक शासन)  |  GS Paper III — अर्थव्यवस्था (कार्बन मूल्य निर्धारण, राजकोषीय संसाधन, पर्यावरण और सतत विकास)  |  GS Paper III — पर्यावरण (जलवायु परिवर्तन शमन, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान, शुद्ध-शून्य लक्ष्य)
  • Prelims: कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) और ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (संशोधन 2022), ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) की भूमिका, अनुपालन बाज़ार बनाम स्वैच्छिक बाज़ार, कार्बन मूल्य निर्धारण: कार्बन कर और उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS) में अंतर, पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6 (सहकारी दृष्टिकोण और तंत्र), प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (PAT) योजना, राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) और 2070 का शुद्ध-शून्य लक्ष्य, ओपन कोएलिशन ऑन कम्प्लायंस कार्बन मार्केट्स (OCCCM) के सदस्य और उसका उद्देश्य
  • Essay: वैश्विक जलवायु शासन में नियम-निर्माण के लिए भागीदारी क्यों आवश्यक है: भारत के लिए अवसर और जोखिम, कार्बन मूल्य निर्धारण: विकासशील देशों के लिए शमन लागत, राजस्व और न्यायसंगत संक्रमण का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत की CCTS (कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना) अनुपालन कार्बन बाज़ार है, जबकि OCCCM जैसे गठबंधन में नियम-निर्माण की भागीदारी ही भारत के वैश्विक जलवायु-शासन में प्रभाव को तय करेगी।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत की राष्ट्रीय कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) अब व्यवहार में आ गई है, जिसके अंतर्गत सात औद्योगिक क्षेत्रों की लगभग 500 कंपनियों ने 31 जुलाई को अपनी पहली अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की। इसी बीच यूरोपीय संघ, चीन और ब्राज़ील ने मई में फ्लोरेंस में ओपन कोएलिशन ऑन कम्प्लायंस कार्बन मार्केट्स (OCCCM) की स्थापना की, जिसका उद्देश्य अनुपालन कार्बन बाज़ारों की संरचना और संवाद के तरीके में समन्वय लाना है। जर्मनी और न्यूज़ीलैंड पहले नए सदस्य बने, और बाद में कनाडा, फ्रांस, नॉर्वे, सिंगापुर, तुर्किये और यूनाइटेड किंगडम भी जुड़े। 14 सितंबर को वुहान में गठबंधन ने अपनी पहली कार्य-योजना अपनाई, जबकि भारत अब तक इससे बाहर है। इसलिए विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या भारत ऐसे मंच से बाहर रह सकता है जहाँ कार्बन बाज़ार से जुड़े नियम तय हो रहे हैं।

पृष्ठभूमि

  • पेरिस समझौता (2015) के अंतर्गत हर देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान प्रस्तुत करता है। भारत ने 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
  • भारत की CCTS को ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में 2022 के संशोधन से वैधानिक आधार मिला, और इसके पूर्ववर्ती प्रदर्शन, उपलब्धि और व्यापार (PAT) योजना के अनुभव पर यह आधारित है।
  • CCTS का पहला चरण चल रहा है, जिसमें बाध्यकारी लक्ष्य, दंड और वास्तविक इकाइयाँ शामिल हैं। कार्बन क्रेडिट जारी होने की प्रक्रिया अक्टूबर में शुरू होनी है और ऊर्जा विनिमय (power exchanges) पर व्यापार नवंबर से जनवरी के बीच अपेक्षित है।
  • विश्व स्तर पर 50 से अधिक देशों ने किसी न किसी रूप में कार्बन मूल्य निर्धारण लागू किया है, जिससे विभिन्न घरेलू प्रणालियों के बीच संपर्क और संबंध (linkage) की संभावना बढ़ रही है।
  • OCCCM का गठन यूरोपीय संघ, चीन और ब्राज़ील की पहल से हुआ है और इसका ध्यान MRV प्रणालियों, कार्बन लेखा-पद्धतियों और उच्च-गुणवत्ता वाले ऑफसेट के उपयोग से जुड़े नियमों पर है।

कार्बन बाज़ार क्या है?

  • कार्बन बाज़ार वह व्यवस्था है जिसमें ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को आर्थिक मूल्य देकर उसके कम करने को प्रोत्साहित किया जाता है। आमतौर पर एक टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO2e) को एक इकाई माना जाता है।
  • अनुपालन (compliance) कार्बन बाज़ार में सरकार द्वारा उत्सर्जन की बाध्यकारी सीमा तय होती है और उसका पालन न करने पर दंड लगता है। स्वैच्छिक बाज़ार में भाग लेना कंपनियों की इच्छा पर निर्भर होता है।
  • कार्बन मूल्य निर्धारण के दो मुख्य रूप हैं: कार्बन कर, जिसमें उत्सर्जन पर सीधे शुल्क तय होता है, और उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETS), जिसमें उत्सर्जन सीमा और उसके व्यापार पर आधारित मूल्य तय होता है।
  • भारत की CCTS में ऊर्जा-गहन क्षेत्रों के लिए लक्ष्य तय किए जाते हैं और लक्ष्य से अधिक या कम उत्सर्जन के आधार पर कार्बन क्रेडिट जारी या व्यापारित होते हैं। इसके नियमन और क्रियान्वयन में ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) की केंद्रीय भूमिका है।
  • पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के अंतर्गत देश आपसी सहयोग से उत्सर्जन में कमी के परिणामों का हस्तांतरण कर सकते हैं (अनुच्छेद 6.2) और एक केंद्रीय तंत्र भी स्थापित किया गया है (अनुच्छेद 6.4)।
  • OCCCM जैसे गठबंधन का उद्देश्य अलग-अलग अनुपालन बाज़ारों के बीच तकनीकी मानकों और नियमों का सामंजस्य बनाना है, ताकि भविष्य में बाज़ारों को आपस में जोड़ना सरल हो।
  • कार्बन मूल्य निर्धारण से सरकार को राजस्व मिल सकता है, जिसका उपयोग जलवायु-संबंधी आपदाओं से निपटने या संक्रमण के लिए किया जा सकता है। इसलिए यह राजकोषीय दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
अनुपालन कार्बन बाजार (Compliance Carbon Market) की स्थापना भारत ने कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (Carbon Credit Trading Scheme – CCTS) के माध्यम से बाध्यकारी लक्ष्य, दंड और वास्तविक इकाइयों वाला बाजार शुरू किया है। कागज़ पर यह 2023 से मौजूद था, अब यह क्रियाशील है।
पहला अनुपालन चक्र लगभग 500 भारतीय कंपनियों ने सात औद्योगिक क्षेत्रों से 31 जुलाई को पहली बार अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की। इससे योजना का व्यावहारिक ढाँचा सामने आया।
आगामी चरण अक्टूबर में कार्बन क्रेडिट जारी होने हैं और नवंबर से जनवरी के बीच विद्युत विनिमय (Power Exchange) पर व्यापार की अपेक्षा है।
ओपन कोएलिशन ऑन कम्प्लायंस कार्बन मार्केट्स (Open Coalition on Compliance Carbon Markets – OCCCM) मई में यूरोपीय संघ, चीन और ब्राज़ील ने फ्लोरेंस में इसे शुरू किया। इसका उद्देश्य अनुपालन कार्बन बाजारों के आपसी संवाद और नियमों में समन्वय है। इसमें जर्मनी, न्यूज़ीलैंड, कनाडा, फ्रांस, नॉर्वे, सिंगापुर, तुर्किये और यूनाइटेड किंगडम भी जुड़ चुके हैं।
कार्ययोजना (Work Plan) गठबंधन ने 14 सितंबर को वुहान बैठक में अपनी पहली कार्ययोजना अपनाई। भारत अभी इसका सदस्य नहीं है।
मुख्य विषय-क्षेत्र एमआरवी (निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन – MRV) प्रणालियाँ, कार्बन लेखांकन पद्धतियाँ तथा उच्च गुणवत्ता वाले ऑफसेट के उपयोग से जुड़े नियम इसके प्रमुख विषय हैं।

महत्व

आर्थिक (Economic)

  • कार्बन मूल्य निर्धारण को शमन की अर्थव्यवस्था-व्यापी लागत घटाने वाला उपकरण माना जाता है, जो विकासशील दक्षिण (Global South) के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है।
  • कार्बन मूल्य से राजकोषीय राजस्व प्राप्त हो सकता है, जो ऐसे समय में महत्त्वपूर्ण है जब जलवायु परिवर्तन से जुड़े खर्च बढ़ रहे हैं, जैसे लू और बाढ़ से निपटना।
  • भारत का बाजार सक्रिय होने से कार्बन क्रेडिट और विद्युत विनिमय पर व्यापार का नया वित्तीय क्षेत्र विकसित होता है।

कूटनीतिक एवं रणनीतिक (Diplomatic and Strategic)

  • नियम-निर्माण की प्रक्रिया में भागीदारी से भारत के हितों, जैसे कार्बन लेखांकन और ऑफसेट की शर्तों, पर प्रभाव डालने का अवसर मिलता है।
  • बाहर रहने से भारतीय निर्यातकों के लिए विदेशी कार्बन बाजारों के मानकों के साथ तालमेल की चुनौती बढ़ सकती है।
  • आने वाले समय में कई घरेलू कार्बन मूल्य प्रणालियाँ आंशिक रूप से आपस में जुड़ सकती हैं, इसलिए समन्वय की भूमिका बढ़ेगी।

पर्यावरणीय एवं नीतिगत (Environmental and Policy)

  • CCTS को भारत के राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution – NDC) लक्ष्यों और 2070 के शुद्ध-शून्य (Net-Zero) लक्ष्य से जोड़ा गया है।
  • पेरिस समझौते के अंतर्गत बाजार-आधारित तंत्र की चर्चा का सीधा संबंध घरेलू कार्बन बाजार के अंतरराष्ट्रीय संरेखण से है।

चुनौतियाँ

1. नियम-निर्माण से बाहर रहने का जोखिम

  • गठबंधन के नियम भारत की बाजार-संरचना पर असर डाल सकते हैं, पर बाहर रहने से भारत की आवाज़ सीमित रहती है।
  • सदस्यता के बिना भारत मानकों को प्रभावित करने के बजाय केवल उन्हें अपनाने की स्थिति में रह सकता है।

2. एमआरवी और कार्बन लेखांकन की विश्वसनीयता

  • निगरानी, रिपोर्टिंग और सत्यापन की गुणवत्ता पर ही कार्बन क्रेडिट की साख टिकी होती है।
  • अलग-अलग देशों की पद्धतियों में अंतर होने पर क्रेडिट की तुलनीयता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है।

3. उच्च गुणवत्ता वाले ऑफसेट का प्रश्न

  • ऑफसेट की वास्तविकता, अतिरिक्तता और स्थायित्व सुनिश्चित करना कठिन कार्य है।
  • कमज़ोर ऑफसेट नियम उत्सर्जन में वास्तविक कमी के बजाय केवल कागज़ी समायोजन को बढ़ावा दे सकते हैं।

4. घरेलू उद्योगों पर लागत का दबाव

  • बाध्यकारी लक्ष्य और दंड से सात औद्योगिक क्षेत्रों की कंपनियों की अनुपालन लागत बढ़ती है।
  • छोटे उद्योगों के लिए क्षमता-निर्माण और संक्रमण सहायता का अभाव संतुलन को कठिन बना सकता है।

5. विकासशील देशों के हितों का संतुलन

  • कार्बन मूल्य निर्धारण से वंचित वर्गों पर प्रभाव न पड़े, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है।
  • न्यायसंगत जलवायु संक्रमण और साझा किंतु विभेदित उत्तरदायित्व के सिद्धांत के साथ तालमेल बिठाना चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संप्रभुता और नीति-स्वायत्तता बाहरी मानकों के अनुरूप ढलते समय घरेलू नीतिगत स्वतंत्रता पर दबाव आ सकता है।
एमआरवी की साख सत्यापन प्रणाली कमज़ोर हुई तो कार्बन क्रेडिट की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता घटेगी।
ऑफसेट की गुणवत्ता निम्न गुणवत्ता वाले ऑफसेट से वास्तविक उत्सर्जन कटौती का उद्देश्य कमज़ोर हो सकता है।
एमएसएमई पर बोझ छोटे उद्योगों के लिए अनुपालन लागत और तकनीकी क्षमता की कमी बड़ी बाधा बन सकती है।
राजस्व का उपयोग कार्बन मूल्य से प्राप्त राजस्व का पारदर्शी और उद्देश्यपरक उपयोग सुनिश्चित करना आवश्यक है।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (Carbon Credit Trading Scheme – CCTS)

आगे की राह

  • भारत को OCCCM में सदस्यता पर विचार करना चाहिए, ताकि अंतरराष्ट्रीय नियम-निर्माण में भागीदारी हो सके।
  • एमआरवी प्रणाली को राष्ट्रीय स्तर पर सुदृढ़ किया जाए और उसे अंतरराष्ट्रीय मानकों से तालमेल योग्य बनाया जाए।
  • कार्बन लेखांकन पद्धतियों को पारदर्शी बनाकर घरेलू और विदेशी क्रेडिट की तुलनीयता बढ़ाई जाए।
  • उच्च गुणवत्ता वाले ऑफसेट के लिए कठोर अतिरिक्तता और स्थायित्व मानदंड अपनाए जाएँ।
  • एमएसएमई के लिए क्षमता-निर्माण, तकनीकी सहायता और चरणबद्ध अनुपालन की व्यवस्था की जाए।
  • कार्बन मूल्य से प्राप्त राजस्व के उपयोग के लिए स्पष्ट और सार्वजनिक दिशानिर्देश तय किए जाएँ।
  • CCTS के परिणामों की नियमित समीक्षा करके नीतिगत समायोजन किए जाएँ।
  • विकासशील देशों के साथ साझा हितों पर आधारित कूटनीतिक समन्वय को आगे बढ़ाया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अनुपालन कार्बन बाज़ार (Compliance Carbon Market) · कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (Carbon Credit Trading Scheme – CCTS) · कार्बन मूल्य निर्धारण (Carbon Pricing) · राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (Nationally Determined Contribution – NDC) · नेट-ज़ीरो लक्ष्य (Net-Zero Target) · मापन, प्रतिवेदन एवं सत्यापन (Monitoring, Reporting and Verification – MRV) · पेरिस समझौता, अनुच्छेद 6 (Paris Agreement, Article 6) · ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 (Energy Conservation Act, 2001) · उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (Emission Trading System) · उच्च-गुणवत्ता कार्बन ऑफसेट (High-Integrity Carbon Offsets) · सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व (Common but Differentiated Responsibilities) · वैश्विक दक्षिण (Global South)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51: अंतरराष्ट्रीय संधि दायित्वों का सम्मान
  • अनुच्छेद 253: संधि दायित्वों को लागू करने हेतु कानून
  • अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण का राज्य का दायित्व
  • अनुच्छेद 51A(g): पर्यावरण संरक्षण का मौलिक कर्तव्य

अवधारणा प्रवाह

पेरिस समझौते और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) से भारत के उत्सर्जन-कटौती लक्ष्य तय होते हैं।  →  इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) के अंतर्गत बाध्यकारी लक्ष्य और दंड लागू किए गए।  →  सात औद्योगिक क्षेत्रों की लगभग 500 कंपनियों ने पहली अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की।  →  अक्टूबर में कार्बन क्रेडिट जारी होंगे और नवंबर से जनवरी के बीच विद्युत विनिमय पर व्यापार होगा।  →  विश्व के प्रमुख कार्बन बाजारों के समन्वय हेतु OCCCM बना, जो एमआरवी और ऑफसेट के नियमों पर कार्य कर रहा है।  →  इन नियमों से बाहर रहने पर भारत की नियम-निर्माण में भागीदारी सीमित होने का जोखिम बनता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत में कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) का विधिक आधार ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2001 में वर्ष 2022 में किए गए संशोधन से जुड़ा है।
2. ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) इस योजना के नोडल संस्थान के रूप में कार्य करता है।
3. CCTS के अंतर्गत कार्बन क्रेडिट प्रमाण-पत्रों का व्यापार केवल सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों तक सीमित है।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 ने कार्बन बाज़ार के लिए विधिक आधार प्रदान किया। कथन 2 सही है: BEE इस योजना का नोडल संस्थान है। कथन 3 गलत है, क्योंकि पात्र संस्थाएँ व्यापार में भाग ले सकती हैं और ऊर्जा विनिमय (power exchanges) के माध्यम से व्यापार अपेक्षित है, यह स्वामित्व पर आधारित नहीं है।

Q2. कथन (A): ओपन कोएलिशन ऑन कम्प्लायंस कार्बन मार्केट्स (OCCCM) एक ऐसा बाध्यकारी मंच है जो अपने सदस्य देशों पर उत्सर्जन लक्ष्य थोपता है।
कारण (R): OCCCM का उद्देश्य अनुपालन कार्बन बाज़ारों की मापन, प्रतिवेदन एवं सत्यापन (MRV) पद्धतियों और कार्बन लेखांकन नियमों में समन्वय को बढ़ावा देना है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, किंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) गलत है, किंतु (R) सही है। — कथन (A) गलत है, क्योंकि OCCCM एक सहयोगात्मक पहल है जो विचार-विमर्श और तकनीकी समन्वय के लिए बनी है, इसमें बाध्यकारी उत्सर्जन लक्ष्य नहीं हैं। कथन (R) सही है, क्योंकि इसके कार्य-क्षेत्र में MRV प्रणालियाँ, कार्बन लेखांकन पद्धतियाँ और उच्च-गुणवत्ता ऑफसेट से जुड़े नियम शामिल हैं।

Q3. निम्नलिखित सूचियों को सुमेलित कीजिए:

सूची-I (व्यवस्था/प्रावधान)
1. स्वच्छ विकास व्यवस्था (CDM)
2. पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6
3. यूरोपीय संघ उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (EU ETS)
4. कार्बन कर

सूची-II (विशेषता)
A. प्रति टन उत्सर्जन पर एक निश्चित मूल्य
B. उत्सर्जन भत्तों की सीमा तय कर उनका व्यापार (cap-and-trade)
C. क्योटो प्रोटोकॉल के अंतर्गत परियोजना-आधारित कार्बन क्रेडिट तंत्र
D. अंतरराष्ट्रीय रूप से हस्तांतरित शमन परिणामों के लिए सहकारी दृष्टिकोण

नीचे दिए गए कूटों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. 1-C, 2-D, 3-B, 4-A
  2. 1-A, 2-C, 3-B, 4-D
  3. 1-C, 2-B, 3-D, 4-A
  4. 1-B, 2-D, 3-A, 4-C

उत्तर: 1-C, 2-D, 3-B, 4-A — स्वच्छ विकास व्यवस्था (CDM) क्योटो प्रोटोकॉल की परियोजना-आधारित व्यवस्था है (1-C)। पेरिस समझौते का अनुच्छेद 6 सहकारी दृष्टिकोणों से संबंधित है (2-D)। EU ETS एक ‘कैप-एंड-ट्रेड’ प्रणाली है (3-B)। कार्बन कर प्रति टन निश्चित मूल्य पर आधारित है (4-A)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत ने वर्ष 2023 में अधिसूचित कार्बन क्रेडिट व्यापार योजना (CCTS) के माध्यम से अपना अनुपालन कार्बन बाज़ार आरंभ कर दिया है, फिर भी वह ओपन कोएलिशन ऑन कम्प्लायंस कार्बन मार्केट्स (OCCCM) से बाहर है। भारत के लिए इस मंच से जुड़ने के तर्कों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि यदि भारत इससे जुड़ता है तो उसे किन सुरक्षोपायों की आवश्यकता होगी और बाहर रहने की लागत क्या हो सकती है। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर-कंकाल (Model-Answer Skeleton):

1. भूमिका: भारत का CCTS ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 पर आधारित है और इसे राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (NDC) तथा 2070 के नेट-ज़ीरो लक्ष्य (COP26, ग्लासगो, 2021 में घोषित) से जोड़ा गया है। 31 जुलाई को लगभग 500 कंपनियों द्वारा पहली बार अनुपालन प्रतिवेदन दाखिल किए जाने का उल्लेख करें। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या अब नियम-निर्माण की प्रक्रिया में शामिल होना आवश्यक है।

2. OCCCM का परिचय: मई में यूरोपीय संघ, चीन और ब्राज़ील द्वारा फ्लोरेंस में आरंभ; जर्मनी और न्यूज़ीलैंड पहले नए सदस्य; कनाडा, फ्रांस, नॉर्वे, सिंगापुर, तुर्की और यूनाइटेड किंगडम का बाद में जुड़ना; 14 सितंबर को वुहान बैठक में पहली कार्य-योजना। यह बाध्यकारी संधि नहीं, सहयोगात्मक मंच है।

3. जुड़ने के तर्क: (क) कार्बन मूल्य निर्धारण से शमन की अर्थव्यवस्था-व्यापी लागत घटती है, जो वैश्विक दक्षिण के लिए महत्त्वपूर्ण है; (ख) राजस्व सृजन से राजकोषीय संसाधनों को सहारा मिलता है, विशेषकर जलवायु-जनित आपदाओं के दौर में; (ग) MRV और कार्बन लेखांकन पद्धतियों पर प्रभाव से भारतीय क्रेडिट की अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता बढ़ती है; (घ) भविष्य में बाज़ारों के आपसी संबंध (linkage) से बाहर रहने पर पहुँच सीमित हो सकती है। 50 से अधिक देशों में कार्बन मूल्य निर्धारण व्यवस्थाएँ लागू होने का तथ्य जोड़ें।

4. सावधानी के पक्ष: (क) संप्रभुता और नियम-पालन (rule-taker) बनने का जोखिम; (ख) सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व तथा संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) का सिद्धांत, विकसित देशों की जलवायु वित्त प्रतिबद्धताएँ; (ग) छोटे और मध्यम उद्यमों पर अनुपालन का बोझ; (घ) उच्च-गुणवत्ता ऑफसेट की साख और दोहरी गणना का जोखिम; (ङ) कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (CBAM) जैसे एकतरफ़ा व्यापार उपायों के बीच भारत के हितों की रक्षा।

5. सुरक्षोपाय: पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के अनुरूप पारदर्शिता, उचित MRV मानक, घरेलू नीति-स्वायत्तता बनाए रखना, CCTS के मूल्य-संकेतों को स्थिर रखना, तथा तकनीकी कार्य-समूहों में भागीदारी को चरणबद्ध रखना।

6. बाहर रहने की लागत: नियम-लेखन में प्रतिनिधित्व का अभाव, कार्बन क्रेडिट के अंतरराष्ट्रीय बाज़ार तक सीमित पहुँच, और निर्यातकों पर सीमा-समायोजन जैसे उपायों का प्रभाव।

7. संतुलित निष्कर्ष: पूर्ण सदस्यता से पहले तकनीकी संवाद और पर्यवेक्षक-स्तर की भागीदारी द्वारा नीतिगत विकल्प खुले रखते हुए, घरेलू CCTS की विश्वसनीयता को प्राथमिकता देना तर्कसंगत मार्ग प्रतीत होता है। अंत में राष्ट्रीय संप्रभुता और सामान्य किंतु विभेदित उत्तरदायित्व के बीच संतुलन पर टिप्पणी करें।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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