21 Jul पीएलआई योजनाओं से 2.40 लाख करोड़ निवेश और 14.15 लाख रोजगार सृजन: जानिए पूरा विवरण
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — अर्थव्यवस्था: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाना, संवृद्धि, विकास तथा रोज़गार। सरकारी बजट के मुख्य घटक। | GS Paper III — निवेश मॉडल।
- Prelims: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ, DPIIT, विनिर्माण क्षेत्र, निर्यात प्रोत्साहन, आत्मनिर्भर भारत, वैश्विक मूल्य श्रृंखलाएँ
- Essay: आत्मनिर्भर भारत के निर्माण में विनिर्माण क्षेत्र की भूमिका, आर्थिक विकास और रोजगार सृजन में सरकारी योजनाओं का प्रभाव
त्वरित पुनरावृत्ति: उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ भारत में विनिर्माण को बढ़ावा देने, निवेश आकर्षित करने और रोजगार सृजित करने के लिए सरकार की एक प्रमुख पहल हैं, जो ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
हाल ही में, वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय ने जानकारी दी कि उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाओं ने 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश आकर्षित किया है और 14.15 लाख से अधिक (प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष) रोजगार सृजित किए हैं। इन योजनाओं के माध्यम से 15.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात भी हुआ है, जो विभिन्न प्रमुख क्षेत्रों में भारत की विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत कर रहा है और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) के साथ भारत के एकीकरण को दर्शाता है।
पृष्ठभूमि
- सरकार ने भारत की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने, निवेश आकर्षित करने, निर्यात बढ़ाने, रोजगार सृजित करने और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार लाने के उद्देश्य से 14 प्रमुख क्षेत्रों के लिए PLI योजनाएँ शुरू की हैं।
- इन योजनाओं के लिए कुल 1.91 लाख करोड़ रुपये का स्वीकृत वित्तीय परिव्यय निर्धारित किया गया है।
- उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) PLI योजनाओं के समग्र समन्वय और निगरानी के लिए नोडल विभाग के रूप में कार्य करता है।
- संबंधित प्रशासनिक मंत्रालय/विभाग अपनी-अपनी योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार हैं।
उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ क्या हैं?
- उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन (Production-Linked Incentive – PLI) योजनाएँ भारत सरकार द्वारा शुरू की गई एक पहल हैं, जिसका उद्देश्य घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देना और आयात पर निर्भरता को कम करना है।
- इन योजनाओं के तहत, पात्र कंपनियों को भारत में निर्मित उत्पादों की वृद्धिशील बिक्री पर प्रोत्साहन (incentive) प्रदान किया जाता है।
- योजना का मुख्य लक्ष्य भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी को आकर्षित करना और रोजगार के अवसर पैदा करना है।
- यह योजना विभिन्न क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ भारत में विनिर्माण क्षमता बढ़ाने की अपार संभावनाएँ हैं।
- PLI योजनाएँ ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जिसका उद्देश्य देश को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है।
- इन योजनाओं से न केवल उत्पादन में वृद्धि हुई है, बल्कि निर्यात में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे भारत वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक एकीकृत हो रहा है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| 14 प्रमुख सेक्टरों में लागू | भारत के विविध विनिर्माण आधार को मजबूत करना और विशिष्ट क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ाना। |
| 1.91 लाख करोड़ रुपये का वित्तीय परिव्यय | योजनाओं के लिए सरकार की प्रतिबद्धता और बड़े पैमाने पर निवेश को आकर्षित करने की क्षमता को दर्शाता है। |
| 2.40 लाख करोड़ रुपये से अधिक का वास्तविक निवेश | लक्ष्य से अधिक निवेश आकर्षित करने में योजना की सफलता, आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना। |
| 14.15 लाख से अधिक रोजगार सृजन | प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के माध्यम से आजीविका के अवसरों में वृद्धि और बेरोजगारी दर में कमी। |
| 15.2 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात | वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में भारत के एकीकरण और निर्यात-आधारित विकास को बढ़ावा देना। |
| मोबाइल फोन उत्पादन में 2.4 गुना वृद्धि | इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और आयात पर निर्भरता में कमी। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- विनिर्माण क्षेत्र में निवेश को बढ़ावा मिला है, जिससे आर्थिक संवृद्धि (Economic Growth) को गति मिली है।
- नए रोजगारों का सृजन हुआ है, जिससे लोगों की आय में वृद्धि हुई है और गरीबी कम करने में मदद मिली है।
- निर्यात में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे व्यापार घाटे (Trade Deficit) को कम करने और विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) को बढ़ाने में सहायता मिली है।
- आयात पर निर्भरता कम हुई है, विशेषकर मोबाइल फोन और फार्मास्युटिकल उत्पादों में, जिससे देश की आर्थिक संप्रभुता मजबूत हुई है।
सामरिक महत्व
- प्रमुख क्षेत्रों जैसे फार्मास्युटिकल्स और चिकित्सा उपकरणों में घरेलू विनिर्माण क्षमताओं को मजबूत किया गया है, जिससे स्वास्थ्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई है।
- दूरसंचार और नेटवर्किंग उत्पादों में स्वदेशी 4G और 5G प्रौद्योगिकी के विकास ने डिजिटल संप्रभुता को बढ़ावा दिया है।
- वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (Global Value Chains) में भारत का एकीकरण बढ़ा है, जिससे देश की भू-राजनीतिक स्थिति मजबूत हुई है।
सामाजिक महत्व
- रोजगार सृजन से आय असमानता (Income Inequality) को कम करने और जीवन स्तर में सुधार लाने में मदद मिली है।
- कुशल कार्यबल (Skilled Workforce) के विकास को प्रोत्साहन मिला है, जिससे मानव पूंजी (Human Capital) का निर्माण हुआ है।
- ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में भी आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिला है, जिससे क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने में सहायता मिली है।
चुनौतियाँ
1. योजनाओं का प्रभावी कार्यान्वयन
- योजनाओं के कार्यान्वयन में विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के बीच समन्वय की कमी।
- छोटे और मध्यम उद्यमों (MSMEs) के लिए योजनाओं तक पहुंच और लाभ प्राप्त करने में चुनौतियाँ।
यूपीएससी लिंक: शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही
2. अनुसंधान और विकास (R&D) में निवेश की कमी
- दीर्घकालिक नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता के लिए पर्याप्त अनुसंधान और विकास निवेश का अभाव।
- उच्च-तकनीकी क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता के लिए निरंतर नवाचार की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ
3. पर्यावरणीय स्थिरता
- विनिर्माण गतिविधियों में वृद्धि से उत्पन्न होने वाली पर्यावरणीय चुनौतियों, जैसे प्रदूषण और संसाधन क्षरण।
- हरित विनिर्माण (Green Manufacturing) प्रथाओं को अपनाने की धीमी गति।
यूपीएससी लिंक: पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण
4. वैश्विक प्रतिस्पर्धा
- अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में अन्य देशों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में भारतीय उत्पादों की चुनौतियाँ।
- तकनीकी उन्नयन और गुणवत्ता मानकों को बनाए रखने की आवश्यकता।
यूपीएससी लिंक: उदारीकरण का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| योजनाओं का जटिल ढाँचा | छोटे खिलाड़ियों के लिए आवेदन प्रक्रिया और अनुपालन में कठिनाई। |
| कौशल विकास की आवश्यकता | बढ़ती विनिर्माण क्षमताओं के लिए आवश्यक कुशल कार्यबल की उपलब्धता सुनिश्चित करना। |
| भूमि अधिग्रहण और नियामक बाधाएँ | नई विनिर्माण इकाइयों की स्थापना में आने वाली प्रशासनिक और कानूनी अड़चनें। |
| तकनीकी उन्नयन की धीमी गति | वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादों के उत्पादन के लिए नवीनतम तकनीकों को अपनाने में देरी। |
| वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भरता | कुछ महत्वपूर्ण इनपुट और घटकों के लिए अभी भी आयात पर निर्भरता। |
सरकारी पहल — प्रीलिम्स हेतु अवश्य याद रखें
- उत्पादन-संबंधित प्रोत्साहन (Production-Linked Incentive – PLI) योजनाएँ
आगे की राह
- PLI योजनाओं के तहत आवेदन और अनुपालन प्रक्रियाओं को सरल बनाना, विशेषकर MSMEs के लिए।
- अनुसंधान और विकास (R&D) में सार्वजनिक और निजी निवेश को बढ़ावा देना ताकि नवाचार और तकनीकी उन्नयन को गति मिल सके।
- विनिर्माण क्षेत्र की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना और उद्योग-अकादमिक सहयोग बढ़ाना।
- पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए हरित विनिर्माण प्रथाओं को प्रोत्साहित करना और प्रदूषण नियंत्रण उपायों को कड़ाई से लागू करना।
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा में सुधार के लिए भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता और मानकों को उन्नत करना।
- योजनाओं के कार्यान्वयन की नियमित समीक्षा करना और हितधारकों की प्रतिक्रिया के आधार पर आवश्यक संशोधन करना।
- निर्यात को और बढ़ावा देने के लिए नए बाजारों की पहचान करना और व्यापार समझौतों को मजबूत करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
उत्पादन-संबंधित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएँ · विनिर्माण क्षमता · आत्मनिर्भर भारत · रोजगार सृजन · निर्यात प्रोत्साहन · घरेलू मूल्य संवर्धन · वैश्विक मूल्य श्रृंखला · आयात प्रतिस्थापन · औद्योगिक विकास · आर्थिक संवृद्धि
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘अनुच्छेद 38’: ‘राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि का प्रयास करेगा’}
- {‘अनुच्छेद 39’: ‘राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति सिद्धांत’}
- {‘अनुच्छेद 43’: ‘कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी आदि’}
अवधारणा प्रवाह
सरकार द्वारा PLI योजनाओं की शुरुआत → निवेश आकर्षित करना और विनिर्माण को बढ़ावा देना → उत्पादन में वृद्धि और रोजगार सृजन → निर्यात में वृद्धि और आयात में कमी → आर्थिक संवृद्धि और आत्मनिर्भरता की ओर
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. उत्पादन-संबंधित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पीएलआई योजनाएँ भारत में विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने और निवेश आकर्षित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थीं।
2. उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग (DPIIT) पीएलआई योजनाओं के समग्र समन्वय और निगरानी के लिए नोडल विभाग है।
3. इन योजनाओं के तहत मोबाइल फोन के आयात में लगभग 77 प्रतिशत की कमी आई है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: सभी तीन — कथन 1 सही है क्योंकि पीएलआई योजनाओं का मुख्य उद्देश्य भारत की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाना और निवेश आकर्षित करना है। कथन 2 भी सही है क्योंकि DPIIT पीएलआई योजनाओं के समग्र समन्वय और निगरानी के लिए नोडल विभाग के रूप में कार्य करता है। कथन 3 भी सही है क्योंकि पीएलआई योजनाओं के कारण मोबाइल फोन के आयात में लगभग 77 प्रतिशत की कमी आई है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा/से क्षेत्र पीएलआई योजनाओं के तहत लाभान्वित हुआ/हुए है/हैं?
1. इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण
2. फार्मास्युटिकल सेक्टर
3. चिकित्सा उपकरण निर्माण
4. दूरसंचार और नेटवर्किंग उत्पाद
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1 और 2
- केवल 2, 3 और 4
- केवल 1, 3 और 4
- 1, 2, 3 और 4
उत्तर: 1, 2, 3 और 4 — पीएलआई योजनाएँ 14 प्रमुख सेक्टरों के लिए शुरू की गई हैं, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण, फार्मास्युटिकल सेक्टर, चिकित्सा उपकरण निर्माण और दूरसंचार एवं नेटवर्किंग उत्पाद शामिल हैं। इन सभी सेक्टरों ने पीएलआई योजनाओं के तहत महत्वपूर्ण लाभ दर्ज किए हैं।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ उत्पादन-संबंधित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाएँ भारत की विनिर्माण क्षमताओं को बढ़ाने और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में इसके एकीकरण को मजबूत करने में कितनी सफल रही हैं? आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (250 शब्द)
रूपरेखा: प्रश्न पीएलआई योजनाओं की सफलता का आलोचनात्मक परीक्षण करने के लिए कहता है। उत्तर की शुरुआत पीएलआई योजनाओं के उद्देश्यों को संक्षेप में बताते हुए करें। फिर, निवेश आकर्षित करने, रोजगार सृजित करने, निर्यात बढ़ाने और प्रमुख सेक्टरों में घरेलू विनिर्माण को मजबूत करने जैसे विभिन्न मापदंडों पर उनकी सफलताओं का विस्तार से वर्णन करें। मोबाइल फोन उत्पादन में वृद्धि, फार्मास्युटिकल उत्पादों के घरेलू उत्पादन और आयात निर्भरता में कमी जैसे विशिष्ट उदाहरणों का उल्लेख करें। आलोचनात्मक भाग में, योजनाओं के कार्यान्वयन में आने वाली चुनौतियों, जैसे कि कुछ सेक्टरों में अपेक्षित परिणाम न मिलना या कुछ उद्योगों पर अत्यधिक निर्भरता, पर चर्चा की जा सकती है। अंत में, भारत के आर्थिक विकास और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में पीएलआई योजनाओं के समग्र महत्व पर एक संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
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