01 Sep क्रांति की स्त्री-रेखा : भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की निर्णायक भूमिका
मुख्य परीक्षा के सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र -1 के अंतर्गत- आधुनिक भारतीय इतिहास, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व, भारत के राष्ट्रवादी आंदोलनों और क्रांतिकारी गतिविधियों में महिलाओं की भूमिका, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लैंगिक और सामाजिक सुधार
प्रारंभिक परीक्षा के लिए – सावित्रीबाई फुले, रानी लक्ष्मीबाई, रानी चेन्नम्मा, रानी गाइदिन्ल्यू, पंडिता रमाबाई, सरोजिनी नायडू, कल्पना दत्ता, कनकलता बरुआ, एनी बेसेंट, बीना दास, सुचेता कृपलानी, अरुणा आसफ अली, असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन
खबरों में क्यों ?
- हाल ही में भारत ने अपना 79वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया। इस ऐतिहासिक अवसर पर न केवल देश की आज़ादी के संघर्ष – गाथाओं की यादों को एक बार पुनः ताज़ा किया गया, बल्कि उन अनगिनत महिलाओं के योगदान को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया, जिन्होंने अपनी जान की बाज़ी लगाकर स्वतंत्रता के स्वप्न को साकार करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
- भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास मुख्यतः पुरुष नेताओं की कहानियों से भरा पड़ा है—गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह आदि। किंतु इस संघर्ष का एक अन्य महत्वपूर्ण और अक्सर अनदेखा पहलू है: भारतीय महिलाओं की भूमिका, जो न केवल तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध लड़ीं, बल्कि भारतीय समाज में व्याप्त अनेक सामाजिक रूढ़ियों और बेड़ियों को तोड़कर सार्वजनिक जीवन में आईं।
भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की बहुआयामी भागीदारी :
- जन आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी : महिलाओं ने ‘भारत माता’ के प्रतीक से प्रेरणा लेकर अपने पारंपरिक भूमिकाओं की सीमाओं को तोड़ा और आंदोलन का अभिन्न हिस्सा बनीं। वे स्थानीय, क्षेत्रीय और जातीय पहचान से ऊपर उठकर एक राष्ट्रवादी चेतना से ओतप्रोत हुईं। इस सामाजिक एकजुटता ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को व्यापक जनाधार प्रदान किया।
- असहयोग आंदोलन (1920-22) : महिलाओं ने ब्रिटिश वस्त्रों और संस्थाओं का बहिष्कार किया, खादी को अपनाया, विदेशी माल की होली जलाई और विरोध जुलूसों में भाग लिया। उन्होंने गिरफ्तारी से भी परहेज़ नहीं किया। इस आंदोलन में हजारों महिलाएँ घरों से बाहर निकलकर राष्ट्र के लिये खड़ी हुईं—यह एक राजनीतिक जागरूकता और साहस की ऐतिहासिक मिसाल थी।
- नमक सत्याग्रह (1930) : महात्मा गांधी के इस शांतिपूर्ण विरोध में महिलाओं की बड़ी भागीदारी रही। सरोजिनी नायडू, कमला नेहरू और कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसी महिलाएँ न केवल जुलूसों की अगुवाई कर रही थीं, बल्कि ग्रामीण भारत की महिलाओं को भी संगठित कर रही थीं। उन्होंने नमक कानून तोड़ा, धरना दिया और गिरफ्तारियों का सामना किया।
- भारत छोड़ो आंदोलन (1942) : यह आंदोलन महिलाओं की राजनीतिक नेतृत्व क्षमता का प्रमाण बन गया। पुरुष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद भी आंदोलन की निरंतरता बनाए रखने का कार्य महिलाओं ने बखूबी किया। अरुणा आसफ अली द्वारा बंबई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस का झंडा फहराना इस आंदोलन का प्रतीक बन गया।
- महिलाओं का क्रांतिकारी योगदान और भूमिगत गतिविधियाँ : महिलाओं ने केवल अहिंसक आंदोलनों तक ही स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि वे क्रांतिकारी संगठनों में भी शामिल हुईं। उन्होंने हथियारों की तस्करी की, गुप्त संदेश पहुँचाए, भूमिगत रेडियो स्टेशन चलाए और ब्रिटिश प्रतिष्ठानों पर हमले किए। उदाहरण के लिए –
- प्रीतिलता वाद्देदार ने ब्रिटिश नस्लीय भेदभाव के विरुद्ध यूरोपियन क्लब पर हमला किया।
- कल्पना दत्त ने चटगाँव शस्त्रागार छापे की न केवल सहभागी रही, बल्कि इसमें उन्होंने अपनी सक्रिय एवं महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- बीना दास : इन्होंने वर्ष 1932 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह हॉल (Convocation Hall) में बंगाल के गवर्नर स्टेनली जैक्सन की हत्या का प्रयास किया था। उन्होंने खादी पहनकर, प्रतिबंधित साहित्य पर लेखन करते हुए और अपने कॉलेज में क्रांतिकारी साहित्य का वितरण कर शांतिपूर्वक विरोध जताया। इन कार्यों ने ब्रिटिश साम्राज्य और महिलाओं की आवाज़ को दबाने वाले वाले सामाजिक मानदंडों, दोनों को चुनौती दी।
- कमला दास गुप्ता : क्रांतिकारियों को छुपाने में सहायता की, संदेशों को पहुँचाने का कार्य किया तथा क्रांतिकारियों को हथियार उपलब्ध कराते हुए स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन किया। बेगम रुकैया सखावत हुसैन : एक अग्रणी नारीवादी, उन्होंने अपने उपन्यास सुल्ताना का सपना (Sultana’s Dream) में महिलाओं के नेतृत्व में, तर्क एवं शांतिपूर्ण तरीके से शासित और पितृसत्ता एवं उपनिवेशवाद दोनों की बेड़ियों से मुक्त समाज की कल्पना की। उन्होंने कोलकाता में मुस्लिम लड़कियों के लिये स्कूल स्थापित किये और व्यक्तिगत रूप से परिवारों को अपनी बेटियों को शिक्षित करने के लिए प्रोत्साहित किया था।
नेतृत्व के स्तर पर और संगठनात्मक निर्माण में महिलाओं की भूमिका :
- महिला संगठनों की स्थापना करना : भारत के स्वतंत्रता – संग्राम के आंदोलन में महिलाओं की भूमिका को सशक्त करने के लिए कई संगठन बने। जिसमें अखिल भारतीय महिला सम्मेलन (AIWC) और विमेन्स इंडियन एसोसिएशन (WIA) जैसे संगठन का निर्माण किया। इन संगठनों ने महिलाओं को राजनीतिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त करने का कार्य किया। यहीं से भारतीय महिलाओं की संगठित चेतना की नींव पड़ी।
राष्ट्रीय नेतृत्व में अपनी सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करना :
- सरोजिनी नायडू : कांग्रेस की पहली भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं, भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिनिधित्व दिया।
- विजया लक्ष्मी पंडित : संयुक्त राष्ट्र में भारत की पहली राजदूत और विश्व राजनीति में भारत की आवाज बनीं।
- सुचेता कृपलानी : स्वतंत्र भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री (उत्तर प्रदेश) बनीं।
- अरुणा आसफ अली : इन्हें ‘1942 के आन्दोलन की नायिका’ के रूप में भारतीय इतिहास में दर्ज किया गया है। इन महिला नेताओं ने यह सिद्ध किया कि राजनीतिक नेतृत्व और महिला सशक्तीकरण एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
सामाजिक सुधार और लैंगिक न्याय के लिए संघर्ष करना :
स्त्री शिक्षा और सामाजिक चेतना से संबंधित स्वतंत्रता संग्राम की नायिकाएँ :
- सावित्रीबाई फुले : भारत की पहली महिला शिक्षिका, जिन्होंने भारत में सबसे पहले दलित और महिला – शिक्षा की नींव रखी और भारतीय इतिहास में अपना नाम स्त्री – अधिकारों की प्रबल समर्थक के रूप में दर्ज कराया।
- फातिमा शेख : महिलाओं के लिए समान शिक्षा की समर्थक और सावित्रीबाई की मुख्य सहयोगी के रूप में फातिमा शेख ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- पंडिता रमाबाई : पंडिता रमाबाई ने विधवाओं के अधिकार और स्त्री शिक्षा की पुरजोर वकालत की।
बाल विवाह, पर्दा-प्रथा के विरुद्ध और संपत्ति के अधिकार से संबंधित नायिकाएँ:
- महिलाओं ने इन सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध संघर्ष किया और इनसे मुक्ति को राष्ट्रीय स्वतंत्रता का एक अंग माना।
- बेगम रुकैया सखावत हुसैन ने मुस्लिम लड़कियों की शिक्षा पर बल दिया और ‘सुल्ताना का सपना’ जैसी प्रगतिशील रचनाएँ लिखीं।
- रुक्मिणी देवी अरुंडेल ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से महिलाओं की सृजनात्मक शक्ति को सामने लाया।
- ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में सहभागिता : खादी उत्पादन, साक्षरता अभियान, महिला मेलों और प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से महिलाओं को संगठित किया गया। इसने न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता दी, बल्कि उन्हें राजनीतिक नागरिकता का भी बोध कराया।
आज़ादी के आंदोलन में बलिदान की प्रतिमूर्तियाँ :
- भारत के स्वतंत्रता – संग्राम में कुछ महिलाएँ ऐसी भी रहीं, जो संघर्ष करते हुए शहीद हो गईं और भारत माता की संतान के रूप में अमर हो गईं। जिनमें प्रमुख हैं –
- रानी लक्ष्मीबाई : 1857 की क्रांति की वीरांगना, जिन्होंने अंग्रेजों के “डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स” का विरोध करते हुए वीरगति प्राप्त की।
- मातंगिनी हाजरा : ‘गांधी बूढ़ी’ के नाम से प्रसिद्ध, जो ‘वंदे मातरम’ का नारा लगाते हुए गोली खाकर शहीद हुईं।
- कनकलता बरुआ : असम की युवा क्रांतिकारी, जिन्होंने तिरंगा थामे हुए ब्रिटिश गोलीबारी का सामना किया। इन तमाम महिलाओं का अपना सर्वोच्च बलिदान इस बात का प्रतीक है कि स्वतंत्रता किसी विशेष वर्ग की जागीर नहीं, बल्कि हर नागरिक की साझी आकांक्षा थी।
प्रमुख महिला क्रांतिकारी : भारतीय स्वतंत्रता – संग्राम में उनका योगदान :
| नाम | योगदान |
| रानी चेन्नम्मा | 1824 में कर्नाटक में अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह |
| कमलादेवी चट्टोपाध्याय | महिला संगठनकर्ता, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक |
| उषा मेहता | गुप्त रूप से ‘कांग्रेस रेडियो’ का संचालन |
| कमला नेहरू | असहयोग आंदोलन में अग्रणी भूमिका |
| भीकाजी कामा | विदेश में भारतीय ध्वज फहराने वाली पहली महिला |
| लाबन्या प्रभा घोष | ग्रामीण महिलाओं में राष्ट्रवाद का संचार |
| कमला दास गुप्ता | क्रांतिकारियों को सहायता और संदेश संचालन |
निष्कर्ष :
- भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाएँ केवल दर्शक भर नहीं थीं, बल्कि वे संघर्ष की आधार – स्तंभ भी थीं। उन्होंने घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर, अपने जीवन को राष्ट्र के लिए समर्पित किया।
- देश की आज़ादी के संघर्ष में जहाँ कुछ महिलाओं ने अपने कंधों पर बंदूक उठाई, तो वहीं कुछ महिलाओं ने तिरंगा, कुछ ने किताब और कुछ ने चरखा को अपनाकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा कर भारतीय इतिहास के पन्नों में अपने स्वर्णिम संघर्ष को अमर कर अपनी अमिट छाप छोड़ गई हैं।
- इन महिलाओं ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता केवल राजनैतिक आज़ादी नहीं होती, वह सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक मुक्ति का संगम होती है।
- आज जब हम ‘नारी सशक्तिकरण’ की बात करते हैं, तो हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि इस सशक्तिकरण की जड़ें भारत की आज़ादी की उस मिट्टी में हैं, जिसे इन महिलाओं ने अपने खून, पसीने और संघर्ष से सींचा था।
स्त्रोत – पी. आई. बी एवं द हिन्दू।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में 8 अगस्त, 1942 को भारत छोड़ो आंदोलन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?
- भारत छोड़ो प्रस्ताव AICC (अखिल भारतीय कांग्रेस समिति) द्वारा अपनाया गया था।
- वायसराय की कार्यकारी परिषद का विस्तार अधिक भारतीयों को शामिल करने के लिये किया गया था।
- कांग्रेस के मंत्रिमंडलों ने सात प्रांतों में इस्तीफा दे दिया।
- द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद क्रिप्स मिशन ने पूर्ण डोमिनियन दर्जे के साथ एक भारतीय संघ का प्रस्ताव रखा।
नीचे दिए गए कूट के माध्यम से सही विकल्प का चयन कीजिए :
A. केवल 1
B. केवल 2
C. केवल 1, 2 और 3
D. उपरोक्त सभी।
उत्तर – A
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q.1. चर्चा कीजिए कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका क्या रही है और उनका योगदान किस प्रकार बहुआयामी एवं ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है ? ( शब्द सीमा – 250 अंक – 15 )

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