उर्वरक आपूर्ति में सरकार की अग्रिम योजना: 2025-26 में 4% वृद्धि का लक्ष्य

उर्वरक आपूर्ति में सरकार की अग्रिम योजना: 2025-26 में 4% वृद्धि का लक्ष्य

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper III — अर्थव्यवस्था  |  GS Paper III — कृषि
  • Prelims: उर्वरक विभाग, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीकेएस, खरीफ सत्र, दीर्घकालिक आयात समझौते
  • Essay: कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और खाद्य सुरक्षा का महत्व, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में लचीलापन और भारत की रणनीति

त्वरित पुनरावृत्ति: भारत सरकार अग्रिम योजना, घरेलू उत्पादन और रणनीतिक आयात समझौतों के माध्यम से देश में उर्वरकों की पर्याप्त एवं समय पर उपलब्धता सुनिश्चित कर रही है, जिससे कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा को बल मिल रहा है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

भारत सरकार ने देश भर में उर्वरकों की समय पर और पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। यह अग्रिम योजना, मजबूत घरेलू उत्पादन और भागीदार देशों के साथ रणनीतिक आयात व्यवस्था के माध्यम से किया जा रहा है। रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के उर्वरक विभाग ने बताया कि वर्ष 2025-26 के दौरान कुल उर्वरक आवश्यकता में लगभग 4 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है, जिसके लिए घरेलू उत्पादन और रणनीतिक आयात के माध्यम से आपूर्ति बनाए रखी जाएगी।

पृष्ठभूमि

  • भारत एक कृषि प्रधान देश है जहाँ उर्वरक कृषि उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
  • कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) प्रत्येक फसल सत्र से पहले राज्य सरकारों के परामर्श से उर्वरकों की आवश्यकता का आकलन करता है।
  • उर्वरक विभाग इन आकलनों के आधार पर घरेलू उत्पादन, आयात और वितरण का समन्वय करता है ताकि किसानों को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।
  • वर्ष 2025-26 के दौरान कुल उर्वरक आवश्यकता 677.18 लाख मीट्रिक टन (LMT) आंकी गई है, जो 2024-25 की 649.43 LMT की तुलना में लगभग 4 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।
  • भारत प्रमुख उर्वरकों जैसे यूरिया, डीएपी (DAP), एमओपी (MOP) और एनपीकेएस (NPKS) की खपत करता है, जिनमें से कुछ का आयात किया जाता है।
  • वैश्विक अनिश्चितताओं के कारण उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधानों का जोखिम रहता है, जिससे आपूर्ति सुरक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत में उर्वरक आपूर्ति प्रबंधन

  • उर्वरक आपूर्ति प्रबंधन भारत सरकार की एक महत्वपूर्ण पहल है जिसका उद्देश्य देश के किसानों के लिए पर्याप्त और समय पर उर्वरक उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
  • यह प्रबंधन कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा प्रत्येक फसल सत्र से पहले राज्य सरकारों के परामर्श से उर्वरकों की आवश्यकता का आकलन करने से शुरू होता है।
  • आकलन के बाद, उर्वरक विभाग घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देता है और आवश्यकतानुसार आयात की योजना बनाता है।
  • सरकार ने उर्वरक आपूर्ति सुरक्षा को मजबूत करने के लिए प्रमुख उर्वरक उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालिक आयात समझौते किए हैं।
  • वर्ष 2025-26 के लिए सऊदी अरब, जॉर्डन, मोरक्को और रूस जैसे देशों से डीएपी, एमओपी और एनपीके के आयात के लिए समझौते किए गए हैं।
  • ये समझौते वैश्विक बाजार की अस्थिरता से देश की आपूर्ति श्रृंखला को बचाने और बड़ी मात्रा में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने में मदद करते हैं।
  • प्रमुख उर्वरकों में यूरिया (नाइट्रोजन का स्रोत), डीएपी (डाई-अमोनियम फॉस्फेट), एमओपी (म्यूरेट ऑफ पोटाश) और एनपीकेएस (नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम और सल्फर युक्त उर्वरक) शामिल हैं।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
अग्रिम योजना प्रत्येक फसल सत्र से पहले राज्य सरकारों के परामर्श से उर्वरकों की आवश्यकता का आकलन सुनिश्चित करता है।
घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन उर्वरक आपूर्ति में आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम, आयात पर निर्भरता कम करता है।
रणनीतिक आयात व्यवस्था प्रमुख उर्वरक उत्पादक देशों के साथ दीर्घकालिक समझौते वैश्विक अनिश्चितताओं के विरुद्ध आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करते हैं।
उर्वरक विभाग की भूमिका घरेलू उत्पादन, आयात और वितरण का समन्वय कर किसानों को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करता है।
मांग में वृद्धि का प्रबंधन 2025-26 में कुल उर्वरक आवश्यकता में अनुमानित 4% वृद्धि के बावजूद पर्याप्त उपलब्धता बनाए रखना।

महत्व

आर्थिक महत्व

  • उर्वरकों की समय पर और पर्याप्त उपलब्धता कृषि उत्पादकता में वृद्धि करती है, जिससे किसानों की आय बढ़ती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है।
  • घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने से आयात पर निर्भरता कम होती है, जिससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है और व्यापार घाटे को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
  • उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है, जिससे आवश्यक कृषि उत्पादों की कीमतों में स्थिरता आती है।

रणनीतिक महत्व

  • विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आयात समझौते भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक आपूर्ति व्यवधानों के बावजूद भारत की उर्वरक सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
  • उर्वरक सुरक्षा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा का एक अभिन्न अंग है, जो देश की संप्रभुता और स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है।
  • यह रणनीति भारत को वैश्विक उर्वरक बाजार में एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में स्थापित करती है, जिससे उसकी मोलभाव करने की शक्ति बढ़ती है।

सामाजिक महत्व

  • किसानों को उचित मूल्य पर उर्वरक उपलब्ध होने से कृषि लागत कम होती है और उनकी आजीविका में सुधार होता है।
  • खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित होने से कुपोषण और गरीबी से लड़ने में मदद मिलती है, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में।
  • कृषि क्षेत्र में स्थिरता ग्रामीण रोजगार और सामाजिक कल्याण को बढ़ावा देती है।

चुनौतियाँ

1. वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान

  • अंतर्राष्ट्रीय संघर्ष, व्यापार प्रतिबंध और प्राकृतिक आपदाएं वैश्विक उर्वरक आपूर्ति को बाधित कर सकती हैं, जिससे कीमतें बढ़ सकती हैं और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
  • प्रमुख उर्वरक उत्पादक देशों पर अत्यधिक निर्भरता भारत को भू-राजनीतिक दबावों के प्रति संवेदनशील बना सकती है।

2. उर्वरक सब्सिडी का वित्तीय बोझ

  • उर्वरक सब्सिडी सरकार के राजकोष पर महत्वपूर्ण बोझ डालती है, विशेषकर जब वैश्विक कीमतें बढ़ती हैं।
  • सब्सिडी का लक्षित लाभार्थियों तक प्रभावी ढंग से न पहुंचना और रिसाव (leakage) एक चुनौती बनी हुई है।

3. पर्यावरणीय चिंताएँ

  • उर्वरकों के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग से मृदा स्वास्थ्य, जल प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन जैसी पर्यावरणीय समस्याएं उत्पन्न होती हैं।
  • रासायनिक उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकालिक कृषि स्थिरता के लिए खतरा पैदा करती है।

4. घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार

  • घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नई इकाइयों की स्थापना और मौजूदा इकाइयों के आधुनिकीकरण में भारी निवेश और समय लगता है।
  • कच्चे माल की उपलब्धता और ऊर्जा लागत भी घरेलू उत्पादन की प्रतिस्पर्धात्मकता को प्रभावित करती है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वैश्विक मूल्य अस्थिरता अंतर्राष्ट्रीय बाजार में उर्वरक की कीमतों में उतार-चढ़ाव आयात लागत और घरेलू सब्सिडी बिल को प्रभावित करता है।
असंतुलित उर्वरक उपयोग किसानों द्वारा यूरिया जैसे कुछ उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग मृदा स्वास्थ्य को खराब करता है और पोषक तत्वों के असंतुलन को बढ़ाता है।
लॉजिस्टिक्स और वितरण दूरदराज के क्षेत्रों तक उर्वरकों की समय पर और कुशल पहुंच सुनिश्चित करना एक चुनौती बनी हुई है, विशेषकर पीक सीजन में।
तकनीकी उन्नयन घरेलू उर्वरक उत्पादन इकाइयों में पुरानी तकनीक दक्षता और उत्पादन क्षमता को सीमित करती है।
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव जलवायु परिवर्तन से कृषि पद्धतियों में बदलाव आ सकता है, जिससे उर्वरकों की मांग और प्रकार प्रभावित हो सकते हैं।

आगे की राह

  • उर्वरक उत्पादन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के लिए घरेलू उत्पादन क्षमता का विस्तार करना और नई, कुशल प्रौद्योगिकियों में निवेश करना।
  • विभिन्न देशों के साथ दीर्घकालिक आयात समझौतों को मजबूत करना और नए रणनीतिक साझेदारों की तलाश करना ताकि आपूर्ति श्रृंखला में विविधता लाई जा सके।
  • उर्वरक सब्सिडी को अधिक लक्षित और कुशल बनाना, जैसे कि प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (Direct Benefit Transfer – DBT) को और प्रभावी ढंग से लागू करना।
  • किसानों के बीच संतुलित उर्वरक उपयोग और मृदा स्वास्थ्य कार्ड (Soil Health Card) के माध्यम से मृदा-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देना।
  • जैविक और जैव-उर्वरकों के उपयोग को प्रोत्साहित करना ताकि रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम हो सके और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित हो सके।
  • उर्वरक वितरण नेटवर्क को मजबूत करना और लॉजिस्टिक्स में सुधार करना ताकि दूरदराज के क्षेत्रों तक समय पर पहुंच सुनिश्चित हो सके।
  • अनुसंधान और विकास में निवेश करना ताकि कम पर्यावरणीय प्रभाव वाले नए और अधिक कुशल उर्वरक विकसित किए जा सकें।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

उर्वरक उपलब्धता · घरेलू उत्पादन · रणनीतिक आयात · वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला · कृषि उत्पादकता · खाद्य सुरक्षा · उर्वरक सब्सिडी · पोषक तत्व आधारित सब्सिडी · यूरिया · डीएपी · एमओपी · एनपीकेएस

अवधारणा प्रवाह

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा उर्वरक आवश्यकता का आकलन  →  उर्वरक विभाग द्वारा घरेलू उत्पादन, आयात और वितरण का समन्वय  →  घरेलू उत्पादन और रणनीतिक आयात समझौतों के माध्यम से उपलब्धता सुनिश्चित  →  किसानों को समय पर और पर्याप्त उर्वरक आपूर्ति  →  कृषि उत्पादकता में वृद्धि और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत में उर्वरकों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) प्रत्येक फसल सत्र से पहले राज्य सरकारों के परामर्श से उर्वरकों की आवश्यकता का आकलन करता है।
2. उर्वरक विभाग देश भर के किसानों को निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए घरेलू उत्पादन, आयात और वितरण का समन्वय करता है।
3. भारत सरकार ने उर्वरक आपूर्ति सुरक्षा को मजबूत करने के लिए केवल घरेलू उत्पादन पर ध्यान केंद्रित किया है, आयात समझौतों से परहेज किया है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 2
  4. 1, 2 और 3

उत्तर: केवल 1 और 2 — कथन 1 और 2 सही हैं। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग उर्वरक आवश्यकता का आकलन करता है, और उर्वरक विभाग आपूर्ति का समन्वय करता है। कथन 3 गलत है क्योंकि भारत सरकार घरेलू उत्पादन के साथ-साथ रणनीतिक आयात समझौतों के माध्यम से भी उर्वरक आपूर्ति सुनिश्चित करती है।

Q2. भारत में उर्वरक क्षेत्र के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-से प्रमुख उर्वरक हैं जिनकी खपत का उल्लेख हाल की खबरों में किया गया है?

  1. यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीकेएस
  2. पोटाश, फॉस्फेट, अमोनिया, नाइट्रेट
  3. जिंक, बोरोन, सल्फर, कैल्शियम
  4. केवल यूरिया और डीएपी

उत्तर: यूरिया, डीएपी, एमओपी, एनपीकेएस — खबर में स्पष्ट रूप से यूरिया, डीएपी (डायअमोनियम फॉस्फेट), एमओपी (म्यूरेट ऑफ पोटाश) और एनपीकेएस (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम और सल्फर युक्त उर्वरक) को प्रमुख उर्वरकों के रूप में संदर्भित किया गया है जिनकी खपत का आकलन किया गया है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारत में कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में उर्वरक उपलब्धता की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। सरकार द्वारा उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने के लिए उठाए गए विभिन्न कदमों पर चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

रूपरेखा: प्रश्न के पहले भाग में, उर्वरक उपलब्धता का कृषि उत्पादकता और खाद्य सुरक्षा पर सीधा प्रभाव समझाएँ। इसमें फसल उत्पादन में वृद्धि, मिट्टी के स्वास्थ्य का रखरखाव और किसानों की आय में सुधार जैसे बिंदुओं को शामिल करें। दूसरे भाग में, सरकार द्वारा उठाए गए कदमों पर विस्तार से चर्चा करें, जैसे अग्रिम योजना, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना, रणनीतिक आयात समझौते (उदाहरण सहित), और वितरण प्रणाली का समन्वय। वैश्विक अनिश्चितताओं के संदर्भ में आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती के महत्व पर भी प्रकाश डालें।

स्रोत: PIB (Press Information Bureau)


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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