जीएसएलवी-एफ18 के सफल प्रक्षेपण पर पीएम ने इसरो की सराहना की, जानिए NVS-03 मिशन की खासियत

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जीएसएलवी-एफ18 के सफल प्रक्षेपण पर पीएम ने इसरो की सराहना की, जानिए NVS-03 मिशन की खासियत

नाविक प्रणाली का विकास एवं प्रक्षेपण प्रक्रियास्वीकृति2006उपग्रह निर्माणNVS-03प्रक्षेपणGSLV-F18कक्षा स्थापनानाविक नक्षत्रसेवा में शामिलक्षेत्रीय नौवहन
नाविक प्रणाली का विकास एवं प्रक्षेपण प्रक्रिया

✎ नाविक (NavIC) भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है, जिसके उपग्रह GSLV जैसे स्वदेशी प्रक्षेपण यानों से स्थापित किए जाते हैं, और इसके प्रक्षेपण-तंत्र की क्षमता का आधार क्रायोजेनिक उपरी चरण है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और उसके अनुप्रयोग)  |  GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (नौवहन उपग्रह प्रणालियों का रणनीतिक उपयोग)
  • Prelims: नाविक (NavIC – Navigation with Indian Constellation) और इसका संरचना-तंत्र, भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV – Geosynchronous Satellite Launch Vehicle), क्रायोजेनिक उपरी चरण (Cryogenic Upper Stage) और इसका महत्व, भू-स्थिर कक्षा (Geostationary Orbit) बनाम भू-तुल्यकाली कक्षा (Geosynchronous Orbit), सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (Satish Dhawan Space Centre, Sriharikota), अंतरिक्ष विभाग (Department of Space) और अंतरिक्ष आयोग (Space Commission), L5 और S बैंड के संकेत तथा नौवहन सेवाओं के प्रकार (SPS और RS), GNSS बनाम क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली में अंतर
  • Essay: आत्मनिर्भर भारत और अंतरिक्ष क्षेत्र: स्वदेशी प्रौद्योगिकी से राष्ट्रीय सामर्थ्य का निर्माण, नौवहन उपग्रह प्रणालियाँ: आर्थिक, सामरिक और सामाजिक उपयोगिता

त्वरित पुनरावृत्ति: नाविक (NavIC) भारत की स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है, जिसके उपग्रह GSLV जैसे स्वदेशी प्रक्षेपण यानों से स्थापित किए जाते हैं, और इसके प्रक्षेपण-तंत्र की क्षमता का आधार क्रायोजेनिक उपरी चरण है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने भूस्थैतिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) के F18 मिशन से नाविक (NavIC) प्रणाली के उपग्रह NVS-03 का प्रक्षेपण किया। प्रधानमंत्री ने वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को इस सफल प्रक्षेपण के लिए बधाई दी। यह घटना इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नाविक प्रणाली भारत की अपनी क्षेत्रीय नौवहन व्यवस्था है और इसके उपग्रहों का नियमित प्रतिस्थापन एवं विस्तार इस प्रणाली की निरंतरता तथा सेवा-गुणवत्ता के लिए आवश्यक है। परीक्षा की दृष्टि से इस समाचार का केंद्र बिंदु प्रक्षेपण-तंत्र की स्वदेशी क्षमता और अंतरिक्ष आधारित राष्ट्रीय अवसंरचना के रखरखाव की प्रक्रिया है।

पृष्ठभूमि

  • भारत ने अपनी स्वतंत्र क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली के लिए भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (IRNSS – Indian Regional Navigation Satellite System) की परियोजना को वर्ष 2006 में मंजूरी दी थी, जिसे बाद में नाविक नाम दिया गया।
  • नाविक की मूल संकल्पना में सात उपग्रह शामिल हैं, जिनमें से तीन भू-स्थिर कक्षा में और चार भू-तुल्यकाली झुकी हुई कक्षा में स्थापित किए गए हैं।
  • नाविक की सेवा-सीमा मुख्यतः भारत और उसके आसपास लगभग 1500 किलोमीटर के क्षेत्र तक निर्धारित है, जबकि इसका विस्तारित क्षेत्र उससे भी बड़ा है।
  • भारत में प्रक्षेपण-यानों का विकास मुख्यतः सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र, श्रीहरिकोटा (आंध्र प्रदेश) से होता है, और GSLV में स्वदेशी क्रायोजेनिक उपरी चरण का प्रयोग इसकी भू-तुल्यकाली कक्षा में भारी उपग्रह पहुँचाने की क्षमता का आधार है।
  • अंतरिक्ष गतिविधियों का प्रशासनिक ढाँचा अंतरिक्ष विभाग के अधीन है, जिसकी नीतिगत देखरेख अंतरिक्ष आयोग करता है।

नाविक (NavIC) और GSLV प्रक्षेपण का स्वरूप क्या है?

  • नाविक एक क्षेत्रीय उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जो भारत और उसके आसपास के क्षेत्र में स्थिति (position), दिशा और समय से संबंधित सूचना प्रदान करती है।
  • नाविक की प्रणाली में अंतरिक्ष खंड (space segment), भू-खंड (ground segment) और उपयोगकर्ता खंड (user segment) शामिल हैं, और तीनों का समन्वित संचालन सेवा की विश्वसनीयता तय करता है।
  • इसकी दो प्रमुख सेवाएँ हैं: नागरिक उपयोग के लिए मानक स्थिति सेवा (SPS) तथा अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए प्रतिबंधित सेवा (RS)।
  • नाविक के उपग्रह L5 और S बैंड में संकेत प्रसारित करते हैं, जिससे यह प्रणाली भारतीय परिस्थितियों में सटीक स्थिति निर्धारण के लिए उपयोगी मानी जाती है।
  • GSLV एक तीन-चरणीय प्रक्षेपण यान है, जिसके पहले चरण में ठोस ईंधन, दूसरे चरण में द्रव ईंधन और तीसरे (उपरी) चरण में क्रायोजेनिक इंजन प्रयुक्त होता है।
  • भू-तुल्यकाली उपग्रह भू-स्थिर कक्षा या उसके निकट की कक्षा में स्थापित किए जाते हैं, जहाँ से वे पृथ्वी के किसी निश्चित क्षेत्र से निरंतर संपर्क बनाए रख सकते हैं।
  • क्षेत्रीय प्रणालियाँ वैश्विक प्रणालियों (जैसे GPS) से भिन्न हैं, क्योंकि वे सीमित क्षेत्र में केंद्रित सेवा देती हैं और रणनीतिक स्वायत्तता को सुदृढ़ करती हैं।
  • उपग्रहों का प्रतिस्थापन और समय-समय पर नए उपग्रहों का प्रक्षेपण प्रणाली की सेवा-निरंतरता के लिए आवश्यक होता है, क्योंकि उपग्रहों की परिचालन आयु सीमित होती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्त्व
प्रक्षेपण यान: GSLV-F18 (भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान, GSLV) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का भारी उपग्रहों को भू-समकालिक अंतरण कक्षा (GTO) में पहुँचाने वाला प्रमुख प्रक्षेपण यान; इसी श्रेणी के यान से नौवहन उपग्रहों का प्रक्षेपण होता है।
पेलोड: NVS-03 उपग्रह नाविक (NavIC – Navigation with Indian Constellation) प्रणाली के नौवहन उपग्रह श्रृंखला का तीसरा उपग्रह; भारत के क्षेत्रीय नौवहन नक्षत्र को सुदृढ़ करने में सहायक।
नाविक (NavIC) प्रणाली की प्रकृति यह एक क्षेत्रीय (Regional) उपग्रह नौवहन प्रणाली है, जो मुख्यतः भारतीय भूभाग और उसके आसपास लगभग 1500 किलोमीटर के क्षेत्र में स्थिति एवं समय संबंधी सूचना देती है।
प्रक्षेपण स्थल: श्रीहरिकोटा आंध्र प्रदेश स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से प्रक्षेपण; यह भारत का मुख्य प्रक्षेपण केंद्र है, जहाँ से पूर्वी तट पर भूमध्यरेखीय प्रक्षेपण का लाभ मिलता है।
स्वदेशी क्षमता का पक्ष प्रक्षेपण यान के ऊपरी चरण में क्रायोजेनिक इंजन का उपयोग होता है; इससे भारी उपग्रहों को उच्च ऊर्जा वाली कक्षा में भेजने की स्वदेशी क्षमता का प्रदर्शन होता है।
प्रधानमंत्री की सार्वजनिक बधाई सरकार के शीर्ष स्तर से वैज्ञानिकों और अभियंताओं की सराहना; अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता और संस्थागत मनोबल का संकेत।

महत्व

सामरिक एवं सुरक्षा संबंधी

  • नाविक (NavIC) प्रणाली सैन्य एवं सुरक्षा बलों को स्वतंत्र नौवहन क्षमता देती है, जिससे विदेशी वैश्विक नौवहन प्रणालियों पर पूर्ण निर्भरता घटती है।
  • क्षेत्रीय कवरेज के कारण भारत की सीमा और समुद्री क्षेत्र की निगरानी तथा आपदा के समय संचार में सहायता मिलती है।

आर्थिक एवं नागरिक उपयोग

  • परिवहन, लॉजिस्टिक्स, मत्स्यन और वाहन ट्रैकिंग जैसे क्षेत्रों में स्थानीय नौवहन सेवाओं का आधार मजबूत होता है।
  • स्वदेशी नौवहन डेटा से डिजिटल सेवाओं और स्थान-आधारित उद्योगों के विकास की संभावना बढ़ती है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी

  • भारी उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण से प्रक्षेपण यान प्रौद्योगिकी, ऊपरी चरण के नियंत्रण और कक्षा-सम्मिलन में अनुभव बढ़ता है।
  • अंतरिक्ष विज्ञान में अनुसंधान और युवा वैज्ञानिकों के प्रशिक्षण के लिए व्यावहारिक आधार तैयार होता है।

शासन एवं संस्थागत

  • अंतरिक्ष विभाग और ISRO की परियोजना-प्रबंधन क्षमता का सार्वजनिक प्रमाण मिलता है।
  • वैज्ञानिक उपलब्धियों की सार्वजनिक स्वीकृति से विज्ञान के प्रति जनसामान्य में रुचि और वैज्ञानिक दृष्टिकोण (Scientific Temper) को बल मिलता है।

चुनौतियाँ

1. प्रक्षेपण यान की विश्वसनीयता

  • प्रक्षेपण यानों की सफलता दर निरंतर बनी रहना आवश्यक है, क्योंकि एक भी असफलता उपग्रह और पूरी परियोजना की लागत को प्रभावित करती है।
  • ऊपरी चरण की जटिल प्रणालियों में अत्यधिक सटीकता और परीक्षण की आवश्यकता होती है।

2. नक्षत्र का रखरखाव और प्रतिस्थापन

  • नाविक नक्षत्र के उपग्रहों की कार्यकारी आयु सीमित होती है, इसलिए समय-समय पर प्रतिस्थापन उपग्रह भेजना आवश्यक है।
  • एक ही नक्षत्र में विभिन्न पीढ़ियों के उपग्रहों का समन्वय तकनीकी और वित्तीय चुनौती है।

3. उपयोगकर्ता स्तर पर अपनाना

  • नाविक सेवा का लाभ तभी मिलता है जब मोबाइल, वाहन और उपकरणों में संगत रिसीवर उपलब्ध हों।
  • विदेशी वैश्विक प्रणालियों की तुलना में व्यापक उपयोग और जागरूकता अभी सीमित मानी जाती है।

4. अंतरिक्ष मलबा और कक्षीय भीड़

  • निचली और भू-समकालिक कक्षाओं में बढ़ते उपग्रह और मलबे से टकराव का जोखिम बढ़ रहा है।
  • सक्रिय उपग्रहों के जीवनकाल-अंत पर उन्हें सुरक्षित कक्षा से हटाने के मानक अनिवार्य होते जा रहे हैं।

5. विधिक एवं नियामक ढाँचा

  • निजी क्षेत्र और स्टार्टअप की अंतरिक्ष गतिविधियों में भागीदारी बढ़ने से व्यापक विधिक ढाँचे की आवश्यकता बढ़ी है।
  • भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष संवर्धन और प्राधिकरण केंद्र (IN-SPACe) की भूमिका के साथ नियामक स्पष्टता बनाए रखना चुनौती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
प्रक्षेपण की सफलता दर असफलता से उपग्रह की हानि, समय और संसाधनों का व्यय तथा परियोजनाओं में देरी।
नक्षत्र की निरंतरता पुराने उपग्रहों के जीवनकाल के बाद सेवा में व्यवधान की आशंका।
उपकरणों में संगतता नाविक सेवा के व्यापक उपयोग हेतु रिसीवर चिप और उपकरणों का सीमित प्रसार।
अंतरिक्ष मलबा कक्षाओं में भीड़ बढ़ने से टकराव और दीर्घकालिक सुरक्षा का जोखिम।
विधिक ढाँचा निजी भागीदारी के लिए स्पष्ट और व्यापक कानूनी प्रावधानों की अपेक्षा।

आगे की राह

  • नाविक नक्षत्र के उपग्रहों का समयबद्ध प्रतिस्थापन और उनकी कार्यकारी आयु का नियमित मूल्यांकन सुनिश्चित किया जाए।
  • प्रक्षेपण यानों के परीक्षण, गुणवत्ता नियंत्रण और असफलता-विश्लेषण की प्रक्रियाओं को और सुदृढ़ किया जाए।
  • नाविक (NavIC) संगत रिसीवर के स्वदेशी विनिर्माण को प्रोत्साहित कर उपकरण निर्माताओं को सहभागी बनाया जाए।
  • परिवहन, आपदा प्रबंधन और कृषि जैसे क्षेत्रों में नाविक आधारित अनुप्रयोगों का व्यवस्थित प्रसार किया जाए।
  • अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए स्पष्ट विधिक ढाँचा तैयार कर निजी क्षेत्र की भागीदारी के नियम पारदर्शी बनाए जाएँ।
  • अंतरिक्ष मलबे को कम करने और उपग्रहों को जीवनकाल-अंत पर सुरक्षित हटाने के मानकों को अपनाया जाए।
  • स्कूल और उच्च शिक्षा स्तर पर अंतरिक्ष विज्ञान और उपग्रह नौवहन की जानकारी को पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

नाविक (NavIC – Navigation with Indian Constellation) · भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (GSLV) · अंतरिक्ष विभाग (Department of Space – DoS) · भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) · स्थानिक नौवहन प्रणाली · दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी · राष्ट्रीय ओपन अंतरिक्ष पहुँच (निजी क्षेत्र की भागीदारी) · IN-SPACe · NSIL (न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड) · बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 · रणनीतिक स्वायत्तता · अंतरिक्ष-आधारित शासन

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 51A(h): वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सुधार की भावना का मौलिक कर्तव्य।
  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची: अनुसंधान संस्थाओं और वैज्ञानिक सहायता पर संघ की विधायी शक्ति।

अवधारणा प्रवाह

भारत सरकार और अंतरिक्ष विभाग द्वारा नाविक (NavIC) नक्षत्र के विस्तार का निर्णय और कार्यक्रम स्वीकृत होता है।  →  ISRO द्वारा NVS-03 उपग्रह का निर्माण और परीक्षण किया जाता है।  →  श्रीहरिकोटा से GSLV-F18 प्रक्षेपण यान द्वारा उपग्रह को प्रक्षेपित किया जाता है।  →  स्वदेशी क्रायोजेनिक ऊपरी चरण उपग्रह को भू-समकालिक अंतरण कक्षा तक पहुँचाता है।  →  उपग्रह कक्षा में स्थापित होकर नाविक नक्षत्र का हिस्सा बनता है और परीक्षण के बाद सेवा में आता है।  →  क्षेत्रीय नौवहन सेवा की उपलब्धता बढ़ने से सुरक्षा, परिवहन और नागरिक उपयोग में लाभ मिलता है।  →  सफलता की सार्वजनिक स्वीकृति से वैज्ञानिक संस्थाओं और अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रति राष्ट्रीय विश्वास सुदृढ़ होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नाविक प्रणाली में सात उपग्रह हैं, जिनमें तीन भू-स्थिर (GEO) और चार भू-समकालिक (GSO) कक्षा में स्थापित हैं।
2. नाविक के नौवहन संकेत केवल C-बैंड में प्रसारित होते हैं।
3. नाविक की प्रतिबंधित (Restricted) सेवा केवल अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए आरक्षित है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. उपर्युक्त में से कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है: नाविक में तीन GEO और चार GSO उपग्रह हैं, जो भारत तथा उसके लगभग 1500 किमी के परिक्षेत्र को कवर करते हैं। कथन 2 गलत है, क्योंकि नाविक के संकेत L5 और S बैंड में प्रसारित होते हैं, C-बैंड में नहीं। कथन 3 सही है: प्रतिबंधित सेवा एन्क्रिप्टेड होती है और रक्षा उपयोग के लिए अधिकृत उपयोगकर्ताओं तक सीमित है।

Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत में गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा अंतरिक्ष गतिविधियाँ करने के लिए IN-SPACe उन्हें अधिकृत करता है और उनका संवर्धन करता है।
कारण (R): IN-SPACe स्वयं प्रक्षेपण यान बनाकर भारत के सभी उपग्रहों का प्रक्षेपण करता है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही उत्तर चुनिए:
(a) A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
(b) A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
(c) A सही है, किंतु R गलत है।
(d) A गलत है, किंतु R सही है।

  1. A और R दोनों सही हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सही हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सही है, किंतु R गलत है।
  4. A गलत है, किंतु R सही है।

उत्तर: A गलत है, किंतु R सही है। — अभिकथन (A) गलत है, क्योंकि प्रक्षेपण यान और प्रक्षेपण का संचालन मुख्यतः ISRO करता है, IN-SPACe नहीं। कारण (R) सही है: IN-SPACe अंतरिक्ष विभाग के अधीन एक स्वतंत्र नोडल एजेंसी है, जो गैर-सरकारी संस्थाओं को प्राधिकरण देती है, उनका संवर्धन करती है और उनकी निगरानी करती है।

Q3. निम्नलिखित सुमेलों पर विचार कीजिए:
सूची-I (संस्था/संकल्पना) | सूची-II (कार्य/विवरण)
A. नाविक | 1. गैर-सरकारी संस्थाओं को प्राधिकरण और संवर्धन
B. NSIL | 2. अंतरिक्ष कार्यक्रम की नीति का निर्धारण, प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में
C. IN-SPACe | 3. भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली
D. अंतरिक्ष आयोग | 4. इसरो की वाणिज्यिक शाखा, जो उद्योग को प्रौद्योगिकी और सेवाएँ हस्तांतरित करती है
सही सुमेलन चुनिए:

  1. A-3, B-4, C-1, D-2
  2. A-3, B-1, C-4, D-2
  3. A-2, B-4, C-1, D-3
  4. A-3, B-2, C-4, D-1

उत्तर: A-3, B-4, C-1, D-2 — नाविक भारत की क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली है (A-3)। NSIL इसरो की वाणिज्यिक शाखा है (B-4)। IN-SPACe गैर-सरकारी संस्थाओं को प्राधिकरण और संवर्धन देता है (C-1)। अंतरिक्ष आयोग अंतरिक्ष कार्यक्रम की नीति तय करता है और प्रधानमंत्री इसके अध्यक्ष होते हैं (D-2)।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत की स्वदेशी क्षेत्रीय नौवहन प्रणाली नाविक (NavIC) का रणनीतिक और नागरिक उपयोग भारत की अंतरिक्ष नीति के लिए कितना महत्वपूर्ण है? नाविक जैसी प्रणालियों के विकास और संचालन में ISRO की भूमिका के साथ निजी क्षेत्र की बढ़ती भागीदारी के विधिक और संस्थागत आयामों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही यह भी बताइए कि क्या बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 के अंतर्गत राज्य की उत्तरदायित्व-संबंधी बाध्यताएँ निजी गतिविधियों के नियमन के लिए पर्याप्त ढाँचा प्रदान करती हैं। (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर संरचना (लगभग 250 शब्द):

1. भूमिका: GSLV-F18 द्वारा NVS-03 उपग्रह के सफल प्रक्षेपण का संदर्भ, जो नाविक श्रृंखला के उपग्रहों के विस्तार से जुड़ा है। नाविक का पूर्ववर्ती नाम IRNSS था।

2. नाविक की संरचना और क्षमता: सात उपग्रह (तीन GEO और चार GSO); भारत और लगभग 1500 किमी के परिक्षेत्र में कवरेज; L5 और S बैंड; मानक स्थिति सेवा (SPS) और प्रतिबंधित सेवा (RS) का अंतर।

3. रणनीतिक आयाम: GPS (अमेरिका), GLONASS (रूस), Galileo (यूरोपीय संघ) और BeiDou (चीन) पर निर्भरता घटाने की रणनीतिक स्वायत्तता; रक्षा, सीमा निगरानी और आपदा प्रबंधन में प्रतिबंधित सेवा का उपयोग; दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी से जुड़े जोखिम।

4. नागरिक आयाम: परिवहन, मत्स्यन, कृषि, आपदा चेतावनी और मोबाइल उपकरणों में एकीकरण; स्थानिक डेटा अर्थव्यवस्था पर प्रभाव।

5. संस्थागत ढाँचा: अंतरिक्ष आयोग (1972) द्वारा नीति निर्धारण; अंतरिक्ष विभाग का प्रशासन; ISRO का कार्यान्वयन; NSIL (2019) द्वारा उद्योग को प्रौद्योगिकी हस्तांतरण; IN-SPACe (2020) द्वारा गैर-सरकारी संस्थाओं का प्राधिकरण और संवर्धन।

6. विधिक आयाम: बाह्य अंतरिक्ष संधि, 1967 का अनुच्छेद VI, जिसके अनुसार राज्य गैर-सरकारी संस्थाओं की गतिविधियों के लिए अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायी है और उसे उनका प्राधिकरण व निरंतर निगरानी करनी होती है। भारत में व्यापक अंतरिक्ष गतिविधि विधि का अभाव और उस पर चली आ रही नीतिगत चर्चा; दायित्व, बीमा और डेटा-स्वामित्व के प्रश्न।

7. संतुलित दृष्टिकोण: (क) निजी भागीदारी से क्षमता, लागत-दक्षता और नवाचार बढ़ते हैं; (ख) दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा हितों के संरक्षण हेतु राज्य का नियंत्रण आवश्यक है। दोनों के बीच संतुलन का तर्क दीजिए।

8. निष्कर्ष: नाविक एक सफल रणनीतिक-नागरिक परियोजना है; किंतु इसकी दीर्घकालिक सफलता के लिए स्पष्ट विधिक ढाँचे, निजी क्षेत्र के लिए पारदर्शी प्राधिकरण प्रक्रिया और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के अनुपालन की आवश्यकता है।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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