आरबीआई का कठोर प्रस्ताव: रुपये को बचाने के लिए क्या होगा बड़ा बदलाव?

आरबीआई का कठोर प्रस्ताव: रुपये को बचाने के लिए क्या होगा बड़ा बदलाव?

आरबीआई का कठोर प्रस्ताव: रुपये को बचाने के लिए क्या होगा बड़ा बदलाव?

रुपये के कमज़ोर होने के कारण और प्रभावविदेशी कारणकच्चा तेल महँगाविदेशी पूंजी बहिर्वाहFPI बाहर जातारुपये पर दबावमाँग बढ़तीRBI हस्तक्षेपविदेशी मुद्रा बेचतानीतिगत दर बढ़ाताब्याज दरें ऊँचीआयात महँगामुद्रास्फीति बढ़ती
रुपये के कमज़ोर होने के कारण और प्रभाव

✎ रुपये की गिरावट के समय RBI विदेशी मुद्रा भंडार से हस्तक्षेप, रेपो दर और LRS जैसे प्रशासनिक उपायों का प्रयोग कर सकता है, पर प्रभावी स्थिरता के लिए विश्वसनीय संप्रेषण और मज़बूत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अधिक टिकाऊ आधार देते हैं।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था (मुद्रा, विदेशी मुद्रा भंडार, बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र, बाह्य क्षेत्र)  |  GS Paper II — शासन (वैधानिक और नियामक संस्थाएँ, जैसे RBI की भूमिका और FEMA के अंतर्गत विदेशी मुद्रा विनियमन)
  • Prelims: विनिमय दर प्रबंधित लचीली प्रणाली (Managed Floating Exchange Rate System), लिबरलाइज़्ड रेमिटेंस स्कीम (LRS), विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA), असंभव त्रिकोण (Impossible Trinity), चालू खाता घाटा (Current Account Deficit), रेपो दर और उसका विनिमय दर पर प्रभाव, विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) बनाम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), पूंजी खाता परिवर्तनीयता (Capital Account Convertibility)
  • Essay: वैश्विक पूंजी प्रवाह के दौर में मौद्रिक स्थिरता और आर्थिक संप्रभुता का संतुलन, नीति-निर्माण में पारदर्शी संप्रेषण की भूमिका: बाज़ार का विश्वास कैसे बनता है

त्वरित पुनरावृत्ति: रुपये की गिरावट के समय RBI विदेशी मुद्रा भंडार से हस्तक्षेप, रेपो दर और LRS जैसे प्रशासनिक उपायों का प्रयोग कर सकता है, पर प्रभावी स्थिरता के लिए विश्वसनीय संप्रेषण और मज़बूत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश अधिक टिकाऊ आधार देते हैं।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

नवंबर 2026 के आरंभ में एक समाचार विश्लेषण ने बताया कि रुपया पिछले बारह महीनों में लगभग 7 प्रतिशत गिरकर 88.84 से 94.95 प्रति अमेरिकी डॉलर पर पहुँच गया है। इस गिरावट को रोकने के लिए RBI के एक चर्चा-पत्र में विदेश भेजे जाने वाले धन पर कड़े प्रतिबंधों के प्रस्ताव सामने आए, जिनमें LRS की सीमा को 2,50,000 डॉलर से घटाकर 50,000 डॉलर प्रतिवर्ष करने का सुझाव शामिल है। इससे नीतिगत स्पष्टता और बाज़ार की अपेक्षाओं के बीच का अंतर चर्चा में आया है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के ऊँचे मूल्य, भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी प्रतिफल-दरों में वृद्धि ने भारत के बाह्य क्षेत्र पर दबाव बढ़ाया है, और इसी संदर्भ में यह प्रश्न उठा है कि विदेशी मुद्रा के बहिर्वाह को प्रशासनिक उपायों से नियंत्रित करना कितना उचित है।

पृष्ठभूमि

  • भारत की मुद्रा विनिमय दर बाह्य व्यापार, पूंजी प्रवाह और विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति से सीधे जुड़ी होती है। रुपये का कमज़ोर होना आयात को महँगा करता है, जिसका असर कच्चे तेल, सोने और विदेश यात्रा व शिक्षा पर पड़ता है।
  • भारत ने 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद विनिमय दर को बाज़ार की शक्तियों से काफी हद तक निर्धारित होने दिया है, परंतु RBI अत्यधिक अस्थिरता की स्थिति में हस्तक्षेप करता है। इसी कारण इसे प्रबंधित लचीली प्रणाली कहा जाता है।
  • LRS की शुरुआत RBI ने वर्ष 2004 में की थी। यह FEMA, 1999 के अंतर्गत निवासी व्यक्तियों को एक वित्तीय वर्ष में निर्धारित सीमा तक विदेश में धन भेजने की सुविधा देती है।
  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) अल्पकालिक प्रवाह के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं, जबकि प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) अपेक्षाकृत स्थिर माना जाता है। वैश्विक अनिश्चितता के समय FPI का बहिर्वाह रुपये पर तेज़ दबाव डालता है।
  • रेपो दर बढ़ाने से देश में ब्याज दरें ऊँची होती हैं, जिससे रुपया-आधारित परिसंपत्तियाँ विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बनती हैं। RBI विदेशी मुद्रा बेचकर भी बाज़ार में डॉलर की आपूर्ति बढ़ाता है।

रुपये की विनिमय दर और LRS क्या है?

  • विनिमय दर वह मूल्य है जिस पर एक मुद्रा दूसरी मुद्रा से बदली जाती है। भारत में यह मुख्यतः बाज़ार में माँग और आपूर्ति से तय होती है, और RBI केवल अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है।
  • विदेशी मुद्रा भंडार RBI के पास उपलब्ध विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियों का संग्रह है। इसका उपयोग विनिमय दर में स्थिरता लाने और बाह्य भुगतान दायित्वों को पूरा करने में होता है।
  • असंभव त्रिकोण के अनुसार कोई देश एक साथ स्थिर विनिमय दर, स्वतंत्र मौद्रिक नीति और पूंजी की पूर्ण गतिशीलता को प्राप्त नहीं कर सकता। भारत इन तीनों के बीच संतुलन बनाए रखता है।
  • LRS के अंतर्गत निवासी व्यक्ति विदेश यात्रा, शिक्षा, इलाज, निवेश और उपहार आदि के लिए निर्धारित सीमा तक विदेश में धन भेज सकते हैं। यह योजना FEMA के नियमों और RBI के निर्देशों के अंतर्गत चलती है।
  • LRS की वर्तमान सीमा 2,50,000 डॉलर प्रति वित्तीय वर्ष है, जिसे RBI का चर्चा-पत्र केवल चालू खाता लेनदेन के संदर्भ में घटाने का सुझाव देता है। चालू खाता लेनदेन में स्वास्थ्य और शिक्षा को इस सीमा से बाहर रखने का प्रस्ताव है।
  • चालू खाता घाटा (CAD) तब बढ़ता है जब देश का आयात निर्यात और विदेश से प्राप्त आय से अधिक हो जाता है। इसकी भरपाई पूंजी प्रवाह से होती है, इसलिए CAD की स्थिति विदेशी पूंजी पर निर्भरता बढ़ाती है।
  • पूंजी खाता परिवर्तनीयता का अर्थ है कि पूंजी का आवागमन किस सीमा तक मुक्त है। भारत में इसे चरणबद्ध और नियंत्रित ढंग से लागू किया गया है, जिससे संकट के समय नीति-विकल्प खुले रहें।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
रुपये का मूल्यह्रास (Depreciation) पिछले 12 महीनों में रुपया डॉलर के मुकाबले लगभग 7 प्रतिशत गिरकर 88.84 से 94.95 पर पहुँचा
आयात की लागत कच्चा तेल, सोना और अन्य आयात डॉलर में खरीदे जाते हैं, इसलिए रुपये के कमजोर होने से घरेलू कीमतें बढ़ती हैं
पूंजी बहिर्वाह (Capital Outflow) पर नियंत्रण का प्रस्ताव उदारीकृत प्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme – LRS) के अंतर्गत व्यक्तिगत प्रेषण की वार्षिक सीमा 2.5 लाख अमेरिकी डॉलर से घटाकर 50,000 अमेरिकी डॉलर करने का सुझाव है
LRS के अंतर्गत प्रेषण का पैमाना वर्ष 2025-26 में LRS के अंतर्गत लगभग 29 अरब अमेरिकी डॉलर का प्रेषण हुआ, जो डॉलर की माँग का एक बड़ा स्रोत है
RBI के अब तक के उपाय विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचना (रुपया खरीदना) और नीतिगत दर (Policy Rate) बढ़ाना, ताकि रुपया-आधारित परिसंपत्तियाँ आकर्षक बनें
वैश्विक कारक कच्चे तेल का 115 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर जाना, भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में वृद्धि से डॉलर की माँग बढ़ी है

महत्व

आर्थिक

  • आयात बिल बढ़ने से चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) पर दबाव बढ़ता है
  • आयातित ईंधन और कच्चे माल की महँगाई से मुद्रास्फीति (Inflation) का आयातित दबाव बनता है
  • विदेश यात्रा और उच्च शिक्षा का खर्च बढ़ने से मध्यम वर्ग के परिवारों की क्रय शक्ति प्रभावित होती है

मौद्रिक और वित्तीय

  • विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) का उपयोग रुपये को स्थिर रखने में होता है, इसलिए उसका प्रबंधन महत्वपूर्ण है
  • नीतिगत दर में वृद्धि विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) को आकर्षित करने का एक साधन है, पर इसके ऋण-लागत पर भी प्रभाव पड़ते हैं
  • पूंजी प्रवाह की अस्थिरता के दौर में बाजार का विश्वास नीति की स्पष्टता पर निर्भर करता है

भू-राजनीतिक और रणनीतिक

  • रूस-यूक्रेन और इज़राइल/अमेरिका-ईरान संघर्षों से ऊर्जा आपूर्ति पर जोखिम बढ़ता है
  • अमेरिकी राजकोषीय उधारी और यील्ड से विकासशील देशों की पूंजी के लिए प्रतिस्पर्धा तेज होती है
  • विनिर्माण, दुर्लभ मृदा तत्व और बैटरी जैसे क्षेत्रों में वैश्विक निर्भरता भारत की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है

शासन और नीति प्रक्रिया

  • केंद्र सरकार और RBI के बीच नीति समन्वय तथा संप्रेषण की स्पष्टता बाजार की अपेक्षाओं को प्रभावित करती है
  • नीति-पत्र (Discussion Paper) के चरण में प्रस्तावों का सार्वजनिक विमर्श नीति निर्माण की पारदर्शिता का एक आधार है

चुनौतियाँ

1. असंभव त्रिकोण (Impossible Trinity)

  • एक साथ मौद्रिक नीति की स्वायत्तता, स्थिर विनिमय दर और पूंजी की स्वतंत्र आवाजाही संभव नहीं होती
  • पूंजी प्रवाह पर रोक लगाने से विनिमय दर पर दबाव कम हो सकता है, पर निवेशक का भरोसा और उदारीकरण की साख प्रभावित होती है

2. पूंजी खाता परिवर्तनीयता बनाम नियंत्रण

  • 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद भारत ने चालू खाते की परिवर्तनीयता को व्यापक रूप से अपनाया है
  • LRS की सीमा घटाने जैसे प्रस्ताव व्यक्तिगत स्तर पर प्रवाह को सीमित करते हैं, जिससे नीति की दिशा पर बहस होती है

3. आयात निर्भरता और मुद्रास्फीति का दबाव

  • कच्चे तेल और सोने जैसे आयात पर निर्भरता रुपये के मूल्यह्रास को सीधे घरेलू कीमतों तक पहुँचाती है
  • ईंधन की खपत कम करने और सोने की खरीद टालने जैसे आह्वान तत्काल प्रभाव के बजाय मांग-प्रबंधन के सीमित उपाय हैं

4. नीति संप्रेषण और बाजार विश्वास

  • परस्पर विरोधी संकेत (जैसे, हस्तक्षेप बनाम न हस्तक्षेप) बाजार में अनिश्चितता बढ़ाते हैं
  • RBI की परिचालन स्वायत्तता और सरकार के नीतिगत उद्देश्यों के बीच स्पष्ट भूमिका-विभाजन आवश्यक है

5. वैश्विक अनिश्चितता और पूंजी की ध्रुवीकृत प्रवृत्ति

  • वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के दौर में विदेशी निवेशक सुरक्षित परिसंपत्तियों की ओर झुकते हैं
  • FDI और FPI का प्रवाह केवल मजबूत मूलभूत आर्थिक संकेतकों से सुनिश्चित नहीं होता

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

विषय चिंता
डॉलर की माँग बनाम आपूर्ति LRS और आयात से होने वाली डॉलर की माँग को नियंत्रित करना, जबकि निर्यात और विदेशी निवेश से आपूर्ति बढ़ाना कठिन है
नीतिगत उपायों की प्रकृति प्रेषण सीमा घटाना तत्काल दिखने वाला, पर कठोर उपाय है, जिसका मध्यम वर्ग और प्रवासी परिवारों पर प्रभाव पड़ता है
बाजार में अपेक्षाएँ ब्याज दर और हस्तक्षेप के बावजूद बाजार का मूल्यह्रास पर दाँव बना रहना नीति की विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाता है
बाहरी झटके कच्चे तेल की ऊँची कीमतें, अमेरिकी नीति और यील्ड, तथा चीन के विनिर्माण वर्चस्व से भारत की नीति स्वतंत्रता सीमित होती है
विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग भंडार का सीमित उपयोग बाहरी झटकों के समय सुरक्षा कवच है, इसलिए उसका संतुलित प्रबंधन आवश्यक है

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • उदारीकृत प्रेषण योजना (Liberalised Remittance Scheme – LRS)

आगे की राह

  • नीतिगत उपायों की घोषणा से पहले उनके प्रभाव का स्पष्ट आकलन और सार्वजनिक परामर्श सुनिश्चित किया जाए
  • केंद्र सरकार और RBI के बीच समन्वित संप्रेषण हो, ताकि बाजार को एक ही दिशा का संकेत मिले
  • ऊर्जा आयात पर निर्भरता घटाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता के उपायों को गति दी जाए
  • निर्यात संवर्धन और विनिर्माण क्षमता बढ़ाकर डॉलर की स्थायी आपूर्ति के स्रोत मजबूत किए जाएँ
  • प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए नियामकीय स्पष्टता और व्यापार सुगमता बढ़ाई जाए
  • चालू खाता घाटे को दीर्घकालिक रूप से नियंत्रित रखने के लिए बचत और घरेलू वित्तीय बचत का उपयोग बढ़ाया जाए
  • प्रवासी और व्यक्तिगत प्रेषण से जुड़े नियमों में चरणबद्ध और पूर्वानुमेय बदलाव किए जाएँ
  • वैश्विक वित्तीय अस्थिरता के लिए बहु-स्तरीय सुरक्षा ढाँचा, जैसे पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार, बनाए रखा जाए

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

रुपये का मूल्यह्रास · भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) · उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) · विदेशी मुद्रा भंडार · मुद्रास्फीति (Inflation) · राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit) · मौद्रिक नीति (Monetary Policy) · वैश्विक पूंजी प्रवाह · आयात-निर्यात संतुलन · विनिमय दर प्रबंधन · भुगतान संतुलन (Balance of Payments) · पूंजी नियंत्रण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • सातवीं अनुसूची, संघ सूची: मुद्रा और RBI से संबंधित विषय

अवधारणा प्रवाह

वैश्विक अनिश्चितता और ऊँचे कच्चे तेल की कीमतों से आयात बिल बढ़ता है  →  डॉलर की माँग बढ़ने और विदेशी पूंजी के बाहर जाने से रुपये पर दबाव पड़ता है  →  रुपये का मूल्यह्रास आयातित वस्तुओं की घरेलू कीमतें और मुद्रास्फीति बढ़ाता है  →  RBI विदेशी मुद्रा बेचकर और नीतिगत दर बढ़ाकर बाजार को स्थिर करने का प्रयास करता है  →  बाजार की अपेक्षाएँ और संप्रेषण की स्पष्टता तय करती हैं कि नीति प्रभावी होगी या नहीं  →  LRS जैसे प्रेषण नियंत्रण प्रस्ताव दीर्घकालिक उदारीकरण और निवेशक विश्वास के बीच संतुलन की चुनौती खड़ी करते हैं

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रुपये के मूल्यह्रास से आयात महंगा हो जाता है।
2. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये के मूल्य को स्थिर करने के लिए डॉलर बेच सकता है।
3. उच्च ब्याज दरें विदेशी निवेशकों के लिए रुपये-मूल्यवर्गित परिसंपत्तियों को कम आकर्षक बनाती हैं।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। रुपये के मूल्यह्रास का अर्थ है कि एक डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये की आवश्यकता होगी, जिससे डॉलर में मूल्य वाले आयात महंगे हो जाएंगे। कथन 2 सही है। RBI रुपये की मांग बढ़ाने और उसके मूल्य को सहारा देने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर बेचकर हस्तक्षेप कर सकता है। कथन 3 गलत है। उच्च ब्याज दरें विदेशी निवेशकों के लिए रुपये-मूल्यवर्गित परिसंपत्तियों (जैसे बॉन्ड) को अधिक आकर्षक बनाती हैं, क्योंकि उन्हें उन पर बेहतर रिटर्न मिलता है, जिससे रुपये की मांग बढ़ती है और उसके मूल्य में वृद्धि होती है।

Q2. उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?

  1. यह योजना केवल अनिवासी भारतीयों (NRIs) को भारत से पैसा भेजने की अनुमति देती है।
  2. यह योजना भारतीय निवासियों को विदेशों में अचल संपत्ति खरीदने की अनुमति नहीं देती है।
  3. यह योजना भारतीय निवासियों को चालू खाता लेनदेन और कुछ पूंजी खाता लेनदेन के लिए विदेश में धन भेजने की अनुमति देती है।
  4. इस योजना के तहत प्रेषण की कोई ऊपरी सीमा नहीं है।
  5. C

उत्तर: यह योजना भारतीय निवासियों को चालू खाता लेनदेन और कुछ पूंजी खाता लेनदेन के लिए विदेश में धन भेजने की अनुमति देती है। — उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) भारतीय निवासियों को चालू खाता लेनदेन (जैसे विदेश यात्रा, उपहार) और कुछ अनुमत पूंजी खाता लेनदेन (जैसे विदेशों में शेयर या संपत्ति खरीदना, हालांकि RBI द्वारा प्रस्तावित परिवर्तनों में इन पर प्रतिबंध लगाने की बात कही गई है) के लिए प्रति वित्तीय वर्ष एक निश्चित सीमा तक विदेश में धन भेजने की अनुमति देती है। यह अनिवासी भारतीयों के लिए नहीं है और इसकी एक ऊपरी सीमा है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ रुपये के मूल्यह्रास के कारणों और भारतीय अर्थव्यवस्था पर इसके प्रभावों का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। रुपये के मूल्य को स्थिर करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा अपनाए जा सकने वाले विभिन्न उपायों पर भी चर्चा कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: रुपये के मूल्यह्रास की वर्तमान स्थिति और इसके महत्व का संक्षिप्त परिचय।
2. रुपये के मूल्यह्रास के कारण:
क. वैश्विक कारक: कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि, भू-राजनीतिक तनाव (रूस-यूक्रेन, इज़राइल-ईरान युद्ध), अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति (बढ़ती ब्याज दरें), वैश्विक पूंजी प्रवाह में अस्थिरता।
ख. घरेलू कारक: व्यापार घाटा, विदेशी निवेश में कमी, उच्च मुद्रास्फीति, घरेलू मांग में वृद्धि (विशेषकर आयातित वस्तुओं के लिए)।
3. भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव:
क. नकारात्मक प्रभाव: आयात महंगा होना (कच्चा तेल, सोना), मुद्रास्फीति में वृद्धि, विदेशी ऋण का बोझ बढ़ना, विदेशी यात्रा और शिक्षा महंगी होना, विदेशी निवेशकों का विश्वास कम होना।
ख. सकारात्मक प्रभाव (सीमित): निर्यात को बढ़ावा मिल सकता है (हालांकि वैश्विक मांग पर निर्भर करता है), विदेशी पर्यटकों के लिए भारत सस्ता हो सकता है।
4. RBI द्वारा अपनाए जा सकने वाले उपाय:
क. मौद्रिक नीति उपकरण: रेपो दर में वृद्धि (विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए), खुले बाजार के संचालन (डॉलर बेचना/रुपये खरीदना)।
ख. विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप: डॉलर बेचकर रुपये की मांग को सहारा देना।
ग. पूंजी नियंत्रण: उदारीकृत प्रेषण योजना (LRS) की सीमाएं कम करना, कुछ पूंजी खाता लेनदेन पर प्रतिबंध लगाना (जैसा कि हाल ही में RBI द्वारा प्रस्तावित किया गया है)।
घ. अन्य उपाय: निर्यात को बढ़ावा देना, गैर-आवश्यक आयातों को हतोत्साहित करना (जैसे सोने की खरीद), विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए नीतियां।
5. आलोचनात्मक विश्लेषण: इन उपायों की प्रभावशीलता, उनके संभावित नकारात्मक परिणाम (जैसे पूंजी नियंत्रण से निवेशकों का विश्वास कम होना, आर्थिक गतिविधियों पर प्रभाव) और वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों की भूमिका पर चर्चा।
6. निष्कर्ष: रुपये के मूल्य को स्थिर करने के लिए एक संतुलित और बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल।

स्रोत: The Indian Express

Maharashtra PCS (MPSC) — राज्य PCS अभ्यास

Prelims: महाराष्ट्राच्या अर्थव्यवस्थेवर परिणाम करणाऱ्या ‘आरबीआयच्या रुपयाच्या स्थिरतेसाठी प्रस्तावित उपाय’ संदर्भात, खालीलपैकी कोणता प्रस्ताव रुपयाच्या स्थिरतेसाठी सर्वात प्रभावी ठरू शकतो, विशेषतः मुंबईच्या आर्थिक केंद्राच्या दृष्टीने?

  1. रुपयाच्या विनिमय दरावर थेट सरकारी नियंत्रण लागू करणे
  2. विदेशी चलन बाजारात रुपयाची तरलता वाढविण्यासाठी आरबीआयने मोठ्या प्रमाणावर परकीय चलन खरेदी करणे
  3. रुपयाच्या विनिमय दरातील चढउतार कमी करण्यासाठी ‘करन्सी बँड’ पद्धतीचा अवलंब करणे
  4. मुंबईतील विदेशी चलन बाजाराच्या व्यापारावर पूर्ण बंदी घालणे

उत्तर: रुपयाच्या विनिमय दरातील चढउतार कमी करण्यासाठी ‘करन्सी बँड’ पद्धतीचा अवलंब करणे — करन्सी बँड पद्धतीमुळे रुपयाच्या विनिमय दरातील अत्यधिक चढउतार रोखून मुंबईच्या आर्थिक केंद्रावर होणारा परिणाम कमी करता येईल.

Mains: महाराष्ट्राच्या दृष्टीने, ‘आरबीआयच्या रुपयाच्या स्थिरतेसाठी प्रस्तावित उपाय’ हे मुंबईच्या आर्थिक केंद्रावर कसा परिणाम करू शकतात? या प्रस्तावांचे महाराष्ट्राच्या निर्यातदार, आयातदार आणि विदेशी गुंतवणूकदारांवर होणारे संभाव्य परिणाम विश्लेषण करा. (250 शब्द)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।


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