राज्यसभा अध्यक्ष ने केंद्र को दिया सुझाव: अमित शाह सदन में आएं, जवाब दें

‘Consider request for Amit Shah’s Rajya Sabha presence’: Chairman to Centre — concept mind map

राज्यसभा अध्यक्ष ने केंद्र को दिया सुझाव: अमित शाह सदन में आएं, जवाब दें

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राज्यसभा कार्यवाही प्रक्रिया

✎ संसदीय कार्यवाही में मंत्रियों की उपस्थिति और विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों पर उनके जवाब भारतीय संसदीय लोकतंत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

विषय प्रासंगिकता — यह टॉपिक कहाँ आता है

  • GS Paper II — भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएँ, संशोधन, महत्त्वपूर्ण प्रावधान और आधारभूत संरचना। संसद और राज्य विधायिका—संरचना, कार्यप्रणाली, कार्य-संचालन, शक्तियाँ एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय।  |  GS Paper II — कार्यपालिका और न्यायपालिका का गठन और कार्य। सरकार के मंत्रालय एवं विभाग।
  • Prelims: राज्यसभा अध्यक्ष, संसदीय कार्य मंत्री, विपक्ष के नेता, नियम 235, नियम 240, शून्यकाल, स्थगन प्रस्ताव, मंत्री का सदन में वक्तव्य
  • Essay: संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका, संसदीय कार्यवाही में अनुशासन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन

त्वरित पुनरावृत्ति: संसदीय कार्यवाही में मंत्रियों की उपस्थिति और विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दों पर उनके जवाब भारतीय संसदीय लोकतंत्र की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए महत्वपूर्ण हैं।

यह खबर चर्चा में क्यों?

हाल ही में, राज्यसभा के सभापति ने केंद्र सरकार से केंद्रीय गृह मंत्री की सदन में उपस्थिति के अनुरोध पर विचार करने को कहा। विपक्ष के सांसद, विशेष रूप से कांग्रेस पार्टी के सदस्य, सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियों और पेपर लीक के विरोध प्रदर्शनों पर गृह मंत्री से स्पष्टीकरण की मांग कर रहे थे। इस मुद्दे पर संसदीय कार्य मंत्री और विपक्ष के नेता के बीच नियमों और प्रक्रियाओं को लेकर बहस भी हुई, जिसके कारण सदन की कार्यवाही बाधित हुई।

पृष्ठभूमि

  • विपक्ष के सांसदों ने 20 जुलाई को पेपर लीक के विरोध में संसद की ओर मार्च कर रहे युवाओं पर सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों को लेकर गृह मंत्री से जवाब मांगा।
  • विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने गृह मंत्री और प्रधानमंत्री की सदन में उपस्थिति और वक्तव्य की मांग की।
  • संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्षी सांसदों द्वारा बार-बार एक ही मुद्दे को उठाने पर नियम 235 और नियम 240 (अप्रासंगिकता या पुनरावृत्ति) का हवाला दिया।
  • खड़गे ने रिजिजू के नियमों के उल्लेख का खंडन करते हुए कहा कि सदन में क्या कहना है, कब कहना है और कैसे कहना है, यह तय करना उनका अधिकार है।
  • खड़गे ने भाजपा के दिवंगत नेता अरुण जेटली के इस कथन का भी उल्लेख किया कि ‘लोकतंत्र में व्यवधान एक स्वाभाविक हिस्सा है’।
  • सभापति ने अंततः संसदीय कार्य मंत्री से विपक्ष की मांग पर विचार करने का अनुरोध किया।

संसदीय प्रक्रियाएँ और मंत्रियों की भूमिका

  • भारतीय संसदीय प्रणाली में, मंत्री संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार होते हैं।
  • किसी भी सदन का सदस्य होने के नाते, मंत्री को सदन की कार्यवाही में भाग लेने और पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देने की आवश्यकता होती है।
  • विपक्ष के सदस्यों को सार्वजनिक महत्व के मामलों पर मंत्रियों से प्रश्न पूछने और स्पष्टीकरण मांगने का अधिकार है।
  • नियम 235 राज्यसभा के प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमों में से एक है, जो सभापति को सदन में व्यवस्था बनाए रखने और सदस्यों के व्यवहार को नियंत्रित करने का अधिकार देता है।
  • नियम 240 सदस्यों को अप्रासंगिक या दोहराव वाले भाषण देने से रोकता है, ताकि सदन का समय बर्बाद न हो।
  • शून्यकाल (Zero Hour) एक अनौपचारिक संसदीय प्रक्रिया है, जिसमें सदस्य बिना किसी पूर्व सूचना के सार्वजनिक महत्व के मामलों को उठा सकते हैं।
  • किसी मंत्री का सदन में वक्तव्य (Statement by a Minister) एक औपचारिक तरीका है जिससे सरकार किसी महत्वपूर्ण मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करती है या जानकारी प्रदान करती है।
  • संसदीय लोकतंत्र में, विपक्ष की भूमिका सरकार को जवाबदेह ठहराना, सार्वजनिक मुद्दों को उठाना और नीतियों पर बहस करना है।

मुख्य विशेषताएँ

विशेषता महत्व
संसदीय कार्यवाही का संचालन राज्यसभा अध्यक्ष सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने के लिए नियमों और परंपराओं का पालन सुनिश्चित करते हैं।
विपक्ष की भूमिका विपक्ष सरकार को जवाबदेह ठहराने और जनहित के मुद्दों को उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
मंत्रियों की सदन में उपस्थिति मंत्रियों से अपेक्षा की जाती है कि वे सदन में उपस्थित होकर सदस्यों के प्रश्नों का उत्तर दें और सरकार की नीतियों पर स्पष्टीकरण दें।
संसदीय विशेषाधिकार सांसदों को सदन में अपनी बात रखने की स्वतंत्रता होती है, जो लोकतंत्र के लिए आवश्यक है।
नियमों का पालन सदन के नियमों, जैसे कि नियम 235 और 240, का उद्देश्य बहस को व्यवस्थित और प्रासंगिक बनाए रखना है।

महत्व

लोकतांत्रिक महत्व

  • यह घटना संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका और सरकार की जवाबदेही के महत्व को रेखांकित करती है।
  • सदन के भीतर मंत्रियों की उपस्थिति और उनके द्वारा प्रश्नों का उत्तर देना संसदीय नियंत्रण का एक महत्वपूर्ण पहलू है।

संसदीय प्रक्रिया

  • यह अध्यक्ष की भूमिका को दर्शाता है, जो सदन के संरक्षक के रूप में सदस्यों की भावनाओं को सरकार तक पहुँचाने का प्रयास करते हैं।
  • संसदीय नियमों, जैसे कि नियम 235 (बाधाओं को समाप्त करना) और नियम 240 (अप्रासंगिकता या पुनरावृत्ति), का उपयोग सदन की कार्यवाही को व्यवस्थित रखने के लिए किया जाता है।

शासन और जवाबदेही

  • विपक्ष द्वारा गृह मंत्री की उपस्थिति की मांग सुरक्षा बलों द्वारा कथित ज्यादतियों जैसे संवेदनशील मुद्दों पर सरकार से स्पष्टीकरण मांगने के लिए की गई थी।
  • यह दर्शाता है कि संसद सार्वजनिक महत्व के मामलों पर सरकार से जवाबदेही सुनिश्चित करने का एक प्रमुख मंच है।

चुनौतियाँ

1. संसदीय गतिरोध

  • विपक्ष के विरोध और सरकार के जवाब के कारण सदन की कार्यवाही बाधित हुई, जिससे महत्वपूर्ण विधायी कार्यों में देरी हो सकती है।
  • बार-बार होने वाले गतिरोध से संसद की उत्पादकता और प्रभावशीलता प्रभावित होती है।

2. सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करना

  • विपक्ष का मानना है कि सरकार महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन में जवाब देने से बच रही है, जिससे उसकी जवाबदेही पर सवाल उठते हैं।
  • मंत्रियों की अनुपस्थिति या प्रश्नों का संतोषजनक उत्तर न देना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर कर सकता है।

3. संसदीय नियमों का दुरुपयोग

  • सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों द्वारा संसदीय नियमों की व्याख्या और उपयोग पर असहमति, जिससे सदन में तनाव बढ़ता है।
  • नियमों का उपयोग बहस को रोकने या बाधित करने के लिए किया जा सकता है, बजाय इसके कि वे सुचारु कार्यवाही सुनिश्चित करें।

4. विपक्ष की भूमिका का क्षरण

  • यदि विपक्ष को महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता है, तो उसकी भूमिका कमजोर हो सकती है।
  • लोकतंत्र में एक मजबूत और प्रभावी विपक्ष आवश्यक है।

चुनौतियाँ — यूपीएससी दृष्टिकोण

मुद्दा चिंता
संसदीय कार्यवाही में बाधा विपक्ष के लगातार विरोध से सदन का कीमती समय बर्बाद होता है और विधायी कार्य बाधित होते हैं।
सरकार की जवाबदेही पर सवाल मंत्रियों की अनुपस्थिति या प्रश्नों का सीधा जवाब न देने से सरकार की जवाबदेही पर संदेह पैदा होता है।
संसदीय मर्यादा का उल्लंघन सदन में नारेबाजी और व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से संसदीय मर्यादा का उल्लंघन होता है।
नियमों की व्याख्या पर मतभेद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संसदीय नियमों की व्याख्या को लेकर अक्सर मतभेद होते हैं, जिससे गतिरोध बढ़ता है।
जनता में विश्वास की कमी संसदीय गतिरोध और हंगामे से जनता का संसद और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में विश्वास कम हो सकता है।

आगे की राह

  • सदन के अध्यक्ष को सभी पक्षों के साथ संवाद स्थापित कर गतिरोध को तोड़ने का प्रयास करना चाहिए।
  • सरकार को विपक्ष द्वारा उठाए गए महत्वपूर्ण मुद्दों पर सदन में स्पष्ट और समयबद्ध जवाब देना चाहिए।
  • विपक्ष को विरोध प्रदर्शनों के साथ-साथ रचनात्मक बहस और चर्चा के माध्यम से अपनी बात रखनी चाहिए।
  • संसदीय नियमों का पालन सभी सदस्यों द्वारा निष्पक्ष रूप से किया जाना चाहिए ताकि सदन की गरिमा बनी रहे।
  • संसदीय समितियों का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जाना चाहिए ताकि महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तृत चर्चा हो सके।
  • संसद सदस्यों को जनहित के मुद्दों पर सार्थक बहस में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • सभी राजनीतिक दलों को संसदीय लोकतंत्र के महत्व को समझते हुए आपसी सम्मान और सहयोग की भावना से काम करना चाहिए।

यूपीएससी मूल्य-संवर्धन

मुख्य परीक्षा उत्तर-लेखन हेतु कीवर्ड

संसदीय विशेषाधिकार · संसदीय कार्यवाही · राज्यसभा · लोकतंत्र · संसदीय कार्य मंत्री · विपक्ष की भूमिका · सदन के नियम · प्रश्नकाल · शून्यकाल · संसदीय गतिरोध

संवैधानिक व नीतिगत संबंध

  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 75 (3)’, ‘note’: ‘मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 85’, ‘note’: ‘राष्ट्रपति द्वारा संसद के सत्र बुलाना, सत्रावसान’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 105’, ‘note’: ‘संसद सदस्यों के विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ’}
  • {‘article’: ‘अनुच्छेद 118’, ‘note’: ‘संसद के प्रत्येक सदन को अपनी प्रक्रिया के नियम बनाने की शक्ति’}

अवधारणा प्रवाह

विपक्ष द्वारा सुरक्षा बलों की कथित ज्यादतियों पर चिंता व्यक्त करना।  →  विपक्ष द्वारा गृह मंत्री की राज्यसभा में उपस्थिति की मांग।  →  सदन में ‘अमित शाह जवाब दो’ के नारे और विरोध प्रदर्शन।  →  राज्यसभा अध्यक्ष द्वारा केंद्र से गृह मंत्री की उपस्थिति पर विचार करने का आग्रह।  →  संसदीय कार्य मंत्री द्वारा नियमों का हवाला देते हुए विपक्ष के नेता पर आरोप।  →  सदन में गतिरोध और कार्यवाही का स्थगन।  →  लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सरकार की जवाबदेही और विपक्ष की भूमिका पर बहस।

प्रारंभिक अभ्यास प्रश्न

Q1. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री को राज्यसभा में उपस्थित होना अनिवार्य है यदि विपक्ष द्वारा इसकी मांग की जाती है।
2. राज्यसभा के सभापति के पास सदन के किसी सदस्य को किसी विशेष मामले पर बार-बार बोलने से रोकने का अधिकार है।
3. संसदीय कार्य मंत्री का मुख्य कार्य सदन में सरकार और विपक्ष के बीच समन्वय स्थापित करना है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: केवल दो — कथन 1 गलत है। संविधान में ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि केंद्रीय गृह मंत्री को विपक्ष की मांग पर राज्यसभा में उपस्थित होना अनिवार्य है। यह संसदीय परंपराओं और सदन के नियमों पर निर्भर करता है। कथन 2 सही है। राज्यसभा के सभापति के पास सदन के नियमों के तहत सदस्यों को अनावश्यक पुनरावृत्ति या असंबद्धता से रोकने का अधिकार होता है (जैसे नियम 240)। कथन 3 गलत है। संसदीय कार्य मंत्री का मुख्य कार्य सदन में सरकारी कामकाज का प्रबंधन करना और विधायी एजेंडा को आगे बढ़ाना है, न कि सरकार और विपक्ष के बीच समन्वय स्थापित करना।

Q2. राज्यसभा के संदर्भ में, निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. सभापति: सदन का पीठासीन अधिकारी
2. नियम 235: विपक्ष के व्यवधानों को समाप्त करने से संबंधित
3. नियम 240: अप्रासंगिकता या पुनरावृत्ति से संबंधित
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सुमेलित हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं

उत्तर: सभी तीन — युग्म 1 सही है। राज्यसभा का सभापति (जो भारत का उपराष्ट्रपति भी होता है) सदन का पीठासीन अधिकारी होता है। युग्म 2 गलत है। नियम 235 विपक्ष के व्यवधानों को समाप्त करने से संबंधित नहीं है, बल्कि यह सभापति को सदस्यों को सदन से हटाने का अधिकार देता है यदि वे नियमों का उल्लंघन करते हैं। युग्म 3 सही है। नियम 240 सदस्यों को अप्रासंगिक या दोहराव वाली टिप्पणियाँ करने से रोकने से संबंधित है।

मुख्य अभ्यास प्रश्न

✍ भारतीय संसद में विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र के सुचारू कामकाज के लिए महत्वपूर्ण है। इस संदर्भ में, सदन की कार्यवाही में उत्पन्न होने वाले गतिरोधों और उनके समाधान में पीठासीन अधिकारी की भूमिका का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (15 Marks)

रूपरेखा: मॉडल-उत्तर संरचना:
1. **परिचय:** भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका का महत्व (सरकार को जवाबदेह ठहराना, वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करना, सार्वजनिक मुद्दों को उठाना)।
2. **विपक्ष की भूमिका का महत्व:**
* सरकार पर नियंत्रण और संतुलन।
* नीतियों और निर्णयों की आलोचनात्मक जांच।
* लोकतांत्रिक बहस और विचार-विमर्श को बढ़ावा देना।
* जनता की आवाज को सदन तक पहुंचाना।
3. **सदन की कार्यवाही में गतिरोध के कारण:**
* सरकारी नीतियों पर असहमति।
* विपक्ष द्वारा महत्वपूर्ण मुद्दों पर तत्काल चर्चा की मांग।
* सत्ता पक्ष द्वारा विपक्ष की मांगों को अनदेखा करना।
* सदन के नियमों और प्रक्रियाओं का उल्लंघन।
* राजनीतिक ध्रुवीकरण।
4. **पीठासीन अधिकारी (सभापति/अध्यक्ष) की भूमिका:**
* **सदन के संरक्षक के रूप में:** निष्पक्षता बनाए रखना, सभी सदस्यों को बोलने का अवसर देना।
* **नियमों का प्रवर्तन:** सदन के नियमों (जैसे नियम 235, 240) का पालन सुनिश्चित करना, अव्यवस्था को नियंत्रित करना।
* **समन्वयकर्ता के रूप में:** सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच संवाद स्थापित करने का प्रयास करना, गतिरोध तोड़ने के लिए मध्यस्थता करना।
* **विशेषाधिकारों का संरक्षण:** सदस्यों के संसदीय विशेषाधिकारों की रक्षा करना।
* **सीमित शक्तियां:** पीठासीन अधिकारी की शक्तियां सदन के नियमों और परंपराओं से बंधी होती हैं; वे राजनीतिक इच्छाशक्ति को प्रतिस्थापित नहीं कर सकते।
5. **समालोचनात्मक विश्लेषण:**
* पीठासीन अधिकारी की भूमिका की प्रभावशीलता अक्सर उनके व्यक्तित्व, अनुभव और राजनीतिक तटस्थता पर निर्भर करती है।
* गतिरोधों के समाधान में पीठासीन अधिकारी की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की है कि वे रचनात्मक संवाद में शामिल हों।
* हाल के उदाहरणों का उल्लेख (जैसे वर्तमान समाचार में राज्यसभा सभापति की भूमिका)।
6. **निष्कर्ष:** एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों का रचनात्मक सहयोग आवश्यक है, जिसमें पीठासीन अधिकारी एक महत्वपूर्ण सुविधाप्रदाता की भूमिका निभाता है।

स्रोत: The Indian Express


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