12 Aug यूपीएससी और पीसीएस के लिए 91, 182, 364 दिन के टी-बिल नीलामी परिणाम: कट-ऑफ दरें

✎ ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी अल्पकालिक, शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ हैं जो सरकार के अल्पकालिक वित्तपोषण और RBI की मौद्रिक नीति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है
- GS Paper III — भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय। सरकारी बजट के मुख्य घटक।
- Prelims: ट्रेजरी बिल (T-Bills), सरकारी प्रतिभूतियाँ (Government Securities), राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit), मुद्रास्फीति (Inflation), भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI), खुला बाज़ार परिचालन (Open Market Operations), मौद्रिक नीति (Monetary Policy), अर्थव्यवस्था में तरलता (Liquidity in Economy)
- Essay: भारत में राजकोषीय स्थिरता और आर्थिक विकास में सरकारी ऋण प्रबंधन की भूमिका।, मौद्रिक नीति के उपकरण के रूप में ट्रेजरी बिलों का महत्व।
त्वरित पुनरावृत्ति: ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी अल्पकालिक, शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ हैं जो सरकार के अल्पकालिक वित्तपोषण और RBI की मौद्रिक नीति के लिए महत्वपूर्ण हैं।
यह खबर चर्चा में क्यों?
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने हाल ही में 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेजरी बिलों (T-Bills) की नीलामी के परिणाम घोषित किए हैं। इस नीलामी में सरकार द्वारा अधिसूचित कुल ₹24,000 करोड़ (₹9,000 करोड़, ₹8,000 करोड़ और ₹7,000 करोड़) के ट्रेजरी बिलों को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया गया, जो सरकारी ऋण प्रबंधन और बाज़ार में तरलता की स्थिति को दर्शाता है। ये नीलामी परिणाम अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों और सरकारी उधार की लागत पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
पृष्ठभूमि
- भारत सरकार अपनी वित्तीय आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए घरेलू और विदेशी स्रोतों से धन उधार लेती है। इस उधार का प्रबंधन वित्त मंत्रालय और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा किया जाता है।
- सरकारी प्रतिभूतियाँ (Government Securities – G-Secs) सरकार द्वारा जारी किए गए ऋण साधन हैं। इन्हें दो मुख्य श्रेणियों में बांटा जा सकता है: ट्रेजरी बिल (T-Bills) और दिनांकित प्रतिभूतियाँ (Dated Securities)।
- ट्रेजरी बिल अल्पकालिक ऋण साधन हैं जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है। भारत में, ये वर्तमान में 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय परिपक्वता अवधि में जारी किए जाते हैं।
- दिनांकित प्रतिभूतियाँ दीर्घकालिक ऋण साधन हैं जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष या उससे अधिक होती है, आमतौर पर 5 वर्ष से 40 वर्ष तक। इन पर निश्चित या परिवर्तनशील ब्याज दर (कूपन दर) का भुगतान किया जाता है।
- RBI सरकार के बैंकर और ऋण प्रबंधक के रूप में कार्य करता है। यह सरकार की ओर से ट्रेजरी बिलों और दिनांकित प्रतिभूतियों की नीलामी आयोजित करता है।
- सरकारी प्रतिभूतियों की नीलामी में वाणिज्यिक बैंक, प्राथमिक डीलर (Primary Dealers), बीमा कंपनियाँ, म्यूचुअल फंड और अन्य वित्तीय संस्थान भाग लेते हैं। ये नीलामी प्रतिस्पर्धी बोली (Competitive Bidding) और गैर-प्रतिस्पर्धी बोली (Non-Competitive Bidding) दोनों तरीकों से आयोजित की जाती हैं।
ट्रेजरी बिल (T-Bills) क्या हैं?
- ट्रेजरी बिल (T-Bills) भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक मुद्रा बाज़ार (Money Market) साधन हैं।
- ये एक वर्ष से कम की परिपक्वता अवधि वाले होते हैं, वर्तमान में 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय अवधि में उपलब्ध हैं।
- ट्रेजरी बिल ‘शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ’ (Zero-Coupon Securities) होती हैं, जिसका अर्थ है कि इन पर कोई ब्याज (कूपन) नहीं दिया जाता है। इसके बजाय, इन्हें अंकित मूल्य (Face Value) से कम मूल्य पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है।
- निवेशक को होने वाला लाभ खरीद मूल्य और अंकित मूल्य के बीच का अंतर होता है, जिसे ‘छूट’ (Discount) कहा जाता है। इस छूट से ही प्रभावी प्रतिफल (Implicit Yield) की गणना की जाती है।
- ये अत्यधिक तरल (Highly Liquid) और सुरक्षित निवेश माने जाते हैं क्योंकि ये सरकार द्वारा जारी किए जाते हैं।
- ट्रेजरी बिल सरकार के लिए अल्पकालिक धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं और यह राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के वित्तपोषण में मदद करते हैं।
- RBI मौद्रिक नीति के संचालन में भी ट्रेजरी बिलों का उपयोग करता है, जैसे कि खुले बाज़ार परिचालन (Open Market Operations – OMO) के माध्यम से बाज़ार में तरलता को समायोजित करना।
मुख्य विशेषताएँ
| विशेषता | महत्व |
|---|---|
| ट्रेजरी बिल (T-Bill) | ये भारत सरकार द्वारा जारी किए गए अल्पकालिक ऋण साधन हैं, जिनकी परिपक्वता अवधि एक वर्ष से कम होती है। ये सरकार के लिए धन जुटाने का एक महत्वपूर्ण साधन हैं। |
| अवधि | 91-दिवसीय, 182-दिवसीय और 364-दिवसीय ट्रेजरी बिल। ये अलग-अलग परिपक्वता अवधियाँ निवेशकों को तरलता और प्रतिफल के विभिन्न विकल्प प्रदान करती हैं। |
| नीलामी | भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) द्वारा साप्ताहिक आधार पर आयोजित की जाती है। यह प्रक्रिया बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण सुनिश्चित करती है और पारदर्शिता बढ़ाती है। |
| कट-ऑफ मूल्य | यह वह न्यूनतम मूल्य है जिस पर ट्रेजरी बिल नीलामी में स्वीकार किए जाते हैं। यह बाजार की मांग और प्रचलित ब्याज दरों को दर्शाता है। |
| अंतर्निहित प्रतिफल (Implicit Yield) | यह कट-ऑफ मूल्य पर निवेशक को मिलने वाला प्रभावी प्रतिफल है। यह निवेशकों के लिए निवेश निर्णय लेने में महत्वपूर्ण होता है। |
| अधिसूचित कुल अंकित मूल्य | यह वह कुल राशि है जिसे सरकार ट्रेजरी बिलों के माध्यम से जुटाना चाहती है। यह सरकार की अल्पकालिक वित्तीय आवश्यकताओं को दर्शाता है। |
महत्व
आर्थिक महत्व
- ट्रेजरी बिल सरकार के लिए अल्पकालिक नकदी प्रवाह (Cash Flow) प्रबंधन का एक महत्वपूर्ण उपकरण हैं।
- इनकी नीलामी के परिणाम बाजार में तरलता (Liquidity) की स्थिति और ब्याज दर के रुझानों का संकेत देते हैं, जो अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य को समझने में मदद करते हैं।
- उच्च प्रतिफल (Yield) दरें अक्सर मुद्रास्फीति (Inflation) के दबाव या सरकार की बढ़ती उधार आवश्यकताओं का संकेत हो सकती हैं।
राजकोषीय प्रबंधन
- ट्रेजरी बिलों के माध्यम से सरकार अपने राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के एक हिस्से का वित्तपोषण करती है।
- इनकी सफल नीलामी सरकार की उधार लेने की क्षमता में निवेशकों के विश्वास को दर्शाती है।
- कम प्रतिफल दरें सरकार के लिए उधार लेने की लागत को कम करती हैं, जिससे राजकोषीय स्थिरता में सहायता मिलती है।
मौद्रिक नीति
- RBI, जो सरकार का बैंकर है, ट्रेजरी बिलों की नीलामी का प्रबंधन करता है और यह खुले बाजार परिचालन (Open Market Operations) का एक अप्रत्यक्ष हिस्सा है।
- बाजार में ट्रेजरी बिलों की खरीद और बिक्री तरलता को प्रभावित करती है, जो RBI की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायक होती है।
निवेशकों के लिए
- ट्रेजरी बिल जोखिम-मुक्त निवेश विकल्प प्रदान करते हैं, क्योंकि ये सरकार द्वारा समर्थित होते हैं।
- ये विभिन्न परिपक्वता अवधियों के साथ निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो को विविधतापूर्ण बनाने का अवसर देते हैं।
चुनौतियाँ
1. बढ़ता प्रतिफल
- यदि ट्रेजरी बिलों पर प्रतिफल बढ़ता है, तो यह सरकार के लिए उधार लेने की लागत को बढ़ा देता है, जिससे राजकोषीय बोझ बढ़ सकता है।
- उच्च प्रतिफल निजी क्षेत्र के निवेश को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि बैंक और अन्य वित्तीय संस्थान सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश को प्राथमिकता दे सकते हैं।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: सरकारी वित्त, राजकोषीय नीति
2. बाजार तरलता पर प्रभाव
- ट्रेजरी बिलों की बड़ी मात्रा में नीलामी बाजार से तरलता को सोख सकती है, जिससे अन्य क्षेत्रों के लिए धन की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
- अत्यधिक तरलता निकासी से अल्पकालिक ब्याज दरों में वृद्धि हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मौद्रिक नीति, वित्तीय बाजार
3. मुद्रास्फीति का दबाव
- यदि सरकार को अपने बढ़ते राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए अधिक उधार लेना पड़ता है, तो यह अंततः मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ा सकता है।
- उच्च मुद्रास्फीति निवेशकों के लिए वास्तविक प्रतिफल को कम कर सकती है, जिससे ट्रेजरी बिलों की मांग प्रभावित हो सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: मुद्रास्फीति, राजकोषीय घाटा
4. वैश्विक आर्थिक कारक
- वैश्विक ब्याज दरों में वृद्धि या पूंजी प्रवाह में बदलाव भारतीय ट्रेजरी बिल बाजार को प्रभावित कर सकता है, जिससे प्रतिफल दरों में अस्थिरता आ सकती है।
- अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों की धारणा भी नीलामी परिणामों पर असर डाल सकती है।
यूपीएससी लिंक: अर्थव्यवस्था: वैश्विक अर्थव्यवस्था, पूंजी बाजार
चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण
| मुद्दा | चिंता |
|---|---|
| उच्च प्रतिफल दरें | सरकार की उधार लागत में वृद्धि, राजकोषीय दबाव |
| बाजार तरलता में कमी | निजी क्षेत्र के लिए ऋण की उपलब्धता पर नकारात्मक प्रभाव |
| मुद्रास्फीति का जोखिम | बढ़ते सरकारी उधार से संभावित मुद्रास्फीति दबाव |
| निवेशकों की मांग | बाजार की स्थितियों के आधार पर मांग में उतार-चढ़ाव |
| वैश्विक आर्थिक अस्थिरता | विदेशी पूंजी प्रवाह और ब्याज दरों पर प्रभाव |
आगे की राह
- सरकार को राजकोषीय सुदृढ़ीकरण (Fiscal Consolidation) के उपायों को अपनाना चाहिए ताकि उधार लेने की आवश्यकता कम हो सके।
- RBI को बाजार की तरलता का सावधानीपूर्वक प्रबंधन करना चाहिए ताकि ब्याज दरों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोका जा सके।
- निवेशकों के आधार को व्यापक बनाने के लिए वित्तीय साक्षरता (Financial Literacy) और पहुंच में सुधार करना।
- सरकारी प्रतिभूतियों के लिए एक कुशल और पारदर्शी द्वितीयक बाजार (Secondary Market) विकसित करना।
- दीर्घकालिक राजकोषीय स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए राजस्व सृजन के स्थायी तरीकों पर ध्यान केंद्रित करना।
- वैश्विक आर्थिक रुझानों की निगरानी करना और तदनुसार उधार रणनीति को समायोजित करना।
यूपीएससी मूल्य-संवर्धन
मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड
राजकोषीय नीति · मौद्रिक नीति · ट्रेजरी बिल · सरकारी प्रतिभूतियाँ · सार्वजनिक ऋण · ब्याज दरें · तरलता प्रबंधन · भारतीय रिजर्व बैंक · मुद्रा बाजार · राजकोषीय घाटा
संवैधानिक व नीतिगत संबंध
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 292’, ‘note’: ‘भारत सरकार द्वारा उधार लेने की शक्ति’}
- {‘article’: ‘अनुच्छेद 266(1)’, ‘note’: ‘भारत की संचित निधि से व्यय’}
अवधारणा प्रवाह
सरकार को धन की आवश्यकता होती है (राजकोषीय घाटा) → भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ट्रेजरी बिलों की नीलामी करता है → निवेशक (बैंक, वित्तीय संस्थान) बिल खरीदते हैं → सरकार को अल्पकालिक धन प्राप्त होता है → नीलामी में कट-ऑफ मूल्य और प्रतिफल निर्धारित होता है → प्रतिफल दरें बाजार की तरलता और ब्याज दरों को दर्शाती हैं → यह अर्थव्यवस्था और मौद्रिक नीति को प्रभावित करता है
प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ट्रेजरी बिल (T-Bill) भारत सरकार द्वारा जारी किए जाने वाले अल्पकालिक ऋण साधन हैं।
2. ट्रेजरी बिल केवल 91 दिन और 182 दिन की परिपक्वता अवधि में ही उपलब्ध होते हैं।
3. ट्रेजरी बिलों को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा नीलाम किया जाता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- सभी तीन
- कोई नहीं
उत्तर: केवल दो — कथन 1 सही है क्योंकि ट्रेजरी बिल भारत सरकार द्वारा जारी अल्पकालिक ऋण साधन हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि ट्रेजरी बिल 364 दिन की परिपक्वता अवधि में भी उपलब्ध होते हैं। कथन 3 सही है क्योंकि ट्रेजरी बिलों की नीलामी RBI द्वारा सरकार की ओर से की जाती है। अतः, केवल दो कथन सही हैं।
Q2. ट्रेजरी बिलों के संबंध में, निम्नलिखित में से कौन सा कथन सही नहीं है?
- ये शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ (Zero-Coupon Securities) हैं, जो छूट पर जारी की जाती हैं और अंकित मूल्य पर भुनाई जाती हैं।
- इन पर केंद्र सरकार द्वारा ब्याज का भुगतान किया जाता है।
- ये अत्यधिक तरल साधन हैं।
- इनका उपयोग सरकार के अल्पकालिक वित्तपोषण आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किया जाता है।
उत्तर: इन पर केंद्र सरकार द्वारा ब्याज का भुगतान किया जाता है। — ट्रेजरी बिल शून्य-कूपन प्रतिभूतियाँ हैं, जिसका अर्थ है कि उन पर सीधे ब्याज का भुगतान नहीं किया जाता है। उन्हें अंकित मूल्य से कम पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य पर भुनाया जाता है, जिससे निवेशक को लाभ होता है।
मुख्य अभ्यास प्रश्न
✍ ट्रेजरी बिल क्या हैं और सरकार के राजकोषीय प्रबंधन में इनकी क्या भूमिका है? भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ती ट्रेजरी बिल यील्ड (yield) के संभावित प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। (15 Marks)
रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** ट्रेजरी बिल (T-Bill) की परिभाषा, उनकी प्रकृति (अल्पकालिक, शून्य-कूपन, केंद्र सरकार द्वारा जारी) और जारीकर्ता (RBI) का उल्लेख करें।
2. **सरकार के राजकोषीय प्रबंधन में भूमिका:**
* अल्पकालिक नकदी आवश्यकताओं का प्रबंधन।
* राजकोषीय घाटे के वित्तपोषण का एक साधन।
* बाजार से उधार लेने की रणनीति का हिस्सा।
* सरकारी व्यय और राजस्व के बीच अस्थायी बेमेल को पाटना।
3. **बढ़ती ट्रेजरी बिल यील्ड के संभावित प्रभाव:**
* **सरकार पर:** उधार लेने की लागत में वृद्धि, राजकोषीय घाटे पर दबाव, भविष्य के विकास व्यय के लिए कम धन।
* **अर्थव्यवस्था पर:**
* **ब्याज दरों पर प्रभाव:** अन्य ऋण साधनों (जैसे कॉर्पोरेट बॉन्ड, बैंक ऋण) के लिए बेंचमार्क के रूप में कार्य करना, जिससे समग्र ब्याज दरों में वृद्धि हो सकती है।
* **निवेश पर प्रभाव:** उच्च ब्याज दरें निजी निवेश को हतोत्साहित कर सकती हैं (क्राउडिंग आउट प्रभाव)।
* **मुद्रास्फीति पर प्रभाव:** यदि उच्च यील्ड मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के RBI के प्रयासों का परिणाम है, तो यह एक संकेत हो सकता है।
* **बैंकों पर प्रभाव:** सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश पर अधिक रिटर्न, लेकिन निजी क्षेत्र को ऋण देने की लागत में वृद्धि।
* **विदेशी निवेश पर प्रभाव:** उच्च यील्ड विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को आकर्षित कर सकती है, लेकिन यह पूंजी प्रवाह की अस्थिरता भी ला सकती है।
4. **निष्कर्ष:** सरकार के राजकोषीय विवेक और RBI की मौद्रिक नीति के बीच संतुलन की आवश्यकता पर बल दें, ताकि बढ़ती यील्ड के नकारात्मक प्रभावों को कम किया जा सके और आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित की जा सके।
स्रोत: RBI
शैक्षिक उद्देश्य हेतु AanyaAi द्वारा जनित।

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