केरल उच्च न्यायालय का पंचायत को आदेश: आवारा कुत्ते के हमले में पीड़ित को 10,000 रुपये मुआवजा

Kerala High Court orders panchayat to compensate stray dog attack victim — concept mind map

केरल उच्च न्यायालय का पंचायत को आदेश: आवारा कुत्ते के हमले में पीड़ित को 10,000 रुपये मुआवजा

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✎ केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को उनके वैधानिक कर्तव्यों, विशेषकर सार्वजनिक सुरक्षा और आवारा पशु प्रबंधन के प्रति जवाबदेह ठहराता है, और नागरिकों के अधिकारों को रेखांकित करता है।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — राजव्यवस्था, शासन और सामाजिक न्याय  |  GS Paper III — पर्यावरण और आपदा प्रबंधन
  • Prelims: स्थानीय स्वशासन, ग्राम पंचायत, उच्च न्यायालय, पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, जन्म नियंत्रण नियम, न्यायिक समीक्षा
  • Essay: स्थानीय स्वशासन की भूमिका और चुनौतियाँ, नागरिकों के अधिकार और राज्य/स्थानीय निकायों की जवाबदेही

त्वरित पुनरावृत्ति: केरल उच्च न्यायालय का यह निर्णय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को उनके वैधानिक कर्तव्यों, विशेषकर सार्वजनिक सुरक्षा और आवारा पशु प्रबंधन के प्रति जवाबदेह ठहराता है, और नागरिकों के अधिकारों को रेखांकित करता है।

यह खबर चर्चा में क्यों?

केरल उच्च न्यायालय ने एरुवेस्सी ग्राम पंचायत को 2007 में एक आवारा कुत्ते के हमले के पीड़ित को ₹10,000 का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने स्थानीय निकाय को उसकी कानूनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में विफल रहने का दोषी पाया। यह निर्णय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं की जवाबदेही और सार्वजनिक सुरक्षा के प्रति उनके कर्तव्यों पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालता है।

पृष्ठभूमि

  • केरल उच्च न्यायालय ने माना कि ग्राम पंचायत आवारा कुत्तों को पकड़ने और उनकी नसबंदी (sterilization) करने में विफल रही, जो उसके वैधानिक (statutory) कर्तव्यों का उल्लंघन है।
  • न्यायालय ने कहा कि पंचायत ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act) और पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम, 2001 (Animal Birth Control (Dogs) Rules, 2001) के तहत अपने आवश्यक कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया।
  • पंचायत ने तर्क दिया कि उसे राज्य से आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली और ऐसे मुकदमों से उसके नियमित कार्य बाधित होंगे।
  • पीड़ित ने दावा किया कि पंचायत आवारा कुत्तों को नियंत्रित करने और जब्त करने के लिए बाध्य थी, और इस कर्तव्य में विफलता के बाद वह अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
  • यह मामला 2007 में हुई घटना से संबंधित है, जिसमें कन्नूर के एक व्यक्ति को आवारा कुत्ते के काटने से चोटें आई थीं।
  • मुंसिफ अदालत और सब-कोर्ट ने भी पंचायत की लापरवाही को स्वीकार किया था, जिसके बाद पंचायत ने उच्च न्यायालय में अपील की थी।

स्थानीय स्वशासन और उसकी जिम्मेदारियाँ

  • भारत में स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) पंचायती राज संस्थाओं और शहरी स्थानीय निकायों के माध्यम से कार्य करता है, जिन्हें संविधान के 73वें और 74वें संशोधन अधिनियमों द्वारा संवैधानिक दर्जा दिया गया है।
  • ग्राम पंचायतें ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्वशासन की सबसे निचली इकाई हैं, जिन्हें ग्रामीण विकास और सार्वजनिक सेवाओं के प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
  • संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची पंचायतों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले 29 विषयों को सूचीबद्ध करती है, जिनमें सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वच्छता और पशुधन (livestock) प्रबंधन शामिल हैं।
  • आवारा पशुओं का प्रबंधन, विशेष रूप से आवारा कुत्तों का नियंत्रण, स्थानीय निकायों की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
  • पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम, 2001 (Animal Birth Control (Dogs) Rules, 2001) स्थानीय निकायों को आवारा कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण (vaccination) कार्यक्रम चलाने के लिए दिशानिर्देश प्रदान करते हैं।
  • न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के माध्यम से, उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय यह सुनिश्चित करते हैं कि स्थानीय निकाय सहित सभी सरकारी संस्थाएँ अपने वैधानिक और संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करें।
  • नागरिकों को स्थानीय निकायों की लापरवाही के कारण हुए नुकसान के लिए मुआवजे का दावा करने का अधिकार है, जैसा कि इस मामले में देखा गया है।
  • स्थानीय निकायों को अपने कर्तव्यों का प्रभावी ढंग से निर्वहन करने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधनों और प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होती है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
स्थानीय निकाय की जवाबदेही उच्च न्यायालय ने ग्राम पंचायत को आवारा कुत्तों के हमले के लिए उत्तरदायी ठहराया, जो स्थानीय स्वशासन (Local Self-Government) की जवाबदेही को रेखांकित करता है।
वैधानिक कर्तव्यों का पालन न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचायतों को पशु क्रूरता निवारण अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act) और जन्म नियंत्रण नियमों (Birth Control Rules) के तहत अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य है।
क्षतिपूर्ति का सिद्धांत पीड़ित को क्षतिपूर्ति का आदेश यह स्थापित करता है कि वैधानिक कर्तव्यों के उल्लंघन से नागरिकों को हुए नुकसान के लिए स्थानीय निकाय जिम्मेदार हैं।
नागरिकों की सुरक्षा यह निर्णय स्थानीय निकायों के लिए नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के महत्व पर बल देता है, विशेषकर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से संबंधित मामलों में।
न्यायिक समीक्षा का दायरा यह दर्शाता है कि उच्च न्यायालय स्थानीय निकायों के कार्यों की न्यायिक समीक्षा कर सकते हैं और उनके वैधानिक दायित्वों का उल्लंघन पाए जाने पर हस्तक्षेप कर सकते हैं।
दीर्घकालिक प्रभाव 2007 के मामले में 2026 में निर्णय आना न्यायिक प्रक्रिया की लंबी अवधि और न्याय की निरंतर खोज को दर्शाता है।

महत्व

शासन और प्रशासन

  • यह निर्णय स्थानीय स्वशासन संस्थाओं (Local Self-Government Institutions) की जवाबदेही को मजबूत करता है, विशेषकर सार्वजनिक स्वास्थ्य और सुरक्षा से संबंधित उनके वैधानिक कर्तव्यों के संबंध में।
  • यह पंचायतों को अपने अधिकार क्षेत्र में आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए सक्रिय कदम उठाने के लिए प्रेरित करेगा, जिसमें लाइसेंस जारी करना और नसबंदी कार्यक्रम शामिल हैं।
  • यह न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद करता है।

सामाजिक और नागरिक

  • यह आवारा कुत्तों के हमलों के पीड़ितों को न्याय और क्षतिपूर्ति प्राप्त करने का मार्ग प्रदान करता है, जिससे नागरिकों में सुरक्षा की भावना बढ़ती है।
  • यह स्थानीय निकायों को अपने नागरिकों के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के बारे में अधिक जागरूक होने के लिए प्रोत्साहित करता है।
  • यह सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय समुदायों और प्रशासन के बीच सहयोग के महत्व पर जोर देता है।

कानूनी और संवैधानिक

  • यह निर्णय भारत में न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) और न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे को दर्शाता है, जहाँ न्यायालय नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करते हैं।
  • यह स्थानीय निकायों के वैधानिक कर्तव्यों को स्पष्ट करता है, जैसा कि पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और संबंधित नियमों में निहित है।
  • यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के अप्रत्यक्ष विस्तार को दर्शाता है, क्योंकि सुरक्षित वातावरण का अधिकार इसमें निहित है।

चुनौतियाँ

1. स्थानीय निकायों पर वित्तीय बोझ

  • क्षतिपूर्ति के आदेशों से पंचायतों पर वित्तीय बोझ बढ़ सकता है, खासकर यदि ऐसे कई मामले सामने आते हैं।
  • राज्य सरकारों से पर्याप्त वित्तीय सहायता के बिना, पंचायतों के लिए आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा और कार्यक्रम स्थापित करना मुश्किल होगा।

2. क्षमता और संसाधन की कमी

  • कई ग्राम पंचायतों के पास आवारा पशुओं को पकड़ने, नसबंदी करने और उनका टीकाकरण करने के लिए आवश्यक जनशक्ति, प्रशिक्षण और बुनियादी ढाँचे की कमी है।
  • पशु चिकित्सा सुविधाओं और प्रशिक्षित कर्मियों की अनुपलब्धता आवारा पशुओं के प्रभावी प्रबंधन में बाधा डालती है।

3. कानूनी और नियामक जटिलताएँ

  • पशु क्रूरता निवारण अधिनियम और जन्म नियंत्रण नियम जैसे विभिन्न कानूनों के प्रावधानों को समझना और उनका पालन करना पंचायतों के लिए जटिल हो सकता है।
  • आवारा पशुओं के प्रबंधन से संबंधित विभिन्न हितधारकों (पशु अधिकार कार्यकर्ता, नागरिक, स्थानीय निवासी) के बीच हितों का टकराव एक चुनौती प्रस्तुत करता है।

4. मुकदमेबाजी का बढ़ता जोखिम

  • इस तरह के न्यायिक निर्णयों से आवारा पशुओं के हमलों के पीड़ितों द्वारा दायर किए जाने वाले मुकदमों की संख्या में वृद्धि हो सकती है, जिससे पंचायतों पर प्रशासनिक और कानूनी बोझ बढ़ जाएगा।
  • मुकदमेबाजी में शामिल होने से पंचायतों के नियमित कार्यों में बाधा आ सकती है और उनके संसाधनों का विचलन हो सकता है।

5. सार्वजनिक जागरूकता और सहयोग का अभाव

  • नागरिकों में पालतू जानवरों के लाइसेंसिंग और टीकाकरण के महत्व के बारे में जागरूकता की कमी आवारा पशुओं की समस्या को बढ़ाती है।
  • आवारा पशुओं के प्रबंधन कार्यक्रमों में स्थानीय समुदाय के सहयोग का अभाव उनकी प्रभावशीलता को कम करता है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
वित्तीय बाधाएँ क्षतिपूर्ति और प्रबंधन कार्यक्रमों के लिए पंचायतों पर बढ़ता वित्तीय बोझ।
संसाधन की कमी आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए प्रशिक्षित कर्मियों, बुनियादी ढाँचे और पशु चिकित्सा सुविधाओं का अभाव।
कानूनी अनुपालन विभिन्न कानूनों और नियमों का पालन करने में पंचायतों के लिए जटिलताएँ और चुनौतियाँ।
मुकदमेबाजी का जोखिम आवारा पशुओं के हमलों से संबंधित मुकदमों की संख्या में संभावित वृद्धि।
सार्वजनिक सहयोग पालतू जानवरों के लाइसेंसिंग और टीकाकरण में नागरिकों की भागीदारी का अभाव।
नीति कार्यान्वयन आवारा पशुओं के प्रभावी प्रबंधन के लिए सुसंगत और व्यापक नीतियों का अभाव।

आगे की राह

  • राज्य सरकारों द्वारा पंचायतों को आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए पर्याप्त वित्तीय सहायता और संसाधन उपलब्ध कराना।
  • पंचायतों के कर्मचारियों के लिए आवारा पशुओं को पकड़ने, नसबंदी करने और उनका टीकाकरण करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करना।
  • आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए एक व्यापक राज्य-स्तरीय नीति विकसित करना, जिसमें पंचायतों, पशु कल्याण संगठनों और नागरिकों की भूमिकाएँ स्पष्ट रूप से परिभाषित हों।
  • नागरिकों के बीच पालतू जानवरों के लाइसेंसिंग, टीकाकरण और जिम्मेदार स्वामित्व के महत्व के बारे में जागरूकता बढ़ाना।
  • आवारा पशुओं की आबादी को नियंत्रित करने के लिए पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control – ABC) कार्यक्रमों को प्रभावी ढंग से लागू करना।
  • पंचायतों और पशु कल्याण संगठनों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना ताकि आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जा सके।
  • आवारा पशुओं के हमलों के पीड़ितों के लिए एक सुव्यवस्थित और त्वरित क्षतिपूर्ति तंत्र स्थापित करना।
  • स्थानीय स्तर पर पशु चिकित्सा सुविधाओं और सेवाओं तक पहुँच में सुधार करना।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

स्थानीय स्वशासन · पंचायती राज संस्थाएँ · संवैधानिक उत्तरदायित्व · न्यायिक सक्रियता · पशु क्रूरता निवारण अधिनियम · जन्म नियंत्रण नियम · नागरिकों का अधिकार · क्षतिपूर्ति का सिद्धांत · राज्य और स्थानीय निकायों के संबंध · जन सुरक्षा · न्यायिक समीक्षा · शक्तियों का पृथक्करण

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘अनुच्छेद 243G’: ‘पंचायतों की शक्तियाँ, अधिकार और उत्तरदायित्व’}
  • {‘अनुच्छेद 243W’: ‘नगरपालिकाओं की शक्तियाँ, अधिकार और उत्तरदायित्व’}
  • {‘अनुच्छेद 21’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार’}
  • {‘सातवीं अनुसूची (राज्य सूची)’: ‘सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता’}

अवधारणा प्रवाह

स्थानीय निकाय द्वारा वैधानिक कर्तव्यों का उल्लंघन  →  आवारा कुत्तों की आबादी का अनियंत्रित होना  →  नागरिक पर आवारा कुत्ते का हमला  →  पीड़ित को चोट और नुकसान  →  न्यायालय द्वारा स्थानीय निकाय को क्षतिपूर्ति का आदेश  →  स्थानीय निकायों की जवाबदेही का सुदृढीकरण

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान का अनुच्छेद 243 स्थानीय स्वशासन से संबंधित है।
2. 73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया।
3. राज्य वित्त आयोग स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है। अनुच्छेद 243 पंचायती राज संस्थाओं से संबंधित है। कथन 2 गलत है, 73वें संविधान संशोधन अधिनियम ने ग्रामीण स्थानीय निकायों (पंचायतों) को संवैधानिक दर्जा दिया, जबकि 74वें संविधान संशोधन अधिनियम ने शहरी स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा दिया। कथन 3 सही है। राज्य वित्त आयोग (State Finance Commission) का गठन स्थानीय निकायों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा और सुधार के लिए किया जाता है। अतः, केवल दो कथन सही हैं।

Q2. अभिकथन (A): स्थानीय स्वशासन संस्थाएँ अपने अधिकार क्षेत्र में नागरिकों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं।
कारण (R): भारत में स्थानीय स्वशासन संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्राप्त है और वे विभिन्न कानूनों के तहत विशिष्ट कर्तव्यों का पालन करती हैं।

  1. A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
  2. A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
  3. A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
  4. A असत्य है, लेकिन R सत्य है।

उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है क्योंकि स्थानीय निकाय अपने क्षेत्र के नागरिकों के प्रति जवाबदेह होते हैं और उन्हें विभिन्न कानूनों के तहत सुरक्षा और कल्याण के कर्तव्य सौंपे गए हैं। कारण (R) भी सही है क्योंकि 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से स्थानीय निकायों को संवैधानिक दर्जा मिला है, और वे ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम’ (Prevention of Cruelty to Animals Act) जैसे कानूनों के तहत विशिष्ट वैधानिक कर्तव्यों का पालन करती हैं। R, A की सही व्याख्या है क्योंकि संवैधानिक दर्जा और विशिष्ट कानूनी कर्तव्य ही उन्हें बाध्यकारी बनाते हैं।

Q3. निम्नलिखित में से कौन सा अधिनियम भारत में पशु कल्याण और नियंत्रण से संबंधित है?

  1. पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
  2. वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972
  3. पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960
  4. जैव विविधता अधिनियम, 2002

उत्तर: पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 — पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (Prevention of Cruelty to Animals Act, 1960) भारत में पशुओं के प्रति क्रूरता को रोकने और उनके कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया प्रमुख कानून है। इसमें पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control) जैसे नियम भी शामिल हैं।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ केरल उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के आलोक में, स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के संवैधानिक और वैधानिक उत्तरदायित्वों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। जन सुरक्षा सुनिश्चित करने में उनकी भूमिका और जवाबदेही को कैसे सुदृढ़ किया जा सकता है? (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. परिचय: केरल उच्च न्यायालय के निर्णय का संक्षिप्त उल्लेख, जिसमें पंचायत को आवारा कुत्तों के हमले के पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश दिया गया है, और स्थानीय निकायों की वैधानिक विफलताओं पर प्रकाश डाला गया है।
2. स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के संवैधानिक उत्तरदायित्व: अनुच्छेद 243 (ग्राम पंचायतें) और अनुच्छेद 243W (नगरपालिकाएँ) के तहत प्राप्त संवैधानिक दर्जा, ग्यारहवीं अनुसूची और बारहवीं अनुसूची में सूचीबद्ध विषय (जैसे जन स्वास्थ्य, स्वच्छता, पशु नियंत्रण)।
3. वैधानिक उत्तरदायित्व: ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960’ और ‘पशु जन्म नियंत्रण नियम’ जैसे कानूनों के तहत स्थानीय निकायों के विशिष्ट कर्तव्य (जैसे आवारा कुत्तों को पकड़ना, नसबंदी करना, लाइसेंस जारी करना)।
4. समालोचनात्मक परीक्षण: निर्णय का विश्लेषण – यह कैसे स्थानीय निकायों की निष्क्रियता को सीधे उनके कर्तव्यों की विफलता से जोड़ता है। ‘प्रत्यक्ष और उचित रूप से अनुमानित परिणाम’ (direct and reasonably foreseeable consequence) के सिद्धांत पर जोर।
5. जन सुरक्षा में भूमिका और जवाबदेही सुदृढ़ करने के उपाय:
क. वित्तीय सुदृढ़ीकरण: राज्य सरकारों द्वारा पर्याप्त वित्तीय सहायता और संसाधनों का प्रावधान (जैसा कि पंचायत ने तर्क दिया था कि उसे राज्य से कोई वित्तीय सहायता नहीं मिली)।
ख. क्षमता निर्माण: स्थानीय निकाय के अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण, विशेष रूप से पशु नियंत्रण और प्रबंधन में।
ग. स्पष्ट दिशानिर्देश और मानक: आवारा पशुओं के प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर स्पष्ट, लागू करने योग्य दिशानिर्देश।
घ. सामुदायिक भागीदारी: आवारा पशुओं के प्रबंधन में स्थानीय समुदायों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को शामिल करना।
ङ. न्यायिक सक्रियता और निगरानी: उच्च न्यायालयों द्वारा ऐसे मामलों में हस्तक्षेप, स्थानीय निकायों को उनके कर्तव्यों के प्रति जवाबदेह ठहराना।
च. नागरिक शिकायत निवारण तंत्र: प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करना।
6. निष्कर्ष: स्थानीय स्वशासन की परिकल्पना को साकार करने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए संवैधानिक जनादेश और वैधानिक कर्तव्यों के प्रभावी अनुपालन के महत्व पर बल।

स्रोत: The Hindu


शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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