भारत में गरीबी घटी, लेकिन नौकरी, एआई और बुजुर्गों की चुनौतियाँ बनीं

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भारत में गरीबी घटी, लेकिन नौकरी, एआई और बुजुर्गों की चुनौतियाँ बनीं

गरीबी घटने के कारण-प्रभाव चक्रगरीबी दर घटना2.6% (2023)उपभोग क्षमता बढ़नाघरेलू माँगGDP वृद्धि7.8%रोज़गार सृजनयुवा बेरोज़गारी 15.9%मज़दूरी वृद्धिवास्तविक वृद्धि नहींगरीबी पुनः घटना12.1% (2028 अनुमान)
गरीबी घटने के कारण-प्रभाव चक्र

✎ अत्यधिक गरीबी में कमी की स्थायी दिशा तभी संभव है जब आर्थिक संवृद्धि के साथ उत्पादक रोज़गार और श्रम आय में वृद्धि हो, क्योंकि जनसांख्यिकीय लाभांश इन्हीं पर निर्भर है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था (समावेशी संवृद्धि, गरीबी, रोज़गार और श्रम बाज़ार)  |  GS Paper I — सामाजिक मुद्दे (जनसंख्या और संबंधित मुद्दे, क्षेत्रीय असमानता)  |  GS Paper II — शासन (सामाजिक क्षेत्र से जुड़ी नीतियाँ और हस्तक्षेप)
  • Prelims: अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty) और अंतरराष्ट्रीय गरीबी रेखा ($3 और $4.2 प्रतिदिन, 2021 क्रय शक्ति समता पर आधारित), क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity – PPP), रंगराजन समिति और भारत की आधिकारिक गरीबी रेखा, बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index – MPI), जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend), श्रम आय हिस्सा (Labour Share of Income), आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (Periodic Labour Force Survey – PLFS), बीमारू (BIMARU) राज्य और अशोक बोस, अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (International Labour Organization – ILO)
  • Essay: विकास की अनुभूति: आर्थिक संवृद्धि आम नागरिक तक कैसे पहुँचे?, जनसांख्यिकीय लाभांश को तकनीकी और सामाजिक बदलावों के दौर में कैसे सुरक्षित रखा जाए?

त्वरित पुनरावृत्ति: अत्यधिक गरीबी में कमी की स्थायी दिशा तभी संभव है जब आर्थिक संवृद्धि के साथ उत्पादक रोज़गार और श्रम आय में वृद्धि हो, क्योंकि जनसांख्यिकीय लाभांश इन्हीं पर निर्भर है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

विश्व बैंक की नवीनतम ‘गरीबी एवं समानता संक्षेप’ (Poverty & Equity Brief) रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023 में भारत में अत्यधिक गरीबी घटकर 2.6 प्रतिशत रह गई, जो एक वर्ष पहले की तुलना में लगभग आधी है। इसी रिपोर्ट में 4.2 डॉलर प्रतिदिन की निम्न-मध्य आय वाले देशों की सीमा के आधार पर गरीबी 23.9 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत हुई बताई गई है, और वर्ष 2026 तक इसके 14.2 प्रतिशत तथा 2028 तक 12.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है। साथ ही, युवा बेरोज़गारी बढ़कर 15.9 प्रतिशत हो गई है और वास्तविक मज़दूरी में उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है। इसलिए चर्चा का केंद्र यह हो गया है कि आगे की गरीबी में कमी मुख्यतः उत्पादक रोज़गार के सृजन पर निर्भर करेगी, विशेषकर सबसे गरीब राज्यों में। जुलाई-सितंबर के अनुमान में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की 7.8 प्रतिशत वृद्धि के बावजूद विकास के ‘महसूस’ न होने के प्रश्न उठे हैं। ILO के मुख्य अर्थशास्त्री के अनुसार वैश्विक स्तर पर श्रम आय हिस्सा 2004 के लगभग 54 प्रतिशत से घटकर 2025 में 52.6 प्रतिशत रह गया है।

पृष्ठभूमि

  • गरीबी मापन के आधिकारिक प्रयास: तेंदुलकर समिति (2009) और उसके बाद रंगराजन समिति (2014) की गरीबी रेखाएँ, जिनमें रंगराजन समिति की रेखा को भारत की नवीनतम आधिकारिक रेखा माना गया था। हाल में भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के एक स्टाफ पेपर ने इस रेखा को अद्यतन किया है, जो सरकारी आधिकारिक रेखा के रूप में औपचारिक रूप से अपनाई गई रेखा नहीं है।
  • अंतरराष्ट्रीय और घरेलू गरीबी रेखाओं में अंतर: विश्व बैंक की डॉलर आधारित रेखाएँ क्रय शक्ति समता पर आधारित हैं, जबकि भारत में उपभोग व्यय के आँकड़ों पर आधारित रेखाओं का प्रयोग होता है। इसी कारण दोनों के निष्कर्षों की सीधी तुलना सावधानी से करनी चाहिए।
  • क्षेत्रीय संकेंद्रण: विश्व बैंक के अनुसार भारत के 57 प्रतिशत गरीब उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैली एक सटी हुई पट्टी में रहते हैं। यह नई जानकारी नहीं है, परंतु इससे राज्य-स्तरीय नीतियों की आवश्यकता पर बल मिलता है।
  • बीमारू राज्यों की अवधारणा: चालीस वर्ष से अधिक पहले जनसांख्यिकी विशेषज्ञ अशोक बोस ने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के लिए ‘बीमारू’ शब्द गढ़ा था। आज चर्चा में पश्चिम बंगाल का नाम इस सूची की नई परिस्थिति के रूप में आ रहा है।
  • विकसित भारत 2047 का लक्ष्य: भारत का लक्ष्य 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का है, जिसके लिए रोज़गार की गुणवत्ता और श्रमिक आय में वृद्धि केंद्रीय तत्व माने जाते हैं।

गरीबी मापन क्या है?

  • गरीबी मापन का अर्थ है उन व्यक्तियों या परिवारों की पहचान करना जिनका उपभोग या आय किसी न्यूनतम मानक से नीचे है। इसके लिए गरीबी रेखा का निर्धारण किया जाता है।
  • आय या उपभोग आधारित गरीबी और बहुआयामी गरीबी में अंतर है। बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन-स्तर के संकेतकों को एक साथ देखता है, जबकि मौद्रिक रेखा केवल आय या व्यय पर आधारित होती है।
  • अत्यधिक गरीबी उस स्थिति को कहते हैं जब व्यक्ति की आय अंतरराष्ट्रीय न्यूनतम रेखा से भी नीचे हो। विश्व बैंक इसके लिए क्रय शक्ति समता आधारित डॉलर रेखाओं का उपयोग करता है।
  • निम्न-मध्य आय वर्ग की रेखा (4.2 डॉलर प्रतिदिन) उस स्तर को दर्शाती है जिस पर भारत जैसे देश में जीवन-स्तर की व्यापक स्थिति का आकलन किया जाता है।
  • गरीबी में गिरावट के लिए केवल सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि पर्याप्त नहीं है; यह तभी टिकाऊ होती है जब श्रम आय बढ़े और उत्पादक रोज़गार सृजित हो। जब आय-वृद्धि और उत्पादकता का संबंध कमज़ोर पड़ता है, तो ‘महसूस होने वाली’ वृद्धि सीमित रहती है।
  • जनसांख्यिकीय लाभांश तब प्राप्त होता है जब कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या कुल जनसंख्या में अधिक हो। इसका लाभ तभी मिलता है जब युवाओं को कौशल और उत्पादक रोज़गार मिले; अन्यथा यह बेरोज़गारी का बोझ बन सकता है।
  • श्रम आय हिस्सा वह अनुपात है जो राष्ट्रीय आय में श्रमिकों को मिलने वाले वेतन और मज़दूरी का होता है। इसकी गिरावट असमानता बढ़ने का संकेत मानी जाती है।
  • गरीबी आँकड़ों का आधार घरेलू उपभोग सर्वेक्षण और श्रम बल सर्वेक्षण जैसे स्रोत होते हैं। इन आँकड़ों के संशोधन से पूर्व अनुमानों में बदलाव आ सकता है, जैसा कि विश्व बैंक ने स्वयं स्पष्ट किया है।

मुख्य विशेषताएँ

Feature Significance
अत्यधिक गरीबी (Extreme Poverty) में गिरावट विश्व बैंक के अनुसार 2023 में $3 प्रतिदिन की रेखा पर अत्यधिक गरीबी दर 2.6 प्रतिशत रह गई। इससे भारत की गरीबी को मापने की पद्धति और अंतरराष्ट्रीय तुलना दोनों की समझ आवश्यक हो जाती है।
$4.2 प्रतिदिन की सीमा (निम्न-मध्य आय वाले देशों की सीमा) इस सीमा पर गरीबी दर 23.9 प्रतिशत से घटकर 16.1 प्रतिशत हुई। यह दर्शाता है कि गरीबी का आकलन रेखा के चुनाव पर निर्भर करता है।
पूर्वानुमानित गरीबी दर विश्व बैंक के अनुमान के अनुसार $4.2 प्रतिदिन की सीमा पर गरीबी दर 2026 में 14.2 प्रतिशत और 2028 तक 12.1 प्रतिशत हो सकती है। ये आँकड़े श्रम बाज़ार और समष्टि-आर्थिक आँकड़ों के संशोधन के साथ बदल सकते हैं।
आर्थिक संवृद्धि की दर अप्रैल-जून तिमाही में GDP में 7.8 प्रतिशत की वृद्धि अधिकांश पूर्वानुमानों से आगे रही, जो उच्च आर्थिक संवृद्धि की ओर संकेत करती है।
क्षेत्रीय संकेंद्रण विश्व बैंक के अनुसार भारत के 57 प्रतिशत गरीब उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक फैली सटी हुई पट्टी में रहते हैं। इससे गरीबी का राज्य-स्तरीय वितरण नीति-निर्माण के लिए केंद्रीय विषय बनता है।
युवा बेरोज़गारी में वृद्धि विश्व बैंक के अनुसार युवा बेरोज़गारी बढ़कर 15.9 प्रतिशत हो गई है और वास्तविक आय में अधिक बदलाव नहीं आया है। गरीबी में निरंतर गिरावट के लिए उत्पादक रोज़गार अनिवार्य है।

महत्व

आर्थिक

  • गरीबी में गिरावट से उपभोग-क्षमता बढ़ती है और घरेलू माँग को आधार मिलता है, जो आर्थिक संवृद्धि के चक्र को सहारा देता है।
  • उच्च GDP संवृद्धि और गरीबी में कमी के बीच का संबंध तभी टिकाऊ होता है जब वृद्धि का लाभ मज़दूरी और आय तक पहुँचे।
  • भारत का विकसित राष्ट्र (Developed Nation) बनने का लक्ष्य 2047 तक रखा गया है, जिसके लिए उत्पादक रोज़गार और उच्च उत्पादकता आवश्यक है।

सामाजिक

  • गरीबी के भौगोलिक संकेंद्रण से सामाजिक असमानता और प्रवासन के दबाव उत्पन्न होते हैं, जो राज्यों की सामाजिक संरचना को प्रभावित करते हैं।
  • वृद्ध होती जनसंख्या (Ageing Population) के साथ सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यय की माँग बढ़ेगी, जिसकी तैयारी अभी से आवश्यक है।

प्रशासनिक और सांख्यिकीय

  • गरीबी रेखा का निर्धारण पद्धति पर निर्भर करता है। तेंदुलकर समिति और रंगराजन समिति जैसी विशेषज्ञ समितियों की सिफ़ारिशों से इस विषय को समझना आवश्यक है।
  • RBI के एक स्टाफ़ पेपर द्वारा आधिकारिक गरीबी रेखा को अद्यतन किए जाने से आँकड़ों की विश्वसनीयता और नीति-सुधार पर चर्चा तेज़ हुई है।

चुनौतियाँ

1. जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) की अनिश्चितता

  • कार्यशील आयु वर्ग का लाभ तभी मिलता है जब युवाओं को कौशल और उत्पादक रोज़गार मिले; अन्यथा यह दायित्व बन सकता है।
  • सरकारी अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि जनसांख्यिकीय लाभांश को स्वतः मान लेना उचित नहीं है।
  • स्मार्टफ़ोन और सोशल मीडिया से एकाग्रता और पठन-क्षमता पर पड़ने वाले प्रभाव भविष्य के श्रम-कौशल को प्रभावित कर सकते हैं।

2. युवा बेरोज़गारी और रोज़गार की गुणवत्ता

  • युवा बेरोज़गारी 15.9 प्रतिशत तक पहुँचना श्रम बाज़ार में अवसरों की कमी को दर्शाता है।
  • वास्तविक आय में ठहराव से गरीबी में गिरावट की गति धीमी पड़ सकती है।
  • असंगठित क्षेत्र का बड़ा हिस्सा होने से रोज़गार की गुणवत्ता और सामाजिक सुरक्षा दोनों चुनौतीपूर्ण रहते हैं।

3. वृद्धि और आय के बीच टूटता संबंध

  • ILO के अनुसार वैश्विक स्तर पर श्रम की आय-हिस्सेदारी 2004 के लगभग 54 प्रतिशत से घटकर 2025 में 52.6 प्रतिशत रह गई।
  • उत्पादकता और मज़दूरी के बीच का संबंध कमज़ोर होने से GDP की वृद्धि जनता को ‘महसूस’ नहीं होती।
  • आर्थिक वृद्धि के वितरण से जुड़े प्रश्न नीति-निर्माण में समानता के उद्देश्य को केंद्र में लाते हैं।

4. क्षेत्रीय असमानता और ‘नया बीमारू’ संकेंद्रण

  • BIMARU शब्द डेमोग्राफ़र आशीष बोस ने बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के आर्थिक रूप से पिछड़े होने के संदर्भ में प्रयोग किया था।
  • विश्व बैंक के अनुसार अब गरीबी की पट्टी में पश्चिम बंगाल का नाम जुड़ना क्षेत्रीय असमानता के बदलते स्वरूप को दर्शाता है।
  • राज्यों के बीच अंतर घटाने के लिए संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और राज्य-स्तरीय नीति आवश्यक है।

5. कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) से उत्पन्न रोज़गार-परिवर्तन

  • AI से स्वचालन बढ़ने पर कुछ पारंपरिक रोज़गार कम हो सकते हैं, जबकि नए कौशल की माँग बढ़ेगी।
  • कौशल-विकास और पुनः-कौशल प्रशिक्षण की व्यवस्था की गति इस परिवर्तन के साथ मेल खाना आवश्यक है।
  • तकनीकी परिवर्तन का लाभ सभी क्षेत्रों और वर्गों तक समान रूप से पहुँचे, यह एक नीतिगत चुनौती है।

6. जनसंख्या की वृद्धावस्था (Ageing Population) का दबाव

  • बढ़ती वृद्ध जनसंख्या से पेंशन, स्वास्थ्य और देखभाल पर सार्वजनिक व्यय बढ़ेगा।
  • कार्यशील जनसंख्या का अनुपात घटने पर आय-सृजन और कर-आधार पर दबाव पड़ सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

Issue Concern
युवा बेरोज़गारी 15.9 प्रतिशत की दर से श्रम-शक्ति का बड़ा हिस्सा उत्पादक कार्य से बाहर रहने का जोखिम है।
श्रम की आय-हिस्सेदारी वृद्धि के बावजूद मज़दूरी का अनुपात घटने से जीवन-यापन की लागत का दबाव बढ़ सकता है।
क्षेत्रीय संकेंद्रण 57 प्रतिशत गरीब एक ही भौगोलिक पट्टी में होने से राज्य-स्तरीय लक्षित नीति की आवश्यकता है।
कौशल और एकाग्रता तकनीक के प्रभाव से संज्ञानात्मक कौशल पर पड़ने वाला असर जनसांख्यिकीय लाभांश को कमज़ोर कर सकता है।
जनसंख्या की वृद्धावस्था बढ़ती वृद्ध जनसंख्या से सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यय पर दीर्घकालिक दबाव बनेगा।
गरीबी आँकड़ों की तुलनीयता अलग-अलग गरीबी रेखाओं से निष्कर्ष बदलते हैं, इसलिए आँकड़ों की व्याख्या में सावधानी आवश्यक है।

आगे की राह

  • युवाओं के लिए उत्पादक रोज़गार सृजन को प्राथमिकता देते हुए श्रम-प्रधान विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में निवेश बढ़ाया जाए।
  • कौशल-विकास प्रणाली को उद्योग की माँग से जोड़कर AI और डिजिटल अर्थव्यवस्था के अनुरूप पुनः-कौशल प्रशिक्षण का विस्तार किया जाए।
  • श्रम की आय-हिस्सेदारी और वास्तविक मज़दूरी पर नियमित निगरानी रखी जाए, ताकि वृद्धि का लाभ व्यापक रूप से पहुँचे।
  • पिछड़े राज्यों में बुनियादी ढाँचे, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में लक्षित निवेश करके क्षेत्रीय असमानता को कम किया जाए।
  • PLFS जैसे श्रम-आँकड़ों की समयबद्धता और गुणवत्ता बढ़ाई जाए, ताकि युवा बेरोज़गारी की नीति-आधारित निगरानी संभव हो।
  • स्वास्थ्य, मानसिक कल्याण और डिजिटल उपयोग के संतुलन पर नीति बने, ताकि जनसांख्यिकीय लाभांश की क्षमता का उपयोग हो सके।
  • वृद्ध होती जनसंख्या के लिए पेंशन, स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक सुरक्षा के दीर्घकालिक वित्तीय ढाँचे की योजना अभी से बनाई जाए।
  • गरीबी रेखा और बहुआयामी गरीबी के आकलन में पारदर्शी पद्धति अपनाकर नीति-निर्णयों को साक्ष्य पर आधारित किया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

अति निर्धनता (Extreme Poverty) · क्रय शक्ति समता (Purchasing Power Parity – PPP) · बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (Multidimensional Poverty Index – MPI) · जनांकिकीय लाभांश (Demographic Dividend) · श्रम आय हिस्सेदारी (Labour Share of Income) · युवा बेरोजगारी (Youth Unemployment) · रोजगार-उन्मुख विकास (Employment-Oriented Growth) · अंतर-राज्यीय असमानता (Inter-State Disparity) · बीमारू राज्य (BIMARU States) · कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) · वृद्ध होती जनसंख्या (Ageing Population) · विकसित भारत 2047 (Viksit Bharat 2047)

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 39(क): पर्याप्त जीविका के साधनों का अधिकार, रोज़गार से जुड़ा नीति-निर्देश
  • अनुच्छेद 41: काम, शिक्षा और सार्वजनिक सहायता का अधिकार, वृद्धावस्था सुरक्षा से संबंध
  • अनुच्छेद 38: आय और अवसरों की असमानता घटाने का राज्य का दायित्व

अवधारणा प्रवाह

उच्च आर्थिक संवृद्धि (GDP में 7.8 प्रतिशत वृद्धि) से आय के अवसर बढ़ते हैं।  →  वृद्धि का लाभ मज़दूरी और उत्पादक रोज़गार तक पहुँचना आवश्यक है।  →  श्रम की आय-हिस्सेदारी घटने और युवा बेरोज़गारी बढ़ने से वास्तविक आय में ठहराव आता है।  →  ठहरी आय और क्षेत्रीय संकेंद्रण से गरीबी में गिरावट की गति धीमी पड़ती है।  →  जनसांख्यिकीय लाभांश का लाभ लेने के लिए कौशल, स्वास्थ्य और रोज़गार नीति का समन्वय चाहिए।  →  सफल समन्वय से 2047 तक विकसित राष्ट्र का लक्ष्य और समावेशी गरीबी-उन्मूलन संभव होता है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विश्व बैंक की अति निर्धनता रेखा क्रय शक्ति समता (PPP) के आधार पर समय-समय पर संशोधित की जाती है।
2. निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए निर्धारित निर्धनता रेखा, अति निर्धनता रेखा से ऊँची होती है।
3. विश्व बैंक के निर्धनता अनुमान भारत की आधिकारिक निर्धनता रेखा के समतुल्य माने जाते हैं।
उपर्युक्त में से कितने कथन सत्य हैं?

  1. केवल एक कथन
  2. केवल दो कथन
  3. केवल तीन कथन
  4. सभी कथन

उत्तर: केवल दो कथन — कथन 1 सत्य है: विश्व बैंक अंतरराष्ट्रीय निर्धनता रेखाओं को क्रय शक्ति समता के आधार पर समय-समय पर अद्यतन करता है। कथन 2 सत्य है: निम्न-मध्यम आय रेखा (लगभग 4.2 डॉलर प्रतिदिन) अति निर्धनता रेखा (लगभग 3 डॉलर प्रतिदिन) से ऊँची है। कथन 3 असत्य है: विश्व बैंक के अनुमान अंतरराष्ट्रीय तुलना के लिए हैं, जबकि भारत की आधिकारिक निर्धनता रेखा का निर्धारण भारत सरकार के समितियों द्वारा होता रहा है।

Q2. निम्नलिखित अभिकथन (A) और कारण (R) पर विचार कीजिए:
अभिकथन (A): भारत का जनांकिकीय लाभांश स्वतः प्राप्त नहीं होता।
कारण (R): उत्पादक रोजगार और कौशल विकास के अभाव में कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या आर्थिक लाभ में नहीं बदलती।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:

  1. A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, किंतु R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, किंतु R असत्य है।
  4. A असत्य है, किंतु R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं और R, A की सही व्याख्या है। — जनांकिकीय लाभांश तभी मिलता है जब कार्यशील आयु वर्ग को उत्पादक रोजगार और कौशल उपलब्ध हों, इसलिए A सत्य है। यही तर्क R को A की सही व्याख्या बनाता है, क्योंकि रोजगार और कौशल के बिना जनसंख्या का अनुपात स्वयं आर्थिक लाभ नहीं देता।

Q3. निम्नलिखित सूचियों का सही मिलान कीजिए:
सूची-I (समिति)
1. लकड़ावाला समिति
2. तेंदुलकर समिति
3. रंगराजन समिति
सूची-II (प्रतिवेदन का वर्ष)
A. 2009
B. 1993
C. 2014
सही उत्तर चुनिए:

  1. 1-B, 2-A, 3-C
  2. 1-A, 2-B, 3-C
  3. 1-B, 2-C, 3-A
  4. 1-C, 2-A, 3-B

उत्तर: 1-B, 2-A, 3-C — लकड़ावाला समिति (1993) ने गरीबी रेखा की पद्धति पर सुझाव दिए। तेंदुलकर समिति (2009) ने उपभोग व्यय पर आधारित नई निर्धनता रेखा तय की। रंगराजन समिति (2014) ने तेंदुलकर पद्धति की समीक्षा कर अधिक ऊँची रेखा सुझाई। इसलिए सही मिलान 1-B, 2-A, 3-C है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ विश्व बैंक के आँकड़े दर्शाते हैं कि भारत में अति निर्धनता में तीव्र गिरावट आई है, फिर भी युवा बेरोजगारी ऊँची बनी हुई है और वास्तविक आय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है। निर्धनता में स्थायी कमी के लिए रोजगार-उन्मुख विकास क्यों आवश्यक है, इसका समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और बदलती जनांकिकीय संरचना के संदर्भ में जनांकिकीय लाभांश को सुनिश्चित करने के लिए कौन-से नीतिगत उपाय प्रभावी हो सकते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: उत्तर-संरचना (मॉडल उत्तर के मुख्य बिंदु):
1. परिचय: विश्व बैंक की नवीनतम ‘Poverty & Equity Brief’ के अनुसार अति निर्धनता (2021 PPP पर 3 डॉलर प्रतिदिन) 2023 में 2.6% रह गई; निम्न-मध्यम आय रेखा (4.2 डॉलर प्रतिदिन) पर यह 23.9% से घटकर 16.1% हुई; अनुमान है कि 2026 में 14.2% और 2028 तक 12.1% तक पहुँच सकती है।
2. निर्धनता मापन की पद्धति: अंतरराष्ट्रीय रेखाएँ बनाम भारत की आधिकारिक रेखाएँ (लकड़ावाला 1993, तेंदुलकर 2009, रंगराजन 2014); आय/उपभोग आधारित मापन की सीमाएँ; बहुआयामी निर्धनता सूचकांक (NITI Aayog, UNDP-OPHI पद्धति) द्वारा शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन-स्तर के आयाम; SDG 1 (कोई निर्धनता नहीं)।
3. वृद्धि और ‘महसूस न होना’: 2025-26 की अप्रैल-जून तिमाही में GDP वृद्धि 7.8%; फिर भी युवा बेरोजगारी 15.9% और वास्तविक आय लगभग स्थिर; ILO के अनुसार वैश्विक स्तर पर श्रम आय हिस्सेदारी 2004 के लगभग 54% से घटकर 2025 में 52.6% रह गई, अर्थात उत्पादकता और मजदूरी का संबंध कमजोर हुआ है।
4. क्षेत्रीय आयाम: विश्व बैंक के अनुसार लगभग 57% गरीब ‘उत्तर प्रदेश से पश्चिम बंगाल तक की सटी पट्टी’ में रहते हैं; बीमारू (BIMARU) अवधारणा (अशोक बोस, 1980 के दशक) का संदर्भ; अंतर-राज्यीय असमानता और राज्य-क्षमता का प्रश्न।
5. संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 39(क) (पर्याप्त जीविका के साधन), अनुच्छेद 41 (काम का अधिकार, आर्थिक सामर्थ्य की सीमाओं में), अनुच्छेद 43 (निर्वाह मजदूरी); नीति-निर्देशक तत्वों और मौलिक अधिकारों के बीच संबंध।
6. नीतिगत साधन: महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 की भूमिका और सीमाएँ; कौशल भारत मिशन (Skill India Mission); चार श्रम संहिताएँ (2019-2020) का रोजगार-सृजन और सामाजिक सुरक्षा से संबंध; PLFS (MoSPI) जैसे आंकड़ों की नियमित उपलब्धता।
7. जनांकिकीय चुनौती: वृद्ध होती जनसंख्या; डिजिटल माध्यम, स्मार्टफोन और AI का संज्ञानात्मक कौशल व एकाग्रता पर प्रभाव, जैसा सरकारी अधिकारी द्वारा रेखांकित किया गया; जनांकिकीय लाभांश को ‘स्वतः अनुकूल हवा’ मानने की सीमा।
8. विचारों का संतुलन: (क) वृद्धि-प्रधान दृष्टिकोण के समर्थक मानते हैं कि उच्च वृद्धि स्वयं निर्धनता घटाती है; (ख) अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज़ का सक्षमता (capabilities) और सामाजिक सेवाओं पर आधारित दृष्टिकोण बताता है कि वृद्धि का लाभ तभी समान रूप से पहुँचता है जब शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर उपलब्ध हों; (ग) श्रम-बाज़ार में संरचनात्मक परिवर्तन (AI और स्वचालन) के संदर्भ में पुनः-कौशलन की आवश्यकता।
9. निष्कर्ष: निर्धनता में कमी की गति बनाए रखने के लिए पिछड़े राज्यों में उत्पादक रोजगार, कौशल, सामाजिक सुरक्षा और राज्य-स्तरीय निवेश का समन्वित होना आवश्यक है; केवल समग्र GDP वृद्धि पर्याप्त नहीं है।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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