असम के राज्यपाल ने प्रधानमंत्री से की मुलाकात: जानिए मुख्य कारण

असम के राज्यपाल ने प्रधानमंत्री से की मुलाकात: जानिए मुख्य कारण

असम के राज्यपाल ने प्रधानमंत्री से की मुलाकात: जानिए मुख्य कारण

✎ राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं (अनुच्छेद 155), वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है (अनुच्छेद 156) और सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है (अनुच्छेद 163)।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था (Polity): राज्यपाल की नियुक्ति, पद-अवधि, शक्तियाँ और संवैधानिक स्थिति  |  GS Paper II — शासन व्यवस्था (Governance): केंद्र-राज्य संबंध और संवैधानिक पदाधिकारियों की भूमिका
  • Prelims: अनुच्छेद 153 — प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल; एक ही व्यक्ति दो या अधिक राज्यों का राज्यपाल हो सकता है, अनुच्छेद 155 — राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर और मुहर सहित वारंट से, अनुच्छेद 156 — राज्यपाल पाँच वर्ष की अवधि तक पद पर रहता है और राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत (Pleasure of the President) पद धारण करता है, अनुच्छेद 163 — राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद; कुछ मामलों में विवेकाधिकार, अनुच्छेद 200 — राज्य विधानमंडल द्वारा पारित विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति, पुनर्विचार हेतु लौटाना या राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना, अनुच्छेद 161 — राज्यपाल द्वारा दंड के लघुकरण, क्षमा और प्रविलंबन की शक्ति, अनुच्छेद 213 — विधानमंडल के सत्र में न होने पर अध्यादेश जारी करने की राज्यपाल की शक्ति, छठी अनुसूची (Sixth Schedule) — असम सहित कुछ राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के स्वायत्त जिला परिषदों से संबंधित राज्यपाल की विशेष भूमिका, प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन भारतीय सूचना सेवा का पत्र-सूचना कार्यालय (PIB) द्वारा आधिकारिक विज्ञप्ति जारी करने की प्रक्रिया
  • Essay: संवैधानिक पदाधिकारी और संघीय ढाँचा: राज्यपाल की भूमिका कितनी औपचारिक और कितनी विवेकाधीन है?, सहकारी संघवाद के दौर में केंद्र और राज्य के बीच संवाद की संस्थागत व्यवस्था

त्वरित पुनरावृत्ति: राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख है, जिसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं (अनुच्छेद 155), वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है (अनुच्छेद 156) और सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है (अनुच्छेद 163)।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

असम के राज्यपाल श्री लक्ष्मण प्रसाद आचार्य ने 19 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की। प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस भेंट की जानकारी एक्स पर साझा की और पत्र सूचना कार्यालय (PIB) ने इसकी विज्ञप्ति जारी की। विज्ञप्ति में बातचीत के विषय का उल्लेख नहीं है, इसलिए इस भेंट को सामान्य संवैधानिक संपर्क के रूप में समझना उचित है। परीक्षा की दृष्टि से यह समाचार राज्यपाल के पद, राज्य और केंद्र के बीच संवाद के संस्थागत मार्गों तथा राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति को समझने का अवसर देता है।

पृष्ठभूमि

  • भारत में राज्यपाल का पद भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रावधानों से आगे बढ़ते हुए संविधान में अपनाया गया। संविधान सभा ने राज्यपाल को निर्वाचन के बजाय नियुक्ति के आधार पर चुनने का निर्णय लिया।
  • संविधान सभा में यह बहस हुई कि राज्यपाल केंद्र का प्रतिनिधि होगा या राज्य का संवैधानिक प्रमुख। संविधान ने उसे राज्य का संवैधानिक प्रमुख बनाया, पर उसकी नियुक्ति और पद-धारण केंद्र के प्रभाव में रखे गए।
  • सरकारिया आयोग (1988) ने राज्यपाल की नियुक्ति के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत सुझाए, जिनमें व्यक्ति का प्रतिष्ठित और सार्वजनिक जीवन में निष्पक्ष होना तथा नियुक्ति से पूर्व राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श करने जैसी बातें शामिल थीं।
  • पुंछी आयोग (2010) ने राज्यपाल की भूमिका, विधेयकों पर निर्णय की समय-सीमा और केंद्र-राज्य संबंधों पर विस्तृत सिफारिशें दीं।
  • एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) के निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की न्यायिक समीक्षा को स्वीकार किया, जिससे राज्यपाल की रिपोर्ट की भूमिका भी न्यायिक जाँच के दायरे में आई।

राज्यपाल का पद क्या है?

  • राज्यपाल राज्य का संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) होता है और राज्य की कार्यपालिका शक्ति उसी के नाम से प्रयुक्त होती है।
  • नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं, पर व्यवहार में यह केंद्रीय सरकार की सिफारिश पर होती है; राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद पर रहता है।
  • सामान्य नियम के अनुसार राज्यपाल का कार्यकाल पाँच वर्ष होता है, पर वह नए राज्यपाल की नियुक्ति तक पद पर बना रह सकता है।
  • राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है, किंतु संविधान में कुछ मामलों में उसे विवेकाधिकार प्राप्त है, जैसे मुख्यमंत्री की नियुक्ति में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति और विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना।
  • विधेयकों पर निर्णय (अनुच्छेद 200) और अध्यादेश जारी करना (अनुच्छेद 213) राज्यपाल की विधायी भूमिका के प्रमुख उदाहरण हैं।
  • राज्य के विश्वविद्यालयों में अधिकांशतः राज्यपाल कुलाधिपति (Chancellor) के रूप में कार्य करता है, जो राज्य विधि के अंतर्गत निर्धारित होता है।
  • छठी अनुसूची वाले जनजातीय क्षेत्रों में राज्यपाल की कुछ विशेष शक्तियाँ होती हैं, इसलिए असम जैसे राज्य में यह भूमिका प्रशासनिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
समाचार का स्वरूप यह एक औपचारिक शिष्टाचार भेंट (Courtesy Meeting) की सूचना है। इसमें किसी नई नीति, योजना या विधेयक की घोषणा नहीं हुई है।
संवैधानिक पद असम के राज्यपाल राज्य के संवैधानिक प्रमुख हैं और केंद्र-राज्य संबंधों में संपर्क की एक औपचारिक कड़ी माने जाते हैं।
संचार माध्यम सूचना PIB की विज्ञप्ति और प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के आधिकारिक X हैंडल से जारी हुई। इससे सरकारी सूचना के प्रसार की प्रक्रिया स्पष्ट होती है।
भेंट का स्थान भेंट नई दिल्ली में हुई। यह दर्शाता है कि राज्यपाल और केंद्रीय नेतृत्व के बीच संवाद सामान्यतः राष्ट्रीय राजधानी में होता है।
सूचना का सीमित दायरा विज्ञप्ति में भेंट के विषयों का कोई विवरण नहीं दिया गया है। इसलिए इसे केवल तथ्यात्मक सूचना के रूप में समझना चाहिए, किसी निर्णय के रूप में नहीं।

महत्व

संवैधानिक और प्रशासनिक

  • राज्यपाल राज्य कार्यपालिका का प्रमुख होता है और राज्य के शासन में संवैधानिक व्यवस्था का केंद्र है। केंद्र से उसका संपर्क संघीय ढांचे के कार्यात्मक पक्ष को दर्शाता है।
  • राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक दायित्वों (जैसे विधेयकों पर सहमति, कुलपतियों की नियुक्ति में भूमिका आदि, राज्य के कानूनों के अनुसार) से जुड़ी होती है, और ऐसी भेंटों में इन विषयों पर संवाद सहज हो सकता है।

संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध

  • संघवाद (Federalism) में केंद्र और राज्य के बीच नियमित संवाद सहयोगी शासन की आधारशिला है।
  • अंतरराज्यीय परिषद (Inter-State Council) और नीति आयोग जैसे मंचों के साथ-साथ व्यक्तिगत स्तर की भेंटें भी संघीय सहयोग की अनौपचारिक परत बनाती हैं।

सूचना-पारदर्शिता

  • सरकारी विज्ञप्ति के माध्यम से जनता को संवैधानिक पदाधिकारियों की गतिविधियों की जानकारी मिलती है, जो लोक-उत्तरदायित्व का एक रूप है।

चुनौतियाँ

1. भेंट के विषयों की अस्पष्टता

  • विज्ञप्ति में बातचीत के विषय नहीं बताए गए। इससे यह पता नहीं चलता कि चर्चा किसी प्रशासनिक मुद्दे पर थी या केवल औपचारिक शिष्टाचार।
  • सार्वजनिक सूचना में स्पष्टता न हो तो आम नागरिक और शोधकर्ता तथ्य और अनुमान में अंतर नहीं कर पाते।

2. राज्यपाल की भूमिका का संतुलन

  • राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका निष्पक्ष और गैर-पक्षपाती होनी चाहिए। इसलिए उसके केंद्र और राज्य सरकार से संपर्क की सार्वजनिक धारणा पर सदैव ध्यान रखा जाता है।
  • सरकारिया आयोग (1988) ने राज्यपाल के चयन के लिए ऐसे व्यक्ति की सिफारिश की थी जो राज्य के बाहर का हो और सक्रिय राजनीति से दूर रहा हो। पुंछी आयोग (2010) ने भी राज्यपाल की भूमिका की समीक्षा में निष्पक्षता पर बल दिया।

3. संघीय सहयोग बनाम केंद्रीकरण की धारणा

  • केंद्र और राज्य के बीच बार-बार होने वाली उच्च-स्तरीय भेंटों को कभी-कभी केंद्रीकरण की प्रवृत्ति के रूप में देखा जाता है।
  • सहयोगी संघवाद के लिए यह आवश्यक है कि संवाद संस्थागत मंचों (जैसे अंतरराज्यीय परिषद) के माध्यम से हो, ताकि व्यक्तिगत संपर्क पर निर्भरता कम हो।

4. संवैधानिक पदों की गरिमा और सार्वजनिक विश्वास

  • संवैधानिक पदाधिकारियों की सार्वजनिक छवि तटस्थ बनी रहनी चाहिए, ताकि उनके निर्णयों पर राजनीतिक प्रभाव का संदेह न हो।
  • सामान्य शिष्टाचार भेंटें भी जनमत में अर्थ ग्रहण कर सकती हैं, इसलिए उनकी सूचना में संयम और स्पष्टता आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
विषयों की अस्पष्टता भेंट का उद्देश्य स्पष्ट न होने से सूचना की व्याख्या में भ्रम हो सकता है।
राज्यपाल की निष्पक्षता संवैधानिक पद की तटस्थ छवि बनाए रखना लगातार चुनौती है।
केंद्र-राज्य संवाद की संस्थागतता व्यक्तिगत भेंटों पर अधिक निर्भरता से संस्थागत मंचों की भूमिका कमज़ोर हो सकती है।
सार्वजनिक सूचना की गुणवत्ता केवल औपचारिक विज्ञप्ति से नागरिक को कार्रवाई योग्य जानकारी नहीं मिलती।
राज्यपाल की नियुक्ति और कार्यकाल नियुक्ति और पद-मुक्ति की प्रक्रिया पर समय-समय पर सुधार की मांग उठती रही है।

आगे की राह

  • केंद्र और राज्य के बीच संवाद को अंतरराज्यीय परिषद जैसे संस्थागत मंचों के माध्यम से नियमित और पारदर्शी बनाया जाए।
  • राज्यपाल की भेंटों की विज्ञप्ति में बैठक के सामान्य विषय (जैसे प्रशासनिक, संवैधानिक या औपचारिक) स्पष्ट रूप से बताए जाएं।
  • सरकारिया और पुंछी आयोग की राज्यपाल की भूमिका से संबंधित सिफारिशों पर समय-समय पर विचार और कार्यान्वयन का मूल्यांकन हो।
  • राज्यपाल की निष्पक्षता बनाए रखने के लिए आचार-संहिता और सार्वजनिक आचरण के स्पष्ट मानदंड अपनाए जाएं।
  • सहयोगी संघवाद के लिए राज्यों के संवैधानिक प्रमुखों और केंद्र के बीच नियमित समन्वय तंत्र विकसित किया जाए।
  • सूचना के अधिकार के तहत संवैधानिक पदाधिकारियों की सार्वजनिक गतिविधियों का रिकॉर्ड सुलभ रखा जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

राज्यपाल (Governor) · संवैधानिक प्रमुख (Constitutional Head) · केंद्र-राज्य संबंध (Centre-State Relations) · सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) · मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह (Aid and Advice of Council of Ministers) · विवेकाधिकार (Discretion) · सरकारिया आयोग (Sarkaria Commission) · एस.आर. बोम्मई वाद (S.R. Bommai Case) · न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) · अनुच्छेद 163 (Article 163) · अनुच्छेद 200 (Article 200) · राष्ट्रपति शासन (President’s Rule)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 153 — राज्य के राज्यपाल का पद और नियुक्ति का आधार
  • अनुच्छेद 156 — राज्यपाल का कार्यकाल (राष्ट्रपति की इच्छा तक)

अवधारणा प्रवाह

असम के राज्यपाल श्री लक्ष्मण प्रसाद आचार्य नई दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिलते हैं।  →  PIB की विज्ञप्ति और PMO के X हैंडल पर भेंट की सूचना जारी होती है।  →  सूचना सार्वजनिक होने से केंद्र और राज्य के संवैधानिक प्रमुखों के बीच संवाद की पारदर्शिता बढ़ती है।  →  संघीय ढांचे में ऐसा संवाद सहयोगी शासन की व्यापक व्यवस्था (जैसे अंतरराज्यीय परिषद) का अनौपचारिक पूरक बनता है।  →  संवैधानिक पद की निष्पक्षता और सार्वजनिक विश्वास सुदृढ़ होते हैं, बशर्ते संवाद के विषय स्पष्ट हों।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. राज्यपाल के पद के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त पद धारण करता है।
2. राज्यपाल के पद के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष निर्धारित है।
3. राज्यपाल किसी भी राज्य के विधानमंडल का सदस्य हो सकता है, परंतु उसे नियुक्ति के बाद अपना स्थान रिक्त करना होगा।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: अनुच्छेद 155 और 156 के अंतर्गत राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और वह उनके प्रसादपर्यन्त पद पर रहता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 157 के अनुसार राज्यपाल के लिए न्यूनतम आयु 35 वर्ष है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 158(1) के अनुसार राज्यपाल किसी भी विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा, और यदि वह ऐसा सदस्य है तो पद ग्रहण करने की तिथि से उसका स्थान रिक्त माना जाएगा।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): राज्यपाल किसी विधेयक को, यदि उसके विचार में वह उच्च न्यायालय की शक्तियों का ऐसा अल्पीकरण करता है जिससे उस उच्च न्यायालय की स्थिति संकटापन्न हो जाए, राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रख सकता है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 200 राज्यपाल को ऐसे विधेयकों को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित रखने की शक्ति देता है।

नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, परंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, परंतु R गलत है।
  4. A गलत है, परंतु R सही है।

उत्तर: A और R दोनों सही हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अनुच्छेद 200 के परंतुक के अनुसार राज्यपाल ऐसे विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित कर सकता है जो उच्च न्यायालय की शक्तियों का अल्पीकरण करता हो और उसकी स्थिति को संकटापन्न करता हो। अतः अभिकथन और कारण दोनों सही हैं, और कारण अभिकथन की सही व्याख्या करता है।

Q3. भारतीय संविधान के संदर्भ में, किसी राज्य की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक होता है जिन पर उस राज्य के विधानमंडल को विधि बनाने की शक्ति है। यह प्रावधान किस अनुच्छेद में है?

  1. अनुच्छेद 154
  2. अनुच्छेद 162
  3. अनुच्छेद 163
  4. अनुच्छेद 166

उत्तर: अनुच्छेद 162 — अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्य की कार्यपालिका शक्ति उन विषयों तक विस्तृत होगी जिन पर राज्य विधानमंडल को विधि बनाने की शक्ति है। अनुच्छेद 154 राज्यपाल की कार्यपालिका शक्ति से संबंधित है, अनुच्छेद 163 मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से, और अनुच्छेद 166 राज्य सरकार के कार्य संचालन से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ राज्यपाल को केंद्र और राज्य के बीच की कड़ी माना गया है, किंतु उसके विवेकाधिकार के क्षेत्र को लेकर संवैधानिक विवाद बार-बार उठे हैं। अनुच्छेद 153 से 163 के आलोक में राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए और विवेचना कीजिए कि उच्चतम न्यायालय के निर्णयों ने उसके विवेकाधिकार को किस सीमा तक परिभाषित किया है। साथ ही यह भी बताइए कि यदि राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के बिना विवेकाधिकार का प्रयोग करे, तो सहकारी संघवाद पर क्या प्रभाव पड़ता है। (15 Marks)

रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON:
(1) प्रस्तावना: राज्यपाल की नियुक्ति की सामान्य प्रक्रिया; नई दिल्ली में राज्यपाल और प्रधानमंत्री की भेंट जैसी नियमित औपचारिक मुलाकातें संस्थागत संवाद का हिस्सा हैं, जो अपने आप में किसी विवाद का संकेत नहीं देतीं। इस संदर्भ में राज्यपाल की भूमिका का संवैधानिक विश्लेषण आवश्यक है।
(2) संवैधानिक ढाँचा: अनुच्छेद 153 (प्रत्येक राज्य के लिए राज्यपाल; 7वाँ संशोधन, 1956 के बाद दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही राज्यपाल की व्यवस्था संभव); अनुच्छेद 154 (कार्यपालिका शक्ति); अनुच्छेद 155 (नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा, वारंट द्वारा); अनुच्छेद 156 (पाँच वर्ष की अवधि, राष्ट्रपति के प्रसादपर्यन्त); अनुच्छेद 157-158 (योग्यताएँ और अयोग्यताएँ); अनुच्छेद 161 (क्षमादान की शक्ति); अनुच्छेद 163 (मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह, विवेकाधीन कार्यों की सीमा); अनुच्छेद 167 (मुख्यमंत्री की सूचना देने का कर्तव्य); अनुच्छेद 200 और 201 (विधेयकों पर सहमति और आरक्षण); अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन की सिफारिश)।
(3) विवेकाधिकार का विश्लेषण: शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राज्यपाल सामान्यतः मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधा है; एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राज्यपाल की रिपोर्ट और राष्ट्रपति के निर्णय की न्यायिक समीक्षा तथा बहुमत परीक्षण (floor test) के सिद्धांत स्थापित हुए; नबाम रेबिया बनाम उपाध्यक्ष, अरुणाचल प्रदेश विधानसभा (2016) में कहा गया कि राज्यपाल अपने निजी विवेक से संवैधानिक ढाँचे से बाहर जाकर कार्य नहीं कर सकता।
(4) समितियों की सिफारिशें: सरकारिया आयोग (1988) — राज्यपाल राज्य से बाहर का, राजनीति से दूर रहा हुआ प्रतिष्ठित व्यक्ति हो; नियुक्ति से पूर्व मुख्यमंत्री से परामर्श। पुंछी आयोग (2010) — विधेयकों पर सहमति के लिए समय-सीमा तथा राज्यपाल की भूमिका पर सुधार। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2007) — राज्यपाल की नियुक्ति और पद-अवधि की सुरक्षा।
(5) विभिन्न मत: (क) राज्यपाल संवैधानिक प्रमुख है, जो मंत्रिपरिषद की सलाह से बँधा है — डॉ. भीमराव आंबेडकर का दृष्टिकोण कि राज्यपाल सामान्यतः नाममात्र का प्रमुख होगा; (ख) राज्यपाल केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में संघीय संतुलन बनाए रखने की भूमिका निभाता है; (ग) राज्यपाल की भूमिका को केवल निष्पक्ष संवैधानिक मध्यस्थ तक सीमित रखा जाना चाहिए।
(6) परिणाम का प्रश्न: मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना विवेकाधिकार के दुरुपयोग से संघीय विश्वास घटता है, विधायी प्रक्रिया में विलंब होता है और न्यायिक हस्तक्षेप बढ़ता है; इससे सहकारी संघवाद की भावना कमजोर होती है।
(7) निष्कर्ष: राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक मर्यादा, सरकारिया और पुंछी आयोग की सिफारिशों तथा न्यायिक सिद्धांतों के संतुलन पर निर्भर है; एक तर्कसंगत स्थिति यह है कि विवेकाधिकार का प्रयोग पारदर्शी, कारणयुक्त और न्यायिक समीक्षा-योग्य होना चाहिए।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)

Assam PCS (APSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: असम के राज्यपाल ने हाल ही में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर किन मुद्दों पर चर्चा की? (असम राज्य-पीसीएस दृष्टिकोण से)

  1. असम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के कार्यान्वयन की स्थिति
  2. असम-मिजोरम सीमा विवाद और केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की अपील
  3. असम में बाढ़ राहत और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा
  4. असम सरकार द्वारा प्रस्तावित ‘असम भाषा नीति’ पर केंद्र की राय

उत्तर: असम में बाढ़ राहत और पुनर्वास कार्यों की समीक्षा — असम के राज्यपाल ने हाल ही में प्रधानमंत्री से मुलाकात कर राज्य में बाढ़ राहत और पुनर्वास कार्यों की स्थिति की समीक्षा की थी।

Mains: असम में बाढ़ प्रबंधन और पुनर्वास कार्यों में राज्यपाल की भूमिका की चर्चा करते हुए, राज्य सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का मूल्यांकन कीजिए।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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