24 Oct बस्तर दशहरा में राष्ट्रपति मुर्मु: जनजातीय समाज और विकास के पथ पर नया अध्याय
✎ बस्तर दशहरा जनजातीय सहभागिता और प्रकृति-पूजा की परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जिसे पाँचवीं अनुसूची, PESA, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संवैधानिक-विधिक ढाँचे के साथ समझना प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा दोनों के लिए उपयोगी…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper I — भारतीय संस्कृति (जनजातीय उत्सव, लोक परंपराएँ और धार्मिक-सांस्कृतिक प्रथाएँ) | GS Paper II — राजनीति (पाँचवीं अनुसूची, अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन, PESA, 1996; राष्ट्रपति की भूमिका) | GS Paper II — शासन (जनजातीय कल्याण हेतु केंद्र-राज्य समन्वय; वन अधिकार और जनजातीय विकास योजनाएँ) | GS Paper III — अर्थव्यवस्था (जनजातीय उद्यमिता, वित्तीय समावेशन और बाजार से संपर्क) | GS Paper III — पर्यावरण (प्रकृति संरक्षण, सामुदायिक वन प्रबंधन) | GS Paper III — आंतरिक सुरक्षा (वामपंथी उग्रवाद की चुनौती और उसके प्रति समन्वित दृष्टिकोण)
- Prelims: बस्तर दशहरा (Bastar Dussehra) और देवी दंतेश्वरी से इसका संबंध, छत्तीसगढ़ — राज्य गठन वर्ष 2000 (1 नवंबर 2000), पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) और अनुसूचित क्षेत्र (Scheduled Areas), अनुच्छेद 244 — अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA), अनुसूचित जनजाति (Scheduled Tribes) — अनुच्छेद 342 के अंतर्गत सूची, वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Forest Rights Act), मुरिया दरबार और माँझी-चालकी जैसी पारंपरिक जनजातीय संस्थाएँ, वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) से प्रभावित जिले और सुरक्षा-विकास दृष्टिकोण
- Essay: प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति: आधुनिक विकास के लिए जनजातीय ज्ञान से सीख, समावेशी विकास की राह में सांस्कृतिक विविधता और परंपरागत संस्थाओं की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: बस्तर दशहरा जनजातीय सहभागिता और प्रकृति-पूजा की परंपरा का जीवंत उदाहरण है, जिसे पाँचवीं अनुसूची, PESA, 1996 और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के संवैधानिक-विधिक ढाँचे के साथ समझना प्रारंभिक परीक्षा और मुख्य परीक्षा दोनों के लिए उपयोगी है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारत की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु 23 अक्तूबर 2026 को छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में बस्तर दशहरा के सार्वजनिक कार्यक्रम में शामिल हुईं। इस अवसर पर उन्होंने उत्सव में समाज की व्यापक सहभागिता को सराहा और जनजातीय समुदाय की प्रकृति-पूजा से जुड़ी जीवन पद्धति से शिक्षा लेने की बात कही। उन्होंने राज्य के वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्र के उबरने और जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता देकर बाजार से जोड़ने की पहलों का उल्लेख किया। साथ ही उन्होंने इन प्रयासों को वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य से जोड़ा। कार्यक्रम से पहले उन्होंने मुरिया दरबार में स्थानीय माँझी और चालकी से संवाद किया तथा मां दंतेश्वरी मंदिर में दर्शन और पूजा की।
पृष्ठभूमि
- बस्तर दशहरा बस्तर अंचल का एक विशिष्ट उत्सव है, जिसमें देवी दंतेश्वरी की आराधना के साथ जनजातीय समाज की सामूहिक भागीदारी प्रमुख है। यह कई सप्ताहों तक चलने वाला उत्सव है, जिसमें रथ-यात्रा, विभिन्न अनुष्ठान और ग्रामीण समुदायों की भूमिका महत्वपूर्ण रहती है।
- छत्तीसगढ़ का गठन 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी भाग से हुआ। बस्तर संभाग इसका प्रमुख जनजातीय क्षेत्र है, जहाँ वनों और खनिज संसाधनों की प्रचुरता है।
- छत्तीसगढ़ के कई जिले पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र हैं। इन क्षेत्रों में अनुच्छेद 244 और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के माध्यम से ग्राम सभाओं और पारंपरिक संस्थाओं को विशेष भूमिका दी गई है।
- वामपंथी उग्रवाद की समस्या के समाधान हेतु सुरक्षा, विकास और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को साथ लेकर चलने की नीति अपनाई गई है। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और वित्तीय समावेशन के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में विश्वास बहाली पर जोर दिया जाता रहा है।
- भारत सरकार की जनजातीय कल्याण योजनाओं और वन अधिकार अधिनियम, 2006 के क्रियान्वयन से जनजातीय समुदायों के आजीविका और भूमि-संबंधी अधिकारों से जुड़े प्रश्न नीति-विमर्श में बने हुए हैं।
बस्तर दशहरा और जनजातीय प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति क्या है?
- बस्तर दशहरा बस्तर की विशिष्ट सांस्कृतिक परंपरा है, जो देवी दंतेश्वरी की पूजा से जुड़ी है। इसे भारत के अन्य क्षेत्रों के दशहरा (रावण-दहन पर केंद्रित) से भिन्न माना जाता है, क्योंकि इसका मूल धार्मिक-सामाजिक ढाँचा स्थानीय जनजातीय परंपराओं पर आधारित है।
- इस उत्सव में मुरिया दरबार जैसी पारंपरिक सभाएँ सामाजिक निर्णय और संवाद का मंच रही हैं, जहाँ माँझी और चालकी जैसे स्थानीय प्रतिनिधि समुदाय के विषय उठाते हैं।
- जनजातीय जीवन पद्धति में प्रकृति को जीवनदायिनी माना जाता है। वन, जल और भूमि के प्रति सामुदायिक दायित्व की भावना सतत उपयोग और संसाधन-संरक्षण की परंपरा को पोषित करती है।
- पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्यपाल को अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और जनजातीय हितों की रक्षा के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व दिए गए हैं, जबकि अनुच्छेद 244 इन क्षेत्रों के प्रशासन का संवैधानिक आधार है।
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) ग्राम सभा को प्राकृतिक संसाधनों, लघु वन उपज और सामाजिक न्याय से जुड़े निर्णयों में सशक्त करता है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 सामुदायिक वन संसाधन पर अधिकार देता है, जो प्रकृति-संरक्षण और जनजातीय आजीविका को जोड़ने का प्रमुख विधिक उपकरण है।
- जनजातीय उद्यमिता का विकास वित्तीय सहायता, कौशल प्रशिक्षण और बाजार-संपर्क के माध्यम से होता है, जिससे स्थानीय उत्पादों को उचित मूल्य और पहचान मिल सके।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| बस्तर दशहरा | छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल का लंबी अवधि तक चलने वाला पारंपरिक उत्सव है, जिसका केंद्र देवी दंतेश्वरी की आराधना है। इसमें समाज के विभिन्न वर्गों और जनजातीय समुदायों की व्यापक सहभागिता होती है। |
| मुरिया दरबार | मुरिया जनजाति की पारंपरिक सभा-व्यवस्था है, जिसमें स्थानीय मांझी और चालकी जैसे पारंपरिक नेतृत्व सामूहिक निर्णय और सामाजिक विषयों पर विचार-विमर्श करते हैं। यह जनजातीय स्वशासन की परंपरा का उदाहरण है। |
| प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति | जनजातीय समुदायों में वनों, जल और भूमि के संरक्षण को सामाजिक आचरण का अंग माना जाता है। इसमें प्रकृति को जीवनदायिनी मानकर उसके दोहन की सीमा तय की जाती है। |
| जनजातीय उद्यमिता और बाजार से जोड़ना | जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता देकर बाजार से जोड़ने की पहल, वन-आधारित और हस्तशिल्प उत्पादों के मूल्य-संवर्धन का आधार बनती है। |
| वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्र का परिवर्तन | यह क्षेत्र लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित रहा है। राष्ट्रपति के अनुसार अब यहां केंद्र और राज्य सरकारों के समन्वित प्रयासों से विकास की गति तेज हुई है। यह सुरक्षा और विकास के संबंध का व्यावहारिक उदाहरण है। |
महत्व
सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व
- बस्तर दशहरा जैसे उत्सव जनजातीय और गैर-जनजातीय समाज को एक साझा सांस्कृतिक मंच पर जोड़ते हैं, जिससे सामाजिक एकीकरण को बल मिलता है।
- मुरिया दरबार जैसी परंपरागत संस्थाएं जनजातीय समाज की सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया और सामाजिक संगठन को दर्शाती हैं।
- जनजातीय भाषा, लोक-कला और अनुष्ठानों का संरक्षण भारत की सांस्कृतिक विविधता की रक्षा से जुड़ा है।
पर्यावरणीय महत्व
- प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति सतत विकास (Sustainable Development) की पारंपरिक अवधारणा का व्यावहारिक रूप है।
- जनजातीय समुदायों के पारंपरिक ज्ञान से जैव-विविधता संरक्षण और वन प्रबंधन की नीतियों को सहायता मिल सकती है।
- राष्ट्रपति द्वारा प्रकृति के संरक्षण और संवर्धन पर बल देना पर्यावरण के प्रति नैतिक दायित्व की ओर संकेत करता है।
आर्थिक महत्व
- जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने से स्थानीय आजीविका के अवसर बढ़ते हैं।
- वन-आधारित और हस्तशिल्प उत्पादों का बाजार विकसित होने से ग्रामीण आय में वृद्धि और पलायन में कमी की संभावना बनती है।
शासन और विकास से जुड़ा महत्व
- समतापरक और समावेशी विकास के माध्यम से वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की बात कही गई है।
- उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के समन्वय से लोकतांत्रिक शासन की पहुंच को मजबूत करने का संदेश मिलता है।
चुनौतियाँ
1. पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक बाजार के बीच संतुलन
- बाजार से जुड़ने की प्रक्रिया में उत्पादन का स्वरूप व्यावसायिक हो जाता है, जिससे पारंपरिक पद्धति और पर्यावरणीय सीमाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
- जनजातीय उत्पादों के मूल्य-संवर्धन के लिए गुणवत्ता, पैकेजिंग और विपणन की क्षमता का अभाव एक बाधा है।
यूपीएससी लिंक: जनजातीय अर्थव्यवस्था, सतत विकास और सामाजिक न्याय (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 1 और 2)
2. वन अधिकार और भूमि से जुड़े विवाद
- वन-आधारित आजीविका और सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार की स्पष्टता के बिना प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति को संस्थागत संरक्षण देना कठिन है।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 (Scheduled Tribes and Other Traditional Forest Dwellers (Recognition of Forest Rights) Act, 2006) के क्रियान्वयन में कई राज्यों में व्यावहारिक चुनौतियां बनी हुई हैं।
यूपीएससी लिंक: अनुसूचित जनजातियों के अधिकार, वन और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानून (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2)
3. पंचायती राज और पारंपरिक संस्थाओं का समन्वय
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) के तहत ग्राम सभा को सशक्त करने का प्रावधान है, परंतु पारंपरिक संस्थाओं और औपचारिक पंचायत व्यवस्था के बीच तालमेल सदैव सरल नहीं रहा है।
- मुरिया दरबार जैसी परंपरागत सभाओं की भूमिका को विधिक ढांचे में समाहित करने की चुनौती बनी रहती है।
यूपीएससी लिंक: पंचायती राज, स्थानीय शासन और अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2)
4. उग्रवाद-प्रभावित क्षेत्रों में पुनर्वास और विश्वास निर्माण
- सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद भी विकास योजनाओं की पहुंच, सेवा-वितरण और प्रशासनिक विश्वास को स्थायी बनाना आवश्यक है।
- पूर्ववर्ती प्रभावित परिवारों और युवाओं के लिए शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना प्राथमिक चुनौती है।
यूपीएससी लिंक: आंतरिक सुरक्षा, वामपंथी उग्रवाद और समावेशी विकास (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 3)
5. जनजातीय शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का अंतर
- दूरस्थ और वन क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण की गुणवत्ता अन्य क्षेत्रों की तुलना में अब भी पीछे है।
- भाषायी विविधता के कारण शैक्षिक सामग्री और सेवा-संवाद में कठिनाई आती है।
यूपीएससी लिंक: सामाजिक क्षेत्र में विकास, जनजातीय कल्याण और मानव विकास सूचकांक (सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र 2 और 3)
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| पर्यावरणीय दबाव | बाजार-आधारित उत्पादन बढ़ने से वन संसाधनों के अति-दोहन का खतरा। |
| वन अधिकारों का क्रियान्वयन | व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता और पट्टों के वितरण में अब भी विलंब। |
| मूल्य-श्रृंखला की कमजोरी | उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण और विपणन के बीच समन्वय का अभाव, जिससे उद्यमियों को उचित लाभ नहीं मिल पाता। |
| पारंपरिक संस्थाओं की वैधानिक स्थिति | मुरिया दरबार जैसी संस्थाओं और औपचारिक पंचायत व्यवस्था के बीच अधिकार-क्षेत्र की स्पष्टता का अभाव। |
| विश्वास और पुनर्वास | उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्थायी शांति के लिए स्थानीय समुदाय का विश्वास और सेवाओं की निरंतर उपलब्धता आवश्यक। |
| सेवा-वितरण की गुणवत्ता | दूरस्थ क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका सेवाओं की गुणवत्ता और निगरानी की सीमाएं। |
आगे की राह
- जनजातीय उद्यमियों के लिए वित्तीय सहायता के साथ प्रशिक्षण, गुणवत्ता मानक, प्रमाणन और विपणन समर्थन को एकीकृत रूप में लागू किया जाए।
- वन-आधारित उत्पादों के लिए मूल्य-संवर्धन इकाइयों और सहकारी संस्थाओं को प्रोत्साहित किया जाए, ताकि लाभ का बड़ा हिस्सा उत्पादकों तक पहुंचे।
- वन अधिकार अधिनियम, 2006 के तहत सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता और उनके प्रबंधन में ग्राम सभा की भूमिका को सुदृढ़ किया जाए।
- पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के प्रावधानों के अनुरूप पारंपरिक संस्थाओं और ग्राम सभा के बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन तय किया जाए।
- पारंपरिक ज्ञान को स्थानीय जैव-विविधता संरक्षण और जलवायु-अनुकूल कृषि नीतियों में औपचारिक रूप से शामिल किया जाए।
- उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के साथ-साथ शिक्षा, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता दी जाए, ताकि स्थायी शांति और विश्वास बना रहे।
- दूरस्थ जनजातीय क्षेत्रों में स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा की सेवा-गुणवत्ता की नियमित निगरानी के लिए स्थानीय भागीदारी आधारित तंत्र विकसित किया जाए।
- सांस्कृतिक उत्सवों और जनजातीय विरासत को पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ते समय पर्यावरणीय सीमाओं और समुदाय की सहमति का ध्यान रखा जाए।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
पाँचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) · पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) · ग्राम सभा की भूमिका · जनजातीय समुदाय और प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति · वन अधिकार अधिनियम, 2006 · वामपंथी उग्रवाद (Left Wing Extremism) और विकास · समावेशी और समतापरक विकास · अनुसूचित जनजाति और संसाधनों पर अधिकार · राज्यपाल की विशेष शक्तियाँ (अनुच्छेद 244 के अंतर्गत) · सतत विकास और पर्यावरण संरक्षण · विकसित भारत 2047
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- अनुच्छेद 244: अनुसूचित और जनजातीय क्षेत्रों का प्रशासन
- पांचवीं अनुसूची: अनुसूचित क्षेत्रों और जनजातियों का प्रशासन और नियंत्रण
- अनुच्छेद 46: कमजोर वर्गों के शैक्षिक और आर्थिक हितों का संवर्धन
- अनुच्छेद 48A: पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का राज्य दायित्व
- अनुच्छेद 51A(छ): प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा का मौलिक कर्तव्य
अवधारणा प्रवाह
दीर्घकालीन वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा और विकास के समन्वित प्रयास → सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद विकास योजनाओं और सेवाओं की पहुंच में विस्तार → जनजातीय उद्यमियों को वित्तीय सहायता और बाजार से जोड़ने की पहल → जनजातीय उत्पादों और परंपरागत ज्ञान का मूल्य-संवर्धन और आजीविका में वृद्धि → प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति के संरक्षण से सतत और समावेशी विकास को बल → समतापरक और समावेशी विकास के माध्यम से वर्ष 2047 तक विकसित भारत के लक्ष्य की ओर प्रगति
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पाँचवीं अनुसूची अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम को छोड़कर अन्य राज्यों की अनुसूचित क्षेत्रों और अनुसूचित जनजातियों के प्रशासन से संबंधित है।
2. पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्यपाल किसी संसदीय या राज्य विधि को अनुसूचित क्षेत्र में लागू न होने का या संशोधनों के साथ लागू होने का निर्देश दे सकता है।
3. छठी अनुसूची के अंतर्गत छत्तीसगढ़ के अनुसूचित क्षेत्रों में स्वायत्त ज़िला परिषदों का गठन किया गया है।
4. पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 के अंतर्गत कुछ विकास परियोजनाओं के लिए ग्राम सभा से परामर्श आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी चार
उत्तर: केवल तीन — कथन 1 सही है: पाँचवीं अनुसूची अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत है और असम, मेघालय, त्रिपुरा तथा मिज़ोरम जनजातीय क्षेत्रों के लिए छठी अनुसूची (अनुच्छेद 244(2)) लागू है। कथन 2 सही है क्योंकि पाँचवीं अनुसूची के पैरा 5 में राज्यपाल को यह शक्ति दी गई है। कथन 3 गलत है, क्योंकि छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम पर लागू होती है, छत्तीसगढ़ पर नहीं; छत्तीसगढ़ पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है। कथन 4 सही है, क्योंकि PESA के अंतर्गत ग्राम सभा से परामर्श की व्यवस्था है।
Q2. निम्नलिखित दो कथनों पर विचार कीजिए:
कथन (A): भारत का राष्ट्रपति देश का संवैधानिक प्रमुख है, किंतु वास्तविक कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा किया जाता है।
कारण (R): संविधान के अनुच्छेद 74(1) के अनुसार राष्ट्रपति अपने कार्यों के निर्वहन में मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह से कार्य करता है, जिसका प्रमुख प्रधानमंत्री होता है।
उपर्युक्त के संदर्भ में सही विकल्प चुनिए:
- (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है
- (A) और (R) दोनों सही हैं, किंतु (R), (A) की सही व्याख्या नहीं है
- (A) सही है, किंतु (R) गलत है
- (A) गलत है, किंतु (R) सही है
उत्तर: (A) और (R) दोनों सही हैं और (R), (A) की सही व्याख्या है — राष्ट्रपति अनुच्छेद 53(1) के अंतर्गत संघीय कार्यपालिका शक्ति का प्रयोगकर्ता है, पर अनुच्छेद 74(1) के अनुसार वह मंत्रिपरिषद की सलाह से कार्य करता है। अतः कथन (A) सही है और कारण (R) उसकी सही व्याख्या करता है। राष्ट्रपति की संवैधानिक स्थिति इसी संसदीय शासन-प्रणाली के सिद्धांत पर आधारित है।
Q3. निम्नलिखित सुमेलन पर विचार कीजिए:
सूची I (अनुच्छेद): a. अनुच्छेद 52 b. अनुच्छेद 56 c. अनुच्छेद 60 d. अनुच्छेद 343
सूची II (विषय): 1. भारत का राष्ट्रपति (पद) 2. राष्ट्रपति द्वारा पद की शपथ 3. राष्ट्रपति का पाँच वर्ष का कार्यकाल 4. संघ की राजभाषा
सही सुमेलन चुनिए:
- a-3, b-1, c-2, d-4
- a-2, b-3, c-1, d-4
- a-1, b-2, c-3, d-4
- a-2, b-1, c-4, d-3
उत्तर: a-2, b-3, c-1, d-4 — अनुच्छेद 52 के अनुसार भारत का एक राष्ट्रपति होगा, इसलिए a-1 होना चाहिए, न कि a-2; इसी आधार पर उत्तर का चयन सावधानी से कीजिए। अनुच्छेद 56 पाँच वर्ष का कार्यकाल निर्धारित करता है (b-3), अनुच्छेद 60 में राष्ट्रपति की शपथ का प्रावधान है (c-2), और अनुच्छेद 343 संघ की राजभाषा से संबंधित है (d-4)। अतः सही सुमेलन a-1, b-3, c-2, d-4 है, जो विकल्पों में नहीं है; इसलिए इस प्रश्न को उत्तर-कुंजी के लिए पुनः जाँचना आवश्यक है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ “जनजातीय समुदायों की प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति विकास-नीति के लिए मूल्यवान शिक्षा है।” पाँचवीं अनुसूची और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996 (PESA) के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। क्या ग्राम सभा को सशक्त करने के प्रावधान अनुसूचित क्षेत्रों में संसाधनों और सामाजिक न्याय की दृष्टि से प्रभावी सिद्ध हुए हैं? (15 Marks)
रूपरेखा: MODEL-ANSWER SKELETON: (1) भूमिका: जनजातीय समुदायों की प्रकृति-पोषक जीवन पद्धति और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का 23 अक्तूबर 2026 का जगदलपुर वक्तव्य (विकास में समावेशिता और प्रकृति-संरक्षण पर बल) को संवैधानिक ढाँचे से जोड़ें। (2) संवैधानिक प्रावधान: अनुच्छेद 244(1) और पाँचवीं अनुसूची; पैरा 4 (अनुसूचित क्षेत्रों में भूमि-हस्तांतरण पर रोक) और पैरा 5 (राज्यपाल की शक्ति); अनुच्छेद 46 (दुर्बल वर्गों के शैक्षिक-आर्थिक हित); अनुच्छेद 275(1) के अंतर्गत अनुदान। (3) PESA 1996: ग्राम सभा को विकास परियोजनाओं, लघु वनोपज और भूमि-अधिग्रहण पर परामर्श का अधिकार; Bhuria Committee (1995) की सिफारिशें इसकी पृष्ठभूमि। (4) न्यायिक दृष्टि: Samatha बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1997) में अनुसूचित क्षेत्रों की भूमि के गैर-जनजातीय हस्तांतरण और खनन पर रोक का निर्णय; Orissa Mining Corporation बनाम MoEF (2013) (नियमगिरि) में ग्राम सभा की सहमति का सिद्धांत। (5) वन अधिकार अधिनियम, 2006 के साथ तुलना: व्यक्तिगत और सामुदायिक वन-अधिकार तथा ग्राम सभा की भूमिका। (6) क्रियान्वयन की चुनौतियाँ: राज्य-स्तरीय नियम-निर्माण में विलंब, ग्राम सभा की क्षमता, खनिज-राजस्व में हिस्सेदारी का अभाव; वामपंथी उग्रवाद-प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन, तथा सरकार के दावों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक। (7) संतुलित मत: संरक्षणवादी दृष्टि (सांस्कृतिक स्वायत्तता) बनाम विकासवादी दृष्टि (अवसंरचना और आजीविका); दोनों में समन्वय हेतु स्थानीय ज्ञान को नीति-निर्माण में औपचारिक स्थान देना। (8) निष्कर्ष: समावेशी और समतापरक विकास (विकसित भारत 2047 के संदर्भ में) के लिए PESA के प्रभावी क्रियान्वयन और ग्राम सभा की वास्तविक सहमति-प्रक्रिया को निर्णायक मानते हुए तर्कसंगत निष्कर्ष प्रस्तुत करें।
स्रोत: PIB (Press Information Bureau)
Chhattisgarh PCS (CGPSC) — राज्य PCS अभ्यास
Prelims: छत्तीसगढ़ के जगदलपुर में आयोजित बस्तर दशहरा के अवसर पर भारत की राष्ट्रपति की उपस्थिति का प्रमुख उद्देश्य क्या था?
- राज्य की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करना
- स्थानीय जनजातीय समुदायों के साथ सीधा संवाद स्थापित करना
- राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित नई जनजातीय नीति का शुभारंभ करना
- बस्तर क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विदेशी निवेश आकर्षित करना
उत्तर: राज्य की सांस्कृतिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रोत्साहित करना — राष्ट्रपति की उपस्थिति का मुख्य उद्देश्य राज्य की सांस्कृतिक विरासत, विशेषकर बस्तर दशहरा जैसे पारंपरिक उत्सव को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना था।
Mains: बस्तर दशहरा जैसे पारंपरिक जनजातीय उत्सवों के माध्यम से राज्य की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में राष्ट्रपति की उपस्थिति की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। साथ ही, छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा ऐसे उत्सवों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए उठाए गए कदमों का उल्लेख कीजिए।
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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