ISRO का बड़ा अपडेट: 4 नेविगेशन सैटेलाइट पूरे, इस वित्त वर्ष में 5 और लॉन्च

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भारत के नौवहन उपग्रह विकासIRNSS शुरू2013 मेंNavIC नामक्षेत्रीय सेवाNVS श्रृंखलाउत्तराधिकारीGSLV-F18 प्रक्षेपणNVS-03 सफलउपग्रह संख्या 4PNT हेतु न्यूनतम
भारत के नौवहन उपग्रह विकास

✎ NavIC के पास निर्बाध और उच्च-सटीक सेवा के लिए सात उपग्रहों का समूह आवश्यक है, जबकि PNT के लिए न्यूनतम चार उपग्रह चाहिए; गगनयान से पहले तीन मानवरहित मिशन अनिवार्य हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — विज्ञान और प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, उपग्रह आधारित सेवाएँ और उनके अनुप्रयोग)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (नौवहन उपग्रह तंत्र की रणनीतिक और सुरक्षा-संबंधी उपयोगिता)  |  GS Paper II — शासन (अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार, IN-SPACe और भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023)
  • Prelims: NavIC (भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह तंत्र), IRNSS और NVS श्रृंखला के उपग्रह, GSLV, PSLV और SSLV प्रक्षेपण यान का अंतर, भू-समकालिक कक्षा (Geosynchronous Orbit) और भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Orbit), PNT: स्थिति, नौवहन और समय निर्धारण (Positioning, Navigation and Timing), गगनयान कार्यक्रम, मानवरहित मिशन और गगनयात्री, सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश), IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र)
  • Essay: अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी: आत्मनिर्भरता, सामरिक स्वायत्तता और आर्थिक संवृद्धि, मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम: वैज्ञानिक महत्त्व, सुरक्षा प्राथमिकता और राष्ट्रीय क्षमता-निर्माण

त्वरित पुनरावृत्ति: NavIC के पास निर्बाध और उच्च-सटीक सेवा के लिए सात उपग्रहों का समूह आवश्यक है, जबकि PNT के लिए न्यूनतम चार उपग्रह चाहिए; गगनयान से पहले तीन मानवरहित मिशन अनिवार्य हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के अध्यक्ष वी. नारायणन ने बताया कि GSLV-F18 मिशन द्वारा NVS-03 नौवहन उपग्रह को उसकी निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किए जाने के बाद भारत के पास अब चार नौवहन उपग्रह कक्षा में हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि PNT सेवाओं के लिए न्यूनतम चार उपग्रह आवश्यक हैं, जबकि निर्बाध सेवा और उच्च सटीकता के लिए सात उपग्रहों के उपग्रह समूह (Constellation) की आवश्यकता होगी। इसके साथ ही उन्होंने चालू वित्त वर्ष में पाँच और प्रक्षेपणों की योजना बताई, जिनमें मानवरहित गगनयान G मिशन, कम-से-कम दो PSLV मिशन, दो SSLV मिशन और एक निजी क्षेत्र का प्रक्षेपण शामिल हैं। समाचार में यह भी उल्लेख है कि गगनयान के लिए अब तक 8,000 से अधिक परीक्षण पूरे हो चुके हैं और मानव उड़ान से पहले तीन मानवरहित मिशन सफलतापूर्वक करने होंगे।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने अपने क्षेत्रीय नौवहन तंत्र की शुरुआत IRNSS (Indian Regional Navigation Satellite System) के अंतर्गत की थी, जिसका पहला उपग्रह IRNSS-1A वर्ष 2013 में प्रक्षेपित किया गया। यह तंत्र बाद में NavIC (Navigation with Indian Constellation) नाम से जाना गया और इसका प्राथमिक सेवा क्षेत्र भारत तथा उसके आसपास लगभग 1,500 किलोमीटर तक है।
  • NVS श्रृंखला के उपग्रह पुराने IRNSS उपग्रहों के उत्तराधिकारी के रूप में विकसित किए जा रहे हैं, ताकि पूरे उपग्रह समूह की कार्यक्षमता और जीवन-काल को बनाए रखा जा सके।
  • अमेरिका का GPS, रूस का GLONASS, यूरोपीय संघ का Galileo और चीन का BeiDou विश्व के प्रमुख स्वतंत्र नौवहन तंत्र हैं। भारत इन देशों के उस सीमित समूह में शामिल होने की दिशा में है, जिनके पास अपना स्वतंत्र नौवहन उपग्रह तंत्र है।
  • गगनयान कार्यक्रम की घोषणा वर्ष 2018 में की गई थी। इसका उद्देश्य भारतीय प्रक्षेपण यान से भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी की निचली कक्षा में भेजना और सुरक्षित रूप से वापस लाना है। मानव उड़ान से पहले मानवरहित मिशन अनिवार्य रखे गए हैं।
  • वर्ष 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए IN-SPACe की स्थापना की गई तथा वर्ष 2023 में भारतीय अंतरिक्ष नीति लागू की गई, जिससे निजी कंपनियों की भूमिका प्रक्षेपण और उपग्रह सेवाओं में बढ़ी है।

नाविक (NavIC) और गगनयान कार्यक्रम क्या है?

  • नौवहन उपग्रह तंत्र (Navigation Satellite System) ऐसे उपग्रहों का समूह है जो पृथ्वी पर स्थित उपयोगकर्ता के स्थान, दिशा और समय का सटीक निर्धारण करने में सहायता करते हैं।
  • NavIC एक क्षेत्रीय तंत्र है, अर्थात् यह वैश्विक कवरेज के बजाय मुख्यतः भारत और उसके परिवेश के क्षेत्र में सेवा देता है। इसमें भू-समकालिक और भू-स्थिर कक्षाओं के उपग्रह शामिल हैं।
  • PNT सेवाओं के लिए कम-से-कम चार उपग्रह आवश्यक हैं, किंतु निरंतर उपलब्धता और उच्च सटीकता के लिए सात उपग्रहों का पूर्ण समूह वांछित है।
  • प्रक्षेपण यानों की भूमिका अलग-अलग है: GSLV मुख्यतः भू-समकालिक कक्षा में भारी उपग्रहों के लिए, PSLV मुख्यतः ध्रुवीय सूर्य-समकालिक कक्षा के लिए और SSLV छोटे उपग्रहों के लिए उपयोग होता है।
  • गगनयान के अंतर्गत मानव-रेटेड प्रक्षेपण यान, चालक दल मॉड्यूल (Crew Module) और सेवा मॉड्यूल (Service Module) विकसित किए जा रहे हैं। मानवरहित मिशन इन प्रणालियों की विश्वसनीयता जाँचने के लिए होते हैं।
  • अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होती है, इसलिए मानव मिशन से पहले सिमुलेशन परीक्षण और मानवरहित उड़ानों का क्रम अपनाया जाता है।
  • श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र भारत का प्रमुख प्रक्षेपण स्थल है, जहाँ से GSLV, PSLV और SSLV जैसे प्रक्षेपण यान छोड़े जाते हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
NVS-03 का सफल प्रक्षेपण GSLV-F18 द्वारा नौवहन उपग्रह NVS-03 को निर्धारित कक्षा में स्थापित किया गया; कक्षा में भारत के अपने नौवहन उपग्रहों की संख्या अब 4 है।
PNT सेवाओं की आवश्यकता स्थिति निर्धारण, नौवहन और समय-निर्धारण (PNT – Positioning, Navigation and Timing) के लिए न्यूनतम 4 उपग्रह आवश्यक हैं, जबकि निरंतर और अधिक सटीक सेवा हेतु 7 उपग्रहों का समूह (constellation) लक्ष्य है।
शेष उपग्रहों की स्थिति दो उपग्रह अंतिम तैयारी के चरण में हैं और एक अन्य उपग्रह की स्वीकृति प्रक्रिया में है।
प्रक्षेपण यानों की विविधता इस वित्तीय वर्ष में GSLV के अतिरिक्त PSLV, SSLV तथा एक निजी क्षेत्र के प्रक्षेपण की योजना है, जो प्रक्षेपण क्षमता के विस्तार का संकेत है।
गगनयान का मानवरहित चरण मानव अंतरिक्ष उड़ान से पहले तीन मानवरहित मिशन सफलतापूर्वक पूरे करने होंगे; अब तक 8,000 से अधिक परीक्षण पूरे किए जा चुके हैं।
वार्षिक प्रक्षेपण लक्ष्य कुल छह प्रक्षेपणों का लक्ष्य है, किंतु प्राथमिक उद्देश्य कम से कम पाँच मिशन पूरे करना है।

महत्व

रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी महत्व

  • स्वदेशी नौवहन प्रणाली (NavIC – Navigation with Indian Constellation) से देश को बाहरी उपग्रह प्रणालियों पर पूर्ण निर्भरता से राहत मिलती है।
  • NavIC में अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा (restricted service) उपलब्ध है, जो रक्षा और सुरक्षा बलों की आवश्यकताओं के लिए उपयोगी है।
  • भारत उन कुछ देशों में शामिल होने की ओर बढ़ रहा है जिनके पास अपना नौवहन उपग्रह समूह है, जैसे अमेरिका (GPS), रूस (GLONASS), चीन (BeiDou), यूरोपीय संघ (Galileo) और जापान (QZSS)।

आर्थिक और सामाजिक महत्व

  • परिवहन, विमानन, समुद्री नौवहन और मत्स्य क्षेत्र में सटीक स्थिति-ज्ञान से दक्षता और सुरक्षा बढ़ती है।
  • आपदा प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं में स्थान-आधारित सूचना के माध्यम से त्वरित प्रतिक्रिया संभव होती है।
  • समय-समकालन (time synchronisation) सेवाएँ दूरसंचार और वित्तीय लेन-देन के नेटवर्क में सटीक समय-मुहर सुनिश्चित करने में सहायक हैं।

वैज्ञानिक और तकनीकी महत्व

  • NVS श्रृंखला के उपग्रह और GSLV जैसे प्रक्षेपण यान स्वदेशी तकनीक की क्षमता का प्रदर्शन करते हैं।
  • गगनयान कार्यक्रम में क्रू मॉड्यूल, सर्विस मॉड्यूल और जीवन-रक्षा प्रणालियों का विकास देश की मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता को आगे बढ़ाता है।

औद्योगिक और नीतिगत महत्व

  • निजी क्षेत्र के प्रक्षेपण की योजना अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी भागीदारी की नीति के व्यावहारिक क्रियान्वयन का उदाहरण है।
  • उपग्रह और प्रक्षेपण यान के घटक-निर्माण में लगे उद्योगों और स्टार्टअप्स के लिए अवसर बढ़ते हैं।

चुनौतियाँ

1. संरूपण में अंतर

  • सटीक और निरंतर सेवा के लिए 7 उपग्रहों का समूह आवश्यक है, जबकि अभी 4 उपग्रह कक्षा में हैं।
  • शेष उपग्रहों की तैयारी और स्वीकृति में देरी होने पर पूर्ण सेवा का लक्ष्य आगे खिसक सकता है।
  • एक ही प्रणाली में उपग्रहों की संख्या कम होने पर किसी एक उपग्रह की विफलता का प्रभाव अधिक गंभीर होता है।

2. प्रक्षेपण कार्यक्रम का समय-निर्धारण

  • एक वित्तीय वर्ष में पाँच से छह प्रक्षेपण पूरे करना प्रक्षेपण-स्थल, तैयारी-दल और घटकों की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
  • प्रक्षेपण आवृत्ति (launch cadence) बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रक्षेपण यानों की विश्वसनीयता और उत्पादन-क्षमता आवश्यक है।

3. मानव अंतरिक्ष उड़ान की सुरक्षा

  • मानव अंतरिक्ष उड़ान में अंतरिक्ष यात्रियों (गगनयात्रियों) की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए मानवरहित मिशनों का क्रम अनिवार्य है।
  • जीवन-रक्षा प्रणाली, आपातकालीन निकास (abort) और पुनःप्रवेश से जुड़ी तकनीकी जटिलताएँ बड़ी चुनौती हैं।
  • सिमुलेशन परीक्षणों की विश्वसनीयता सिद्ध करना और वास्तविक उड़ान से पहले सभी प्रणालियों का सत्यापन आवश्यक है।

4. निजी क्षेत्र की भागीदारी का नियमन

  • निजी प्रक्षेपण को सक्षम बनाने के लिए अधिकृत तंत्र, तकनीकी हस्तांतरण और सुरक्षा मानकों की स्पष्ट व्यवस्था आवश्यक है।
  • सरकारी संस्थाओं (ISRO) और निजी इकाइयों के बीच भूमिकाओं का स्पष्ट विभाजन शासन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

5. अंतरराष्ट्रीय दायित्व और अंतरिक्ष मलबा

  • बढ़ते प्रक्षेपणों से अंतरिक्ष मलबे (space debris) का खतरा बढ़ता है, जो सक्रिय उपग्रहों के लिए जोखिम है।
  • बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 के अंतर्गत राष्ट्रों के दायित्व और अंतरिक्ष गतिविधियों के उत्तरदायित्व के सिद्धांत लागू होते हैं।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
उपग्रह संख्या में कमी 4 उपग्रहों से पूर्ण और निरंतर सेवा संभव नहीं; 7 उपग्रहों का लक्ष्य अभी दूर है।
प्रक्षेपण लक्ष्य की व्यवहार्यता छह प्रक्षेपणों का लक्ष्य समय-सीमा में पूरा करना तकनीकी तैयारी और संसाधनों पर निर्भर है।
गगनयान की सुरक्षा मानवरहित मिशनों की सफलता के बिना मानव उड़ान की समय-सारणी अनिश्चित रहती है।
निजी प्रक्षेपण का नियमन निजी इकाई के प्रक्षेपण में सुरक्षा, दायित्व और निगरानी के मानक स्पष्ट होने आवश्यक हैं।
अंतरिक्ष मलबा प्रक्षेपणों की बढ़ती संख्या से कक्षाओं में भीड़ और टक्कर का जोखिम बढ़ता है।

आगे की राह

  • शेष उपग्रहों की तैयारी और स्वीकृति प्रक्रिया में समयबद्ध निगरानी से 7 उपग्रह समूह का लक्ष्य सुनिश्चित किया जाए।
  • PSLV, SSLV और GSLV के प्रक्षेपण-कैडेंस को स्थिर रखने के लिए उत्पादन, परीक्षण और प्रक्षेपण-स्थल की क्षमता बढ़ाई जाए।
  • गगनयान के तीनों मानवरहित मिशनों में जीवन-रक्षा और आपातकालीन प्रणालियों के परीक्षण को प्राथमिकता दी जाए।
  • निजी प्रक्षेपण के लिए सुरक्षा, लाइसेंसिंग और दायित्व के मानकों को स्पष्ट और पारदर्शी बनाया जाए।
  • सरकारी संस्था और निजी उद्योग के बीच तकनीकी हस्तांतरण और सहयोग की व्यवस्था सुदृढ़ की जाए।
  • नौवहन सेवाओं के नागरिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए उपयोगकर्ता-अनुकूल उपकरण और मानक विकसित किए जाएँ।
  • अंतरिक्ष मलबा-प्रबंधन के उपायों को राष्ट्रीय नीति में शामिल कर अंतरराष्ट्रीय दिशानिर्देशों के अनुरूप किया जाए।
  • वैज्ञानिक-तकनीकी शिक्षा और अनुसंधान में अंतरिक्ष विज्ञान को शामिल कर भविष्य की मानव-संसाधन क्षमता तैयार की जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

नौचालन उपग्रह तंत्र (NavIC) · भारतीय क्षेत्रीय नौचालन उपग्रह प्रणाली (IRNSS) · स्थिति, नौचालन और समय निर्धारण (PNT) · गगनयान कार्यक्रम · GSLV और PSLV प्रक्षेपण यान · IN-SPACe (भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र) · अंतरिक्ष क्षेत्र सुधार · बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 · दोहरे उपयोग वाली प्रौद्योगिकी · आत्मनिर्भर भारत और रक्षा-नागरिक समन्वय · जीएनएसएस (GNSS) पर वैश्विक निर्भरता

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51A(h): वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानववाद का विकास
  • अनुच्छेद 73: संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार

अवधारणा प्रवाह

GSLV-F18 द्वारा नौवहन उपग्रह NVS-03 का सफल प्रक्षेपण  →  कक्षा में भारत के नौवहन उपग्रहों की संख्या 4 तक पहुँची  →  PNT सेवा की निरंतरता के लिए 7 उपग्रहों का समूह आवश्यक  →  शेष उपग्रहों की तैयारी और स्वीकृति के माध्यम से समूह का विस्तार  →  इस वित्तीय वर्ष में PSLV, SSLV, निजी प्रक्षेपण और गगनयान G सहित प्रक्षेपण कार्यक्रम  →  गगनयान में तीन मानवरहित मिशन सफल होने के बाद ही मानव उड़ान

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. NavIC एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नौचालन उपग्रह तंत्र है, जिसे भारत ने विकसित किया है।
2. NavIC मानक स्थिति सेवा (Standard Positioning Service) सभी उपयोगकर्ताओं को देता है, जबकि प्रतिबंधित सेवा (Restricted Service) केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए है।
3. NavIC के सभी उपग्रह निम्न पृथ्वी कक्षा (Low Earth Orbit) में स्थापित हैं।

उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: NavIC भारत का स्वतंत्र क्षेत्रीय तंत्र है और इसका प्राथमिक सेवा क्षेत्र भारत तथा उसके आसपास लगभग 1,500 किमी तक है। कथन 2 सही है: मानक स्थिति सेवा नागरिक उपयोग के लिए खुली है, जबकि प्रतिबंधित सेवा अधिकृत (रणनीतिक) उपयोगकर्ताओं के लिए है। कथन 3 गलत है: NavIC में 3 भू-स्थिर (GEO) और 4 भू-समकालिक (GSO) उपग्रह हैं, न कि निम्न पृथ्वी कक्षा में।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए:
कथन (A): भारत मानव अंतरिक्ष उड़ान से पहले गगनयान के मानवरहित (uncrewed) मिशनों को पूरा करने पर बल दे रहा है।
कारण (R): मानव-योग्य (human-rated) प्रणालियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्रू मॉड्यूल और सेवा मॉड्यूल जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियों का मानवरहित उड़ानों में सत्यापन आवश्यक है।

नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सही हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सही है, परंतु (R) गलत है।
  4. (A) गलत है, परंतु (R) सही है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या है। — (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की तार्किक व्याख्या करता है। ISRO के अध्यक्ष ने स्पष्ट किया कि अंतरिक्षयात्रियों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है, इसलिए पहले मानवरहित मिशन आयोजित किए जा रहे हैं। मानव-योग्य प्रणाली का सत्यापन इसी उद्देश्य से होता है।

Q3. निम्नलिखित संधियों/समझौतों को उनके मुख्य प्रावधानों से सुमेलित कीजिए:

सूची I (संधि/समझौता)
A. बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967
B. दायित्व सम्मेलन, 1972
C. पंजीकरण सम्मेलन, 1975
D. बचाव समझौता, 1968

सूची II (प्रावधान)
1. अंतरिक्ष वस्तुओं से होने वाली क्षति के लिए राष्ट्रों का दायित्व
2. अंतरिक्ष वस्तुओं का राष्ट्रीय पंजीकरण
3. अंतरिक्षयात्रियों का बचाव और सुरक्षित वापसी
4. अंतरिक्ष की खोज में सभी राष्ट्रों की स्वतंत्रता और किसी भी राष्ट्र द्वारा अंतरिक्ष पर राष्ट्रीय स्वामित्व का निषेध

सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-4, B-1, C-2, D-3
  2. A-1, B-4, C-3, D-2
  3. A-3, B-2, C-4, D-1
  4. A-2, B-3, C-1, D-4

उत्तर: A-4, B-1, C-2, D-3 — बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967) अंतरिक्ष की खोज की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय विनियोजन के निषेध की बात करती है (A-4)। दायित्व सम्मेलन (1972) क्षति के लिए दायित्व तय करता है (B-1)। पंजीकरण सम्मेलन (1975) अंतरिक्ष वस्तुओं के पंजीकरण से संबंधित है (C-2)। बचाव समझौता (1968) अंतरिक्षयात्रियों के बचाव और वापसी से संबंधित है (D-3)। भारत इन संधियों का पक्षकार है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत का स्वदेशी नौचालन उपग्रह तंत्र (NavIC) रणनीतिक और नागरिक, दोनों आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, फिर भी स्थिति, नौचालन और समय निर्धारण (PNT) सेवाओं में वैश्विक प्रणालियों पर निर्भरता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। इस कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही बताइए कि गगनयान जैसे मानव अंतरिक्ष कार्यक्रमों और निजी क्षेत्र की भागीदारी से भारत की अंतरिक्ष क्षमता को किस प्रकार नई दिशा मिल सकती है और इन उपलब्धियों के समक्ष कौन-सी नीतिगत चुनौतियाँ बनी हुई हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल उत्तर संरचना: (1) परिचय: ISRO के अध्यक्ष के अनुसार NVS-03 के प्रक्षेपण के बाद NavIC में चार उपग्रह कक्षा में हैं, जबकि सतत एवं अत्यंत सटीक सेवा के लिए सात उपग्रहों का समूह (constellation) आवश्यक है। (2) NavIC की संरचना: IRNSS के अंतर्गत 3 भू-स्थिर (GEO) और 4 भू-समकालिक (GSO) उपग्रह; भारत और उसके आसपास लगभग 1,500 किमी का प्राथमिक सेवा क्षेत्र; मानक स्थिति सेवा (नागरिक) और प्रतिबंधित सेवा (रणनीतिक/अधिकृत) में अंतर। (3) रणनीतिक महत्व: सीमा-निगरानी, नौवहन, आपदा प्रबंधन और मिसाइल/ड्रोन मार्गदर्शन में प्रासंगिकता; अमेरिकी GPS, रूसी GLONASS, यूरोपीय Galileo और चीनी BeiDou के साथ तुलना। (4) आलोचनात्मक विश्लेषण: सात-उपग्रह समूह पूरा होने तक पूर्ण स्वायत्तता का अभाव; उपयोगकर्ता-स्तर पर NavIC चिप/रिसीवर का व्यापक एकीकरण आवश्यक; वैश्विक पहुँच की सीमा। (5) अंतरिक्ष सुधार: 2020 के सुधारों के अंतर्गत निजी क्षेत्र के लिए IN-SPACe की स्थापना और उसकी प्राधिकरण भूमिका; नई अंतरिक्ष इंडिया लिमिटेड (NSIL) की भूमिका; एक निजी-क्षेत्र प्रक्षेपण की योजना। (6) गगनयान: मानव अंतरिक्ष उड़ान के लिए तीन मानवरहित मिशन, क्रू मॉड्यूल और सेवा मॉड्यूल का सत्यापन; सुरक्षा-प्रथम दृष्टिकोण। (7) अंतरराष्ट्रीय विधि: बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 (अनुच्छेद I और VI, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व); दायित्व सम्मेलन, 1972; पंजीकरण सम्मेलन, 1975; दोहरे उपयोग तकनीक पर अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण व्यवस्था। (8) संवैधानिक संदर्भ: अनुच्छेद 51 (अंतरराष्ट्रीय शांति को बढ़ावा) और अनुच्छेद 51क(ज) (वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास) के संदर्भ में अंतरिक्ष अनुसंधान का औचित्य। (9) चुनौतियाँ: वित्तीय संसाधन, प्रक्षेपण आवृत्ति, उद्योग-क्षमता, अंतरिक्ष मलबा, और आत्मनिर्भरता बनाम अंतरराष्ट्रीय सहयोग का संतुलन। (10) निष्कर्ष: स्वदेशी तंत्र की सार्थकता तभी है जब सेवा-गुणवत्ता, उपयोगकर्ता-पहुँच और नियामक स्पष्टता साथ-साथ विकसित हों।

स्रोत: orissapost.com


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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