28 Oct राजस्थान में नदियों का प्रदूषण: उद्योगों की लापरवाही और सरकारी विफलता
✎ नियामक संस्थाओं की निष्क्रियता से उत्पन्न नदी प्रदूषण में प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, अनुच्छेद 21 और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के माध्यम से जवाबदेही तय होती है, जबकि न्यायालय द्वारा नियामक की भूमिका स्वयं लेने के प्रश्न पर संतुलन आवश्यक…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन (नियामक संस्थाएँ, राज्य की जवाबदेही, न्यायपालिका की भूमिका) | GS Paper II — संविधान (अनुच्छेद 21 और न्यायिक व्याख्या) | GS Paper III — पर्यावरण (जल प्रदूषण, पर्यावरण विधि, सतत विकास)
- Prelims: जोजरी, लूनी और बांदी नदियाँ (राजस्थान की मौसमी नदियाँ), प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle), सामान्य अपशिष्ट जल उपचार संयंत्र (CETP: Common Effluent Treatment Plant), जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT), स्थापना: राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010, अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 48A और अनुच्छेद 51A(छ), स्वतः संज्ञान (Suo Motu) रिट याचिका
- Essay: विकास और पर्यावरण संरक्षण: औद्योगिक प्रगति में नियामक तंत्र की भूमिका, नियामक विफलता की भरपाई में न्यायपालिका की सीमाएँ और उसकी उपयोगिता
त्वरित पुनरावृत्ति: नियामक संस्थाओं की निष्क्रियता से उत्पन्न नदी प्रदूषण में प्रदूषक भुगतान सिद्धांत, अनुच्छेद 21 और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के माध्यम से जवाबदेही तय होती है, जबकि न्यायालय द्वारा नियामक की भूमिका स्वयं लेने के प्रश्न पर संतुलन आवश्यक है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
सर्वोच्च न्यायालय ने राजस्थान सरकार को एक बार फिर जोजरी नदी में औद्योगिक अपशिष्ट जल के प्रवाह और उससे उत्पन्न जन-स्वास्थ्य जोखिम के लिए फटकार लगाई है। यह समस्या कई दशक पुरानी है और 2011 में राजस्थान उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका ने राज्य तंत्र का ध्यान इस ओर खींचा था। जोधपुर, बालोतरा और पाली जिलों से होकर बहने वाली इन मौसमी नदियों के आसपास कपड़ा रंगाई और इस्पात उद्योग विकसित हुए हैं, और इनसे निकला अनुपचारित या अपर्याप्त रूप से उपचारित अपशिष्ट जल सीधे नदियों और मिट्टी में पहुँच रहा है, जिससे लगभग 20 लाख निवासियों का स्वास्थ्य प्रभावित हो रहा है। राज्य द्वारा 2025 में न्यायालय को दिए गए विवरण के अनुसार तीनों शहरी केंद्रों में मलजल उपचार संयंत्र उत्पन्न मलजल के लगभग आधे की ही क्षमता रखते हैं, और सामान्य अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों का भी पर्याप्त उपयोग नहीं हो रहा है। इससे संकेत मिलता है कि कुछ उद्योग उपचार सुविधाओं को बायपास कर रहे हैं, स्रोत और संयंत्रों के बीच संपर्क कमज़ोर है, या कुछ स्थानों पर क्षमता अपर्याप्त है। न्यायालय ने 2025 में स्वतः संज्ञान से रिट याचिका शुरू की और संयंत्रों की जाँच तथा नदी पुनरुद्धार योजना तैयार करने के लिए न्यायमूर्ति संजीव लोढ़ा की अध्यक्षता में उच्चस्तरीय पारिस्थितिकी निगरानी समिति गठित की। समिति की रिपोर्टों के आधार पर नदी तटों से 100 मीटर के भीतर निर्माण और मौजूदा मार्ग से 500 मीटर के भीतर (जहाँ बाढ़ रेखाएँ उपलब्ध हैं, वहाँ उनसे) खतरनाक उद्योगों पर रोक लगाई गई। न्यायालय ने स्थानीय प्रशासन की उस निष्क्रियता को भी रेखांकित किया जिसके चलते प्रदूषण मानकों का पालन नहीं कराया गया, और 2022 के राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेश, जिसमें राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम तथा जोधपुर व बाड़मेर के स्थानीय प्रशासन पर मुआवजा लगाया गया था, के न्यायालय द्वारा दिए गए स्थगन का उल्लेख किया गया। अवैध खनन की जानकारी होने के बावजूद कुछ क्षेत्रों में पट्टे नियमित किए गए, जिससे नियामक तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठते हैं। इस संदर्भ में अधिकारियों और औद्योगिक गुटों के बीच मिलीभगत की संभावना पर न्यायालय की गंभीरता को सम्पादकीय में उचित माना गया है। न्यायमूर्ति द्वारा यह संकेत भी दिया गया कि लापरवाही के कारण राज्य को प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के तहत उत्तरदायी ठहराया जा सकता है। साथ ही यह प्रश्न भी उठाया गया है कि नियामकों को उनके कर्तव्य के प्रति जवाबदेह बनाने के बजाय न्यायालय स्वयं नियामक की भूमिका ग्रहण करने लगा है, जो विमर्श का विषय है।
पृष्ठभूमि
- जोजरी, लूनी और बांदी राजस्थान के शुष्क पश्चिमी क्षेत्र की मौसमी नदियाँ हैं, जिनमें वर्षा ऋतु के अतिरिक्त प्रवाह सीमित रहता है, इसलिए अपशिष्ट का तनुकरण (Dilution) कम होता है और प्रदूषण का संकेंद्रण अधिक होता है।
- इस क्षेत्र में कपड़ा रंगाई और इस्पात उद्योगों का विस्तार हुआ है, जो जल-गहन उद्योग हैं और जिनसे रासायनिक तथा भारी धातु युक्त अपशिष्ट निकलता है।
- जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड औद्योगिक इकाइयों को सहमति (Consent) देते हैं और निगरानी करते हैं; इस मामले में इस नियामक कार्य में कमी सामने आई है।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के तहत हुई थी, जिसे पर्यावरण से संबंधित मामलों के त्वरित निपटान के लिए बनाया गया है।
- पर्यावरण संरक्षण की संवैधानिक नींव अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण सहित जीवन का अधिकार), अनुच्छेद 48A (राज्य का कर्तव्य) और अनुच्छेद 51A(छ) (नागरिकों का मौलिक कर्तव्य) में निहित है, जिनकी व्याख्या न्यायालयों ने समय-समय पर विस्तृत की है।
प्रदूषक भुगतान सिद्धांत क्या है?
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के अनुसार जो व्यक्ति या संस्था पर्यावरण को प्रदूषित करती है, उसे प्रदूषण की रोकथाम, नियंत्रण और क्षतिपूर्ति का व्यय वहन करना चाहिए।
- यह सिद्धांत विकास के ‘सतत’ स्वरूप से जुड़ा है, क्योंकि इससे प्रदूषण की बाहरी लागत (Externality) उत्पादक की लागत में समाहित होती है।
- इसे 1992 के रियो घोषणापत्र (Rio Declaration) के सिद्धांत 16 में अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति मिली है।
- भारतीय न्यायपालिका ने इसे अपने निर्णयों में अपनाया है, जैसे इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ (1996) और वेल्लोर सिटीजन्स वेलफेयर फोरम बनाम भारत संघ (1996)।
- इसके साथ सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) और पूर्व-सावधानी के उपाय भी भारतीय पर्यावरण न्यायशास्त्र के आधार हैं।
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1986) के ओलियम गैस मामले में न्यायालय ने पूर्ण दायित्व (Absolute Liability) का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जो खतरनाक उद्योगों पर लागू होता है।
- सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine) के अनुसार प्राकृतिक संसाधन, जैसे नदियाँ, राज्य के पास जनता की धरोहर के रूप में रहते हैं।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के लागू होने पर राज्य भी उत्तरदायी हो सकता है, यदि प्रदूषण की अनुमति या निगरानी में उसकी लापरवाही सिद्ध होती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| भौगोलिक संदर्भ | जोजरी, लूनी और बांडी मौसमी नदियाँ राजस्थान के शुष्क पश्चिमी क्षेत्र में बहती हैं और जोधपुर, बालोतरा तथा पाली जिलों से होकर गुजरती हैं। सीमित जल-प्रवाह के कारण इनमें प्रदूषकों का सांद्रण अधिक हो जाता है। |
| औद्योगिक संरचना | यह क्षेत्र वस्त्र रंगाई (Textile Dyeing) और इस्पात उद्योग का केंद्र है। अनुपचारित या अपर्याप्त रूप से उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट जल सीधे नदियों और मिट्टी में पहुँचने से प्रदूषण का मुख्य स्रोत यही बनता है। |
| मल-जल उपचार क्षमता | राज्य सरकार द्वारा 2025 में न्यायालय में प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार, तीन शहरी केंद्रों में उत्पन्न मल-जल का लगभग आधा ही मल-जल उपचार संयंत्र (Sewage Treatment Plant) संभाल पाते हैं। इससे अनुपचारित मल-जल के नदियों में जाने की संभावना बनी रहती है। |
| सामूहिक उपचार संयंत्रों का कम उपयोग | न्यायालय ने सामूहिक अपशिष्ट उपचार संयंत्रों (Common Effluent Treatment Plant) के कम उपयोग को दर्ज किया। यह संकेत देता है कि उद्योग उपचार सुविधाओं को बायपास कर रहे हैं, या स्रोत और संयंत्र के बीच संपर्क कमजोर है, या क्षमता अपर्याप्त है। |
| जन-स्वास्थ्य पर प्रभाव | लगभग 20 लाख स्थानीय निवासी इन नदियों और प्रदूषित भूमि से प्रभावित हैं। यह मामला अनुच्छेद 21 के अंतर्गत स्वच्छ पर्यावरण और स्वास्थ्य के अधिकार से सीधे जुड़ता है। |
| न्यायिक हस्तक्षेप का क्रम | 2011 की जनहित याचिका से लेकर 2025 की स्वतः संज्ञान रिट याचिका तक, न्यायालय ने उच्च-स्तरीय पारिस्थितिकी निगरानी समिति गठित की। नदी किनारों पर 100 मीटर और खतरनाक उद्योगों पर 500 मीटर के निर्माण-प्रतिबंध जैसे निर्देश भी दिए गए। |
महत्व
पर्यावरणीय महत्व
- नदी पारिस्थितिकी की बहाली से जल की गुणवत्ता, भूजल और मिट्टी की उर्वरता में सुधार की संभावना बनती है।
- शुष्क क्षेत्र में सीमित जल-संसाधन होने के कारण प्रदूषण का प्रभाव अधिक गंभीर और दीर्घकालिक होता है।
- अवैध रेत खनन से नदी तल और तटीय संरचना को हुई क्षति भी पारिस्थितिकी संतुलन का अंग है।
स्वास्थ्य और सामाजिक महत्व
- लगभग 20 लाख लोगों के जल-स्रोत प्रभावित होने से यह जन-स्वास्थ्य का गंभीर विषय है।
- जल पर निर्भर आजीविका, विशेषकर कृषि और पशुपालन, पर प्रदूषण का सीधा असर पड़ता है।
शासन और प्रशासनिक महत्व
- नियामक तंत्र की विफलता, जैसे अवैध खनन की जानकारी होने के बावजूद पट्टों का नियमितीकरण, प्रशासनिक जवाबदेही का प्रश्न उठाती है।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) के अंतर्गत राज्य की दायित्व-सीमा पर बहस शासन में उत्तरदायित्व की अवधारणा को मजबूत करती है।
विधिक और संवैधानिक महत्व
- स्वतः संज्ञान रिट याचिका और 2022 के राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) आदेश पर रोक, न्यायालय और अधिकरण के बीच अधिकार-क्षेत्र के संबंध को दर्शाती है।
- न्यायालय द्वारा नियामक एजेंसियों की भूमिका स्वयं निभाने और नियामकों को उनके कर्तव्य के लिए बाध्य करने के बीच का अंतर इस मामले में विशेष रूप से प्रासंगिक है।
चुनौतियाँ
1. औद्योगिक अपशिष्ट का अवैध निस्तारण
- उपचार संयंत्रों को बायपास करके सीधे नदी और भूमि में अपशिष्ट छोड़ा जाना प्रवर्तन की गंभीर कमी दर्शाता है।
- वस्त्र और इस्पात उद्योगों की प्रकृति के कारण अपशिष्ट में भारी धातु और रासायनिक घटक हो सकते हैं, जिनका उपचार अधिक जटिल होता है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रदूषण और उसका नियंत्रण; GS-3 (पर्यावरण)
2. उपचार अवसंरचना की अपर्याप्तता और खराब संपर्क
- मल-जल उपचार क्षमता लगभग आधी होने से शहरी अपशिष्ट का बड़ा भाग अनुपचारित रह जाता है।
- सामूहिक उपचार संयंत्रों का कम उपयोग यह बताता है कि क्षमता और स्रोत के बीच की कड़ी कमजोर है। यह केवल संयंत्र निर्माण की नहीं, बल्कि संचालन और संपर्क की भी समस्या है।
यूपीएससी लिंक: शहरी अवसंरचना और सेवा-वितरण; GS-2 (शासन)
3. नियामक तंत्र की विफलता और मिलीभगत का संदेह
- अवैध खनन की जानकारी होने के बावजूद पट्टों का नियमितीकरण प्रशासनिक लापरवाही या हितों के टकराव का संकेत देता है।
- न्यायालय द्वारा मिलीभगत की संभावना को गंभीरता से लेना नियामक संस्थाओं की स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर प्रश्न उठाता है।
यूपीएससी लिंक: लोक प्रशासन में जवाबदेही और नैतिकता; GS-4 (शासन-व्यवस्था और नैतिकता)
4. न्यायिक हस्तक्षेप बनाम नियामक स्वायत्तता
- न्यायालय द्वारा नियामकों की भूमिका स्वयं निभाना संस्थागत संतुलन पर बहस को जन्म देता है।
- लेख के अनुसार न्यायालय को नियामकों को उनके कार्य के लिए बाध्य करना चाहिए, स्वयं उनका स्थान नहीं लेना चाहिए। यह न्यायिक सक्रियता की सीमा से जुड़ा प्रश्न है।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका की भूमिका और शक्तियों का पृथक्करण; GS-2 (शासन और संस्थाएँ)
5. प्रवर्तन में विलंब और दीर्घकालिक उपेक्षा
- समस्या दशकों पुरानी है, जबकि 2011 में जनहित याचिका के माध्यम से राज्य मशीनरी को इसकी जानकारी दी गई थी।
- 2022 के राष्ट्रीय हरित अधिकरण आदेश के तहत लगाए गए मुआवजे पर न्यायालय द्वारा रोक लगने से प्रवर्तन की कानूनी प्रक्रिया भी जटिल हुई है।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण विधि और पर्यावरणीय न्याय; GS-3 और GS-2
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| औद्योगिक अपशिष्ट का सीधा निस्तारण | उपचार संयंत्रों को बायपास करने से भूमिगत और सतही जल दूषित होता है तथा जन-स्वास्थ्य पर सीधा खतरा बनता है। |
| मल-जल उपचार की क्षमता में कमी | शहरी मल-जल का लगभग आधा भाग ही उपचारित हो पाता है, जिससे नदियों में प्रदूषण का भार बढ़ता है। |
| सामूहिक संयंत्रों का कम उपयोग | क्षमता, संपर्क या संचालन की कमी से सार्वजनिक अवसंरचना में निवेश का लाभ नहीं मिल पाता। |
| अवैध रेत खनन और पट्टों का नियमितीकरण | नदी तल का क्षरण और प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका नियामक विश्वसनीयता को कमजोर करती है। |
| न्यायिक और नियामक भूमिकाओं का संतुलन | नियामकों की जगह न्यायालय द्वारा कार्य करना संस्थागत स्वायत्तता और दीर्घकालिक समाधान के लिए चुनौती बन सकता है। |
आगे की राह
- औद्योगिक इकाइयों के अपशिष्ट निस्तारण की निरंतर निगरानी के लिए ऑनलाइन निगरानी प्रणाली (Online Monitoring System) और नियमित निरीक्षण तंत्र को सुदृढ़ किया जाए।
- सामूहिक अपशिष्ट उपचार संयंत्रों को उद्योगों से जोड़ने वाली पाइपलाइन और संपर्क-अवसंरचना की कमियों की पहचान कर उन्हें प्राथमिकता के आधार पर दूर किया जाए।
- तीनों शहरी केंद्रों में मल-जल उपचार क्षमता का वैज्ञानिक आकलन कर उसे उत्पन्न मल-जल के अनुपात में बढ़ाया जाए।
- प्रदूषक भुगतान सिद्धांत को व्यवहार में लागू करते हुए दोषी इकाइयों और उत्तरदायी प्रशासनिक इकाइयों की जवाबदेही तय की जाए।
- अवैध रेत खनन और पट्टा-नियमितीकरण से जुड़े निर्णयों में पारदर्शिता बढ़ाई जाए तथा संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
- पारिस्थितिकी निगरानी समिति की सिफारिशों को समयबद्ध कार्य-योजना में बदला जाए और उसकी प्रगति का सार्वजनिक प्रतिवेदन प्रकाशित किया जाए।
- नदी किनारे के निर्माण-प्रतिबंध और खतरनाक उद्योगों की दूरी संबंधी दिशा-निर्देशों को स्थानीय योजना प्रक्रिया में समाहित किया जाए।
- न्यायिक निर्देशों और नियामक संस्थाओं के कार्य के बीच स्पष्ट भूमिका-विभाजन सुनिश्चित किया जाए, ताकि नियामक अपने दायित्वों का निर्वहन स्वयं कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
प्रदूषक भुगतान सिद्धांत (Polluter Pays Principle) · सावधानी सिद्धांत (Precautionary Principle) · औद्योगिक बहिःस्राव (Industrial Effluents) · सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्र (Common Effluent Treatment Plant, CETP) · राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (State Pollution Control Board, SPCB) · राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal, NGT) · अनुच्छेद 21 और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार · न्यायिक सक्रियता बनाम न्यायिक अतिक्रमण · नियामक विफलता (Regulatory Failure) · अवैध रेत खनन और नदी पारिस्थितिकी · मलजल उपचार क्षमता (Sewage Treatment Capacity) · सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (Public Trust Doctrine)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: स्वच्छ पर्यावरण और स्वास्थ्य का अधिकार
- अनुच्छेद 48A: राज्य का पर्यावरण संरक्षण दायित्व
- अनुच्छेद 51A(छ): नदियों और पर्यावरण की रक्षा का मूल कर्तव्य
- अनुच्छेद 32: सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिका का अधिकार
- अनुच्छेद 226: उच्च न्यायालय द्वारा रिट क्षेत्राधिकार
अवधारणा प्रवाह
वस्त्र रंगाई और इस्पात उद्योगों से अनुपचारित या अपर्याप्त उपचारित औद्योगिक अपशिष्ट निकलता है। → उपचार संयंत्रों की कम क्षमता, खराब संपर्क और सामूहिक संयंत्रों के कम उपयोग से अपशिष्ट सीधे नदियों और भूमि में पहुँचता है। → शुष्क क्षेत्र की मौसमी नदियों में सीमित प्रवाह के कारण प्रदूषकों का सांद्रण बढ़ता है। → दूषित जल और मिट्टी से लगभग 20 लाख निवासियों के स्वास्थ्य और आजीविका पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। → नियामक तंत्र की विफलता और जनहित याचिका के बाद न्यायालय हस्तक्षेप करता है और निर्माण-प्रतिबंध तथा निगरानी समिति जैसे निर्देश देता है। → प्रदूषक भुगतान सिद्धांत के आधार पर राज्य की उत्तरदायित्व-सीमा और नियामक जवाबदेही का प्रश्न सामने आता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अंतर्गत केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के गठन का प्रावधान है।
2. संविधान का अनुच्छेद 48A, 42वें संविधान संशोधन द्वारा जोड़ा गया, जो राज्य को पर्यावरण की रक्षा और उसके संवर्धन का निर्देश देता है।
3. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 भोपाल गैस त्रासदी से पहले अधिनियमित किया गया था।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: जल अधिनियम, 1974 केंद्रीय और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों की व्यवस्था करता है। कथन 2 सही है: अनुच्छेद 48A (राज्य नीति का निदेशक तत्व) 42वें संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया। कथन 3 गलत है: पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 भोपाल गैस त्रासदी (1984) के बाद बना, इसलिए यह कथन असत्य है। अतः सही उत्तर ‘केवल दो’ है।
Q2. प्रकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
प्रकथन (A): राष्ट्रीय हरित अधिकरण पर्यावरणीय क्षति के पीड़ितों को प्रतिकर (Compensation) देने का आदेश दे सकता है।
कारण (R): राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 15 अधिकरण को पर्यावरणीय क्षति के लिए राहत और प्रतिकर देने की शक्ति प्रदान करती है।
नीचे दिए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — प्रकथन (A) सही है, क्योंकि अधिकरण पर्यावरणीय क्षति के लिए प्रतिकर का आदेश दे सकता है। कारण (R) भी सही है: अधिनियम की धारा 15 इसी शक्ति का स्रोत है। अतः (R) सीधे (A) की वैधानिक व्याख्या करता है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन पर विचार कीजिए:
सूची I (संवैधानिक प्रावधान)
A. अनुच्छेद 48A
B. अनुच्छेद 51A(g)
C. अनुच्छेद 21
सूची II (प्रकृति/विषय)
1. मूल कर्तव्य
2. राज्य नीति के निदेशक तत्व
3. प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार
नीचे दिए कूट से सही सुमेलन चुनिए:
- A-2, B-1, C-3
- A-1, B-2, C-3
- A-2, B-3, C-1
- A-3, B-1, C-2
उत्तर: A-2, B-1, C-3 — अनुच्छेद 48A राज्य नीति का निदेशक तत्व है (A-2)। अनुच्छेद 51A(g) नागरिकों का मूल कर्तव्य है, जो पर्यावरण की रक्षा और संवर्धन का कर्तव्य देता है (B-1)। अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार है, जिसकी व्याख्या में न्यायालय ने स्वच्छ पर्यावरण को सम्मिलित किया है (C-3)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ राजस्थान की जोजरी, लूनी और बांडी जैसी मौसमी नदियों में औद्योगिक बहिःस्राव के प्रवाह की समस्या दशकों पुरानी है, जबकि पर्यावरण संरक्षण के लिए विधिक ढांचा मौजूद है। इस संदर्भ में राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे नियामकों की विफलता के कारणों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या नियामक कार्यों का स्थान स्वयं न्यायालय द्वारा ग्रहण किया जाना (जैसे निर्माण पर प्रतिबंध और निगरानी समिति के माध्यम से) दीर्घकालिक समाधान हो सकता है? (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना:
1. भूमिका: जोजरी, लूनी और बांडी नदियाँ (जोधपुर, बालोतरा, पाली जिले); वस्त्र रंगाई और इस्पात क्षेत्र से बहिःस्राव; लगभग 20 लाख निवासियों का स्वास्थ्य जोखिम में; उच्च न्यायालय में 2011 की जनहित याचिका; सर्वोच्च न्यायालय का 2025 का स्वतःसंज्ञान रिट।
2. विधिक ढांचा: अनुच्छेद 21 (स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार, सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991); अनुच्छेद 48A और 51A(g); जल अधिनियम, 1974 (धारा 25 सहमति, धारा 24 नदी प्रदूषण पर रोक); पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986; राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 (धारा 15)।
3. नियामक विफलता के कारण: बहिःस्राव का उपचार संयंत्रों को बायपास करना; सामान्य अपशिष्ट उपचार संयंत्रों का कम उपयोग; मलजल उपचार क्षमता लगभग आधी; अवैध रेत खनन के बारे में जानकारी होने पर भी लीज़ नियमित करना; संभावित मिलीभगत का संदेह; 2022 के राष्ट्रीय हरित अधिकरण आदेश पर रोक से प्रवर्तन में विलंब। विश्लेषण में प्रशासनिक क्षमता, राजनीतिक-आर्थिक दबाव और जवाबदेही तंत्र की कमी को अलग-अलग परखें।
4. प्रदूषक भुगतान सिद्धांत: इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ (1996) में मान्यता; न्यायाधीश द्वारा राज्य पर दायित्व की संभावना को उपलब्ध बताना; राज्य की लापरवाही पर भी इसका विस्तार।
5. न्यायिक हस्तक्षेप का पक्ष-विपक्ष: पक्ष में: सार्वजनिक न्यास सिद्धांत (एम.सी. मेहता बनाम कमल नाथ, 1997), प्रत्यक्ष राहत और तत्काल कार्रवाई। विपक्ष में: विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1998) की निगरानी सीमा से परे जाना, विशेषज्ञता का अभाव, नियामकों की जवाबदेही कमजोर होना और न्यायिक संसाधनों पर भार। संतुलन: न्यायालय को नियामकों को उनके कर्तव्य निभाने के लिए बाध्य करना चाहिए, स्वयं प्रशासन नहीं चलाना चाहिए।
6. निष्कर्ष: सुधार हेतु नियामक क्षमता वृद्धि, वास्तविक समय निगरानी, अवैध खनन पर दंडात्मक प्रवर्तन, सीईटीपी का पूर्ण उपयोग, और राष्ट्रीय हरित अधिकरण के आदेशों का प्रभावी क्रियान्वयन, जिसमें न्यायालय की भूमिका सहायक और अनुशासनात्मक हो।
स्रोत: The Hindu
Rajasthan PCS (RPSC / RAS) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: राजस्थान में नदियों के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए ‘राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड’ द्वारा हाल ही में शुरू की गई प्रमुख पहल कौन सी है?
- A. जल जीवन मिशन
- B. नमामि गंगे कार्यक्रम
- C. जल शक्ति अभियान
- D. राजस्थान नदी संरक्षण मिशन
उत्तर: D. राजस्थान नदी संरक्षण मिशन — राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए ‘राजस्थान नदी संरक्षण मिशन’ नामक पहल शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य नदियों के जल गुणवत्ता में सुधार करना है।
Mains: राजस्थान में नदियों के प्रदूषण के प्रमुख कारणों एवं उनके प्रभावों का विश्लेषण करते हुए, राज्य सरकार द्वारा अपनाए गए प्रदूषण नियंत्रण उपायों का मूल्यांकन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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