09 Dec भारत में पुलिस सुधार : संस्थागत से सांस्कृतिक बदलाव
भारत में पुलिस सुधार : संस्थागत उत्तरदायित्व एवं सांस्कृतिक रूपांतरण का समन्वय
पाठ्यक्रम – जीएस 2 भारतीय राजनीति और शासन
परिचय :
“पुलिस सुधार उतने ही हद तक संस्थागत उत्तरदायित्व का प्रश्न हैं जितने कि पुलिस बल के भीतर सांस्कृतिक रूपांतरण का।” यह कथन भारतीय पुलिस व्यवस्था की मूलभूत चुनौतियों को उजागर करता है। स्वतंत्र भारत में पुलिस अभी भी औपनिवेशिक विरासत से जकड़ी हुई है, जहाँ वह शासन का उपकरण बनी रही है, न कि नागरिक सेवा का माध्यम। विकसित भारत (Viksit Bharat) के निर्माण के लिए पुलिस को उत्तरदायी, नागरिक-केंद्रित और सेवा-उन्मुख बनाना आवश्यक है। यह कथन दर्शाता है कि सुधार केवल संरचनात्मक (संस्थागत उत्तरदायित्व) नहीं, बल्कि मानसिकता-आधारित (सांस्कृतिक रूपांतरण) भी होने चाहिए। इस विवेचना में हम देखेंगे कि दोनों पहलू परस्पर जुड़े हैं और प्रभावी पुलिसिंग के लिए दोनों का समन्वय अनिवार्य है।
संस्थागत उत्तरदायित्व का आयाम
संस्थागत उत्तरदायित्व से तात्पर्य पुलिस व्यवस्था में पारदर्शिता, स्वायत्तता और जवाबदेही सुनिश्चित करने वाली संरचनाओं से है। भारतीय पुलिस अधिनियम, 1861 जैसी औपनिवेशिक विधियाँ अभी भी प्रभावी हैं, जो पुलिस को राजनीतिक नियंत्रण का शिकार बनाती हैं।
प्रमुख चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं:
राजनीतिक हस्तक्षेप और स्वायत्तता का अभाव: पुलिस में स्थानांतरण और पदोन्नति राजनीतिक इच्छा पर निर्भर होती है, जिससे अधिकारी निष्पक्ष जाँच के बजाय राजनीतिक निष्ठा को प्राथमिकता देते हैं। प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सात निर्देश जारी किए, जैसे राज्य सुरक्षा आयोग का गठन, DGP/SP का दो वर्ष का निश्चित कार्यकाल, और पुलिस स्थापना बोर्ड (PEB) की स्थापना। लेकिन अधिकांश राज्यों में इनका पूर्ण अनुपालन नहीं हुआ। उदाहरणस्वरूप, तमिलनाडु में आर्मस्ट्रांग हत्या मामले में DSP का अचानक तबादला (2024) राजनीतिक दखल का प्रमाण है।
कार्मिक और अवसंरचना की कमी: इंडिया जस्टिस रिपोर्ट-2025 के अनुसार, पुलिस-जनसंख्या अनुपात मात्र 155 प्रति लाख है, जबकि स्वीकृत 197 है। 5.3 लाख से अधिक रिक्तियाँ हैं, जिससे कार्यबल पर अत्यधिक बोझ पड़ता है। बुनियादी सुविधाओं की कमी, जैसे 63 थानों में वाहन का अभाव और 628 में लैंडलाइन फोन की अनुपस्थिति, नए कानूनों (BNSS, 2024) के फोरेंसिक अनिवार्यता को अव्यवहारिक बनाती है।
विधायी और डिजिटल सुधार: भारतीय न्याय संहिता (BNS), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) ने औपनिवेशिक कानूनों को निरस्त कर फोरेंसिक-आधारित जाँच को अनिवार्य किया। CCTNS और ICJS जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पुलिस को एकीकृत किया, लेकिन क्रियान्वयन में कमी है। राष्ट्रीय पुलिस आयोग (1977) और मलिमथ समिति (2003) ने ऐसे सुधार सुझाए, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी से वे अधर में लटके हैं।
ये संस्थागत मुद्दे पुलिस को प्रतिक्रियात्मक बनाते हैं, जो अपराध रोकथाम के बजाय घटना के बाद कार्रवाई पर केंद्रित रहती है। उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने से पुलिस राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर विधि के शासन को मजबूत कर सकती है।
भारत में पुलिस सुधार पर प्रमुख समितियाँ/आयोग कौन से हैं?
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समिति/आयोग/निर्णय |
प्रस्तावित प्रमुख सुधार |
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गोर समिति (1971) |
पेशेवर, सेवा-उन्मुख पुलिस व्यवस्था की ओर बदलाव। प्रशिक्षण में मानवाधिकारों और नैतिकता पर ज़ोर दिया गया । |
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राष्ट्रीय पुलिस आयोग (NPC) (1977-1981) |
जाँच को कानून और व्यवस्था से अलग करना, वरिष्ठ अधिकारियों के लिये निश्चित कार्यकाल सुनिश्चित करना तथा वर्ष 1861 अधिनियम के स्थान पर एक नए मॉडल पुलिस अधिनियम का मसौदा तैयार करना। |
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रिबेरो समिति (1998) और पद्मनाभैया समिति (2000) |
पहले की सिफारिशों को सुदृढ़ किया गया, स्वतंत्र निरीक्षण निकायों, आधुनिक प्रशिक्षण और सामुदायिक पुलिसिंग का समर्थन किया गया। |
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मलिमथ समिति (2003) |
फॉरेंसिक तथा जाँच क्षमताओं को और सुदृढ़ करना, संघीय अपराधों के लिये एक समर्पित केंद्रीय कानून प्रवर्तन एजेंसी की स्थापना करना तथा एक प्रभावी साक्षी संरक्षण योजना प्रस्तावित करना। |
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सर्वोच्च न्यायालय (प्रकाश सिंह निर्णय, 2006) |
7 निर्देश जारी किये गए:
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मॉडल पुलिस अधिनियम (2006) और NHRC सिफारिशें (2021) |
पुलिस स्वायत्तता, जवाबदेही और निगरानी के विनियमन पर ज़ोर देना। |
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स्मार्ट पुलिसिंग पहल (2015) |
पूर्वानुमानित पुलिसिंग के लिये प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और डेटा विश्लेषण का लाभ उठाना। सामुदायिक सहभागिता पर ध्यान केंद्रित करना। |
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पुलिस बलों की आधुनिकीकरण (MPF) योजना |
हथियारों, संचार प्रणालियों, फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं तथा साइबर अपराध से जुड़े बुनियादी ढाँचे का आधुनिकीकरण करना। |
पुलिस बल में सांस्कृतिक रूपांतरण का आयाम :
सांस्कृतिक रूपांतरण से तात्पर्य पुलिस की मानसिकता में बदलाव से है, जहाँ वह दंड-केंद्रित से सेवा-उन्मुख बने। औपनिवेशिक काल से चली आ रही ‘शासक’ की छवि अभी भी बनी हुई है, जो जनता में अविश्वास पैदा करती है। प्रमुख पहलू निम्न हैं:
विषाक्त कार्य संस्कृति और मानसिक स्वास्थ्य: पुलिस में पदानुक्रमिक दबाव, लंबे कार्यघंटे (14 घंटे से अधिक) और छुट्टियों का अभाव तनाव बढ़ाते हैं। कर्नाटक में सब-इंस्पेक्टर की तनाव-जनित मृत्यु (2024) इसका उदाहरण है। स्टेटस ऑफ पुलिसिंग इन इंडिया रिपोर्ट-2025 के अनुसार, 38% पुलिसकर्मी लघु अपराधों में न्यायेतर दंड का समर्थन करते हैं। NHRC के आँकड़ों से पता चलता है कि 2021-22 में हिरासत में 2,300 से अधिक मौतें हुईं, जो थर्ड-डिग्री यातना की संस्कृति दर्शाती है।
लैंगिक असमानता और पितृसत्ता: पुलिस में महिलाओं की भागीदारी मात्र 12.73% है, कर्नाटक में 8.91%। महिलाओं को डेस्क जॉब तक सीमित रखना लैंगिक अपराधों की जाँच को प्रभावित करता है। NLSIU अध्ययन (2024) के अनुसार, 25% आरक्षण के बावजूद यह स्थिति है। सांस्कृतिक बदलाव से विविधता बढ़ेगी और पुलिस समाज का प्रतिबिंब बनेगी।
सेवा-उन्मुख दृष्टिकोण: प्रधानमंत्री की SMART पुलिसिंग संकल्पना (2014) ने संवेदनशीलता, तकनीक-सक्षमता और जवाबदेही पर जोर दिया। केरल की जनमैत्री सुरक्षा परियोजना और तमिलनाडु की फ्रेंड्स ऑफ पुलिस जैसी पहलें समुदाय से जुड़ाव बढ़ाती हैं। AI-आधारित फेस रिकग्निशन और ड्रोन का उपयोग पक्षपात कम करता है, लेकिन प्रशिक्षण की कमी से सांस्कृतिक बदलाव अधूरा रहता है।
सांस्कृतिक रूपांतरण से पुलिस जनता का विश्वास जीत सकती है, लेकिन इसके लिए प्रशिक्षण (मिशन कर्मयोगी) और मानसिक स्वास्थ्य सहायता आवश्यक है।
दोनों आयामों का परस्पर संबंध और विवेचना
कि संस्थागत उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक रूपांतरण एक-दूसरे के पूरक हैं। बिना संस्थागत सुधारों के सांस्कृतिक बदलाव असंभव है, क्योंकि राजनीतिक दखल ईमानदार अधिकारियों को हतोत्साहित करता है। उदाहरणस्वरूप, प्रकाश सिंह निर्णय ने स्वायत्तता सुनिश्चित की, जो सांस्कृतिक रूप से पुलिस को सेवा-केंद्रित बनाती है। वहीं, सांस्कृतिक बदलाव बिना संस्थागत ढाँचे के स्थायी नहीं रह सकता, क्योंकि विषाक्त संस्कृति (जैसे हिरासत हिंसा) उत्तरदायित्व को कमजोर करती है।
समितियाँ जैसे गोर समिति (1971), रिबेरो समिति (1998) और MPF योजना ने दोनों आयामों पर जोर दिया। NIA (2008) जैसी केंद्रीय एजेंसियाँ संस्थागत मजबूती देती हैं, जबकि समुदाय-नेतृत्व वाली पुलिसिंग सांस्कृतिक बदलाव लाती है। यदि केवल संस्थागत सुधार हों, तो सांस्कृतिक जड़ता बनी रहेगी; और केवल सांस्कृतिक प्रयासों से संरचनात्मक कमजोरियाँ दूर नहीं होंगी।
सुझाव
संरचनात्मक पृथक्करण: जाँच और विधि-व्यवस्था को अलग करें, जासूसी कैडर गठित करें।
डिजिटल और फोरेंसिक मजबूती: मोबाइल फोरेंसिक इकाइयाँ और AI-आधारित पूर्वानुमानित पुलिसिंग अपनाएँ।
समुदाय सहभागिता: नागरिक-पुलिस समितियाँ बनाएँ।
कार्मिक सुधार: 8 घंटे शिफ्ट, मनोवैज्ञानिक सहायता और लैंगिक समानता सुनिश्चित करें।
कानूनी अनुपालन: प्रकाश सिंह निर्देशों का सख्त क्रियान्वयन और मॉडल पुलिस अधिनियम अपनाएँ।
निष्कर्ष :
पुलिस सुधार संस्थागत उत्तरदायित्व और सांस्कृतिक रूपांतरण का संतुलित मिश्रण हैं। औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति के लिए दोनों को समन्वित रूप से लागू करना होगा। इससे पुलिस न केवल कानून प्रवर्तक बनेगी, बल्कि समाज का विश्वास अर्जित करने वाली संस्था भी। विकसित भारत के लिए यह परिवर्तन अनिवार्य है, जो न्याय, सुरक्षा और लोकतंत्र को मजबूत करेगा।
प्रारंभिक परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1.प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority) को राज्य तथा जिला स्तर पर अनिवार्य रूप से गठित करने का निर्देश दिया था।
2.भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 में 7 वर्ष या उससे अधिक कारावास वाले अपराधों के लिए फोरेंसिक विशेषज्ञ द्वारा अपराध-स्थल की जाँच को अनिवार्य बनाया गया है।
3.BioE3 नीति (2024) का पूरा नाम “अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए जैव प्रौद्योगिकी” है तथा यह भारत के नेट-ज़ीरो 2070 लक्ष्य को समर्थन देती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d) 1, 2 और 3
मुख्य परीक्षा के लिए अभ्यास प्रश्न :
Q. “भारत में पुलिस सुधार केवल कानूनी या संरचनात्मक परिवर्तन का विषय नहीं है, बल्कि यह पुलिस बल के भीतर सांस्कृतिक एवं मानसिक रूपांतरण का भी प्रश्न है।” इस कथन के संदर्भ में प्रकाश सिंह निर्णय (2006) के बाद बीते 19 वर्षों में हुए सुधारों तथा बची हुई प्रमुख चुनौतियों का मूल्यांकन कीजिए। साथ ही, उत्तरदायी एवं नागरिक-केंद्रित पुलिसिंग सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नीतिगत एवं प्रशासनिक उपाय सुझाइए। ( शब्द सीमा – 250, अंक – 15 )
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