19 Oct कर्नाटक में शिल्प समागम मेला 2026: कारीगरों के सशक्तिकरण की पहल
✎ शिल्प समागम जैसे मेले वंचित समुदायों को सीधा बाजार उपलब्ध कराकर आजीविका और उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं, जबकि NSFDC, NBCFDC और NSKFDC उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएं | GS Paper III — समावेशी विकास, रोजगार और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME)
- Prelims: अनुच्छेद 46 (राज्य नीति का निदेशक तत्व), अनुच्छेद 338 और अनुच्छेद 338B (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग), राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (NSFDC), राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम (NBCFDC), राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम (NSKFDC), मैन्युअल स्कैवेंजिंग प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम, 2013, भौगोलिक संकेतक (GI) और हथकरघा उत्पाद, सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की संरचना एवं उसके अधीन वित्त निगम
- Essay: समावेशी विकास में बाजार पहुंच की भूमिका: वंचित समुदायों के लिए आजीविका और उद्यमिता, पारंपरिक शिल्प और हथकरघा: सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और आर्थिक अवसर
त्वरित पुनरावृत्ति: शिल्प समागम जैसे मेले वंचित समुदायों को सीधा बाजार उपलब्ध कराकर आजीविका और उद्यमिता को बढ़ावा देते हैं, जबकि NSFDC, NBCFDC और NSKFDC उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता सचिव श्री सुधांश पंत ने कर्नाटक के मैसुरु स्थित दशहरा प्रदर्शनी मैदान में आयोजित नौ दिवसीय ‘शिल्प समागम मेला 2026’ का दौरा किया। यह मेला सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय और उसके तीन राष्ट्रीय वित्त एवं विकास निगमों की संयुक्त साझेदारी से आयोजित किया जा रहा है। मेले में 83 स्टॉल लगाए गए हैं, जिनमें से 80 स्टॉल कारीगरों को आवंटित हैं, जिनमें 37 महिला कारीगर शामिल हैं। इसमें 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिभागी हिस्सा ले रहे हैं। सचिव ने स्टॉलों का निरीक्षण किया, प्रबंधकों और आगंतुकों से बातचीत की तथा मंत्रालय की लागू योजनाओं और पहलों की समीक्षा की। इस अवसर पर सरकार ने वंचित समुदायों के लिए बेहतर बाजार पहुंच, उद्यमिता संवर्धन और आर्थिक सशक्तिकरण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई। यह मेला 11 अक्टूबर से चल रहा है और सोमवार, 19 अक्टूबर तक जारी रहेगा।
पृष्ठभूमि
- संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को दुर्बल वर्गों, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों, के शैक्षिक और आर्थिक हितों की विशेष सावधानी से उन्नति करने का निर्देश देता है। यह नीति-निर्माण का नैतिक और संवैधानिक आधार है।
- अनुच्छेद 338 के अंतर्गत राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और अनुच्छेद 338B के अंतर्गत राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया है। इन आयोगों का कार्य संवैधानिक सुरक्षा उपायों की निगरानी करना है।
- सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अधीन तीन निगम अलग-अलग वंचित वर्गों के लिए कार्यरत हैं। NSFDC की स्थापना 1989, NBCFDC की 1992 और NSKFDC की 1997 में हुई। ये निगम रियायती ऋण और स्वरोजगार के लिए वित्तीय सहायता देते हैं।
- मैन्युअल स्कैवेंजिंग प्रतिषेध और पुनर्वास अधिनियम, 2013 के बाद सफाई कर्मचारियों के पुनर्वास और वैकल्पिक आजीविका पर नीतिगत बल बढ़ा है। NSKFDC इसी दिशा में सफाई कर्मचारियों और उनके आश्रितों को सहायता देता है।
- वंचित वर्गों के उद्यमों की सबसे बड़ी बाधा प्रायः बाजार तक सीधी पहुंच का अभाव रही है, जिसके कारण बिचौलियों पर निर्भरता बढ़ती है। प्रदर्शनी और विपणन मंच इस कमी को दूर करने का एक व्यावहारिक उपाय माने जाते हैं।
शिल्प समागम मेला और उसकी विपणन पहल क्या है?
- शिल्प समागम मेला सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय का एक विपणन मंच है, जो अनुसूचित जातियों (SC), अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) और सफाई कर्मचारियों से जुड़े कारीगरों और लाभार्थियों को उनके उत्पाद सीधे ग्राहकों तक पहुंचाने का अवसर देता है।
- इस मेले का आयोजन मंत्रालय और उसके तीन निगमों (NSFDC, NBCFDC और NSKFDC) की संयुक्त साझेदारी से होता है। ये निगम कारीगरों और पात्र लाभार्थियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं।
- प्रदर्शित उत्पादों में हस्तशिल्प, हथकरघा साड़ियां, ब्लॉक-प्रिंट वस्त्र, टेराकोटा उत्पाद, लकड़ी के खिलौने, रोज़वुड की वॉल हैंगिंग, चमड़े की वस्तुएं, मसाले, अचार, शहद से बने उत्पाद और पारंपरिक व्यंजन शामिल हैं।
- मंत्रालय कारीगरों की भागीदारी आसान बनाने के लिए उन्हें स्टॉल निःशुल्क उपलब्ध कराता है। प्रेस विज्ञप्ति के संबंधित अंश में लागू नियमों के अनुसार यात्रा व्यय और दैनिक भत्ते जैसे प्रावधानों का संकेत है।
- ऐसे मेले उपभोक्ता से प्रत्यक्ष संवाद के अवसर देते हैं, जिससे कारीगर अपने ग्राहक-आधार का विस्तार कर सकते हैं और मांग के अनुरूप उत्पाद-सुधार कर सकते हैं।
- इसके साथ ही यह पारंपरिक शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण में सहायक है तथा मंत्रालय की योजनाओं के बारे में जागरूकता फैलाने का माध्यम भी है।
- मेले का संदेश यह है कि सामाजिक न्याय की नीति केवल सहायता राशि तक सीमित न रहकर बाजार-आधारित आजीविका और उद्यमिता के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण तक पहुंचनी चाहिए।
मुख्य विशेषताएँ
| Feature | Significance |
|---|---|
| आयोजक संस्थाएं | सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय तथा तीन राष्ट्रीय निगम: राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (National Scheduled Castes Finance and Development Corporation, NSFDC), राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम (NBCFDC) और राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम (NSKFDC) का संयुक्त आयोजन |
| अवधि और स्थान | मैसूरु के दशहरा प्रदर्शनी मैदान में 11 से 19 अक्टूबर तक चलने वाला नौ दिवसीय आयोजन |
| स्टॉल व्यवस्था | कुल 83 स्टॉल, जिनमें से 80 कारीगरों को आवंटित; इनमें 37 महिला कारीगर शामिल |
| राज्यों की भागीदारी | आंध्र प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, केरल, राजस्थान, पुडुचेरी, गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना, तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश सहित 12 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश |
| लक्षित लाभार्थी | अनुसूचित जातियों (SC), अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) और सफाई कर्मचारियों से जुड़े कारीगर तथा पात्र लाभार्थी |
| उत्पाद श्रेणी | हथकरघा साड़ियां, ब्लॉक-प्रिंट वस्तुएं, टेराकोटा उत्पाद, लकड़ी के खिलौने, रोज़वुड की वॉल हैंगिंग, चमड़े की वस्तुएं और पारंपरिक व्यंजन |
महत्व
आर्थिक
- कारीगरों को सीधे उपभोक्ताओं से जोड़कर बाजार पहुंच का विस्तार होता है और बिचौलियों पर निर्भरता घटती है।
- आजीविका के टिकाऊ अवसर बनते हैं, जिससे वंचित समुदायों की आय में स्थिरता आती है।
- वित्तीय सहायता से जुड़े निगमों की योजनाओं की जानकारी मिलने से उद्यमिता को आधार मिलता है।
सामाजिक न्याय और समावेशन
- संविधान के अनुच्छेद 46 में राज्य से कमजोर वर्गों के आर्थिक हितों के संवर्धन की अपेक्षा की गई है; यह आयोजन उसी दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।
- महिला कारीगरों की बड़ी भागीदारी (37 स्टॉल) से लैंगिक समावेशन को बल मिलता है।
- सफाई कर्मचारियों के समुदाय को मुख्यधारा की आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना सामाजिक गरिमा के प्रश्न से भी जुड़ा है।
सांस्कृतिक
- पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा कौशल का प्रदर्शन इन कलाओं के संरक्षण में सहायक होता है।
- भारत की सांस्कृतिक विरासत के प्रति जनजागरूकता बढ़ती है।
प्रशासनिक और संस्थागत
- मंत्रालय और राज्य प्रशासन के बीच समन्वय से योजनाओं की समीक्षा और कार्यान्वयन की व्यावहारिक जांच होती है, जो सहकारी संघवाद की भावना से मेल खाती है।
- मुफ्त स्टॉल उपलब्ध कराना लाभार्थियों की भागीदारी की बाधाओं को कम करने का प्रयास है।
चुनौतियाँ
1. बाजार पहुंच की सीमाएं
- मेला एक निश्चित अवधि का आयोजन है, इसलिए इससे प्राप्त बाजार संपर्क की निरंतरता सुनिश्चित करना कठिन है।
- बड़े बाजारों और ऑनलाइन मंचों तक पहुंच के लिए डिजिटल कौशल और लॉजिस्टिक्स की कमी आड़े आ सकती है।
यूपीएससी लिंक: GS-3: समावेशी आर्थिक विकास और रोजगार
2. मशीन निर्मित उत्पादों से प्रतिस्पर्धा
- सस्ते औद्योगिक उत्पादों के सामने हस्तशिल्प की लागत और कीमत का अंतर कारीगरों की आय को प्रभावित करता है।
- उत्पादन की पारंपरिक विधियां आधुनिक डिज़ाइन और गुणवत्ता मानकों के साथ तालमेल बिठाने में चुनौती पेश करती हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-3: उद्योग और कृषि-ग्रामीण आजीविका
3. योजनाओं के लाभ तक वास्तविक पहुंच
- निगमों की वित्तीय सहायता के बारे में जानकारी का अभाव पात्र लाभार्थियों को योजनाओं से दूर रख सकता है।
- दस्तावेज़ीकरण और प्रक्रियात्मक जटिलता के कारण अति-वंचित कारीगर सहायता से वंचित रह सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक न्याय और कल्याण योजनाओं का कार्यान्वयन
4. सफाई कर्मचारी समुदाय की गरिमा और पुनर्वास
- सफाई कर्मचारियों के लिए आजीविका के वैकल्पिक अवसर सुनिश्चित करना पुनर्वास का मूल प्रश्न है।
- हाथ से मैला ढोने के नियोजन का प्रतिषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 (Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013) के प्रभावी अनुपालन के लिए आजीविका के ठोस विकल्प आवश्यक हैं।
यूपीएससी लिंक: GS-2: सामाजिक न्याय, वंचित वर्गों के लिए कानून
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| Issue | Concern |
|---|---|
| मेले पर निर्भरता | आयोजन समाप्त होने के बाद आय का स्रोत अस्थिर हो सकता है |
| डिजिटल और विपणन कौशल | ऑनलाइन बिक्री और ब्रांडिंग में क्षमता की कमी |
| जागरूकता का अभाव | निगमों की योजनाओं की जानकारी सभी पात्र लाभार्थियों तक नहीं पहुंचती |
| प्रतिस्पर्धा और लागत | मशीन निर्मित सस्ते उत्पादों से कीमत का दबाव |
| महिला कारीगरों की सीमित पहुंच | पूंजी, प्रशिक्षण और बाजार संपर्क तक असमान पहुंच |
| सफाई कर्मचारी समुदाय का पुनर्वास | वैकल्पिक और गरिमामय आजीविका के अवसर अब भी सीमित |
आगे की राह
- मेले में बने ग्राहक संपर्कों को स्थायी बिक्री में बदलने के लिए कारीगर-वार ऑर्डर और आपूर्ति का रिकॉर्ड बनाया जाए।
- कारीगरों को डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन कैटलॉग और ई-कॉमर्स मंचों के उपयोग का प्रशिक्षण दिया जाए।
- निगमों की वित्तीय सहायता की जानकारी स्थानीय भाषाओं में और ग्राम स्तर तक पहुंचाई जाए।
- महिला कारीगरों के लिए ऋण, कच्चे माल की आपूर्ति और बाजार संपर्क हेतु स्वयं सहायता समूहों और सहकारी समितियों से जोड़ा जाए।
- पारंपरिक उत्पादों के भौगोलिक संकेत (Geographical Indication, GI) पंजीकरण को बढ़ाकर उनकी पहचान और मूल्य को मजबूत किया जाए।
- सफाई कर्मचारी समुदाय के युवाओं के लिए कौशल प्रशिक्षण और वैकल्पिक व्यवसायों की सुविधा का विस्तार किया जाए।
- राज्य प्रशासन और निगमों के बीच नियमित समीक्षा तंत्र बनाकर लाभार्थियों की वास्तविक पहुंच का सत्यापन किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय · राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम (National Scheduled Castes Finance and Development Corporation) · राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम (National Backward Classes Finance and Development Corporation) · राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम (National Safai Karamcharis Finance and Development Corporation) · आर्थिक सशक्तिकरण · बाजार पहुँच और विपणन · पारंपरिक शिल्प एवं हथकरघा · अनुच्छेद 46 (Article 46) · अनुच्छेद 338B (Article 338B) · मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम, 2013 (Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013) · समावेशी आर्थिक विकास (Inclusive Growth) · भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication)
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 46: कमजोर वर्गों के आर्थिक हितों का संवर्धन
- अनुच्छेद 38: आय और अवसरों की असमानता में कमी
अवधारणा प्रवाह
वंचित समुदायों के कारीगरों और सफाई कर्मचारी समुदाय की पहचान तथा पात्रता → तीन राष्ट्रीय निगमों द्वारा कारीगरों और लाभार्थियों को वित्तीय सहायता → मंत्रालय द्वारा मेले का आयोजन और कारीगरों को मुफ्त स्टॉल का आवंटन → उपभोक्ताओं से सीधा संपर्क, बिक्री और बाजार पहुंच में विस्तार → कारीगरों की आय और आजीविका में टिकाऊ सुधार → पारंपरिक शिल्प का संरक्षण और सामाजिक-आर्थिक समावेशन
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग वित्त एवं विकास निगम और राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी वित्त एवं विकास निगम, तीनों सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करते हैं।
2. राष्ट्रीय अनुसूचित जाति वित्त एवं विकास निगम की स्थापना संविधान के अनुच्छेद 338 के अंतर्गत एक संवैधानिक निकाय के रूप में की गई है।
3. ये निगम कारीगरों और पात्र लाभार्थियों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी
उत्तर: केवल एक — कथन 1 और 3 सही हैं, क्योंकि ये निगम मंत्रालय के अंतर्गत कार्य करते हैं और कारीगरों व लाभार्थियों को वित्तीय सहायता देते हैं। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 338 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से संबंधित है, जबकि ये निगम वैधानिक नहीं, बल्कि गैर-लाभकारी कंपनियों के रूप में स्थापित विकास निगम हैं।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): शिल्प मेलों में अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और सफाई कर्मचारी समुदायों के कारीगरों को मुफ्त स्टॉल उपलब्ध कराना वंचित समुदायों की आजीविका सुदृढ़ करने का एक प्रभावी उपाय है।
कारण (R): संविधान का अनुच्छेद 46 राज्य को दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की उन्नति का निर्देश देता है।
नीचे दिए गए विकल्पों में से सही उत्तर चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, परंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, परंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, परंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — अनुच्छेद 46 एक नीति-निदेशक तत्व है, जो दुर्बल वर्गों के आर्थिक हितों की उन्नति का लक्ष्य देता है, और मुफ्त स्टॉल जैसे उपाय उसी लक्ष्य की दिशा में कार्य करते हैं। यह निदेश न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है, परंतु नीति-निर्माण का मार्गदर्शक है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलित कीजिए:
सूची I (संवैधानिक प्रावधान)
A. अनुच्छेद 46
B. अनुच्छेद 338
C. अनुच्छेद 340
D. अनुच्छेद 15(4)
सूची II (विषय)
1. अनुसूचित जातियों के संरक्षण हेतु राष्ट्रीय आयोग
2. सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की दशाओं की जाँच हेतु आयोग का गठन
3. दुर्बल वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों की उन्नति
4. सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति हेतु विशेष उपबंध
सही सुमेलन चुनिए:
- A-3, B-1, C-2, D-4
- A-1, B-3, C-4, D-2
- A-3, B-2, C-1, D-4
- A-2, B-3, C-1, D-4
उत्तर: A-3, B-1, C-2, D-4 — अनुच्छेद 46 नीति-निदेशक तत्व है जो दुर्बल वर्गों की उन्नति की बात करता है (3)। अनुच्छेद 338 राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग से संबंधित है (1)। अनुच्छेद 340 पिछड़े वर्गों की दशा की जाँच के लिए आयोग के गठन का प्रावधान करता है (2)। अनुच्छेद 15(4) सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष उपबंध की अनुमति देता है (4)।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ वंचित समुदायों के आर्थिक सशक्तिकरण हेतु राष्ट्रीय विकास निगमों के माध्यम से दी जाने वाली वित्तीय सहायता की प्रभावशीलता का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। इसके साथ यह भी स्पष्ट कीजिए कि बाजार पहुँच और विपणन मंचों के अभाव में केवल ऋण या वित्तीय सहायता से सशक्तिकरण का लक्ष्य क्यों अधूरा रह सकता है। (15 Marks)
रूपरेखा: उत्तर संरचना (मॉडल उत्तर बिंदु):
(1) भूमिका: सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय द्वारा मैसुरु में आयोजित शिल्प समागम मेला 2026 का तथ्य; तीन निगमों (NSFDC, NBCFDC, NSKFDC) की साझेदारी; 83 स्टॉल में से 80 कारीगरों को आवंटन, 37 महिला कारीगर, 12 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की भागीदारी।
(2) संवैधानिक आधार: अनुच्छेद 46 (नीति-निदेशक तत्व); अनुच्छेद 15(4) और 16(4) (विशेष उपबंध); अनुच्छेद 338 (राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग), अनुच्छेद 338B (राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग, 102वें संविधान संशोधन, 2018 द्वारा सम्मिलित) और अनुच्छेद 340।
(3) निगमों की भूमिका का परीक्षण: वित्तीय सहायता से स्वरोजगार और लघु उद्यम को गति; मुफ्त स्टॉल, प्रदर्शनी और सीधी बिक्री से ग्राहक-संपर्क; सांस्कृतिक विरासत व पारंपरिक कौशल का संरक्षण।
(4) समालोचनात्मक पक्ष: वित्त के साथ कौशल-प्रशिक्षण, कच्चे माल की आपूर्ति, डिजिटल विपणन और मूल्य-शृंखला से जुड़ाव की आवश्यकता; ऋण-वसूली और ऋण-जाल का जोखिम; एकल आयोजनों की सीमित अवधि (9 दिवसीय मेला) बनाम दीर्घकालिक बाजार-संबंध।
(5) सफाई कर्मचारियों का संदर्भ: मैनुअल स्कैवेंजर्स अधिनियम, 2013 और सर्वोच्च न्यायालय का सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ (2014) निर्णय; पुनर्वास के साथ वैकल्पिक आजीविका की आवश्यकता।
(6) तुलनात्मक दृष्टि: सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम क्षेत्र की नीतियों से संबंध; ‘समावेशी आर्थिक विकास’ की अवधारणा।
(7) निष्कर्ष: वित्त, बाजार पहुँच, कौशल और गरिमा (सामाजिक स्वीकृति) का समन्वित मॉडल ही सशक्तिकरण को सतत बनाता है; सुझाव के रूप में निगमों के लक्ष्यों का प्रभाव-मूल्यांकन (impact assessment)।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Karnataka PCS (KPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता सचिव श्री सुधांश पंत द्वारा मैसुरु में आयोजित ‘शिल्प समागम मेले 2026’ का दौरा किसके संदर्भ में महत्वपूर्ण है?
- A. कर्नाटक के पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरों के उत्थान के लिए केंद्र सरकार की पहल
- B. राज्य में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई योजना
- C. कर्नाटक में औद्योगिक विकास को गति देने के लिए केंद्र सरकार की नीति
- D. राज्य में शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए केंद्र सरकार द्वारा उठाया गया कदम
उत्तर: A. कर्नाटक के पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरों के उत्थान के लिए केंद्र सरकार की पहल — यह दौरा कर्नाटक के पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरों के उत्थान के लिए केंद्र सरकार की पहल के तहत किया गया, जिससे राज्य के सांस्कृतिक और आर्थिक विकास को बल मिलेगा।
Mains: कर्नाटक के पारंपरिक हस्तशिल्प और कारीगरों के उत्थान में केंद्र सरकार की ‘शिल्प समागम मेले’ जैसी पहलों की भूमिका का विश्लेषण करते हुए, राज्य के सांस्कृतिक विरासत और आर्थिक विकास पर इसके प्रभाव का मूल्यांकन कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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