केरल में बच्चों की कुपोषण और उपेक्षा से मृत्यु रोकने की तैयारी, जानिए कैसे

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केरल में बच्चों की कुपोषण और उपेक्षा से मृत्यु रोकने की तैयारी, जानिए कैसे

केरल में बाल संवेदनशीलता मानचित्रण प्रक्रियाजोखिम वाले बच्चों की पस्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षानियमित निगरानीस्वास्थ्य विभागसमन्वय एवं हस्तक्षेपपंचायत एवं महिला विभागपुनर्मिलन/संस्थागत देखबाल कल्याण समितिअनुवर्ती कार्रवाईआंगनवाड़ी केंद्र
केरल में बाल संवेदनशीलता मानचित्रण प्रक्रिया

✎ बाल संरक्षण में कुपोषण की रोकथाम के लिए पहचान, निगरानी और समन्वित अनुवर्ती कार्रवाई (Identification, Monitoring and Follow-up) तीनों का सक्रिय होना अनिवार्य है, क्योंकि संवैधानिक दायित्व (अनुच्छेद 39(f) और 47) तभी व्यवहार में…

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — शासन व्यवस्था, सामाजिक न्याय और स्वास्थ्य (कमजोर वर्गों के लिए सरकारी योजनाएँ और संस्थाएँ, बाल कल्याण से संबंधित नीतियाँ)  |  GS Paper I — सामाजिक मुद्दे (महिलाओं और बच्चों से संबंधित मुद्दे, गरीबी और कुपोषण)
  • Prelims: कुपोषण के प्रकार: वेस्टिंग (Wasting), स्टंटिंग (Stunting) और अल्पवजन (Underweight), राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS), किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (Juvenile Justice (Care and Protection of Children) Act, 2015) और बाल कल्याण समिति (CWC), बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 और राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (SCPCR), मिशन वात्सल्य (Mission Vatsalya), पोषण अभियान और सक्षम आंगनवाड़ी व पोषण 2.0 (Saksham Anganwadi and Poshan 2.0), अनुच्छेद 39(f), अनुच्छेद 47 और अनुच्छेद 15(3), स्वतः संज्ञान (Suo Motu) की अवधारणा
  • Essay: बच्चों का कल्याण और राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी: नीति-निर्माण से जमीनी क्रियान्वयन तक की चुनौतियाँ, सामाजिक सुरक्षा तंत्र में सूचना, निगरानी और समन्वय की भूमिका: कुपोषण से बचाव के लिए संस्थागत सुधार

त्वरित पुनरावृत्ति: बाल संरक्षण में कुपोषण की रोकथाम के लिए पहचान, निगरानी और समन्वित अनुवर्ती कार्रवाई (Identification, Monitoring and Follow-up) तीनों का सक्रिय होना अनिवार्य है, क्योंकि संवैधानिक दायित्व (अनुच्छेद 39(f) और 47) तभी व्यवहार में उतरता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल के अलप्पुझा जिले में दो वर्षीय बच्चे की मृत्यु कथित रूप से गंभीर कुपोषण और रक्ताल्पता (Anaemia) से हुई। बच्चे का वजन लगभग 7.5 किलोग्राम था, जबकि इस आयु के बच्चे का औसत वजन लगभग 12 किलोग्राम माना जाता है। इस घटना के बाद राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया और बाल कल्याण समिति ने परिवार के चार अन्य बच्चों की देखरेख संभाली। इसी संदर्भ में राज्य सरकार ने राज्यव्यापी बाल संवेदनशीलता मानचित्रण (Child Vulnerability Mapping) की योजना बनाई है, ताकि स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के लिहाज से जोखिम में रहने वाले बच्चों की पहचान की जा सके और उनकी नियमित निगरानी हो सके। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें कुपोषण, परिवार के बार-बार स्थान बदलने, संस्थागत देखरेख से बच्चों को वापस लाने के विवाद और विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की कमी जैसे कई पहलू एक साथ सामने आए हैं।

पृष्ठभूमि

  • कुपोषण का मापन तीन सूचकों से होता है: अल्पवजन (आयु के अनुसार कम वजन), स्टंटिंग (आयु के अनुसार कम लंबाई) और वेस्टिंग (लंबाई के अनुसार कम वजन)। इस मामले में बच्चे का कम वजन गंभीर तीव्र कुपोषण की ओर संकेत करता है, हालाँकि मृत्यु का वास्तविक कारण हिस्टोपैथोलॉजी जाँच के बाद ही तय होगा।
  • बच्चों की सुरक्षा के लिए भारत में किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत बाल कल्याण समिति देखरेख और संरक्षण की भूमिका निभाती है। ऐसे बच्चे, जो असुरक्षित परिस्थितियों में हों, बाल देखभाल संस्थानों में रखे जा सकते हैं और परिवार के साथ पुनर्मिलन का निर्णय भी समिति के आदेश से होता है।
  • राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत स्थापित होते हैं। वे बाल अधिकारों के उल्लंघन के मामलों में स्वतः संज्ञान ले सकते हैं और संबंधित विभागों से रिपोर्ट मांग सकते हैं।
  • केंद्र सरकार की मिशन वात्सल्य और पोषण अभियान (सक्षम आंगनवाड़ी व पोषण 2.0) जैसी योजनाएँ बाल संरक्षण और पोषण से जुड़ी केंद्र-राज्य साझेदारी के प्रमुख उदाहरण हैं। आंगनवाड़ी केंद्र, आशा कार्यकर्ता, पंचायत और स्वास्थ्य विभाग इनके जमीनी क्रियान्वयन में अहम भूमिका निभाते हैं।
  • केरल में पंचायती राज संस्थाएँ, महिला एवं बाल विकास विभाग और स्वास्थ्य विभाग के बीच समन्वय की जिम्मेदारी साझा है। इस मामले में परिवार के लगातार स्थान बदलने से निगरानी कठिन हुई, जो सूचना-साझाकरण और सतत अनुवर्ती कार्रवाई (Follow-up) की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

बाल संवेदनशीलता मानचित्रण और बाल संरक्षण का संवैधानिक-संस्थागत ढाँचा क्या है?

  • बाल संवेदनशीलता मानचित्रण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें राज्यभर में उन बच्चों की पहचान की जाती है जो स्वास्थ्य, शिक्षा या सुरक्षा के संदर्भ में जोखिम में हैं। इसका उद्देश्य समस्या आने से पहले हस्तक्षेप करना है।
  • पहचान के बाद बच्चों के विवरण संकलित कर उनकी नियमित अनुवर्ती जाँच की जाती है। इससे नीति-निर्माताओं को स्थानीय स्तर पर आँकड़े मिलते हैं और सेवाओं को लक्षित किया जा सकता है।
  • संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 39(f) राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि बच्चों को स्वस्थ रूप से विकसित होने के अवसर और सुविधाएँ मिलें। अनुच्छेद 47 पोषण स्तर और जन-स्वास्थ्य में सुधार को राज्य का कर्तव्य बताता है।
  • अनुच्छेद 15(3) राज्य को बच्चों और महिलाओं के लिए विशेष उपबंध बनाने की शक्ति देता है। अनुच्छेद 21A के तहत छह से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए शिक्षा मौलिक अधिकार है, इसलिए स्कूल से बाहर रहना भी संरक्षण की चिंता से जुड़ता है।
  • संस्थागत ढाँचा: बाल कल्याण समिति बच्चों की देखरेख और पुनर्वास के निर्णय लेती है, जबकि राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग निगरानी और स्वतः संज्ञान की भूमिका निभाता है। दोनों के कार्य अलग हैं, पर उनमें समन्वय आवश्यक है।
  • कुपोषण की रोकथाम के लिए पोषण अभियान, आंगनवाड़ी सेवाएँ, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाएँ और आशा कार्यकर्ता का घर-स्तरीय संपर्क मुख्य साधन हैं। ये सेवाएँ तभी प्रभावी होती हैं जब ऐसे परिवारों की पहचान समय पर हो।
  • भारत ने बाल अधिकार सम्मेलन (UNCRC, 1989) का अनुसमर्थन किया है, जो बच्चों के जीवन, विकास, संरक्षण और भागीदारी के अधिकारों को मान्यता देता है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
राज्यव्यापी संवेदनशीलता मानचित्रण (Vulnerability Mapping) स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा के जोखिम में रहने वाले बच्चों की राज्य-स्तरीय पहचान; पहचान के बाद नियमित अनुवर्ती निगरानी का प्रावधान
सुओ मोटो मामला (Suo Motu Case) केरल राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (Kerala State Commission for Protection of Child Rights) द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर दर्ज; बाल अधिकार उल्लंघन की स्वतंत्र जाँच का वैधानिक तंत्र
जिला बाल कल्याण समिति (CWC) द्वारा देखभाल किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के अंतर्गत चार बालिकाओं की देखभाल अपने हाथ में; बच्चों के सर्वोत्तम हित का निर्णय वैधानिक निकाय करता है
बहु-विभागीय समन्वय महिला एवं बाल विकास विभाग, स्वास्थ्य विभाग, पंचायत, पुलिस, आशा कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी कार्यकर्ता की संयुक्त भूमिका; किसी एक विभाग पर निर्भरता नहीं
मृत्यु की वैज्ञानिक जाँच हिस्टोपैथोलॉजी जाँच से यह तय होगा कि मृत्यु बीमारी से हुई या कुपोषण से; अप्राकृतिक मृत्यु के रूप में पुलिस प्रकरण दर्ज

महत्व

मानवीय और संवैधानिक

  • बच्चे के जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार अनुच्छेद 21 की व्याख्या में आता है, जिसमें पोषण और चिकित्सा सुविधा शामिल मानी गई है
  • राज्य का दायित्व है कि वह बच्चों को शोषण और उपेक्षा से बचाए; यह मामला इसी दायित्व की परीक्षा है
  • बाल अधिकार संस्थाओं की सक्रियता से शिकायत-आधारित नहीं, बल्कि जोखिम-आधारित हस्तक्षेप की ओर बढ़ने की आवश्यकता रेखांकित होती है

स्वास्थ्य और पोषण

  • कुपोषण और रक्ताल्पता (Anaemia) का संयुक्त प्रभाव बच्चे की वृद्धि और रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है; सामान्य वजन से काफी कम वजन गंभीर कुपोषण का संकेत हो सकता है
  • मातृ स्वास्थ्य और जन्म-अंतराल का सीधा संबंध बच्चे के पोषण से है; बार-बार प्रसव से माँ और शिशु दोनों का जोखिम बढ़ता है
  • जन्म के बाद की निगरानी (Post-natal Follow-up) में आशा और आंगनवाड़ी तंत्र की भूमिका निर्णायक है

प्रशासनिक और शासन

  • सूचनाओं के आदान-प्रदान में कमी से मामला बार-बार सामने आने के बावजूद समय पर हस्तक्षेप नहीं हो सका; यह समन्वित डेटा प्रणाली की आवश्यकता दर्शाता है
  • बहु-विभागीय उत्तरदायित्व का स्पष्ट निर्धारण न होने पर जिम्मेदारी बँट जाती है और परिणाम कमजोर रहते हैं

विधिक

  • किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के अंतर्गत देखभाल संस्थान और बाल कल्याण समिति की वैधानिक भूमिका स्पष्ट है; अभिभावकों के साथ पुनर्मिलन और संस्थागत देखभाल के बीच संतुलन विधिक ढाँचे में ही तय होता है
  • अप्राकृतिक मृत्यु के मामलों में पुलिस और चिकित्सीय जाँच की प्रक्रिया न्याय और जवाबदेही सुनिश्चित करती है

चुनौतियाँ

1. घुमंतू जीवन शैली और निगरानी की कठिनाई

  • परिवार का बार-बार स्थान बदलना और किराये के मकानों में रहना प्रशासन के लिए नियमित संपर्क और सत्यापन कठिन बनाता है
  • हस्तक्षेप की सूचना मिलते ही स्थान बदलने की प्रवृत्ति जोखिम-आधारित निगरानी को निष्प्रभावी कर सकती है

2. अभिभावक के अधिकार और बच्चे के सर्वोत्तम हित का संतुलन

  • माता-पिता के साथ रहने का अधिकार और बच्चे की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना एक जटिल विधिक प्रश्न है
  • आत्म-हानि की धमकी जैसी स्थितियों में प्रशासन को मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक परामर्श को भी शामिल करना पड़ता है

3. बहु-विभागीय समन्वय का अभाव

  • महिला एवं बाल विकास, स्वास्थ्य, पंचायत और पुलिस विभागों के बीच स्पष्ट एकल उत्तरदायित्व का अभाव हस्तक्षेप को धीमा करता है
  • स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की शक्ति और संसाधनों का वितरण असमान होने से समन्वय टूटता है

4. कुपोषण और मृत्यु के कारणों का निर्धारण

  • बीमारी और कुपोषण के कारण मृत्यु का अंतर चिकित्सीय जाँच के बिना स्पष्ट नहीं होता; हिस्टोपैथोलॉजी जैसी जाँच में समय लगता है
  • कुपोषण के आँकड़े जब वजन-आधारित मापदंडों तक सीमित रहते हैं, तब गंभीर मामले देर से पकड़ में आते हैं

5. देखभाल संस्थानों से पुनर्मिलन की प्रक्रिया

  • संस्थागत देखभाल से बच्चों को परिवार में लौटाने के निर्णय के बाद सतत निगरानी और परामर्श की व्यवस्था कमजोर रहने पर जोखिम बना रहता है
  • बच्चों के पुनर्वास हेतु आजीविका सहायता की प्रतिबद्धता भी पूरी न होने पर परिवार पुनः असुरक्षित हो जाता है

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
निगरानी का अभाव घुमंतू परिवारों की नियमित जाँच और सत्यापन में कठिनाई
विभागीय समन्वय एक ही परिवार पर कई विभागों के हस्तक्षेप बिना एकीकृत योजना के होना
डेटा और पहचान जोखिम वाले बच्चों का समयबद्ध और सटीक डेटाबेस तैयार न होना
अभिभावक का प्रतिरोध हस्तक्षेप के समय विरोध और आत्म-हानि की धमकी से कार्रवाई में विलंब
मृत्यु का कारण स्पष्ट न होना जाँच रिपोर्ट आने तक कुपोषण या बीमारी का निर्धारण अधूरा रहना
पुनर्वास की गुणवत्ता परिवार में लौटाए गए बच्चों के लिए निरंतर परामर्श और आजीविका सहायता का अभाव

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • मिशन वात्सल्य (Mission Vatsalya)
  • सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 (Saksham Anganwadi and Poshan 2.0)
  • प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना (Pradhan Mantri Matru Vandana Yojana)

आगे की राह

  • संवेदनशीलता मानचित्रण में घुमंतू और किराये पर रहने वाले परिवारों को विशेष श्रेणी में शामिल कर वास्तविक समय पर आधारित डेटाबेस बनाया जाए
  • आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दो वर्ष तक की नियमित पोषण और वृद्धि निगरानी सुनिश्चित की जाए
  • बहु-विभागीय समन्वय के लिए जिला स्तर पर एकीकृत मामला-प्रबंधन प्रणाली और स्पष्ट उत्तरदायित्व तय किए जाएँ
  • बाल कल्याण समिति, पुलिस और चिकित्सा विभाग के बीच सूचना साझाकरण का समय-सीमा युक्त प्रोटोकॉल बनाया जाए
  • परिवार में बच्चों की वापसी से पहले परामर्श, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और आजीविका सहायता की लिखित योजना अनिवार्य हो
  • अभिभावकों के साथ संवाद और परामर्श को हस्तक्षेप की पहली सीढ़ी बनाया जाए, ताकि बल प्रयोग की नौबत कम आए
  • कुपोषण से संबंधित मृत्यु के मामलों की जाँच के लिए समयबद्ध चिकित्सीय और पोस्टमॉर्टम प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित हो
  • सामुदायिक निगरानी समितियों को सक्रिय कर स्थानीय स्तर पर जोखिम की प्रारंभिक सूचना प्रणाली मजबूत की जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

बाल कुपोषण · बाल उपेक्षा · बाल संरक्षण · राज्यव्यापी संवेदनशीलता मानचित्रण · महिला एवं बाल विकास विभाग · बाल अधिकार संरक्षण आयोग · बाल कल्याण समिति · एकीकृत बाल संरक्षण योजना · पोषण अभियान · बाल मृत्यु दर

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 21: जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार
  • अनुच्छेद 39: बच्चों के स्वास्थ्य और शोषण से संरक्षण के निर्देश
  • अनुच्छेद 47: पोषण स्तर और जनस्वास्थ्य सुधार का कर्तव्य

अवधारणा प्रवाह

दो वर्षीय बच्चे की गंभीर कुपोषण और रक्ताल्पता से मृत्यु, जिसके समय माता अस्पताल में प्रसव हेतु भर्ती थीं  →  परिवार के घुमंतू जीवन और अभिभावकों के प्रतिरोध से बच्चों की देखभाल और निगरानी में बाधा  →  बाल कल्याण समिति ने चार बालिकाओं की देखभाल अपने हाथ में ली और बाल अधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया  →  पुलिस ने अप्राकृतिक मृत्यु का प्रकरण दर्ज कर हिस्टोपैथोलॉजी जाँच से मृत्यु का कारण निर्धारित करने का प्रयास किया  →  इस घटना के आधार पर राज्यव्यापी संवेदनशीलता मानचित्रण और जोखिम वाले बच्चों की नियमित अनुवर्ती निगरानी की योजना बनी

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत का संविधान 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को किसी भी खतरनाक व्यवसाय में काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाता है।
2. बाल अधिकार संरक्षण आयोग (CPCR) एक सांविधिक निकाय है।
3. बाल कल्याण समिति (CWC) बच्चों की देखभाल और संरक्षण के लिए प्राथमिक निकाय है, जैसा कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत परिभाषित किया गया है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 24, 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक व्यवसायों में काम पर रखने पर प्रतिबंध लगाता है। कथन 2 सही है। बाल अधिकार संरक्षण आयोग अधिनियम, 2005 के तहत बाल अधिकार संरक्षण आयोग एक सांविधिक निकाय है। कथन 3 सही है। किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 के तहत बाल कल्याण समिति को बच्चों की देखभाल और संरक्षण के लिए प्राथमिक निकाय के रूप में स्थापित किया गया है।

Q2. पोषण अभियान (Poshan Abhiyaan) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका उद्देश्य बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण परिणामों में सुधार करना है।
2. यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक प्रमुख योजना है।
3. इसका लक्ष्य कुपोषण को पूरी तरह से समाप्त करना है।
उपरोक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 सही है। पोषण अभियान का उद्देश्य बच्चों, किशोरियों, गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए पोषण परिणामों में सुधार करना है। कथन 2 सही है। यह महिला एवं बाल विकास मंत्रालय की एक प्रमुख योजना है। कथन 3 गलत है। पोषण अभियान का लक्ष्य कुपोषण को पूरी तरह से समाप्त करना नहीं, बल्कि इसे चरणबद्ध तरीके से कम करना है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ बाल कुपोषण और उपेक्षा से होने वाली बाल मृत्यु को रोकने में राज्यव्यापी संवेदनशीलता मानचित्रण (State-wide vulnerability mapping) की भूमिका का परीक्षण कीजिए। इस संबंध में बाल संरक्षण के लिए सरकारी नीतियों और संस्थागत तंत्रों की प्रभावशीलता का भी विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: बाल कुपोषण और उपेक्षा से संबंधित हालिया घटना का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए बाल मृत्यु की गंभीरता पर प्रकाश डालें।
2. राज्यव्यापी संवेदनशीलता मानचित्रण की भूमिका: केरल द्वारा प्रस्तावित ‘राज्यव्यापी संवेदनशीलता मानचित्रण’ की अवधारणा, इसके उद्देश्य (जोखिम वाले बच्चों की पहचान, स्वास्थ्य, शिक्षा और सुरक्षा संबंधी जोखिमों का आकलन) और संभावित लाभों (प्रारंभिक हस्तक्षेप, लक्षित सहायता, निगरानी) का विस्तार से वर्णन करें।
3. सरकारी नीतियां और संस्थागत तंत्र: बाल संरक्षण से संबंधित प्रमुख सरकारी नीतियों और योजनाओं (जैसे पोषण अभियान, एकीकृत बाल संरक्षण योजना) तथा संस्थागत तंत्रों (जैसे महिला एवं बाल विकास विभाग, बाल अधिकार संरक्षण आयोग, बाल कल्याण समिति, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, आशा कार्यकर्ता) का उल्लेख करें।
4. प्रभावशीलता का विश्लेषण: इन नीतियों और तंत्रों की प्रभावशीलता का आलोचनात्मक विश्लेषण करें। इसमें सफलताओं के साथ-साथ चुनौतियों और सीमाओं (जैसे जागरूकता की कमी, अंतर-विभागीय समन्वय का अभाव, संसाधनों की कमी, परिवारों की गतिशीलता, सामाजिक-सांस्कृतिक कारक) पर भी चर्चा करें।
5. आगे की राह/सुझाव: बाल मृत्यु को रोकने और बाल संरक्षण को मजबूत करने के लिए ठोस सुझाव दें, जैसे कि अंतर-विभागीय समन्वय में सुधार, सामुदायिक भागीदारी बढ़ाना, डेटा-संचालित निगरानी, क्षमता निर्माण और जागरूकता कार्यक्रम।
6. निष्कर्ष: एक समग्र दृष्टिकोण के महत्व पर जोर देते हुए निष्कर्ष प्रस्तुत करें।

स्रोत: The Hindu

Kerala PCS (Kerala PSC (KAS)) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: केरल सरकार द्वारा कुपोषण और उपेक्षा से जुड़े बच्चों की मृत्यु को रोकने के लिए शुरू की गई प्रमुख पहल कौन सी है?

  1. A. ‘कुपोषण मुक्त केरल’ अभियान
  2. B. ‘मातृ-पोषण सुरक्षा योजना’
  3. C. ‘बाल संरक्षण मिशन’
  4. D. ‘पोषण सुरक्षा मिशन’

उत्तर: D. ‘पोषण सुरक्षा मिशन’ — केरल सरकार ने ‘पोषण सुरक्षा मिशन’ के माध्यम से कुपोषण और उपेक्षा से बच्चों की मृत्यु को रोकने के लिए व्यापक कार्ययोजना तैयार की है, जिसमें सामुदायिक स्तर पर पोषण संबंधी जागरूकता और चिकित्सा सुविधाओं पर जोर दिया गया है।

Mains: केरल में कुपोषण और उपेक्षा से बच्चों की मृत्यु दर को कम करने के लिए सरकार द्वारा अपनाई गई रणनीतियों का वर्णन करें। इसमें शामिल प्रमुख घटकों जैसे पोषण कार्यक्रम, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर प्रकाश डालें।


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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