12 Aug तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पारित किया
✎ परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया है, जो 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' के सिद्धांत को सुनिश्चित करती है और भारत में लोकसभा तथा विधानसभा सीटों की संख्या को 2026 तक के लिए फ्रीज किया गया है…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय राजव्यवस्था, संविधान, शासन | GS Paper I — भारतीय समाज
- Prelims: परिसीमन आयोग, लोकसभा सीटें, राज्य विधानसभा सीटें, महिला आरक्षण, संविधान संशोधन, जनगणना, अनुच्छेद 82, अनुच्छेद 170
- Essay: भारत में लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और समावेशिता की चुनौतियाँ, संघवाद और जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व का संतुलन
त्वरित पुनरावृत्ति: परिसीमन निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को पुनर्निर्धारित करने की प्रक्रिया है, जो ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को सुनिश्चित करती है और भारत में लोकसभा तथा विधानसभा सीटों की संख्या को 2026 तक के लिए फ्रीज किया गया है, जिसके बाद अगला परिसीमन महिला आरक्षण के साथ होगा।
यह खबर चर्चा में क्यों?
तमिलनाडु विधानसभा ने हाल ही में एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें केंद्र सरकार से लोकसभा सीटों की संख्या को मौजूदा 543 पर स्थिर रखने का आग्रह किया गया है। इस प्रस्ताव में अंतर-राज्यीय सीट वितरण के वर्तमान अनुपात को बनाए रखने और मौजूदा 543 सीटों के आधार पर 2029 के लोकसभा चुनावों तथा बाद के विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को लागू करने पर भी जोर दिया गया है। यह प्रस्ताव आगामी परिसीमन (Delimitation) अभ्यास और महिला आरक्षण (Women’s Reservation) के कार्यान्वयन से संबंधित चिंताओं को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- परिसीमन का अर्थ निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण करना है, ताकि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में जनसंख्या लगभग समान हो।
- भारत में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए सीटों का परिसीमन प्रत्येक जनगणना के बाद किया जाता है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 82 और अनुच्छेद 170 में प्रावधान है।
- 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2023 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान किया है।
- यह अधिनियम जनगणना और उसके बाद परिसीमन अभ्यास के पूरा होने के बाद ही प्रभावी होगा, जिससे इसके कार्यान्वयन में देरी की आशंका है।
- तमिलनाडु जैसे राज्यों का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में उनकी सफलता के कारण उन्हें कम संसदीय प्रतिनिधित्व नहीं मिलना चाहिए, क्योंकि इससे संघीय ढांचे में असंतुलन पैदा होगा।
परिसीमन क्या है और इसका महत्व क्या है?
- परिसीमन का अर्थ किसी देश या प्रांत में विधायी निकाय के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने या फिर से तय करने की प्रक्रिया है।
- इसका मुख्य उद्देश्य ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखना है, ताकि सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या लगभग समान हो।
- भारत में, परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) इस कार्य को करता है, जिसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और उन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
- परिसीमन का आधार आमतौर पर नवीनतम जनगणना के आंकड़े होते हैं, जो जनसंख्या में बदलाव के अनुसार प्रतिनिधित्व को समायोजित करते हैं।
- यह प्रक्रिया राजनीतिक प्रतिनिधित्व में क्षेत्रीय असमानताओं को दूर करने और यह सुनिश्चित करने में मदद करती है कि प्रत्येक नागरिक का वोट समान महत्व रखता हो।
- परिसीमन से अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या और स्थान भी निर्धारित होते हैं, जो उनकी जनसंख्या के अनुपात में होते हैं।
- वर्तमान में, लोकसभा सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर निर्धारित है, जिसे 84वें संविधान संशोधन द्वारा 2026 तक के लिए फ्रीज कर दिया गया था।
- महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के कारण इसके कार्यान्वयन में अनिश्चितता और देरी की आशंका है, जिससे महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण में बाधा आ सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर करना | राज्यों के बीच मौजूदा सीट वितरण अनुपात को बनाए रखने और दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने का प्रयास। |
| लोकसभा-राज्यसभा अनुपात 2.2:1 बनाए रखना | संसद के दोनों सदनों के बीच शक्ति संतुलन और प्रतिनिधित्व की निरंतरता सुनिश्चित करना। |
| महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग करना | महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से स्वतंत्र रूप से लागू करने की वकालत, ताकि इसमें देरी न हो। |
| 2029 के लोकसभा चुनावों से महिला आरक्षण लागू करना | महिलाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में त्वरित भागीदारी सुनिश्चित करने का लक्ष्य। |
महत्व
राजनीतिक महत्व
- यह प्रस्ताव संघवाद (Federalism) के सिद्धांत पर बहस को फिर से शुरू करता है, विशेष रूप से जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिणी राज्यों के प्रतिनिधित्व के संबंध में।
- यह महिला आरक्षण (Women’s Reservation) के शीघ्र कार्यान्वयन की आवश्यकता पर बल देता है, इसे जनगणना और परिसीमन जैसी प्रक्रियाओं से अलग करने की मांग करता है।
संवैधानिक महत्व
- यह परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों (अनुच्छेद 82 और 170) और उनके संभावित प्रभावों पर ध्यान केंद्रित करता है।
- यह 106वें संविधान संशोधन अधिनियम (106th Constitutional Amendment Act) के कार्यान्वयन में देरी के संवैधानिक निहितार्थों पर प्रकाश डालता है, जो महिलाओं के लिए आरक्षण प्रदान करता है।
सामाजिक महत्व
- यह महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण और निर्णय लेने की प्रक्रियाओं में उनकी समान भागीदारी की आवश्यकता पर जोर देता है।
- यह सामाजिक न्याय (Social Justice) के एक महत्वपूर्ण पहलू के रूप में महिलाओं के लिए आरक्षण को प्रस्तुत करता है, न कि केवल एक रियायत के रूप में।
चुनौतियाँ
1. जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व का सिद्धांत
- संविधान लोकसभा सीटों के आवंटन के लिए जनसंख्या को एक प्राथमिक मानदंड मानता है। जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को सीटों में कमी का डर है, जबकि अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को लाभ हो सकता है।
- यह सिद्धांत ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ के विचार से जुड़ा है, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को दंडित करने के रूप में देखा जा सकता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
2. परिसीमन में देरी और महिला आरक्षण
- 106वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन के बाद लागू करने का प्रावधान है, जिससे इसके कार्यान्वयन में अनिश्चितकालीन देरी हो सकती है।
- यह महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों को तुरंत सुनिश्चित करने में बाधा उत्पन्न करता है, जिससे विधायी निकायों में उनका प्रतिनिधित्व कम बना रहता है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संवैधानिक संशोधन, महिला सशक्तिकरण
3. संघवाद पर प्रभाव
- सीटों को स्थिर करने के प्रस्ताव को कुछ राज्यों द्वारा अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बनाए रखने के प्रयास के रूप में देखा जाता है, जो अंतर-राज्यीय असमानताओं को जन्म दे सकता है।
- यह केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों में तनाव पैदा कर सकता है, खासकर जब राज्यों को लगता है कि उनके हितों की अनदेखी की जा रही है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संघवाद, केंद्र-राज्य संबंध
4. संवैधानिक संशोधन प्रक्रिया
- परिसीमन और सीटों के समायोजन के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होती है, जिसके लिए संसद में दो-तिहाई बहुमत और आधे राज्यों के अनुसमर्थन की आवश्यकता होती है।
- यह प्रक्रिया जटिल और समय लेने वाली हो सकती है, जिससे महत्वपूर्ण सुधारों में देरी हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय राजव्यवस्था: संवैधानिक संशोधन
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| जनसंख्या नियंत्रण बनाम प्रतिनिधित्व | जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को परिसीमन के बाद लोकसभा सीटों में कमी का डर है, जिससे उनके राजनीतिक प्रभाव में कमी आ सकती है। |
| महिला आरक्षण का विलंबित कार्यान्वयन | महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने के कारण इसके लागू होने में दशकों की देरी हो सकती है, जिससे महिलाओं के राजनीतिक अधिकार प्रभावित होंगे। |
| संघीय संतुलन | परिसीमन से दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है, जिससे केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ सकता है और संघवाद की भावना प्रभावित हो सकती है। |
| संवैधानिक संशोधन की जटिलता | लोकसभा सीटों को स्थिर करने या महिला आरक्षण को अलग करने के लिए आवश्यक संवैधानिक संशोधनों को पारित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। |
आगे की राह
- परिसीमन के संबंध में राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए एक राष्ट्रीय सहमति विकसित की जानी चाहिए।
- जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के हितों की रक्षा के लिए वैकल्पिक तंत्रों पर विचार किया जाना चाहिए, जैसे कि राज्यसभा में प्रतिनिधित्व बढ़ाना।
- महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग करने के लिए संवैधानिक संशोधन पर विचार किया जाना चाहिए ताकि इसका त्वरित कार्यान्वयन सुनिश्चित हो सके।
- महिला आरक्षण के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध रोडमैप तैयार किया जाना चाहिए, जिसमें 2029 के लोकसभा चुनावों तक इसे लागू करने का लक्ष्य हो।
- परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) को एक निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी चाहिए जो सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखे।
- संसद को परिसीमन के सिद्धांतों पर व्यापक बहस करनी चाहिए, जिसमें जनसंख्या, भौगोलिक क्षेत्र और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व जैसे कारकों पर विचार किया जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
परिसीमन · लोकसभा सीटें · जनसंख्या अनुपात · महिला आरक्षण · 106वाँ संविधान संशोधन अधिनियम · संघवाद · समान प्रतिनिधित्व · संवैधानिक प्रावधान · राजनीतिक प्रतिनिधित्व · अंतर-राज्यीय वितरण · जनगणना · विधायी प्रक्रिया
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 82: लोकसभा सीटों का परिसीमन
- अनुच्छेद 170: विधानसभा सीटों का परिसीमन
- अनुच्छेद 330: लोकसभा में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण
- अनुच्छेद 332: विधानसभाओं में SC/ST के लिए सीटों का आरक्षण
- अनुच्छेद 334: आरक्षण की अवधि
अवधारणा प्रवाह
तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पारित किया। → यह प्रस्ताव परिसीमन और जनसंख्या-आधारित प्रतिनिधित्व के मुद्दों को उठाता है। → जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को प्रतिनिधित्व खोने का डर है। → महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने पर इसके कार्यान्वयन में देरी हो रही है। → यह संघवाद और महिलाओं के राजनीतिक सशक्तिकरण पर बहस को तेज करता है।
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. परिसीमन (Delimitation) का मुख्य उद्देश्य जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना है।
2. भारत में परिसीमन आयोग एक संवैधानिक निकाय है।
3. 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को वर्ष 2026 तक के लिए स्थिर कर दिया था।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है। परिसीमन का उद्देश्य जनसंख्या में परिवर्तन के कारण निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को समायोजित करना है ताकि सभी नागरिकों को समान प्रतिनिधित्व मिल सके। कथन 2 सही है। परिसीमन आयोग का गठन संसद के एक अधिनियम द्वारा किया जाता है, लेकिन इसके आदेशों को कानून का बल प्राप्त होता है और इन्हें किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती, जो इसकी संवैधानिक प्रकृति को दर्शाता है। कथन 3 सही है। 84वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2001 ने अनुच्छेद 82 और 170 में संशोधन करके लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सीटों की संख्या को वर्ष 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक के लिए स्थिर कर दिया था।
Q2. अभिकथन (A): तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटों की संख्या को वर्तमान 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पारित किया है।
कारण (R): यह प्रस्ताव महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को मौजूदा सीटों के आधार पर तुरंत लागू करने की मांग करता है, जिसे जनगणना और परिसीमन से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।
- A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है।
- A और R दोनों सत्य हैं, लेकिन R, A की सही व्याख्या नहीं है।
- A सत्य है, लेकिन R असत्य है।
- A असत्य है, लेकिन R सत्य है।
उत्तर: A और R दोनों सत्य हैं, और R, A की सही व्याख्या है। — अभिकथन (A) सही है, जैसा कि समाचार में बताया गया है कि तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव अपनाया है। कारण (R) भी सही है और यह तमिलनाडु के प्रस्ताव के पीछे के प्रमुख तर्कों में से एक है। प्रस्ताव में महिला आरक्षण को परिसीमन और जनगणना से अलग करने की मांग की गई है ताकि इसे 2029 के लोकसभा चुनावों में लागू किया जा सके। इस प्रकार, कारण (R) अभिकथन (A) के पीछे के एक महत्वपूर्ण पहलू की व्याख्या करता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ परिसीमन की प्रक्रिया और इसके संवैधानिक आधारों की व्याख्या कीजिए। तमिलनाडु विधानसभा के हालिया प्रस्ताव के आलोक में, लोकसभा सीटों के भविष्य के निर्धारण से जुड़े अंतर-राज्यीय प्रतिनिधित्व और संघवाद के मुद्दों का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** परिसीमन की संक्षिप्त परिभाषा और इसका उद्देश्य (समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना) बताएं।
2. **परिसीमन की प्रक्रिया:**
* अनुच्छेद 82 (संसद द्वारा) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं द्वारा) के तहत परिसीमन का प्रावधान।
* परिसीमन आयोग का गठन (संसद के अधिनियम द्वारा)।
* आयोग की संरचना (सेवानिवृत्त सर्वोच्च न्यायालय न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त, संबंधित राज्य चुनाव आयुक्त)।
* आयोग के कार्य (जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण, अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए सीटों का आरक्षण)।
* आयोग के आदेशों की अंतिम प्रकृति (न्यायालय में चुनौती नहीं)।
3. **संवैधानिक आधार:**
* अनुच्छेद 81 (लोकसभा की संरचना) और अनुच्छेद 170 (राज्य विधानसभाओं की संरचना) में जनसंख्या के आधार पर सीटों के आवंटन का सिद्धांत।
* 84वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 2001: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों को 2026 के बाद पहली जनगणना तक के लिए स्थिर करना। इसका कारण जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित न करना था।
4. **तमिलनाडु के प्रस्ताव का विश्लेषण:**
* **मुख्य मांगें:** लोकसभा सीटों को 543 पर स्थिर रखना और अंतर-राज्यीय वितरण के वर्तमान अनुपात को बनाए रखना। महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से अलग कर तुरंत लागू करना।
* **आधार:** जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों (जैसे तमिलनाडु) को भविष्य के परिसीमन में कम सीटें मिलने की आशंका, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। यह संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ है जहां राज्यों को उनकी जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व मिलता है।
* **महिला आरक्षण से जुड़ाव:** 106वें संविधान संशोधन अधिनियम (नारी शक्ति वंदन अधिनियम) के प्रावधानों को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने में देरी पर चिंता।
5. **अंतर-राज्यीय प्रतिनिधित्व और संघवाद के मुद्दे:**
* **जनसंख्या बनाम प्रतिनिधित्व:** जनसंख्या वृद्धि दर में अंतर के कारण दक्षिणी राज्यों (कम वृद्धि) और उत्तरी राज्यों (अधिक वृद्धि) के बीच सीटों के पुनर्वितरण का संभावित प्रभाव।
* **संघवाद पर प्रभाव:** यदि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों की सीटें कम होती हैं, तो यह उन्हें ‘दंडित’ करने जैसा होगा और संघीय संतुलन को बिगाड़ सकता है। इससे राज्यों के बीच अविश्वास और असंतोष बढ़ सकता है।
* **समानता का सिद्धांत:** ‘एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य’ के सिद्धांत को बनाए रखने की चुनौती बनाम जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को पुरस्कृत करना।
* **राजनीतिक निहितार्थ:** भविष्य के परिसीमन से राजनीतिक शक्ति के संतुलन में संभावित बदलाव।
6. **निष्कर्ष:** परिसीमन की आवश्यकता और संघवाद के सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती। एक ऐसे समाधान की आवश्यकता जो जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व के संवैधानिक सिद्धांत का सम्मान करे और साथ ही जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों की चिंताओं को भी संबोधित करे। महिला आरक्षण को शीघ्र लागू करने की आवश्यकता पर बल।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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