आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति: रेपो दर 5.25% पर अपरिवर्तित, जानें प्रमुख फैसले

Monetary Policy Statement, 2026-27 Resolution of the Monetary Policy Committee August 3 to 5, 2026 — concept mind map

आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति: रेपो दर 5.25% पर अपरिवर्तित, जानें प्रमुख फैसले

✎ मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा और तटस्थ रुख बनाए रखा।

RBI Monetary Policy CycleMPC MeetingAug 3-5, 2026Policy DecisionRepo rate 5.25%Neutral StanceFlexibility for adjustmentsInflation TargetCPI 4% (+/-2%)Liquidity ToolsSDF, MSF, Bank RateEconomic ImpactGrowth vs Inflation
RBI Monetary Policy Cycle

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था  |  GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय  |  GS Paper III — सरकारी बजट
  • Prelims: मौद्रिक नीति समिति (MPC), रेपो दर, रिवर्स रेपो दर, सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर, बैंक दर, स्थायी जमा सुविधा (SDF), मुद्रास्फीति लक्ष्य, GDP वृद्धि अनुमान, भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)
  • Essay: भारत की आर्थिक संवृद्धि के समक्ष चुनौतियाँ और अवसर, मुद्रास्फीति प्रबंधन और आर्थिक स्थिरता में मौद्रिक नीति की भूमिका

त्वरित पुनरावृत्ति: मौद्रिक नीति समिति ने रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा और तटस्थ रुख बनाए रखा।

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने 3 से 5 अगस्त, 2026 तक अपनी 62वीं बैठक आयोजित की। इस बैठक में वैश्विक और घरेलू आर्थिक गतिविधियों का विस्तृत मूल्यांकन किया गया और सर्वसम्मति से नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखने का निर्णय लिया गया। समिति ने तटस्थ रुख (neutral stance) बनाए रखने का भी निर्णय लिया, जो वर्तमान आर्थिक परिस्थितियों और भविष्य के अनुमानों के प्रति RBI के दृष्टिकोण को दर्शाता है।

पृष्ठभूमि

  • मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत गठित एक वैधानिक निकाय है, जिसका मुख्य उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त करना है।
  • भारत सरकार ने RBI के परामर्श से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (Consumer Price Index – CPI) आधारित मुद्रास्फीति (Inflation) के लिए 4 प्रतिशत (+/- 2 प्रतिशत) का लक्ष्य निर्धारित किया है।
  • रेपो दर (Repo Rate) वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को सरकारी प्रतिभूतियों के बदले अल्पकालिक ऋण देता है। यह मौद्रिक नीति का एक प्रमुख उपकरण है।
  • स्थायी जमा सुविधा (Standing Deposit Facility – SDF) दर वह दर है जिस पर बैंक RBI के पास बिना किसी संपार्श्विक (collateral) के अधिशेष तरलता जमा कर सकते हैं।
  • सीमांत स्थायी सुविधा (Marginal Standing Facility – MSF) दर वह दर है जिस पर बैंक आपातकालीन स्थिति में RBI से ओवरनाइट ऋण ले सकते हैं।
  • बैंक दर (Bank Rate) वह दर है जिस पर RBI वाणिज्यिक बैंकों को दीर्घकालिक ऋण देता है।
  • तटस्थ रुख (Neutral Stance) का अर्थ है कि MPC भविष्य में आवश्यकतानुसार दरों में वृद्धि या कमी करने के लिए तैयार है, जो आर्थिक डेटा पर निर्भर करेगा।
  • वैश्विक स्तर पर, पश्चिम एशिया में संघर्ष, अस्थिर तेल कीमतें, बढ़ती मुद्रास्फीति की उम्मीदें और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में कमज़ोर सार्वजनिक वित्त वैश्विक आर्थिक परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा कर रहे हैं।
  • घरेलू मोर्चे पर, भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक चुनौतियों के बावजूद लचीली बनी हुई है, जिसमें मज़बूत निजी उपभोग और निवेश गतिविधि शामिल है। हालांकि, अल नीनो (El Niño) की स्थिति के कारण दक्षिण-पश्चिम मानसून की कमी और असमानता कृषि क्षेत्र और ग्रामीण मांग के लिए कुछ जोखिम पैदा करती है।

मौद्रिक नीति समिति (MPC) क्या है?

  • मौद्रिक नीति समिति (MPC) भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन के माध्यम से स्थापित एक छह सदस्यीय निकाय है।
  • इसका मुख्य कार्य भारत में मौद्रिक नीति निर्धारित करना है, जिसका प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि संवृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखना है।
  • समिति में तीन सदस्य RBI से होते हैं (जो पदेन सदस्य होते हैं) और तीन सदस्य भारत सरकार द्वारा नियुक्त किए जाते हैं।
  • RBI गवर्नर MPC के पदेन अध्यक्ष होते हैं।
  • MPC वर्ष में कम से कम चार बार बैठक करती है, और प्रत्येक बैठक के बाद इसके निर्णय सार्वजनिक किए जाते हैं।
  • समिति बहुमत के आधार पर निर्णय लेती है, और टाई होने की स्थिति में RBI गवर्नर के पास निर्णायक मत होता है।
  • MPC नीतिगत रेपो दर निर्धारित करती है, जो मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण है।
  • इसका लक्ष्य उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत (+/- 2 प्रतिशत) के दायरे में रखना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
रेपो दर (Repo Rate) अपरिवर्तित मौद्रिक नीति समिति (Monetary Policy Committee – MPC) ने तरलता समायोजन सुविधा (Liquidity Adjustment Facility – LAF) के तहत नीतिगत रेपो दर को 5.25 प्रतिशत पर अपरिवर्तित रखा है, जो मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने और आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा देने के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
तटस्थ रुख (Neutral Stance) जारी MPC ने तटस्थ रुख को जारी रखने का निर्णय लिया है, जिसका अर्थ है कि भविष्य की मौद्रिक नीति के निर्णय आर्थिक आंकड़ों और उभरती परिस्थितियों पर निर्भर करेंगे, जिससे नीतिगत लचीलापन बना रहेगा।
वैश्विक आर्थिक अस्थिरता पश्चिम एशिया में संघर्ष, अस्थिर तेल कीमतें, बढ़ती मुद्रास्फीति की उम्मीदें और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में नाजुक सार्वजनिक वित्त वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा कर रहे हैं।
घरेलू मांग में लचीलापन उच्च आवृत्ति संकेतक (High Frequency Indicators) Q1:2026-27 में मजबूत निजी खपत और निवेश के साथ स्थिर घरेलू मांग का संकेत देते हैं, जो वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था के लचीलेपन को दर्शाता है।
GDP संवृद्धि अनुमान वास्तविक GDP संवृद्धि 2026-27 के लिए 6.7 प्रतिशत अनुमानित है, जिसमें Q1:2027-28 के लिए 7.3 प्रतिशत की संवृद्धि का अनुमान है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक दृष्टिकोण को दर्शाता है।
मुद्रास्फीति का दबाव जून 2026 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) मुद्रास्फीति 4.4 प्रतिशत तक बढ़ गई है, जो लगातार 16 महीनों तक लक्ष्य से नीचे रहने के बाद मुद्रास्फीति के दबावों की वापसी का संकेत है।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • रेपो दर को अपरिवर्तित रखने का निर्णय वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच घरेलू आर्थिक संवृद्धि को बनाए रखने और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के बीच संतुलन साधने के RBI के दृष्टिकोण को दर्शाता है।
  • तटस्थ नीतिगत रुख भविष्य की आर्थिक परिस्थितियों के आधार पर नीतिगत समायोजन के लिए लचीलापन प्रदान करता है, जिससे RBI को उभरते जोखिमों पर प्रतिक्रिया देने की अनुमति मिलती है।
  • मजबूत घरेलू मांग और निवेश भारतीय अर्थव्यवस्था के लचीलेपन को दर्शाते हैं, जो वैश्विक बाधाओं के बावजूद संवृद्धि को बढ़ावा देते हैं।
  • सेवा निर्यात में निरंतर संवृद्धि और व्यापार समझौतों के माध्यम से वस्तु निर्यात में वृद्धि बाह्य क्षेत्र के लिए सकारात्मक संकेत हैं।

नीतिगत निहितार्थ

  • MPC का निर्णय सरकार की राजकोषीय नीतियों (Fiscal Policies) के साथ मौद्रिक नीति के समन्वय के महत्व को रेखांकित करता है, विशेष रूप से आपूर्ति-पक्ष के उपायों और बुनियादी ढांचे पर जोर देने के संदर्भ में।
  • कृषि क्षेत्र पर प्रतिकूल मानसून के प्रभाव को कम करने के लिए फसल विविधीकरण (Crop Diversification) और जल संचयन (Water Harvesting) जैसी सरकारी पहलें खाद्य मुद्रास्फीति को प्रबंधित करने में महत्वपूर्ण हैं।
  • GST युक्तिकरण (GST Rationalisation) और स्थिर रोजगार की स्थिति शहरी मांग को बनाए रखने में मदद करती है, जो समग्र आर्थिक संवृद्धि के लिए महत्वपूर्ण है।

सामाजिक महत्व

  • मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को स्थिर करके आम नागरिकों की क्रय शक्ति (Purchasing Power) की रक्षा करता है।
  • कृषि क्षेत्र पर मानसून के प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के उपाय ग्रामीण आय और मांग को स्थिर करने में मदद करते हैं, जिससे ग्रामीण आबादी की आजीविका सुरक्षित रहती है।
  • स्थिर रोजगार की स्थिति और मजबूत शहरी मांग बेहतर जीवन स्तर और आर्थिक अवसरों में योगदान करती है।

चुनौतियाँ

1. वैश्विक आर्थिक अस्थिरता

  • पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना और अस्थिर तेल कीमतें वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण जोखिम पैदा करती हैं, जिससे भारत की आयात लागत प्रभावित हो सकती है और मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ सकता है।
  • कई केंद्रीय बैंकों द्वारा दरों में वृद्धि और अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना पूंजी प्रवाह और भारतीय रुपये के विनिमय दर पर दबाव डाल सकता है।

2. मुद्रास्फीति का दबाव

  • लगातार 16 महीनों तक लक्ष्य से नीचे रहने के बाद CPI मुद्रास्फीति का 4.4 प्रतिशत तक बढ़ना चिंता का विषय है, खासकर जब वैश्विक ऊर्जा कीमतें और आपूर्ति श्रृंखला के दबाव ऊंचे बने हुए हैं।
  • एल नीनो (El Niño) की स्थिति के कारण अपर्याप्त और असमान दक्षिण-पश्चिम मानसून कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकता है, जिससे खाद्य मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।

3. कृषि क्षेत्र पर जोखिम

  • एल नीनो की स्थिति के बीच अपर्याप्त और असमान मानसून कृषि क्षेत्र के दृष्टिकोण और ग्रामीण मांग के लिए जोखिम पैदा करता है, जिससे कृषि आय और खाद्य सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
  • जलवायु-लचीली फसलों (Climate-Resilient Crops) और जल संचयन जैसी सरकारी पहलें महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनके प्रभाव को पूरी तरह से महसूस होने में समय लग सकता है।

4. बाह्य क्षेत्र के जोखिम

  • वैश्विक आर्थिक मंदी और व्यापार संरक्षणवाद (Trade Protectionism) में वृद्धि भारतीय निर्यात को प्रभावित कर सकती है, हालांकि सेवा निर्यात और व्यापार समझौतों से कुछ हद तक मदद मिल सकती है।
  • कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि और मजबूत अमेरिकी डॉलर भारत के चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) को बढ़ा सकता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वैश्विक भू-राजनीतिक संघर्ष पश्चिम एशिया में संघर्ष का फिर से शुरू होना तेल की कीमतों में अस्थिरता और वैश्विक आर्थिक संवृद्धि को प्रभावित कर सकता है।
मुद्रास्फीति का दबाव CPI मुद्रास्फीति का बढ़ना और वैश्विक ऊर्जा तथा आपूर्ति श्रृंखला के दबावों के कारण इसके और बढ़ने की संभावना।
मानसून की अनिश्चितता एल नीनो की स्थिति के कारण अपर्याप्त और असमान मानसून कृषि उत्पादन और ग्रामीण मांग को प्रभावित कर सकता है।
वैश्विक वित्तीय बाजार की अस्थिरता बढ़ती वैश्विक ब्याज दरें और मजबूत अमेरिकी डॉलर पूंजी प्रवाह और रुपये के विनिमय दर पर दबाव डाल सकते हैं।
सार्वजनिक वित्त की नाजुकता प्रणालीगत अर्थव्यवस्थाओं में नाजुक सार्वजनिक वित्त वैश्विक आर्थिक दृष्टिकोण के लिए जोखिम पैदा करता है।

आगे की राह

  • मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए RBI को सतर्क रहना चाहिए और वैश्विक तथा घरेलू कारकों पर बारीकी से नजर रखनी चाहिए, आवश्यकता पड़ने पर नीतिगत समायोजन के लिए तैयार रहना चाहिए।
  • सरकार को आपूर्ति-पक्ष के उपायों को मजबूत करना जारी रखना चाहिए, जैसे कि आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना और आपूर्ति श्रृंखला बाधाओं को दूर करना।
  • कृषि क्षेत्र को मानसून की अनिश्चितता से बचाने के लिए फसल विविधीकरण, जलवायु-लचीली फसलों को बढ़ावा देना और जल संचयन तथा संरक्षण के प्रयासों को तेज करना चाहिए।
  • बुनियादी ढांचे में निवेश पर सरकारी जोर को बनाए रखना चाहिए ताकि निवेश गतिविधि को बढ़ावा मिले और दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि को समर्थन मिले।
  • निर्यात को बढ़ावा देने के लिए नए व्यापार समझौतों पर बातचीत जारी रखनी चाहिए और मौजूदा समझौतों का प्रभावी ढंग से लाभ उठाना चाहिए, साथ ही निर्यात बास्केट में विविधता लानी चाहिए।
  • वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थानों की बैलेंस शीट को मजबूत करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि ऋण प्रवाह मजबूत बना रहे।
  • वैश्विक आर्थिक विकास और भू-राजनीतिक जोखिमों की निगरानी जारी रखनी चाहिए, और किसी भी प्रतिकूल प्रभाव को कम करने के लिए आकस्मिक योजनाएं (Contingency Plans) विकसित करनी चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

मौद्रिक नीति समिति (MPC) · रेपो दर · मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण · तरलता समायोजन सुविधा (LAF) · स्थायी जमा सुविधा (SDF) · सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) · आर्थिक संवृद्धि · राजकोषीय नीति · वैश्विक आर्थिक चुनौतियाँ · घरेलू मांग · विनिमय दर · मुद्रास्फीति दबाव

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 282’, ‘note’: ‘केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंध’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 292’, ‘note’: ‘भारत सरकार द्वारा उधार लेना’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 293’, ‘note’: ‘राज्यों द्वारा उधार लेना’}

अवधारणा प्रवाह

वैश्विक आर्थिक अस्थिरता (पश्चिम एशिया संघर्ष, तेल कीमतें)  →  घरेलू अर्थव्यवस्था पर प्रभाव (मुद्रास्फीति दबाव, मानसून जोखिम)  →  RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक  →  रेपो दर और नीतिगत रुख पर निर्णय (अपरिवर्तित रेपो दर, तटस्थ रुख)  →  आर्थिक संवृद्धि और मुद्रास्फीति पर प्रभाव  →  भविष्य की आर्थिक स्थिरता और संवृद्धि के लिए निहितार्थ

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के तहत किया गया है।
2. MPC के अध्यक्ष केंद्रीय वित्त मंत्री होते हैं।
3. MPC का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि संवृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखना है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। मौद्रिक नीति समिति (MPC) का गठन भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में संशोधन करके किया गया था। कथन 2 गलत है। MPC के अध्यक्ष RBI गवर्नर होते हैं। कथन 3 सही है। MPC का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जबकि संवृद्धि के उद्देश्य को ध्यान में रखना है।

Q2. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा उपयोग किए जाने वाले निम्नलिखित उपकरणों पर विचार कीजिए:
1. रेपो दर
2. बैंक दर
3. सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर
4. स्थायी जमा सुविधा (SDF) दर
उपर्युक्त में से कितने तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के अंतर्गत आते हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. केवल तीन
  4. सभी चार

उत्तर: केवल तीन — रेपो दर और रिवर्स रेपो दर तरलता समायोजन सुविधा (LAF) के मुख्य उपकरण हैं। MSF दर और SDF दर LAF के दायरे से बाहर हैं, लेकिन ये मौद्रिक नीति के महत्वपूर्ण उपकरण हैं।

Q3. अभिकथन (A): मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने अपनी हालिया बैठक में नीतिगत रेपो दर को अपरिवर्तित रखा है।
कारण (R): वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और घरेलू मुद्रास्फीति दबावों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था लचीली बनी हुई है।

  1. (A) और (R) दोनों सत्य हैं, और (R), (A) की सही व्याख्या है।
  2. (A) और (R) दोनों सत्य हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है।
  3. (A) सत्य है, लेकिन (R) असत्य है।
  4. (A) असत्य है, लेकिन (R) सत्य है।

उत्तर: (A) और (R) दोनों सत्य हैं, लेकिन (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि MPC ने रेपो दर को अपरिवर्तित रखा है। कारण (R) भी सही है क्योंकि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था लचीली है, और यह MPC के दर को अपरिवर्तित रखने के निर्णय का एक प्रमुख कारण है, क्योंकि यह स्थिरता बनाए रखने और संवृद्धि को समर्थन देने का प्रयास करता है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ मौद्रिक नीति समिति (MPC) के उद्देश्यों और कार्यप्रणाली का विस्तार से वर्णन कीजिए। वैश्विक और घरेलू आर्थिक चुनौतियों के संदर्भ में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसकी हालिया नीतिगत दरों को अपरिवर्तित रखने के निर्णय के निहितार्थों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: परिचय: मौद्रिक नीति समिति (MPC) का संक्षिप्त परिचय और इसका गठन (RBI अधिनियम, 1934)।
MPC के उद्देश्य: मूल्य स्थिरता (मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण) प्राथमिक उद्देश्य, संवृद्धि को ध्यान में रखना।
MPC की कार्यप्रणाली: संरचना (6 सदस्य – 3 RBI से, 3 सरकार से), निर्णय प्रक्रिया (बहुमत से), प्रत्येक बैठक के बाद निर्णय का सार्वजनिक होना।
हालिया निर्णय: रेपो दर, SDF दर, MSF दर और बैंक दर को अपरिवर्तित रखने का उल्लेख। ‘तटस्थ रुख’ (neutral stance) बनाए रखना।
निहितार्थों का विश्लेषण:
1. वैश्विक चुनौतियाँ: पश्चिम एशिया में संघर्ष, अस्थिर तेल कीमतें, वैश्विक मुद्रास्फीति, केंद्रीय बैंकों द्वारा दर वृद्धि, अमेरिकी डॉलर का मजबूत होना।
2. घरेलू संदर्भ: भारतीय अर्थव्यवस्था का लचीलापन, स्थिर घरेलू मांग, मजबूत निजी उपभोग और निवेश, सेवा निर्यात में विस्तार, GST युक्तिकरण का प्रभाव।
3. मुद्रास्फीति और संवृद्धि संतुलन: CPI मुद्रास्फीति में वृद्धि (जून 2026 में 4.4%)। MPC का लक्ष्य मुद्रास्फीति को नियंत्रित करते हुए संवृद्धि को बनाए रखना।
4. कृषि क्षेत्र पर जोखिम: अल नीनो और असमान दक्षिण-पश्चिम मानसून का प्रभाव, हालांकि सरकारी पहल (फसल विविधीकरण, जल संचयन) से प्रभाव कम होने की उम्मीद।
5. भविष्य की संवृद्धि दर: 2026-27 के लिए वास्तविक GDP संवृद्धि 6.7% अनुमानित।
निष्कर्ष: MPC का निर्णय वैश्विक अनिश्चितताओं और घरेलू संवृद्धि गति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है, जिसका उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखते हुए आर्थिक संवृद्धि को समर्थन देना है।

स्रोत: RBI


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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