क्यों नहीं हो सकता चीतों का सैटेलाइट कॉलर से लाइव ट्रैकिंग? कुनो निदेशक का स्पष्टीकरण

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क्यों नहीं हो सकता चीतों का सैटेलाइट कॉलर से लाइव ट्रैकिंग? कुनो निदेशक का स्पष्टीकरण

उपग्रह कॉलर से चीता निगरानी प्रक्रियाकॉलर लगानाचीता पर उपग्रह कॉलरस्थिति भेजना6 घंटे बाद भौगोलिक स्थितिस्थिति प्राप्त करनानिगरानी केंद्र तक आँकड़ेस्थिति विश्लेषणगति-पथ, क्षेत्र-उपयोगकार्रवाई करनामैदान में पहुँचना
उपग्रह कॉलर से चीता निगरानी प्रक्रिया

✎ उपग्रह कॉलर किसी निश्चित समय पर जानवर की भौगोलिक स्थिति देता है, सतत लाइव ट्रैकिंग नहीं; इसलिए इसे VHF रेडियो टेलीमेट्री और मैदानी निगरानी के साथ मिलाकर ही प्रभावी बनाया जा सकता है।

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विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — पर्यावरण, पारिस्थितिकी, जैव-विविधता और वन्यजीव संरक्षण (प्रोजेक्ट चीता, वन्यजीव संरक्षण)  |  GS Paper III — विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (उपग्रह आधारित ट्रैकिंग, GPS और रेडियो टेलीमेट्री के सिद्धांत और सीमाएँ)  |  GS Paper II — शासन (वन विभाग में जवाबदेही, निलंबन और प्रशासनिक निगरानी तंत्र)
  • Prelims: प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) और कूनो राष्ट्रीय उद्यान, मध्य प्रदेश, GPS कॉलर बनाम VHF रेडियो कॉलर: कार्य-प्रणाली में अंतर, उपग्रह ट्रैकिंग की सीमाएँ: घना वन-आच्छादन, चट्टानी भूभाग और सिग्नल बाधा, IUCN लाल सूची में चीते की स्थिति (सुभेद्य, Vulnerable), CITES परिशिष्ट I में अफ्रीकी चीते का वर्गीकरण, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में चीता, भारत में चीते का स्थानीय विलोपन (1952 में घोषित), राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की भूमिका
  • Essay: तकनीक आधारित संरक्षण: क्षमता, सीमाएँ और मानवीय निगरानी का महत्व, संरक्षण परियोजनाओं में जवाबदेही और प्रशासनिक पारदर्शिता

त्वरित पुनरावृत्ति: उपग्रह कॉलर किसी निश्चित समय पर जानवर की भौगोलिक स्थिति देता है, सतत लाइव ट्रैकिंग नहीं; इसलिए इसे VHF रेडियो टेलीमेट्री और मैदानी निगरानी के साथ मिलाकर ही प्रभावी बनाया जा सकता है।

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यह खबर चर्चा में क्यों?

मध्य प्रदेश के कूनो राष्ट्रीय उद्यान में लगभग 19 महीने के नर चीते KNG22 को शिवपुर वन मंडल में गंभीर रूप से घायल अवस्था में पाया गया। उपचार के दौरान 27 अक्टूबर को जबलपुर स्थित पशु-चिकित्सा केंद्र में उसकी मृत्यु हो गई। आपातकालीन शल्य-चिकित्सा में उसके शरीर से पाँच छर्रे (firearm pellets) निकाले गए। इस घटना के बाद राज्य सरकार ने छह वन अधिकारियों को निलंबित किया। इसी बीच कूनो के निदेशक ने स्पष्ट किया कि उपग्रह कॉलर कोई सतत लाइव प्रसारण नहीं देते, बल्कि किसी निश्चित समय पर जानवर की भौगोलिक स्थिति भर बताते हैं। इस स्पष्टीकरण से उपग्रह आधारित निगरानी की तकनीकी सीमाएँ और निगरानी-प्रक्रिया की व्यावहारिक चुनौतियाँ चर्चा में आई हैं।

पृष्ठभूमि

  • प्रोजेक्ट चीता के अंतर्गत भारत में चीतों को अफ्रीकी देशों से लाकर बसाया गया। यह विश्व की पहली अंतर-महाद्वीपीय बड़े मांसाहारी स्तनधारी के स्थानांतरण की परियोजना मानी जाती है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान इसका प्रमुख स्थल है।
  • भारत में चीता 1952 में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित किया गया था। इसलिए इसकी पुनःस्थापना को दीर्घकालिक संरक्षण प्रयोग के रूप में देखा जाता है।
  • कूनो में चीतों की निगरानी दो स्तरों पर होती है: उपग्रह कॉलर से व्यापक क्षेत्र में स्थिति का अनुमान और VHF रेडियो रिसीवर से मैदान में सटीक पता लगाना। वर्तमान में लगभग 15 चीते इस प्रणाली से निगरानी में हैं।
  • वन्यजीव संरक्षण में मानव-वन्यजीव संघर्ष, अवैध शिकार और आग्नेयास्त्रों की उपलब्धता जैसी चुनौतियाँ भी जुड़ी होती हैं। इस घटना की जाँच में हथियार की उपलब्धता और स्थानीय सुरक्षा-स्थिति दोनों पहलू सामने आए हैं।

उपग्रह कॉलर और वन्यजीव ट्रैकिंग क्या है?

  • उपग्रह कॉलर (Satellite Collar) एक ऐसा पट्टा है जिसमें GPS रिसीवर और ट्रांसमीटर लगा होता है। यह निर्धारित अंतराल पर जानवर की भौगोलिक स्थिति उपग्रह के माध्यम से भेजता है।
  • यह तकनीक बड़े और दुर्गम क्षेत्रों में जानवरों की सामान्य गतिविधि, प्रवास-मार्ग और आवास-उपयोग का अध्ययन करने में उपयोगी है।
  • इसका डेटा एक निश्चित समय पर प्राप्त होता है, इसलिए यह किसी सीधे प्रसारण (Live Telecast) की तरह सतत नहीं होता। सूचना मिलने और टीम के वहाँ पहुँचने तक जानवर काफी दूर जा सकता है।
  • कूनो में कॉलर सामान्यतः हर छह घंटे पर स्थिति भेजने के लिए प्रोग्राम किए जाते हैं। यह अंतराल बैटरी की अवधि और सूचना की आवश्यकता के बीच संतुलन रखने के लिए चुना गया है।
  • यदि एक निर्धारित सूचना छूट जाए तो अंतराल बढ़कर 12 घंटे और दो सूचनाएँ छूटने पर 18 घंटे तक जा सकता है।
  • VHF रेडियो टेलीमेट्री में फील्ड टीम रिसीवर के माध्यम से जानवर के संकेत का पीछा करती है। यह स्थानीय स्तर पर सटीक पता लगाने का तरीका है, जबकि उपग्रह कॉलर व्यापक क्षेत्र का अनुमान देते हैं।
  • घने वन-आच्छादन, चट्टानी भूभाग, गुफाओं और गहरी घाटियों में उपग्रह संकेत बाधित हो सकते हैं। इसके अलावा अस्थायी सिग्नल हस्तक्षेप या उपग्रहों की खराब ज्यामिति भी सूचना प्राप्ति को प्रभावित करती है।
  • उपग्रह कॉलर महँगे होते हैं; सूचना दिए गए अनुमान के अनुसार प्रति कॉलर लगभग ₹4-5 लाख तक लागत आती है, इसलिए इनकी संख्या और प्रसारण-आवृत्ति का निर्णय व्यावहारिक संतुलन से होता है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
उपग्रह कॉलर (Satellite Collar) जीपीएस (GPS) आधारित यह उपकरण चीते की भौगोलिक स्थिति दर्ज कर बड़े और दुर्गम क्षेत्रों में निगरानी को संभव बनाता है। इसमें लाइव वीडियो जैसी सतत निगरानी नहीं होती, बल्कि समय-समय पर स्थिति का संकेत भेजा जाता है।
संचरण अंतराल (Transmission Interval) कॉलर सामान्यतः हर छह घंटे पर स्थिति भेजने के लिए प्रोग्राम किए जाते हैं। यह अंतराल बैटरी की अवधि और सूचना की आवश्यकता के बीच संतुलन के आधार पर तय होता है।
VHF रेडियो रिसीवर क्षेत्र-कर्मी VHF (Very High Frequency) उपकरण से पशु की सटीक स्थिति का पता लगाते हैं। उपग्रह संकेत से मिले अनुमानित क्षेत्र में खोज के लिए यह अनिवार्य पूरक है।
कुनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) मध्य प्रदेश में स्थित यह उद्यान प्रोजेक्ट चीता का प्रमुख स्थल है, जहाँ लगभग 15 चीतों की निगरानी उपग्रह कॉलर और रेडियो उपकरणों के संयुक्त तंत्र से की जाती है।
प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah) अफ्रीकी चीतों के भारत में पुनर्स्थापन का राष्ट्रीय प्रयास है। इसमें निगरानी, आनुवंशिक प्रबंधन और स्थानीय समुदायों के साथ सहअस्तित्व जैसे पहलू शामिल हैं।

महत्व

पारिस्थितिक महत्व

  • चीता खुले घास-वन क्षेत्रों का शीर्ष मांसाहारी है। उसकी उपस्थिति से शिकार-प्रजातियों की संख्या और घास-मैदानों के संतुलन पर प्रभाव पड़ता है।
  • पुनर्स्थापन से लंबे समय से विलुप्त प्रजाति के आवास को पुनर्जीवित करने का प्रयास होता है, जिससे भारत के खुले वन-पारिस्थितिकी तंत्र की जैव विविधता को सहारा मिलता है।

वैज्ञानिक एवं तकनीकी महत्व

  • उपग्रह कॉलर से प्राप्त आँकड़े गति-पथ, क्षेत्र-उपयोग और आवास-चयन के अध्ययन में उपयोगी होते हैं, जिससे भविष्य के संरक्षण निर्णय वैज्ञानिक आधार पर लिए जा सकते हैं।
  • यह मामला स्पष्ट करता है कि तकनीक सूचना देती है, पर उसकी व्याख्या और उस पर कार्रवाई मानवीय क्षमता पर निर्भर करती है।

प्रशासनिक एवं शासकीय महत्व

  • निगरानी में चूक पर छह वन-अधिकारियों का निलंबन यह दर्शाता है कि संरक्षण परियोजनाओं में जवाबदेही का तंत्र सीधे लोक-प्रशासन से जुड़ा है।
  • कॉलर की लागत (लगभग 4-5 लाख रुपये प्रति कॉलर) और उसकी बैटरी-सीमा का ध्यान रखते हुए संसाधन-नियोजन करना संरक्षण प्रशासन की एक व्यावहारिक चुनौती है।

विधिक एवं संवैधानिक महत्व

  • वन्यजीव संरक्षण से जुड़े कानून और राज्य-केंद्र समन्वय की भूमिका इस मामले में स्पष्ट होती है, क्योंकि वन विभाग राज्य सरकार के अधीन कार्य करता है जबकि परियोजना की नीति राष्ट्रीय स्तर पर बनती है।

चुनौतियाँ

1. तकनीकी सीमाएँ

  • उपग्रह कॉलर द्वारा दी गई स्थिति एक निश्चित समय की होती है। सूचना टीम तक पहुँचने और मौके पर पहुँचने तक चीता कई किलोमीटर दूर जा सकता है।
  • घने वन-वितान, चट्टानी भू-भाग, गुफाओं और गहरी घाटियों में उपग्रह संकेत बाधित होते हैं। पशु घनी झाड़ियों या जल-स्रोत के पास आराम करे तो भी संकेत नहीं मिल पाता।

2. संचरण-अंतराल और बैटरी का संतुलन

  • कॉलर की बैटरी बचाने के लिए संचरण अंतराल लंबा रखा जाता है। एक संदेश छूटने पर अंतराल 12 घंटे और फिर 18 घंटे तक बढ़ सकता है।
  • लंबा अंतराल तेजी से बदलती गतिविधि, जैसे घायल होने या शिकार की घटना, को पकड़ने में कमजोर साबित होता है।

3. मानव-वन्यजीव संघर्ष और अवैध हथियार

  • KNG22 को बाहरी धातु के छर्रे लगे थे, जिससे स्पष्ट होता है कि संरक्षित क्षेत्रों के आसपास अवैध हथियारों की उपलब्धता एक गंभीर खतरा है।
  • जब समुदाय वन्यजीव को फसल या पशुधन के लिए खतरा मानता है, तो शिकार की प्रवृत्ति बढ़ती है। इसलिए केवल निगरानी तकनीक से समस्या हल नहीं होती।

4. प्रशासनिक जवाबदेही और निगरानी-प्रक्रिया

  • संकेत छूटने पर तत्काल सत्यापन और अलर्ट-प्रणाली का अभाव हो तो तकनीक का लाभ अधूरा रह जाता है।
  • निलंबन जैसी कार्रवाई के साथ यह भी देखना होता है कि निगरानी-प्रोटोकॉल, प्रशिक्षण और जिम्मेदारी का स्पष्ट विभाजन है या नहीं।

5. पुनर्स्थापन की दीर्घकालिक चुनौतियाँ

  • अफ्रीकी चीते के भारत में पुनर्स्थापन में आवास की गुणवत्ता, शिकार-आधार और आनुवंशिक विविधता जैसी जटिलताएँ जुड़ी हैं।
  • बड़ी संख्या में पशुओं को लंबे समय तक ट्रैक करना महँगा है, इसलिए वित्तीय स्थिरता और दीर्घकालिक नीति-योजना आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

समस्या चिंता
उपग्रह संकेत की रुकावट घने जंगल, चट्टान और गहरी घाटी में स्थिति-निर्धारण विफल होने से पशु की सही जानकारी नहीं मिलती।
निगरानी का समय-अंतराल छह घंटे का अंतराल और संदेश छूटने पर बढ़ता अंतराल आपातकालीन स्थिति में देरी का कारण बनता है।
अवैध हथियार और शिकार छर्रों से घायल चीते का मामला संरक्षित क्षेत्र के आसपास हथियारों की उपलब्धता की ओर संकेत करता है।
प्रशासनिक जवाबदेही निगरानी में चूक होने पर कार्रवाई हुई, पर प्रोटोकॉल और अलर्ट-तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है।
कॉलर की लागत प्रति कॉलर लगभग 4-5 लाख रुपये होने से बड़ी संख्या में कॉलर लगाना और बदलना वित्तीय दबाव बनाता है।
पुनर्स्थापन की सफलता आवास, शिकार-आधार और आनुवंशिक विविधता पर दीर्घकालिक निर्भरता के कारण परिणाम अनिश्चित रहते हैं।

सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें

  • प्रोजेक्ट चीता (Project Cheetah)

आगे की राह

  • निगरानी-प्रोटोकॉल में स्पष्ट किया जाए कि संकेत छूटने पर कितने समय में सत्यापन और खोज अभियान शुरू होगा।
  • उपग्रह कॉलर के साथ VHF रेडियो रिसीवर और गश्ती दल का समन्वित उपयोग सुनिश्चित किया जाए, ताकि तकनीकी सीमाओं की भरपाई हो सके।
  • बैटरी-तकनीक और कॉलर-डिज़ाइन में सुधार पर शोध को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि संचरण-अंतराल कम रखा जा सके।
  • संरक्षित क्षेत्रों के आसपास अवैध हथियारों की बरामदगी और जब्ती का नियमित अभियान चलाया जाए।
  • स्थानीय समुदायों को मुआवजा, फसल-सुरक्षा और सूचना-तंत्र से जोड़कर शिकार की प्रवृत्ति को कम किया जाए।
  • निगरानी-कर्मियों के लिए नियमित प्रशिक्षण और जवाबदेही-मूल्यांकन की व्यवस्था की जाए।
  • वन्यजीव नीति में वित्तीय आवंटन और दीर्घकालिक योजना को जोड़ा जाए, ताकि कॉलर-खरीद और रख-रखाव निरंतर चल सके।
  • आनुवंशिक विविधता और आवास-उपयुक्तता के वैज्ञानिक मूल्यांकन को पुनर्स्थापन-योजना का नियमित हिस्सा बनाया जाए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

उपग्रह कॉलर · वन्यजीव निगरानी · चीता परियोजना · कुनो राष्ट्रीय उद्यान · तकनीकी चुनौतियाँ · भूभाग संबंधी बाधाएँ · संरक्षण प्रयास · वन्यजीव प्रबंधन · बैटरी जीवन · सिग्नल हस्तक्षेप

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • अनुच्छेद 48क: पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का राज्य-दायित्व
  • अनुच्छेद 51क(छ): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
  • सातवीं अनुसूची, समवर्ती सूची: प्रविष्टि 17ख, वन्यजीव संरक्षण

अवधारणा प्रवाह

चीते पर उपग्रह कॉलर लगाया जाता है, जो समय-समय पर उसकी भौगोलिक स्थिति भेजता है।  →  बैटरी बचाने के लिए संचरण-अंतराल छह घंटे रखा जाता है, इसलिए स्थिति की सूचना निरंतर नहीं मिलती।  →  घने वन, चट्टान या घाटी में संकेत बाधित होने या संदेश छूटने से अंतराल बढ़ता है।  →  सूचना मिलने और मौके पर पहुँचने में देरी होने पर पशु अन्यत्र चला जाता है और उसकी सही स्थिति नहीं मिल पाती।  →  निगरानी-चूक और अवैध हथियारों से घायल होने की घटना सामने आने पर प्रशासनिक जाँच और निलंबन जैसी कार्रवाई होती है।  →  इससे निगरानी-प्रोटोकॉल, हथियार-नियंत्रण और समुदाय-सहभागिता को मजबूत करने की आवश्यकता रेखांकित होती है।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. चीतों की निगरानी में उपयोग किए जाने वाले उपग्रह कॉलर (Satellite collars) के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उपग्रह कॉलर जानवरों की निरंतर लाइव ट्रैकिंग प्रदान करते हैं, जैसे लाइव टेलीविज़न प्रसारण।
2. ये कॉलर आमतौर पर हर छह घंटे में स्थान की जानकारी प्रसारित करने के लिए प्रोग्राम किए जाते हैं।
3. घने जंगल की छतरी (canopy) और चट्टानी भूभाग उपग्रह सिग्नल में बाधा डाल सकते हैं।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है क्योंकि उपग्रह कॉलर निरंतर लाइव ट्रैकिंग प्रदान नहीं करते हैं; वे एक निश्चित समय पर भौगोलिक स्थिति प्रदान करते हैं। कथन 2 सही है क्योंकि कॉलर आमतौर पर हर छह घंटे में जानकारी प्रसारित करने के लिए प्रोग्राम किए जाते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि घने जंगल और चट्टानी भूभाग सिग्नल में बाधा डाल सकते हैं।

Q2. अभिकथन (A): कुनो राष्ट्रीय उद्यान में चीतों की निगरानी में उपग्रह कॉलर और रेडियो रिसीवर दोनों का उपयोग किया जाता है।
कारण (R): उपग्रह कॉलर बड़े और दुर्गम क्षेत्रों में स्थान की जानकारी प्रदान करते हैं, जबकि VHF उपकरण जमीनी टीमों द्वारा जानवरों का अधिक सटीक पता लगाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है कि कुनो में दोनों तकनीकों का उपयोग किया जाता है। कारण (R) भी सही है और यह A की सही व्याख्या करता है कि क्यों दोनों तकनीकों का उपयोग किया जाता है, उनकी पूरक क्षमताओं के कारण।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में वन्यजीवों की निगरानी में उपग्रह आधारित तकनीकों की सीमाओं और चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** वन्यजीव संरक्षण में निगरानी के महत्व और उपग्रह आधारित तकनीकों के उपयोग का संक्षिप्त उल्लेख।
2. **उपग्रह आधारित तकनीकों की सीमाएँ और चुनौतियाँ:**
* **निरंतर लाइव ट्रैकिंग का अभाव:** यह समझाना कि ये केवल निश्चित समय पर स्थान प्रदान करते हैं, निरंतर नहीं।
* **सिग्नल हस्तक्षेप:** घने जंगल, चट्टानी भूभाग, गुफाएँ और खराब उपग्रह ज्यामिति के कारण सिग्नल का बाधित होना।
* **डेटा अंतराल:** ट्रांसमिशन छूट जाने पर स्थान अपडेट के बीच समय अंतराल का बढ़ना (जैसे 6 से 12 या 18 घंटे)।
* **बैटरी जीवन की सीमाएँ:** निगरानी आवश्यकताओं, बैटरी जीवन और कॉलर के अपेक्षित उपयोग की अवधि के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता।
* **उच्च लागत:** प्रति कॉलर 4-5 लाख रुपये जैसी उच्च लागत का उल्लेख।
* **जानवर का व्यवहार:** जानवर के स्थान बदलने की गति और निगरानी टीम के पहुँचने में लगने वाला समय।
3. **चुनौतियों का समाधान करने के उपाय:**
* **हाइब्रिड निगरानी प्रणाली:** उपग्रह कॉलर और VHF रेडियो रिसीवर जैसी तकनीकों के संयोजन का प्रभावी उपयोग।
* **उन्नत कॉलर प्रौद्योगिकी:** लंबी बैटरी जीवन, अधिक लगातार ट्रांसमिशन और बेहतर सिग्नल अधिग्रहण क्षमता वाले कॉलर विकसित करना।
* **फील्ड टीमों का सशक्तिकरण:** अधिक कर्मियों की तैनाती, बेहतर प्रशिक्षण और त्वरित प्रतिक्रिया के लिए लॉजिस्टिक सहायता।
* **सामुदायिक भागीदारी:** स्थानीय समुदायों को निगरानी प्रयासों में शामिल करना और जानकारी साझा करने के लिए प्रोत्साहित करना।
* **डेटा विश्लेषण और मॉडलिंग:** प्राप्त डेटा का बेहतर विश्लेषण करके जानवरों के व्यवहार पैटर्न की भविष्यवाणी करना।
* **अनुसंधान और विकास:** नई निगरानी तकनीकों (जैसे ड्रोन, AI आधारित विश्लेषण) में निवेश।
4. **निष्कर्ष:** वन्यजीव संरक्षण में प्रौद्योगिकी की भूमिका को स्वीकार करते हुए, मानवीय हस्तक्षेप और जमीनी निगरानी के महत्व पर जोर देना।

स्रोत: The Indian Express


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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