09 Aug मद्रास उच्च न्यायालय में 15 नए न्यायाधीशों ने ली शपथ, कार्यबल बढ़कर 66 हुआ

✎ उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 217 के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है, जिसमें कॉलेजियम प्रणाली का…
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper II — भारतीय संविधान: महत्वपूर्ण प्रावधान, उच्च न्यायालयों की संरचना, कार्यप्रणाली और नियुक्तियाँ
- Prelims: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति, संविधान का अनुच्छेद 217, अतिरिक्त न्यायाधीश, स्थायी न्यायाधीश, न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या, कॉलेजियम प्रणाली
- Essay: न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही, भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की भूमिका
त्वरित पुनरावृत्ति: उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 217 के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है, जिसमें कॉलेजियम प्रणाली का पालन किया जाता है।
यह खबर चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) में 15 नए न्यायाधीशों को शपथ दिलाई गई है, जिससे उच्च न्यायालय में कार्यरत न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 66 हो गई है, जबकि स्वीकृत संख्या 75 है। इन नियुक्तियों में वकीलों में से सीधे नियुक्त किए गए स्थायी न्यायाधीश और अतिरिक्त न्यायाधीश दोनों शामिल हैं।
पृष्ठभूमि
- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 217 (Article 217) के तहत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- राष्ट्रपति, संबंधित राज्य के राज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करने के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) का पालन किया जाता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को स्थायी न्यायाधीश (Permanent Judges) या अतिरिक्त न्यायाधीश (Additional Judges) के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति दो वर्ष से अनधिक अवधि के लिए की जाती है।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक होना चाहिए, कम से कम दस वर्षों तक न्यायिक पद धारण किया हो, या कम से कम दस वर्षों तक किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 62 वर्ष की आयु तक पद धारण करते हैं।
उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- राष्ट्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करते हैं।
- उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए, राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करते हैं।
- अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए, राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश, संबंधित राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श करते हैं।
- कॉलेजियम प्रणाली के तहत, सर्वोच्च न्यायालय कॉलेजियम उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए नामों की सिफारिश करता है, जिसे सरकार द्वारा अनुमोदित किया जाता है।
- अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति तब की जाती है जब उच्च न्यायालय में कार्यभार में अस्थायी वृद्धि होती है या बकाया मामलों की संख्या अधिक होती है।
- एक अतिरिक्त न्यायाधीश को स्थायी न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया जा सकता है यदि वह पात्रता मानदंडों को पूरा करता है और कॉलेजियम द्वारा इसकी सिफारिश की जाती है।
- न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या संसद द्वारा निर्धारित की जाती है और यह समय-समय पर बदल सकती है।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| मद्रास उच्च न्यायालय में 15 नए न्यायाधीशों की नियुक्ति | उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की कमी को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम। |
| कार्यकारी शक्ति में वृद्धि | उच्च न्यायालय की कार्यकारी शक्ति स्वीकृत शक्ति के 75 न्यायाधीशों के मुकाबले 66 तक पहुंच गई है, जिससे लंबित मामलों को निपटाने में मदद मिलेगी। |
| स्थायी और अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति | कुछ न्यायाधीशों को स्थायी रूप से नियुक्त किया गया है, जबकि अन्य को निश्चित कार्यकाल के लिए अतिरिक्त न्यायाधीशों के रूप में नियुक्त किया गया है, जो न्यायिक आवश्यकताओं के प्रति लचीलापन दर्शाता है। |
| बार और न्यायिक सेवा से पदोन्नति | नियुक्त न्यायाधीशों में बार (वकीलों) और न्यायिक सेवा दोनों से आए व्यक्ति शामिल हैं, जो न्यायिक अनुभव की विविधता सुनिश्चित करता है। |
| विभिन्न पृष्ठभूमि के न्यायाधीश | नए न्यायाधीशों में विभिन्न कानूनी विशेषज्ञता वाले व्यक्ति शामिल हैं, जैसे बौद्धिक संपदा कानून, अप्रत्यक्ष कर, और आपराधिक मामले। |
महत्व
न्यायिक प्रशासन
- न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि से न्यायिक प्रणाली पर बोझ कम होगा और मामलों के त्वरित निपटान में सहायता मिलेगी।
- यह नागरिकों को समय पर न्याय सुनिश्चित करने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है, जो न्याय तक पहुंच के अधिकार को मजबूत करता है।
शासन और विधि का शासन
- उच्च न्यायालयों में पर्याप्त न्यायाधीशों की उपस्थिति विधि के शासन (Rule of Law) को बनाए रखने और संवैधानिक सिद्धांतों की रक्षा के लिए आवश्यक है।
- यह नियुक्ति न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही को मजबूत करती है, जो एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण है।
सामाजिक प्रभाव
- न्यायपालिका में विविधता विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के लोगों के विश्वास को बढ़ाती है।
- लंबे समय से लंबित मामलों का समाधान व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए अनिश्चितता को कम करता है, जिससे सामाजिक स्थिरता बढ़ती है।
चुनौतियाँ
1. न्यायाधीशों की कमी
- मद्रास उच्च न्यायालय में अभी भी स्वीकृत शक्ति के मुकाबले 9 न्यायाधीशों की कमी है, जो देश के अन्य उच्च न्यायालयों में भी एक व्यापक समस्या है।
- यह कमी मामलों के बैकलॉग और न्यायिक देरी का एक प्रमुख कारण बनी हुई है।
यूपीएससी लिंक: भारतीय न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली
2. नियुक्ति प्रक्रिया
- न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया अक्सर लंबी और जटिल होती है, जिससे रिक्तियों को भरने में देरी होती है।
- कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) की पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस जारी है।
यूपीएससी लिंक: न्यायाधीशों की नियुक्ति, स्थानांतरण और पदच्युति
3. न्यायिक बैकलॉग
- न्यायाधीशों की कमी के कारण उच्च न्यायालयों में बड़ी संख्या में मामले लंबित हैं, जिससे न्याय मिलने में देरी होती है।
- यह बैकलॉग न्याय प्रणाली पर अत्यधिक दबाव डालता है और नागरिकों के विश्वास को कम कर सकता है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक देरी और इसके निहितार्थ
4. बुनियादी ढांचा और सहायता स्टाफ
- केवल न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है; न्यायिक दक्षता के लिए पर्याप्त बुनियादी ढांचा और सहायक स्टाफ भी आवश्यक है।
- तकनीकी एकीकरण और डिजिटलीकरण की धीमी गति भी न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करती है।
यूपीएससी लिंक: न्यायिक सुधार और ई-कोर्ट परियोजना
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| न्यायाधीशों की रिक्तियां | देश भर के उच्च न्यायालयों में स्वीकृत शक्ति के मुकाबले न्यायाधीशों की लगातार कमी। |
| नियुक्ति में देरी | कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित नामों को सरकार द्वारा मंजूरी देने में लगने वाला समय। |
| मामलों का बैकलॉग | न्यायाधीशों की कमी और न्यायिक प्रक्रिया की अक्षमता के कारण लंबित मामलों की बढ़ती संख्या। |
| न्यायिक गुणवत्ता | नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता के मानकों को बनाए रखने की चुनौती। |
| न्यायिक स्वतंत्रता | कार्यपालिका द्वारा न्यायिक नियुक्तियों में संभावित हस्तक्षेप की चिंता। |
आगे की राह
- न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को सुव्यवस्थित और तेज किया जाना चाहिए ताकि रिक्तियों को समय पर भरा जा सके।
- कॉलेजियम प्रणाली में अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही लाई जानी चाहिए, जिसमें चयन मानदंड स्पष्ट हों।
- न्यायाधीशों की संख्या को स्वीकृत शक्ति तक बढ़ाने के लिए सक्रिय कदम उठाए जाने चाहिए और नियमित अंतराल पर इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।
- न्यायिक बुनियादी ढांचे में सुधार और पर्याप्त सहायक स्टाफ की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए।
- लंबित मामलों को कम करने के लिए वैकल्पिक विवाद समाधान (Alternative Dispute Resolution – ADR) तंत्रों को मजबूत किया जाना चाहिए।
- न्यायिक प्रक्रिया के डिजिटलीकरण और ई-कोर्ट (e-Courts) परियोजनाओं को त्वरित गति से लागू किया जाना चाहिए।
- न्यायाधीशों के प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए ताकि वे बदलते कानूनी परिदृश्य का सामना कर सकें।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
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संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 214’, ‘note’: ‘प्रत्येक राज्य के लिए एक उच्च न्यायालय’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 217’, ‘note’: ‘उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 224’, ‘note’: ‘अतिरिक्त और कार्यवाहक न्यायाधीशों की नियुक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 231’, ‘note’: ‘दो या अधिक राज्यों के लिए एक ही उच्च न्यायालय’}
अवधारणा प्रवाह
उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की रिक्तियां → न्यायिक बैकलॉग और मामलों का संचय → न्यायाधीशों की नियुक्ति की आवश्यकता → नियुक्ति प्रक्रिया का क्रियान्वयन → कार्यकारी शक्ति में वृद्धि → न्यायिक दक्षता और त्वरित न्याय
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार करें:
1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश और संबंधित राज्य के राज्यपाल के परामर्श से की जाती है।
2. एक अतिरिक्त न्यायाधीश को स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्त करने से पहले उच्च न्यायालय में अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए नियुक्त किया जा सकता है।
3. मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 75 है।
उपरोक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल एक — कथन 1 सही है। संविधान के अनुच्छेद 217 के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), संबंधित राज्य के राज्यपाल और मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से की जाती है। कथन 2 गलत है। अतिरिक्त न्यायाधीशों की नियुक्ति अधिकतम दो वर्ष की अवधि के लिए की जाती है, लेकिन यह स्थायी न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति से पहले की शर्त नहीं है। कथन 3 सही है। समाचार के अनुसार, मद्रास उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 75 है।
Q2. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संबंध में निम्नलिखित में से कौन सा/से कथन सही है/हैं?
1. उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा शपथ दिलाई जाती है।
2. एक व्यक्ति जिसने भारत में किसी उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में कम से कम दस वर्ष तक अभ्यास किया हो, वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य है।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1 और न ही 2
उत्तर: केवल 2 — कथन 1 गलत है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को संबंधित राज्य के राज्यपाल द्वारा शपथ दिलाई जाती है, न कि भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा। कथन 2 सही है। संविधान के अनुच्छेद 217(2) के अनुसार, एक व्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य है यदि वह भारत का नागरिक है और उसने भारत के क्षेत्र में कम से कम दस वर्षों तक न्यायिक पद धारण किया हो या किसी उच्च न्यायालय का या दो या अधिक ऐसे न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्षों तक अधिवक्ता रहा हो।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया की विवेचना कीजिए। क्या कॉलेजियम प्रणाली न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में सफल रही है? समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना: उत्तर की शुरुआत उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की संवैधानिक प्रक्रिया (अनुच्छेद 217) से करें। इसके बाद कॉलेजियम प्रणाली के विकास और कार्यप्रणाली का विस्तार से वर्णन करें, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों की भूमिका शामिल हो। न्यायिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने में कॉलेजियम की सफलता के पक्ष में तर्क दें, जैसे कि कार्यपालिका के हस्तक्षेप को कम करना और न्यायिक नियुक्तियों में विशेषज्ञता। फिर, कॉलेजियम प्रणाली की आलोचनात्मक समीक्षा करें, जिसमें पारदर्शिता की कमी, जवाबदेही का अभाव, भाई-भतीजावाद के आरोप और न्यायाधीशों की कमी जैसे मुद्दे शामिल हों। न्यायिक नियुक्तियों में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन पर प्रकाश डालें। अंत में, न्यायिक स्वतंत्रता और जवाबदेही के बीच संतुलन स्थापित करने के लिए सुधारों का सुझाव दें, जैसे कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) का संदर्भ, हालांकि इसे असंवैधानिक घोषित किया गया था, और अन्य संभावित सुधार।
स्रोत: The Hindu
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।
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