डिजिटल लत (Digital Addiction) : एक उभरती चुनौती

डिजिटल लत (Digital Addiction) : एक उभरती चुनौती

डिजिटल लत (Digital Addiction) : एक उभरती चुनौती

पाठ्यक्रम : जीएस 1 भारतीय समाज

परिचय : 

आधुनिक युग में डिजिटल प्रौद्योगिकी ने हमारे जीवन को सुगम और जुड़ा हुआ बनाया है, लेकिन इसके साथ ही एक नई समस्या उभरकर सामने आई है – डिजिटल लत। हाल ही के आर्थिक सर्वेक्षण में डिजिटल लत के संकट और इससे जुड़ी बढ़ती मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई है। डिजिटल लत को कंप्यूटर और ऑनलाइन कंटेंट के निरंतर, अत्यधिक या जुनूनी उपयोग के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो मनोवैज्ञानिक तनाव एवं कार्यक्षमता में गिरावट का कारण बनता है। यह न केवल व्यक्तिगत स्तर पर प्रभाव डालती है, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और शिक्षा पर भी व्यापक नकारात्मक प्रभाव डाल रही है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है, यह समस्या विशेष रूप से गंभीर है।

In the era of Digital India, social media is driving growth but becoming a serious concern for children. The Economic Survey 2025-26 has issued a warning on rising digital addiction and its

  • ऑनलाइन गतिविधियों के अत्यधिक उपयोग से होने वाली डिजिटल लत, मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक संबंधों और वित्त पर नकारात्मक प्रभाव डालती है।
  • डिजिटल लत से निपटने के लिए स्कूलों, परिवारों, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, डेटा ट्रैकिंग और सामुदायिक समर्थन को शामिल करते हुए एक बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
  • प्रमुख रणनीतियों में डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम, माता-पिता के लिए डिजिटल आहार, प्लेटफॉर्म पर आयु सत्यापन और प्रौद्योगिकी-मुक्त क्षेत्रों की स्थापना शामिल हैं।

डिजिटल लत के कारण

डिजिटल लत मुख्य रूप से सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग, स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और स्मार्टफोन के अत्यधिक उपयोग से उत्पन्न होती है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, ऑनलाइन गतिविधियों का अत्यधिक उपयोग मानसिक स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक संबंधों और वित्त पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। भारत में युवा वर्ग विशेष रूप से प्रभावित है, जहां स्मार्टफोन की पहुंच बढ़ने से स्क्रीन टाइम में वृद्धि हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने गेमिंग डिसऑर्डर को एक मानसिक स्वास्थ्य समस्या के रूप में मान्यता दी है, जो भारत में भी प्रचलित है।

इस समस्या के पीछे कई कारक हैं:

प्रौद्योगिकी का डिजाइन: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और टिकटॉक ‘डोपामाइन हिट’ देने वाले फीचर्स (जैसे ऑटो-प्ले, नोटिफिकेशन और लक्षित विज्ञापन) का उपयोग करते हैं, जो उपयोगकर्ताओं को बांधे रखते हैं।
महामारी का प्रभाव: COVID-19 के दौरान ऑनलाइन शिक्षा और कार्य ने डिजिटल निर्भरता को बढ़ावा दिया, जो अब एक आदत बन चुकी है।
सामाजिक-आर्थिक कारक: ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में असमान पहुंच के बावजूद, कम आय वाले परिवारों में भी स्मार्टफोन का उपयोग बढ़ा है, लेकिन जागरूकता की कमी है।

डिजिटल लत के बहुआयामी प्रभाव : 

डिजिटल लत के प्रभाव व्यापक और बहुआयामी हैं, जो व्यक्ति, समाज और अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं:

मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: सोशल मीडिया की लत कम आत्मसम्मान, चिंता और अवसाद से जुड़ी है। साइबर बुलिंग के कारण युवाओं में तनाव बढ़ता है, जबकि गेमिंग विकार आक्रामकता और सामाजिक अलगाव का कारण बनते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम नींद की कमी और एकाग्रता में कमी लाता है, जो मानसिक स्वास्थ्य को और बिगाड़ता है। भारत में, राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NMHS) के अनुसार, युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं 10-15% तक बढ़ी हैं,

जिसमें डिजिटल लत एक प्रमुख कारक है।

शैक्षणिक और संज्ञानात्मक गिरावट: डिजिटल लत व्याकुलता बढ़ाती है, जिससे छात्रों का ध्यान केंद्रित नहीं रहता। इससे शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट आती है। उदाहरणस्वरूप, ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान मल्टीटास्किंग (जैसे सोशल मीडिया का उपयोग) सीखने की क्षमता को कमजोर करता है। आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लेख है कि इससे उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जो अंततः आर्थिक विकास को प्रभावित करता है।
सामाजिक पूंजी का क्षरण: त्यधिक ऑनलाइन व्यस्तता से वास्तविक दुनिया के संबंध कमजोर होते हैं। साथियों के साथ संपर्क कम होता है, सामुदायिक भागीदारी घटती है और व्यावहारिक कौशल (जैसे संवाद और सहयोग) में गिरावट आती है। इससे सामाजिक अलगाव बढ़ता है, जो विशेष रूप से किशोरों और युवाओं में देखा जाता है।
शारीरिक और वित्तीय नुकसान: लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहने से आंखों की समस्या, मोटापा और पीठ दर्द जैसी शारीरिक समस्याएं उत्पन्न होती हैं। वित्तीय रूप से, ऑनलाइन जुआ और साइबर धोखाधड़ी से हानि होती है। भारत में साइबर अपराधों की संख्या में 20-30% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें डिजिटल लत एक योगदानकर्ता है।

ये प्रभाव न केवल व्यक्तिगत हैं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक हैं। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, इससे श्रम उत्पादकता में कमी आती है, जो भारत की GDP वृद्धि को प्रभावित कर सकती है।

समाधान की राह: एक बहुआयामी दृष्टिकोण

डिजिटल लत से निपटने के लिए एक समग्र रणनीति की आवश्यकता है, जिसमें सरकार, स्कूल, परिवार, प्लेटफॉर्म और समाज सभी शामिल हों। आर्थिक सर्वेक्षण ने स्कूलों, परिवारों, प्लेटफॉर्म की जवाबदेही, डेटा ट्रैकिंग और सामुदायिक समर्थन को शामिल करते हुए बहुआयामी दृष्टिकोण की सिफारिश की है। प्रमुख रणनीतियां निम्नलिखित हैं:

शिक्षा और स्कूलों की भूमिका: स्कूलों में “डिजिटल वेलनेस पाठ्यक्रम” शुरू किया जाना चाहिए, जिसमें साइबर सुरक्षा, स्क्रीन-टाइम साक्षरता और डिजिटल नैतिकता शामिल हो। ऑनलाइन शिक्षण उपकरणों पर निर्भरता कम करके ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में इसकी क्षमता है, जहां डिजिटल शिक्षा को संतुलित करने पर जोर दिया गया है।
माता-पिता और परिवार की भूमिका: परिवारों को “डिजिटल डाइट” अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, जो तकनीक के उपयोग को प्रबंधित करने का एक सचेत दृष्टिकोण है। डिवाइस-मुक्त घंटे निर्धारित करना, पेरेंटल कंट्रोल टूल्स का उपयोग और बच्चों के साथ खुली चर्चा आवश्यक है। सरकार द्वारा जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं, जैसे “डिजिटल Detox” कार्यक्रम।
प्लेटफॉर्म की जवाबदेही: तकनीकी कंपनियों को आयु सत्यापन लागू करना चाहिए और कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए ‘ऑटो-प्ले’ तथा लक्षित विज्ञापन पर रोक लगानी चाहिए। भारत में व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक (DPDP) 2023 इस दिशा में कदम है, जो प्लेटफॉर्म को जवाबदेह बनाता है। यूरोपीय संघ के GDPR जैसे मॉडल से प्रेरणा ली जा सकती है।
डेटा ट्रैकिंग और मेट्रिक्स: स्क्रीन टाइम, नींद की गुणवत्ता और साइबर बुलिंग के जोखिम को ट्रैक करने के लिए प्रमुख संकेतक विकसित किए जाएं। सरकार द्वारा एक राष्ट्रीय डिजिटल स्वास्थ्य डैशबोर्ड बनाया जा सकता है, जो डेटा-आधारित नीतियां बनाने में मदद करे।
सामुदायिक समर्थन: कार्यस्थलों, महाविद्यालयों और समुदायों में “तकनीक-मुक्त क्षेत्र” और ऑफलाइन यूथ हब स्थापित किए जाएं। इससे वास्तविक दुनिया के सामाजिक संबंधों को पुनर्स्थापित किया जा सकता है। एनजीओ और सामुदायिक संगठनों को इसमें शामिल किया जाए।

सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण है। एक राष्ट्रीय डिजिटल लत रोकथाम नीति बनाई जाए, जो स्वास्थ्य मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और आईटी मंत्रालय के बीच समन्वय पर आधारित हो। साथ ही, अनुसंधान और जागरूकता के लिए फंडिंग बढ़ाई जाए।

निष्कर्ष :

डिजिटल लत एक उभरती हुई चुनौती है, जो भारत के युवा जनसांख्यिकीय लाभांश को खतरे में डाल सकती है। आर्थिक सर्वेक्षण की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, हमें प्रौद्योगिकी के लाभों को बनाए रखते हुए इसके दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने की आवश्यकता है। एक बहुआयामी दृष्टिकोण से हम एक स्वस्थ डिजिटल समाज का निर्माण कर सकते हैं, जहां तकनीक सशक्तिकरण का माध्यम बने, न कि लत का। यह न केवल व्यक्तिगत कल्याण सुनिश्चित करेगा, बल्कि सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) जैसे SDG-3 (स्वास्थ्य) और SDG-4 (शिक्षा) की प्राप्ति में भी योगदान देगा। अंततः, जागरूकता, नीति और सामूहिक प्रयास ही इस समस्या का समाधान हैं।

प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.निम्नलिखित में से कौन-सा डिजिटल लत से संबंधित प्रभाव नहीं है?
(a) मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट
(b) शैक्षणिक प्रदर्शन में सुधार
(c) सामाजिक अलगाव
(d) वित्तीय हानि
(उत्तर: b)

मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :

Q.डिजिटल लत के संकट और इससे जुड़ी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं पर चर्चा कीजिए। भारत में इससे निपटने के लिए सुझाए गए बहुआयामी दृष्टिकोणों का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)

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