08 Nov नरसिंहपुर एनकाउंटर: सीबीआई जांच, राज्य सरकार की अनुशंसा
✎ राज्य की सहमति (दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946, धारा 6) के बाद ही सीबीआई राज्य में जांच कर सकती है, जबकि न्यायालय के आदेश पर यह सहमति आवश्यक नहीं होती।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — Polity & Governance (संघीय ढांचा, केंद्र-राज्य संबंध, संस्थाएँ और उनकी भूमिका, पुलिस सुधार, न्यायपालिका की भूमिका)
- Prelims: केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (Central Bureau of Investigation) — स्थापना वर्ष 1963, गृह मंत्रालय के अधीन, दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 (Delhi Special Police Establishment Act, 1946) — धारा 6 के अंतर्गत राज्य की सहमति, संघ सूची की प्रविष्टि 8 (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) और प्रविष्टि 80 (दूसरे राज्य में पुलिस की शक्ति का विस्तार), राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification) द्वारा जांच का औपचारिक आदेश, मजिस्ट्रियल जांच (Magisterial Inquiry) और इसका विधिक आधार, पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) — मुठभेड़ हत्याओं पर सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देश, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) — मुठभेड़ मामलों में दिशानिर्देश, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — मजिस्ट्रेट द्वारा जांच से संबंधित प्रावधान
- Essay: राज्य पुलिस की जवाबदेही और स्वतंत्र जांच: न्याय में जनविश्वास की कसौटी, संघीय ढांचे में सीबीआई जांच: सहयोग, सहमति और संस्थागत विश्वसनीयता
त्वरित पुनरावृत्ति: राज्य की सहमति (दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946, धारा 6) के बाद ही सीबीआई राज्य में जांच कर सकती है, जबकि न्यायालय के आदेश पर यह सहमति आवश्यक नहीं होती।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के सुआतला थाना क्षेत्र में वर्ष 2019 में हुई पुलिस मुठभेड़ की जांच अब केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (Central Bureau of Investigation) करेगा। राज्य के गृह विभाग ने 4 नवंबर को राजपत्र में अधिसूचना जारी कर इस जांच के लिए सहमति दे दी है। इस मुठभेड़ में जबलपुर निवासी विजय यादव और समीर खान की मृत्यु हुई थी। मृतकों के परिजनों ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए शिकायत की थी और तत्कालीन पुलिस अधिकारियों पर साजिश का आरोप लगाया था। इससे पहले कराई गई मजिस्ट्रियल जांच में पुलिस के बयान को सही ठहराया गया था। राज्य सरकार ने वर्ष 2021 में ही सीबीआई जांच की अनुशंसा की थी, और अब लगभग सात वर्ष बाद इसकी औपचारिक अधिसूचना जारी हुई है। यह घटनाक्रम दर्शाता है कि किसी भी राज्य में पुलिस कार्रवाई की स्वतंत्र जांच किस प्रकार विधिक और प्रशासनिक चरणों से गुजरती है।
पृष्ठभूमि
- पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची का विषय हैं, इसलिए किसी अपराध की जांच सामान्यतः राज्य पुलिस करती है। केंद्रीय एजेंसी को जांच सौंपने के लिए राज्य की सहमति या न्यायालय का आदेश आवश्यक होता है।
- सीबीआई की स्थापना 1963 में गृह मंत्रालय के एक प्रस्ताव के आधार पर हुई थी। इसकी विधिक नींव दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 में है, जिसकी धारा 6 के अंतर्गत किसी राज्य में जांच के लिए उस राज्य की सहमति आवश्यक है।
- मुठभेड़ में मृत्यु के मामलों में पारदर्शी जांच की मांग समय-समय पर उठती रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) में इन मामलों के लिए विस्तृत दिशानिर्देश दिए, जिनमें तत्काल एफआईआर, स्वतंत्र जांच और मजिस्ट्रियल जांच जैसे उपाय शामिल हैं।
- इस मामले में मजिस्ट्रियल जांच पहले ही हो चुकी थी, फिर भी परिजनों की शिकायत और उठे प्रश्नों के कारण उच्चस्तरीय एजेंसी की जांच की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यह दर्शाता है कि प्रशासनिक जांच और स्वतंत्र एजेंसी की जांच दोनों का अलग-अलग स्थान है।
- सीबीआई जांच के लिए राज्य सरकार की अधिसूचना, केंद्र की स्वीकृति और एजेंसी द्वारा मामले का औपचारिक पंजीकरण, ये चरण क्रमशः पूरे होते हैं। इस प्रकार राज्य-केंद्र सहयोग का व्यावहारिक रूप सामने आता है।
सीबीआई जांच और पुलिस मुठभेड़ों की स्वतंत्र जांच क्या है?
- केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो भारत की प्रमुख केंद्रीय जांच एजेंसी है। यह गंभीर अपराधों, भ्रष्टाचार और ऐसे मामलों की जांच करती है जिन्हें केंद्र या राज्य सरकार या न्यायालय द्वारा सौंपा जाए।
- दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के अंतर्गत सीबीआई को किसी राज्य में जांच करने के लिए उस राज्य की सहमति चाहिए। सहमति सामान्य या विशेष रूप से दी जा सकती है, और राज्य इसे वापस भी ले सकता है।
- सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय, संविधान के अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 226 के अंतर्गत अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए, सीबीआई को जांच सौंप सकते हैं। इसके लिए राज्य की सहमति आवश्यक नहीं मानी जाती।
- पुलिस मुठभेड़ में मृत्यु की स्थिति में सामान्यतः मजिस्ट्रियल जांच कराई जाती है, ताकि घटना की परिस्थितियों का स्वतंत्र विवरण मिल सके। वर्तमान में ये प्रावधान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के अंतर्गत आते हैं।
- पीयूसीएल बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुठभेड़ मामलों की जांच ऐसे पुलिस दल द्वारा होनी चाहिए जो उस घटना में सम्मिलित न हो, और इसकी सूचना तत्काल संबंधित प्राधिकरण को दी जानी चाहिए।
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी मुठभेड़ में मृत्यु के मामलों में समयबद्ध और निष्पक्ष जांच पर बल दिया है। इसका उद्देश्य जवाबदेही सुनिश्चित करना और जनविश्वास बनाए रखना है।
- संघीय ढांचे में ऐसे मामलों में राज्य और केंद्र के बीच सहयोग आवश्यक होता है, जिससे संवैधानिक संतुलन, विधि का शासन और न्याय तक पहुँच, तीनों सुनिश्चित हो सकें।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| जांच का स्वरूप | राज्य सरकार की राजपत्र अधिसूचना (4 नवंबर) से CBI को जांच की सहमति मिली, जिससे राज्य पुलिस से स्वतंत्र एजेंसी द्वारा पुनर्जांच का मार्ग खुला |
| जांच एजेंसी | केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (Central Bureau of Investigation – CBI), जो दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 के अंतर्गत कार्य करता है |
| पूर्व की जांच | 2019 की मुठभेड़ की मजिस्ट्रियल जांच में पुलिस का विवरण सही ठहराया गया था, इसलिए नई जांच को पुनर्विचार के रूप में देखा जा रहा है |
| राज्य की अनुशंसा का समय | राज्य सरकार ने वर्ष 2021 में ही CBI जांच की अनुशंसा की थी, किंतु सहमति की औपचारिक प्रक्रिया 2026 में पूरी हुई |
| परिजनों की शिकायत | मृतकों के परिजनों ने मुठभेड़ को फर्जी बताते हुए राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृह मंत्री और CBI को लिखित शिकायत दी थी |
| मामले की पृष्ठभूमि | मारे गए दोनों व्यक्ति 2017 की एक हत्या के मामले में वांछित थे, जिससे पुलिस कार्रवाई और आरोपों के बीच का विवाद केंद्र में है |
महत्व
विधिक और संवैधानिक
- विधि का शासन (Rule of Law) यह मांगता है कि पुलिस बल का प्रयोग भी न्यायिक जांच के दायरे में हो; मुठभेड़ में मृत्यु की स्वतंत्र जांच इसी सिद्धांत की व्यावहारिक अभिव्यक्ति है।
- अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की रक्षा का दायित्व राज्य पर है, इसलिए किसी भी संदिग्ध मुठभेड़ की निष्पक्ष जांच राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी बन जाती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) में मुठभेड़ों से जुड़ी मौतों के लिए दिशा-निर्देश दिए थे, जिनमें स्वतंत्र जांच और मजिस्ट्रियल जांच के प्रावधान शामिल हैं।
संघीय ढांचा और राज्य-केंद्र समन्वय
- पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची का विषय हैं, जबकि CBI का गठन केंद्रीय सूची की प्रविष्टि के अंतर्गत होता है। इसलिए CBI की जांच के लिए राज्य की सहमति आवश्यक है।
- दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6 के अंतर्गत राज्य की सहमति से ही CBI किसी राज्य में अपराध की जांच कर सकती है। यह संघवाद में राज्य की स्वायत्तता और केंद्र की जांच क्षमता के बीच संतुलन का उदाहरण है।
प्रशासनिक और पुलिस सुधार
- पुलिस जवाबदेही का प्रश्न सीधे जुड़ा है, क्योंकि आंतरिक या समान-स्तरीय जांच पर जनविश्वास सीमित रहता है।
- लंबे अंतराल के बाद जांच होने से साक्ष्य और गवाहों की स्मृति पर असर पड़ता है, जो पुलिस सुधार की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
मानवाधिकार और लोक विश्वास
- राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देश भी मुठभेड़ में मृत्यु की तत्काल और पारदर्शी जांच पर बल देते हैं।
- स्वतंत्र जांच से न्याय के प्रति जनविश्वास बढ़ता है और यह संदेश जाता है कि कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है।
चुनौतियाँ
1. मुठभेड़ की वैधता पर प्रश्न
- परिजनों के आरोप और पुलिस के विवरण के बीच स्पष्ट विरोधाभास है, जिससे तथ्यों का निर्धारण जटिल हो जाता है।
- सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के दिशा-निर्देशों के बावजूद ऐसे मामलों में निष्पक्षता की धारणा बनाए रखना कठिन रहता है।
यूपीएससी लिंक: शासन में नैतिकता, कानून-व्यवस्था और पुलिस सुधार
2. सात वर्ष का विलंब
- जांच में देरी से साक्ष्य नष्ट होने, गवाहों के बयान धुंधलाने और अभियोजन कमजोर होने का खतरा रहता है।
- विलंब न्याय तक पहुंच को प्रभावित करता है और पीड़ित परिवारों का भरोसा घटाता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक प्रक्रिया में सुधार और त्वरित न्याय
3. राज्य-केंद्र सहमति की प्रक्रिया
- CBI जांच के लिए राज्य की सहमति अनिवार्य होने से जांच का आरंभ राजनीतिक-प्रशासनिक निर्णय पर निर्भर हो जाता है।
- सहमति में विलंब या उसके अभाव से केंद्रीय एजेंसियों की भूमिका सीमित हो जाती है, जो संघीय संतुलन का प्रश्न है।
यूपीएससी लिंक: संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध
4. मजिस्ट्रियल जांच बनाम स्वतंत्र जांच
- मजिस्ट्रियल जांच का दायरा सीमित होता है और वह प्रायः पुलिस रिकॉर्ड पर आधारित रहती है।
- स्वतंत्र एजेंसी की जांच से प्रक्रिया की विश्वसनीयता बढ़ती है, परंतु इसके लिए संस्थागत क्षमता और समय दोनों आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: लोक प्रशासन में जवाबदेही और पारदर्शिता
5. पुलिस बल का दुरुपयोग रोकना
- मुठभेड़ को अपराध-नियंत्रण का उपाय मान लेने की प्रवृत्ति कानून के शासन के लिए गंभीर चुनौती है।
- आंतरिक अनुशासन, स्पष्ट परिचालन मानक और शिकायत निवारण व्यवस्था से ऐसे दुरुपयोग पर अंकुश संभव है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा और पुलिस सुधार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| समस्या | चिंता |
|---|---|
| साक्ष्य का संरक्षण | सात वर्ष बाद घटनास्थल, हथियार और मेडिकल रिकॉर्ड की विश्वसनीयता पर संदेह बढ़ता है |
| जांच की स्वतंत्रता | जिस पुलिस तंत्र पर आरोप है, उसी से जुड़े अधिकारियों द्वारा जांच होने से निष्पक्षता पर प्रश्न उठता है |
| मजिस्ट्रियल जांच की सीमा | प्रशासनिक जांच में पुलिस रिकॉर्ड पर निर्भरता अधिक रहती है और गहन आपराधिक जांच की क्षमता सीमित होती है |
| सहमति-आधारित व्यवस्था | CBI जांच का आरंभ राज्य की सहमति पर निर्भर होने से विलंब की संभावना बनी रहती है |
| परिजनों का विश्वास | लंबी प्रक्रिया और बार-बार की शिकायतों से न्याय के प्रति भरोसा कमजोर होता है |
| जवाबदेही की कमी | मुठभेड़ों से जुड़े मामलों में दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के उदाहरण सीमित होने से निवारक प्रभाव घटता है |
आगे की राह
- मुठभेड़ में मृत्यु के हर मामले में तत्काल स्वतंत्र जांच की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए, ताकि प्रारंभिक चरण में ही साक्ष्य सुरक्षित रहें।
- सर्वोच्च न्यायालय के 2014 के दिशा-निर्देशों और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मानकों को राज्य पुलिस की नियमावली में समाहित किया जाए।
- CBI जांच के लिए सहमति की प्रक्रिया में समय-सीमा निर्धारित की जाए, ताकि गंभीर मामलों में अनावश्यक विलंब न हो।
- मजिस्ट्रियल जांच की रिपोर्ट को सार्वजनिक करने और उसकी समीक्षा की स्पष्ट व्यवस्था हो, जिससे पारदर्शिता बढ़े।
- पुलिस अधिकारियों के लिए बल प्रयोग और मुठभेड़ संबंधी प्रशिक्षण तथा परिचालन मानक (SOP) को सुदृढ़ किया जाए।
- पीड़ित परिवारों को जांच की प्रगति की जानकारी और सुरक्षा उपलब्ध कराने के लिए गवाह संरक्षण तंत्र को प्रभावी बनाया जाए।
- पुलिस शिकायत प्राधिकरण जैसे स्वतंत्र निकायों को पर्याप्त शक्ति और संसाधन दिए जाएं, ताकि आरोपों की प्रारंभिक जांच निष्पक्षता से हो सके।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) और राज्य की सहमति · दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6 · पुलिस और लोक व्यवस्था : राज्य सूची का विषय · संघवाद और केंद्र-राज्य अधिकार विभाजन · फर्जी मुठभेड़ और मानवाधिकार · PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) के दिशा-निर्देश · मजिस्ट्रियल जांच और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A) · न्यायिक समीक्षा और न्यायालय द्वारा जांच हस्तांतरण · राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (National Human Rights Commission) · पुलिस सुधार और जवाबदेही · राजपत्र अधिसूचना (Gazette Notification)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 21: जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार
- सातवीं अनुसूची, संघ सूची की प्रविष्टि 8: CBI से संबंधित केंद्रीय अधिकार क्षेत्र
- सातवीं अनुसूची, राज्य सूची: पुलिस और लोक व्यवस्था पर राज्य का अधिकार
अवधारणा प्रवाह
2017 में एक हत्या के मामले में दो व्यक्तियों के वांछित होने से पुलिस कार्रवाई की पृष्ठभूमि बनी। → 2019 में सुआतला थाना क्षेत्र की मुठभेड़ में दोनों व्यक्तियों की मृत्यु हुई और परिजनों ने उसे फर्जी बताया। → मजिस्ट्रियल जांच में पुलिस के विवरण को सही ठहराया गया, किंतु परिजनों ने केंद्रीय स्तर पर शिकायत जारी रखी। → राज्य सरकार ने 2021 में CBI जांच की अनुशंसा की और अंततः गृह विभाग ने राजपत्र अधिसूचना से सहमति दी। → दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम के अंतर्गत CBI अब जांच आगे बढ़ाएगी, जिसके निष्कर्ष विधिक कार्रवाई की दिशा तय करेंगे।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए :
1. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो की स्थापना वर्ष 1963 में गृह मंत्रालय के एक संकल्प द्वारा की गई थी।
2. दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 6 के अंतर्गत किसी राज्य में सीबीआई द्वारा जांच के लिए उस राज्य की सहमति आवश्यक होती है।
3. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A) के अंतर्गत पुलिस गोलीबारी में मृत्यु के मामलों में मजिस्ट्रियल जांच वैकल्पिक है और न्यायालय के विवेक पर निर्भर करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है : सीबीआई की स्थापना 1963 में गृह मंत्रालय के संकल्प से हुई थी, इसका कानूनी आधार 1946 का DSPE अधिनियम है। कथन 2 सही है : धारा 6 के अंतर्गत राज्य की सहमति से ही सीबीआई उस राज्य में जांच कर सकती है। कथन 3 गलत है : पुलिस गोलीबारी में मृत्यु के मामलों में मजिस्ट्रियल जांच अनिवार्य है, वैकल्पिक नहीं।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों (A और R) पर विचार कीजिए :
कथन (A) : किसी राज्य में मामला सीबीआई को सौंपे जाने के लिए उस राज्य सरकार की सहमति आवश्यक होती है।
कारण (R) : पुलिस और लोक व्यवस्था संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के विषय हैं, और दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6 राज्य की सहमति को अनिवार्य बनाती है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए :
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है।
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है।
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है।
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है। — पुलिस और लोक व्यवस्था राज्य सूची (सातवीं अनुसूची, प्रविष्टि 1 और 2) के विषय हैं, इसलिए केंद्रीय एजेंसी को राज्य में प्रवेश के लिए सहमति चाहिए। यही कारण (R) कथन (A) की सही व्याख्या है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन पर विचार कीजिए :
स्तंभ I (विधिक प्रावधान/निर्णय)
1. दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम की धारा 6
2. दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A)
3. PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014)
4. ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013)
स्तंभ II (विषय)
A. पुलिस गोलीबारी से मृत्यु पर मजिस्ट्रियल जांच
B. राज्य की सहमति से सीबीआई जांच
C. संज्ञेय अपराध में प्राथमिकी का अनिवार्य पंजीकरण
D. मुठभेड़ हत्याओं की जांच हेतु दिशा-निर्देश
सही सुमेलन चुनिए :
- 1-A, 2-B, 3-C, 4-D
- 1-B, 2-A, 3-D, 4-C
- 1-C, 2-D, 3-A, 4-B
- 1-D, 2-C, 3-B, 4-A
उत्तर: 1-B, 2-A, 3-D, 4-C — धारा 6 राज्य की सहमति (B) से जुड़ी है। धारा 176(1A) पुलिस गोलीबारी में मजिस्ट्रियल जांच (A) का प्रावधान है। PUCL (2014) ने मुठभेड़ मामलों के लिए दिशा-निर्देश (D) दिए। ललिता कुमारी (2013) ने संज्ञेय अपराधों में प्राथमिकी के अनिवार्य पंजीकरण (C) पर बल दिया।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ पुलिस मुठभेड़ों की स्वतंत्र जांच के लिए केंद्रीय अभिकरण की भूमिका संघीय ढांचे में सीमित क्यों है? सीबीआई जांच के लिए राज्य की सहमति की अनिवार्यता के संवैधानिक और विधिक आधार का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। साथ ही उत्तर दीजिए कि क्या न्यायालय द्वारा सीधे जांच सौंपना इस अवरोध को दूर करने का पर्याप्त उपाय है? (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना : (1) भूमिका : नरसिंहपुर मामले में राज्य सरकार द्वारा 4 नवंबर को राजपत्र अधिसूचना जारी कर सीबीआई जांच की सहमति देना, और 2019 की मुठभेड़ में दो व्यक्तियों की मृत्यु, परिजनों की शिकायत तथा पूर्व में हुई मजिस्ट्रियल जांच का संक्षिप्त उल्लेख। (2) संवैधानिक आधार : सातवीं अनुसूची की संघ सूची की प्रविष्टि 8 (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो), राज्य सूची की प्रविष्टि 1 और 2 (पुलिस, लोक व्यवस्था), समवर्ती सूची की प्रविष्टि 1 (आपराधिक विधि); अनुच्छेद 246 के अंतर्गत विधायी शक्तियों का विभाजन। (3) विधिक प्रावधान : दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम, 1946 की धारा 5 (अधिकार क्षेत्र का विस्तार) और धारा 6 (राज्य की सहमति); सुप्रीम कोर्ट का वेस्ट बंगाल राज्य बनाम सीबीआई (2010) निर्णय। (4) न्यायिक हस्तक्षेप : अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत न्यायालय द्वारा जांच हस्तांतरण, विनीत नारायण बनाम भारत संघ (1997) का संदर्भ, और यह तर्क कि न्यायिक हस्तक्षेप अपवादस्वरूप है। (5) मुठभेड़ मामलों के दिशा-निर्देश : PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य (2014) के दिशा-निर्देश, जिनमें स्वतंत्र जांच की अनिवार्यता और तत्काल प्राथमिकी का प्रावधान शामिल है; राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के मुठभेड़ संबंधी निर्देश। (6) संतुलित मत : (क) संघवाद और राज्य की स्वायत्तता के पक्ष में तर्क; (ख) जवाबदेही, निष्पक्षता और पीड़ित परिजनों के विश्वास के पक्ष में तर्क, जहाँ स्थानीय पुलिस की स्वतंत्रता पर प्रश्न हो। (7) समालोचना : राज्य की सहमति की व्यवस्था का दुरुपयोग या विलंब; दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 176(1A) से लेकर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 के संगत प्रावधानों तक के संक्रमण पर ध्यान। (8) सुधार : पुलिस सुधार पर प्रकाश सिंह मामले (2006) के निर्देश, स्वतंत्र शिकायत प्राधिकरण, और सहमति-प्रणाली में पारदर्शिता। (9) निष्कर्ष : संघीय संतुलन और न्याय की स्वतंत्र जांच के बीच संस्थागत संतुलन की आवश्यकता।
स्रोत: amarujala.com
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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