13 Sep भारत की अंतरिक्ष दौड़ : प्रक्षेपण से लेकर निराशा तक
इस लेख में जीएस-3- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी- “प्रक्षेपण से निराशा तक: भारत की अंतरिक्ष दौड़ अब तक की सबसे कठिन परीक्षा का सामना कर रही है”
पाठ्यक्रम :
जीएस-3- विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी– भारत की अंतरिक्ष दौड़ : प्रक्षेपण से लेकर निराशा तक अब तक की सबसे कठिन परीक्षा का सामना कर रही है।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के सामने प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं और सरकार ने उनसे निपटने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
मुख्य परीक्षा के लिए
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में प्रमुख तकनीकी और मानव संसाधन चुनौतियाँ क्या हैं और उनका समाधान कैसे किया जा सकता है?
समाचार में क्यों?
- इसरो प्रमुख वी. नारायणन ने हाल ही में कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सभी भारतीय उपग्रहों ने चौबीसों घंटे कार्य किया, मिशन की आवश्यकताओं को सफलतापूर्वक पूरा किया
- भारत की उन्नत अंतरिक्ष क्षमताओं को प्रदर्शित किया।
- नई दिल्ली में आयोजित एक रक्षा एवं प्रौद्योगिकी कार्यक्रम में उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि इसरो:
भारत की तकनीकी बढ़त को मजबूत करना, - स्थानीयकरण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को बढ़ावा देना,
अंतरिक्ष उद्यमिता को सक्षम बनाना, - भारत को वैश्विक अंतरिक्ष नेता के रूप में स्थापित करना।
प्रमुख क्षेत्रों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग
| कार्यक्षेत्र | अनुप्रयोग और प्रमुख योजनाएँ |
|---|---|
| 1. अर्थव्यवस्था | – फसल योजना: उपग्रह आधारित फसल पूर्वानुमान से कृषि नियोजन में सुधार। – BHUVAN Platform: भू-स्थानिक डेटा खनन, मत्स्य पालन और अवसंरचना समर्थन। |
| 2. समाज | – ई-विद्या एवं टेलीमेडिसिन: उपग्रह संचार से ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएँ। – SANCHAR Portal: ग्रामीण कनेक्टिविटी हेतु दूरसंचार अवसंरचना की निगरानी। |
| 3. शहरी विकास | – अमृत एवं स्मार्ट सिटी मिशन: जल आपूर्ति, अपशिष्ट प्रबंधन व अवसंरचना की उपग्रह आधारित निगरानी। – GIS आधारित मास्टर प्लानिंग एवं रिमोट सेंसिंग: अवैध अतिक्रमणों का पता लगाना। |
| 4. राजनीतिक क्षेत्र | – मनरेगा जियो-टैगिंग: परिसंपत्ति निर्माण की उपग्रह आधारित ट्रैकिंग से पारदर्शिता। – डिजिटल इंडिया पहल: ई-गवर्नेंस एवं सेवा वितरण में अंतरिक्ष तकनीक का उपयोग। |
| 5. राष्ट्रीय सुरक्षा | – Cartosat उपग्रह: सीमा निगरानी व आतंकवाद-रोधी कार्रवाई हेतु उच्च-रिज़ॉल्यूशन इमेजरी। – Mission Shakti (2019): भारत की उपग्रह-रोधी (A-SAT) क्षमता का प्रदर्शन। |
| 6. आपदा प्रबंधन | – ISRO का Decision Support Centre (DSC): बाढ़, चक्रवात, जंगल की आग आदि की पूर्व चेतावनी हेतु वास्तविक समय उपग्रह डेटा। – Jal Shakti & FloodNET: सूखा, भूजल स्तर व बाढ़ क्षेत्रों की निगरानी। |
अंतरिक्ष क्षेत्र में सरकारी नीति और पहल
| मुख्य पहलू | विवरण |
|---|---|
| 100% एफडीआई की अनुमति | उदारीकृत एफडीआई नीति के तहत स्वचालित एवं सरकारी मार्ग से अंतरिक्ष क्षेत्र में 100% प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति। |
| भारत अंतरिक्ष नीति 2023 | अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था की संपूर्ण मूल्य श्रृंखला में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करके समग्र विकास। |
| स्पेस विजन 2047 | दीर्घकालिक रोडमैप: Bharatiya Antariksh Station (BAS), भविष्य चंद्र मिशन, अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण वाहन, और शुक्र अन्वेषण। |
| केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम | Antrix Corporation (इसरो की वाणिज्यिक शाखा) और New Space India Limited (NSIL) : व्यावसायीकरण और उद्योग सहयोग को बढ़ावा। |
| IN-SPACe | Indian National Space Promotion and Authorization Centre : उपग्रह, प्रक्षेपण वाहन और सेवाओं में निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा देने वाला स्वायत्त निकाय। |
| बढ़ते निवेश | इसरो ने 11 वर्षों में 100 प्रक्षेपण मिशन पूरे किए। अंतरिक्ष बजट ₹5,615 करोड़ (2013-14) से बढ़कर ₹13,416 करोड़ (2025-26)। |
| अंतरिक्ष मलबा प्रायोगिक मिशन (SPADEX) | पृथ्वी की कक्षा में अंतरिक्ष मलबे की निगरानी, प्रबंधन और कमी हेतु नई पहल। |
| स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र विकास | 328 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप, इसरो व वैश्विक साझेदारों के साथ नवाचार और सहयोग को बढ़ावा। |
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में प्रमुख चुनौतियाँ :
| वर्ग | चुनौतियाँ |
|---|---|
| 1. तकनीकी चुनौतियाँ | – पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण वाहन, मानव-रेटेड अंतरिक्ष यान, और जीवन समर्थन प्रणालियों का विकास। – गहरे अंतरिक्ष प्रणोदन, उन्नत रोबोटिक्स और AI-आधारित अंतरिक्ष प्रणालियों में सीमित स्वदेशी क्षमताएँ। |
| 2. बुनियादी ढांचे की सीमाएँ | – बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए अधिक अंतरिक्ष बंदरगाह और उन्नत लॉन्च पैड की आवश्यकता। – गहरे अंतरिक्ष संचार और वास्तविक समय निगरानी हेतु अपर्याप्त ग्राउंड स्टेशन नेटवर्क। |
| 3. निजी क्षेत्र का पारिस्थितिकी तंत्र | – नवजात स्टार्टअप्स की सीमित पूंजी व कुशल प्रतिभा तक पहुंच। – कमजोर उद्योग-अकादमिक सहयोग और अपर्याप्त अनुसंधान एवं विकास वित्तपोषण। |
| 4. नीति और विनियमन | – भारत अंतरिक्ष नीति 2023 के बावजूद देयता मानदंड, बीमा और उपग्रह लाइसेंसिंग में अंतराल। – FDI मंजूरी व निर्यात अनुमोदन में देरी। |
| 5. अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता | – SpaceX, CNSA, Blue Origin आदि से कड़ी प्रतिस्पर्धा (पुन: प्रयोज्य रॉकेट, मेगा तारामंडल, मानव मिशन)। – भारत को लागत-प्रभावशीलता व नवाचार की गति में संतुलन बनाना होगा। |
| 6. स्थिरता और मलबा प्रबंधन | – बढ़ता अंतरिक्ष मलबा परिचालन उपग्रहों व मिशनों के लिए खतरा। – मिशन-उपरांत निपटान और DFSM प्रवर्तन अभी प्रारंभिक अवस्था में। |
| 7. मानव पूंजी | – अंतरिक्ष इंजीनियरिंग, अंतरिक्ष कानून और मिशन संचालन में कुशल पेशेवरों की कमी। – विदेशी एजेंसियों और निजी कंपनियों को प्रतिभा पलायन। |
| 8. मिशन जोखिम और विफलताएँ | – चंद्रयान-2 लैंडर जैसी असफलताओं ने भेद्यता को उजागर किया। – बजट सीमाएँ उच्च जोखिम-उच्च पुरस्कार वाले मिशनों को रोकती हैं। |
| 9. साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष संपत्ति | – उपग्रहों और जमीनी ढांचे पर बढ़ते साइबर खतरे। – मजबूत साइबर सुरक्षा ढांचे और एन्क्रिप्शन मानकों की कमी। |
भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को मजबूत करने के उपाय
| प्रमुख उपाय | मुख्य उप-बिंदु |
|---|---|
| 1. तकनीकी प्रगति | – अगली पीढ़ी के प्रक्षेपण वाहन (NGLV) का विकास, जिसकी क्षमता 30,000 किग्रा LEO तक। – SPADEX की सफलता से उपग्रह डॉकिंग और सर्विसिंग, भविष्य के अंतरिक्ष स्टेशनों के लिए मार्ग प्रशस्त। |
| 2. नीति एवं नियामक सुधार | – भारत अंतरिक्ष नीति 2023: निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहन। – Debris Free Space Mission (DFSM): 2030 तक शून्य मलबा लक्ष्य। |
| 3. संस्थागत समर्थन | – IN-SPACe: निजी अंतरिक्ष उपक्रमों को समर्थन हेतु सिंगल-विंडो एजेंसी। – NSIL: इसरो की प्रौद्योगिकियों और सेवाओं के वैश्विक व्यावसायीकरण को बढ़ावा। |
| 4. निजी क्षेत्र का विकास | – उपग्रह, ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर और घटक खंड में 100% FDI की अनुमति। – 328+ स्टार्टअप्स को वित्तपोषण और नीतिगत प्रोत्साहन द्वारा सहयोग। |
| 5. अंतर्राष्ट्रीय सहयोग | – संयुक्त मिशन: NISAR (NASA), LUPEX (JAXA), TRISHNA (CNES)। – सहयोग: ESA, Starlink, Jio, Airtel के साथ प्रक्षेपण व संचार सेवाओं हेतु। |
| 6. सामरिक एवं नागरिक अनुप्रयोग | – NAVIC: मार्गदर्शन, परिवहन रसद और आपदा प्रबंधन में उपयोग। – GSAT-N2: ग्रामीण इंटरनेट, ई-लर्निंग और डिजिटल गवर्नेंस को बढ़ावा। |
निष्कर्ष:
- भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम नेतृत्व और नवाचार के एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला के मिशन जैसी उपलब्धियाँ देश की बढ़ती क्षमताओं को दर्शाती हैं।
- गगनयान और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन जैसी पहलों के साथ, भारत अंतरिक्ष में निरंतर मानव उपस्थिति की ओर अग्रसर है। मज़बूत नीतिगत समर्थन और निजी क्षेत्र की वृद्धि वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक विकास को बढ़ावा दे रही है।
- भारत अब अंतरिक्ष अन्वेषण के भविष्य को आकार देने वाला एक प्रमुख खिलाड़ी बनने के लिए तैयार है।
प्रारंभिक परीक्षा के प्रश्न:
Q. एक्सिओम मिशन-4 (एक्स-4) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. एक्सिओम मिशन-4, अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आईएसएस) से जुड़ने वाला पहला पूर्णतः निजी मिशन था।
2. ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला मिशन के दौरान अंतरिक्ष में चहलकदमी करने वाले पहले भारतीय नागरिक बने।
3. यह मिशन भारत के गगनयान कार्यक्रम के एक भाग के रूप में इसरो और नासा द्वारा संयुक्त रूप से संचालित किया गया था।
उपरोक्त कथनों में से कितने सही हैं?
(a) केवल एक
(b) केवल दो
(c) तीनों
(d) कोई नहीं
उत्तर: A
मुख्य परीक्षा के प्रश्न:
Q. भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम राज्य-नेतृत्व वाले वैज्ञानिक उद्यम से प्रौद्योगिकी, नीति और निजी क्षेत्र की भागीदारी द्वारा संचालित एक गतिशील पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तित हो रहा है।”भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के सामने आने वाली प्रमुख चुनौतियों और इसे मजबूत करने के लिए उठाए गए उपायों पर चर्चा करें।
(250 शब्द, 15 M)
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