11 Aug केरल उच्च न्यायालय ने लोक सेवा आयोग से परीक्षा विवरण देने के आदेश पर रोक लगाई
✎ सूचना का अधिकार अधिनियम सार्वजनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, जबकि गोपनीयता का अधिकार व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा करता है, और इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना एक जटिल न्यायिक चुनौती है।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पहलू, सूचना का अधिकार | GS Paper II — विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए सरकारी नीतियां और हस्तक्षेप तथा उनके डिजाइन और कार्यान्वयन से उत्पन्न होने वाले मुद्दे
- Prelims: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005, गोपनीयता का अधिकार, केरल लोक सेवा आयोग (Kerala Public Service Commission), राज्य सूचना आयोग (State Information Commission), अनुच्छेद 21, पुट्टास्वामी निर्णय
- Essay: पारदर्शिता बनाम गोपनीयता: एक लोकतांत्रिक समाज में संतुलन, सूचना का अधिकार और सुशासन की चुनौतियाँ
त्वरित पुनरावृत्ति: सूचना का अधिकार अधिनियम सार्वजनिक पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, जबकि गोपनीयता का अधिकार व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा करता है, और इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना एक जटिल न्यायिक चुनौती है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय ने राज्य सूचना आयोग के उस आदेश पर एक महीने के लिए रोक लगा दी है, जिसमें केरल लोक सेवा आयोग (PSC) को केरल राज्य योजना बोर्ड के लिए एक भर्ती परीक्षा के रिकॉर्ड का खुलासा करने का निर्देश दिया गया था। PSC ने तर्क दिया था कि मांगी गई जानकारी में तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी और दस्तावेज़ शामिल हैं, और इसके खुलासे को उचित ठहराने के लिए कोई बड़ा सार्वजनिक हित स्थापित नहीं किया गया था। यह मामला सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम और व्यक्तियों के गोपनीयता के अधिकार के बीच संतुलन से संबंधित महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है।
पृष्ठभूमि
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) भारत में नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों से जानकारी प्राप्त करने का कानूनी अधिकार प्रदान करता है, जिससे शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा मिलता है।
- इस अधिनियम का उद्देश्य भ्रष्टाचार को कम करना और सरकारी कामकाज में अधिक खुलापन लाना है।
- अधिनियम की धारा 8 (1) (j) कुछ व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे से छूट प्रदान करती है, यदि उसके खुलासे का कोई बड़ा सार्वजनिक हित नहीं है।
- गोपनीयता का अधिकार (Right to Privacy) भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 (Article 21) के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के एक आंतरिक भाग के रूप में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त है।
- के.एस. पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ (K.S. Puttaswamy v. Union of India) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय ने गोपनीयता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में स्थापित किया।
- लोक सेवा आयोग (Public Service Commission) जैसी संस्थाएँ सरकारी नियुक्तियों के लिए चयन प्रक्रिया आयोजित करती हैं और बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की व्यक्तिगत जानकारी और परीक्षा संबंधी डेटा को संभालती हैं।
सूचना का अधिकार अधिनियम और गोपनीयता का अधिकार
- सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 नागरिकों को सरकार से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार देता है, जिससे सार्वजनिक प्राधिकरणों के कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है।
- इस अधिनियम के तहत, कोई भी नागरिक किसी भी सार्वजनिक प्राधिकरण से जानकारी का अनुरोध कर सकता है और प्राधिकरण को 30 दिनों के भीतर जवाब देना होता है।
- अधिनियम में कुछ प्रकार की जानकारी के खुलासे से छूट का प्रावधान है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी संबंध, और कुछ व्यक्तिगत जानकारी शामिल है।
- धारा 8 (1) (j) विशेष रूप से उस जानकारी को छूट देती है जो व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित है और जिसके खुलासे का कोई सार्वजनिक हित नहीं है या जो व्यक्ति की गोपनीयता का उल्लंघन करती है।
- गोपनीयता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत एक मौलिक अधिकार है, जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने पुट्टास्वामी निर्णय में स्पष्ट किया है।
- यह अधिकार व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता, गरिमा और स्वयं के बारे में जानकारी को नियंत्रित करने की क्षमता की रक्षा करता है।
- सूचना का अधिकार और गोपनीयता का अधिकार अक्सर एक-दूसरे के साथ टकराते हैं, विशेष रूप से जब सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास मौजूद व्यक्तिगत जानकारी के खुलासे का सवाल आता है।
- न्यायालयों को ऐसे मामलों में सार्वजनिक हित और व्यक्तिगत गोपनीयता के बीच एक संवेदनशील संतुलन बनाना होता है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) | नागरिकों को सरकारी निकायों से जानकारी प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करता है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ती है। |
| निजता का अधिकार (Right to Privacy) | व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करता है, जो अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंतर्निहित हिस्सा है। |
| केरल लोक सेवा आयोग (Kerala Public Service Commission – PSC) | राज्य सरकार के तहत विभिन्न पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया आयोजित करने वाली संवैधानिक संस्था। |
| राज्य सूचना आयोग (State Information Commission) | सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी प्रदान करने से संबंधित शिकायतों और अपीलों का निपटारा करने वाला वैधानिक निकाय। |
| न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) | उच्च न्यायालय द्वारा सूचना आयोग के आदेश की वैधता की जांच, जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संवैधानिक सर्वोच्चता को दर्शाता है। |
महत्व
शासन और पारदर्शिता (Governance and Transparency)
- यह मामला सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत पारदर्शिता और व्यक्तिगत निजता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती को उजागर करता है।
- लोक सेवा आयोगों की भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के महत्व पर बल देता है, जिससे योग्यता और निष्पक्षता को बढ़ावा मिलता है।
कानूनी और संवैधानिक निहितार्थ (Legal and Constitutional Implications)
- यह न्यायिक समीक्षा के महत्व को दर्शाता है, जहां उच्च न्यायालय प्रशासनिक निकायों (जैसे सूचना आयोग) के आदेशों की वैधता की जांच करता है।
- अनुच्छेद 21 के तहत निजता के अधिकार के दायरे और सीमाओं को स्पष्ट करने में मदद करता है, विशेष रूप से सार्वजनिक रोजगार के संदर्भ में।
प्रशासनिक दक्षता (Administrative Efficiency)
- लोक सेवा आयोगों के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवारों से संबंधित व्यक्तिगत जानकारी को प्रबंधित करने और साझा करने की व्यावहारिक चुनौतियों को सामने लाता है।
- भर्ती निकायों को पारदर्शिता के साथ-साथ प्रशासनिक व्यवहार्यता और डेटा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर विचार करने के लिए प्रेरित करता है।
चुनौतियाँ
1. पारदर्शिता बनाम निजता (Transparency vs. Privacy)
- सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत जानकारी के प्रकटीकरण और व्यक्तिगत निजता के अधिकार के बीच एक नाजुक संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
- यह तय करना मुश्किल है कि सार्वजनिक हित में कितनी जानकारी का खुलासा किया जाना चाहिए और कब व्यक्तिगत निजता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही; निजता का अधिकार
2. डेटा प्रबंधन और व्यवहार्यता (Data Management and Feasibility)
- लोक सेवा आयोग जैसी संस्थाओं के लिए लाखों उम्मीदवारों की व्यक्तिगत जानकारी और दस्तावेजों को सुरक्षित रूप से प्रबंधित करना और अनुरोध पर साझा करना एक विशाल प्रशासनिक कार्य है।
- अत्यधिक व्यक्तिगत डेटा के प्रकटीकरण से डेटा सुरक्षा और गोपनीयता उल्लंघनों का जोखिम बढ़ सकता है।
यूपीएससी लिंक: ई-गवर्नेंस; सूचना प्रौद्योगिकी का अनुप्रयोग
3. सार्वजनिक हित की परिभाषा (Definition of Public Interest)
- यह निर्धारित करना कि किस स्थिति में जानकारी का खुलासा ‘बड़े सार्वजनिक हित’ में है, एक व्यक्तिपरक और अक्सर विवादित मुद्दा है।
- सार्वजनिक हित की स्पष्ट और सुसंगत परिभाषा की कमी से सूचना आयोगों और अदालतों के लिए निर्णय लेना जटिल हो जाता है।
यूपीएससी लिंक: शासन में नैतिकता; लोक सेवा मूल्य
4. न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा (Scope of Judicial Intervention)
- सूचना आयोगों के आदेशों पर न्यायिक हस्तक्षेप की सीमा और आवृत्ति प्रशासनिक निर्णय लेने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
- अदालतों को सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है, जिससे कानूनी स्पष्टता सुनिश्चित हो सके।
यूपीएससी लिंक: न्यायपालिका; संवैधानिक प्रावधान
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| व्यक्तिगत जानकारी का प्रकटीकरण | उम्मीदवारों के अंक, अनुभव प्रमाण पत्र और साक्षात्कार के अंकों जैसी संवेदनशील जानकारी की गोपनीयता का उल्लंघन। |
| तीसरे पक्ष की निजता | बिना उनकी सहमति के तीसरे पक्ष की व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा उनके निजता के अधिकार का हनन कर सकता है। |
| सार्वजनिक हित का अभाव | पीएससी का तर्क है कि जानकारी मांगने वाले ने ‘बड़े सार्वजनिक हित’ को स्थापित नहीं किया, जो प्रकटीकरण को उचित ठहरा सके। |
| प्रशासनिक व्यवहार्यता | 1.25 करोड़ उम्मीदवारों से संबंधित व्यक्तिगत क्रेडेंशियल और दस्तावेजों को साझा करने की अव्यावहारिकता। |
| पारदर्शिता बनाम सुरक्षा | भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखने और उम्मीदवारों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने के बीच संतुलन बनाना। |
आगे की राह
- सूचना का अधिकार अधिनियम और निजता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश और मानक विकसित किए जाएं।
- सार्वजनिक हित की अवधारणा को और अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाए, ताकि सूचना आयोगों और अदालतों के लिए निर्णय लेना आसान हो।
- लोक सेवा आयोगों को डेटा सुरक्षा उपायों को मजबूत करना चाहिए और व्यक्तिगत जानकारी के प्रबंधन के लिए एक मजबूत डिजिटल अवसंरचना विकसित करनी चाहिए।
- भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए, परिणामों और चयन मानदंडों को सार्वजनिक करने के लिए मानकीकृत प्रोटोकॉल अपनाए जाएं, जो निजता का उल्लंघन न करें।
- उम्मीदवारों को उनकी व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण के संबंध में सूचित सहमति (informed consent) प्राप्त करने के तरीकों पर विचार किया जा सकता है।
- सूचना आयोगों और लोक सेवा आयोगों के अधिकारियों के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम और निजता कानूनों पर नियमित प्रशिक्षण आयोजित किया जाना चाहिए।
- न्यायपालिका को ऐसे मामलों में एक सुसंगत दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिससे कानूनी निश्चितता और predictability बनी रहे।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
सूचना का अधिकार अधिनियम · निजता का अधिकार · अनुच्छेद 21 · सार्वजनिक हित · केरल लोक सेवा आयोग · राज्य सूचना आयोग · न्यायिक समीक्षा · पारदर्शिता · जवाबदेही · संघवाद · भर्ती प्रक्रिया · गोपनीयता
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 21’, ‘note’: ‘जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (निजता का अधिकार)’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 315-323’, ‘note’: ‘संघ और राज्य लोक सेवा आयोगों से संबंधित प्रावधान’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 226’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालयों की रिट जारी करने की शक्ति (न्यायिक समीक्षा)’}
अवधारणा प्रवाह
एक उम्मीदवार केरल लोक सेवा आयोग से भर्ती परीक्षा की जानकारी मांगता है। → केरल राज्य सूचना आयोग जानकारी प्रदान करने का निर्देश देता है। → पीएससी इस आधार पर जानकारी देने से इनकार करता है कि यह व्यक्तिगत जानकारी है और निजता का उल्लंघन है। → पीएससी सूचना आयोग के आदेश को केरल उच्च न्यायालय में चुनौती देता है। → उच्च न्यायालय सूचना आयोग के आदेश पर रोक लगाता है और मामले की सुनवाई करता है। → यह मामला सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन की चुनौती को दर्शाता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 केंद्र और राज्य दोनों सरकारों पर लागू होता है।
2. यह अधिनियम ‘सूचना’ को किसी भी सामग्री के रूप में परिभाषित करता है जो किसी भी रूप में रखी जाती है, जिसमें रिकॉर्ड, दस्तावेज, ज्ञापन, ईमेल, राय, सलाह, प्रेस विज्ञप्ति, परिपत्र, आदेश, लॉगबुक, अनुबंध, रिपोर्ट, कागजात, नमूने, मॉडल, डेटा सामग्री किसी भी इलेक्ट्रॉनिक रूप में और निजी निकायों से संबंधित जानकारी भी शामिल है जिसे किसी अन्य कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा एक्सेस किया जा सकता है।
3. अधिनियम के तहत, तीसरे पक्ष की जानकारी का खुलासा केवल तभी किया जा सकता है जब सार्वजनिक प्राधिकरण संतुष्ट हो कि बड़े सार्वजनिक हित में ऐसा करना आवश्यक है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 केंद्र और राज्य दोनों सरकारों के सार्वजनिक प्राधिकरणों पर लागू होता है। कथन 2 गलत है। ‘सूचना’ की परिभाषा में निजी निकायों से संबंधित जानकारी शामिल नहीं है, जब तक कि उसे किसी अन्य कानून के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा एक्सेस न किया जा सके। कथन 3 सही है। अधिनियम की धारा 11 तीसरे पक्ष की जानकारी के प्रकटीकरण से संबंधित है और इसमें सार्वजनिक हित का परीक्षण शामिल है।
Q2. भारत में निजता के अधिकार के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही है?
- निजता का अधिकार केवल एक सांविधिक अधिकार है, संवैधानिक नहीं।
- निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंतर्निहित हिस्सा है।
- भारत में निजता का अधिकार केवल नागरिकों के लिए उपलब्ध है, विदेशियों के लिए नहीं।
- निजता का अधिकार किसी भी परिस्थिति में प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है।
उत्तर: निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक अंतर्निहित हिस्सा है। — विकल्प B सही है। सर्वोच्च न्यायालय ने पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ मामले में निजता के अधिकार को अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का एक मौलिक और अंतर्निहित हिस्सा घोषित किया। अन्य विकल्प गलत हैं क्योंकि निजता का अधिकार संवैधानिक है, नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों के लिए उपलब्ध है, और उचित प्रतिबंधों के अधीन हो सकता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने में एक महत्वपूर्ण उपकरण है, लेकिन यह अक्सर निजता के अधिकार के साथ टकराव में आता है। केरल उच्च न्यायालय के हालिया निर्णय के आलोक में, सूचना के अधिकार और निजता के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने में आने वाली चुनौतियों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (Right to Information Act, 2005) और निजता के अधिकार (Right to Privacy) (अनुच्छेद 21) का संक्षिप्त परिचय दें। केरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court) के हालिया मामले का संदर्भ दें जहाँ केरल लोक सेवा आयोग (Kerala Public Service Commission – PSC) को भर्ती परीक्षा के विवरण का खुलासा करने के राज्य सूचना आयोग (State Information Commission) के आदेश पर रोक लगाई गई।
2. **सूचना का अधिकार और इसका महत्व:** पारदर्शिता (Transparency), जवाबदेही (Accountability) और सुशासन (Good Governance) में RTI की भूमिका पर चर्चा करें। सार्वजनिक प्राधिकरणों (Public Authorities) द्वारा रखी गई जानकारी तक नागरिकों की पहुंच सुनिश्चित करने में इसके प्रावधानों को उजागर करें।
3. **निजता का अधिकार और इसका महत्व:** पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (Puttaswamy v. Union of India) मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का उल्लेख करें, जिसने निजता को मौलिक अधिकार घोषित किया। व्यक्तिगत स्वायत्तता (Personal Autonomy), गरिमा (Dignity) और डेटा संरक्षण (Data Protection) के लिए निजता के महत्व पर प्रकाश डालें।
4. **टकराव के बिंदु:**
* **RTI अधिनियम के अपवाद:** अधिनियम की धारा 8(1)(j) का उल्लेख करें जो ऐसी व्यक्तिगत जानकारी के प्रकटीकरण से छूट देती है जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध नहीं है, या जिससे व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन होगा, जब तक कि बड़े सार्वजनिक हित में ऐसा करना उचित न हो।
* **सार्वजनिक हित बनाम व्यक्तिगत निजता:** उन स्थितियों पर चर्चा करें जहाँ भर्ती परीक्षाओं के अंक, अनुभव प्रमाण पत्र या साक्षात्कार के अंक जैसी जानकारी का खुलासा करने की मांग की जाती है। यह कैसे तीसरे पक्ष की निजता का उल्लंघन कर सकता है, विशेषकर जब कोई बड़ा सार्वजनिक हित स्थापित न हो।
* **व्यावहारिकता की चुनौतियाँ:** PSC जैसे बड़े संगठनों के लिए बड़ी संख्या में उम्मीदवारों की व्यक्तिगत जानकारी का प्रबंधन और प्रकटीकरण कितना अव्यावहारिक हो सकता है, जैसा कि केरल PSC ने तर्क दिया।
5. **संतुलन स्थापित करने में चुनौतियाँ:**
* **’सार्वजनिक हित’ की अस्पष्ट परिभाषा:** ‘सार्वजनिक हित’ की व्याख्या में भिन्नताएँ और यह कैसे न्यायिक निर्णयों को प्रभावित करती है।
* **डेटा संरक्षण कानून की आवश्यकता:** भारत में एक मजबूत डेटा संरक्षण कानून (जैसे डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 – Digital Personal Data Protection Act, 2023) की भूमिका और RTI के साथ इसके सामंजस्य की आवश्यकता।
* **संस्थागत क्षमता:** सूचना आयोगों और सार्वजनिक प्राधिकरणों की क्षमता जो RTI अनुरोधों को प्रभावी ढंग से और निजता के अधिकारों का सम्मान करते हुए संसाधित कर सकें।
* **न्यायिक हस्तक्षेप की भूमिका:** उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इस संतुलन को बनाए रखने में निभाई गई भूमिका।
6. **निष्कर्ष:** पारदर्शिता और निजता दोनों को लोकतांत्रिक शासन के लिए आवश्यक बताते हुए, एक ऐसे सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता पर बल दें जो दोनों अधिकारों का सम्मान करे। सुझाव दें कि स्पष्ट दिशानिर्देश, मजबूत डेटा संरक्षण कानून और संवेदनशील निर्णय लेने की प्रक्रिया इस संतुलन को प्राप्त करने में मदद कर सकती है।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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